Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

गढ़ और मठ को तोडऩे वाले कवि मुक्तिबोध

मुक्तिबोध वे कवि हैं जिनके ज़िक्र के बिना आधुनिक हिन्दी कविता मुकम्मल नहीं होती। वह सही मायने में प्रगतिवादी कवि थे। कविता से भी और जीवन से भी। उनका विरोध सतही नहीं था। समाज का हर दबा-कुचला जो किसी न किसी ब्रह्मराक्षस से डरता था, मुक्तिबोध की कविताओं में अपने आपको सुरक्षित पाता है। मुक्तिबोध जिस फंतासी की बात करते हैं, उसका जुड़ाव उनके जीवन से भी था। अपने जीवन में एक भी संग्रह प्रकाशित न करने वाला कवि एक समय में इतना महत्वपूर्ण बन जाएगा कि उनके बिना कविता की बात मुकम्मल न हो सकेगी, यह किसी फंतासी से कम नहीं है। उनकी कविताओं में जो विरोध है, और उस विरोध में जो आक्रमण करने की क्षमता है, उसमें हर चांद अपना मुंह टेढ़ा पाता है। मुक्तिबोध कबीर की तरह मुंह पर थप्पड़ मारने वाले कवि हैं। मुक्तिबोध की कविता का पक्ष इतना म•ाबूत है कि उनका आलोचक और कहानीकार का रूप कहीं दब सा गया है। मुक्तिबोध अपनी हर कविता की प्रथम श्रोता अपनी पत्नी को बनाते हैं, जो सही रूप में जीवन संगिनी है। मुक्तिबोध का वही समय है जो छायावाद का समय है, लेकिन उनकी कविता छायावाद से आगे की है। छायावाद ने पुराने प्रतीकों का परिमार्जन किया, मुक्तिबोध उन प्रतीकों को लेते हैं जो कविता की वस्तु बनी ही नहीं। उस वक्त की उर्दू शायरी जिस चांद पर टिकी हुई थी, उन्होंने उसका मुंह टेढ़ा कर दिया। मुक्तिबोध ने गुलाब की जगह बबूल को रख दिया। मुक्तिबोध जानते हैं कि आम जनता बबूल की तरह ही शोषित, दलित और उपेक्षित है :-

वह बबूल भी

दुबला धूल भरा अप्रिय सा सहज-उपेक्षित

श्याम वक्र अस्तित्व लिए वह रुक-तिरस्कृत

उपमानों को मौन झेलता चिर अपमानित

मुक्तिबोध अपना वक़्त उसी बबूल के साथ  गुजारते  हैं। उन्हें होरी, महतो और धनिया में अपनापन दिखता है-

आह त्याग की उत्कट प्रतिमा

होरी, महतो भोली धनिया जाग रहे हैं

कवि को चकाचौंध शहर से वह गली भली लगती है जिसमें कीटाणु की तरह रस को चूस लेने वाला पूंजीपति नहीं है। पूंजीपति को देखकर तो उन्हें शीघ्र मतली आ जाती है। मुक्तिबोध महलों में नहीं गलियों में रहना चाहते हैं-

गलियों में रहेंगे और गलियों में खाएंगे

गलियों में रहने वाले लोगों के लिए लडेंग़े

इस प्रकार हर अन्याय के  ख़िलाफ़  लडऩे वाला यह कवि गढ़ और मठ सब तोडऩे के लिए उतारू हो जाता है। यह जानने के बावजूद भी कि इस अभिव्यक्ति में खतरे भी बहुत हैं।

मुक्तिबोध सही मायने में सर्वहारा वर्ग के कवि थे। वे खामोशी के साथ कुछ नहीं करने वाले कवि थे। वे जो बोलते थे कबीर की तरह ठोक बजाकर मुंह पर बोलते थे। उनकी कविता के कैनवस में सिर्फ हिन्दुस्तान ही नहीं है। पूरी पृथ्वी पर जहां कहीं भी असमानता और शोषण है, मुक्तिबोध की आवाज बुलंद होती है।

मैं देखता हूं कि

पृथ्वी के प्रसारों पर

जहां भी स्नेह या संगर

वहां पर मेरी छटपटाहट है

नंदकिशोर नवल ने सही कहा था कि वह एक प्रतिबद्घ नहीं पक्षधर कवि भी हैं। सचमुच मुक्तिबोध पक्ष लेते हैं, लेकिन उसका नहीं जो पूंजीपति हैं, बल्कि उसका जो   ज़मीन  जोतता है, और अपनी  ज़मीन  से बेदखल कर दिया जाता है। वो जो गंदुम उपजाता है, लेकिन उसकी थाली रोटी के स्वाद को नहीं जानती। मुक्तिबोध उसी अभावग्रस्त लोगों के कवि हैं। बकौल मुक्तिबोध- 'छाती भींग जाती है।' हद है हमारी आंखें भी नहीं भींगती।

मुक्तिबोध हमारे समय में समाज की पीड़ा, दुख, दर्द को समझने वाले पहले कवि हैं। मुक्तिबोध अंधेरे के खिलाफ प्रकाश का संघर्ष दिखाते हैं।  भले ही इसके लिए उन्हें 'डरावने जुलूस' का सामना करना पड़े। रीतिकाल के दरबारी कवि सरमायादारों के लिए कविता लिखते थे। मुक्तिबोध को पूंजीपति के नाम पर मतली आती है। उसके रक्त में भी गंदापन है- 'तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र'

मुक्तिबोध नज़र  अकबराबादी की तरह चांद में अपने महबूब का अक्स नहीं देखते। उनके चांद पर तो कफ्र्यू लगा है। मुक्तिबोध को पता है कि इस चाटुकारिता के दौर में जब सब चुप हैं तो किसी को तो आवाज़  बुलंद करनी होगी। मुक्तिबोध इस काम का ज़िम्मा  खुद ले लेते हैं-

सब खामोश

मनसबदार

शायर और सूफी

मुक्तिबोध की कविता बिंब विधान की दृष्टि से भी समृद्घ है। इस दृष्टि से उनकी 'ब्रह्मराक्षस' कविता बेजोड़ है।

कहना न होगा कि गजानन माधव मुक्तिबोध वे कवि हैं, जिनकी कविता तो अपनी है, लेकिन उस कविता में जो तकलीफ है, वह मजदूर, वंचित और श्रमिक वर्ग का है।