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Saturday 18 Nov 2017

मुक्तिबोध की कहानियां-ऐतिहासिक दस्तावेज

गजानन माधव मुक्तिबोध की चर्चा यहां हम एक कहानीकार के रूप में करेंगे। एक ऐसा कहानीकार जिसने अपना पूरा जीवन साहित्य को अर्पित कर दिया। मुक्तिबोध की कहानियां यथार्थ के धरातल पर सच्चाई को बिखेरती एक ऐसी प्रक्रिया है जिसने जीवन से जूझने का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है। मध्यम श्रेणी के समाज के संस्कारों को संवारने और ऊंचा उठाने का कार्य यदि किसी ने किया है तो वे मुक्तिबोध हैं। मुक्तिबोध की कहानियों में जीवन के विभिन्न पक्षों का सजीव चित्रण, विश्लेषण उभरकर आया है।

सामाजिक बंधनों की व्यवस्था पर वे चुप नहीं हंै। उनका आक्रोश देखने को मिलता है। मुक्तिबोध का सारा जीवन संघर्ष की परिभाषा है साहित्य के यथार्थ को उन्होंने अपनी पैनी नजर से उघाड़कर रखा है। आदमी कितना ही बलशाली, धनवान क्यों न हो, यदि समाज के प्रति वह सचेत नहीं है तो उसकी कोई अहमियत नहीं है। मुक्तिबोध की कहानियों की विशेषता है कि वे सहज ही दिल में उतर जाती हैं। अहं पर चोट करती हैं। उनका पात्र मध्यम श्रेणी संघर्षशील नागरिक है। जिसकी कुछ महत्वाकांक्षाएं हैं। मुक्तिबोध के लिए इतिहास चुनौती था। मध्यवर्ग इस इतिहास की एक गुत्थी थी जिसे मुक्तिबोध भली-भांति समझते थे। मध्यवर्ग के चारों ओर फैली कुण्ठा, अवसाद से उन्हें प्रेरणा मिली और उन्होंने कलम से उसे उतारा। मध्यवर्ग के असंतोष, संकट को मुक्तिबोध ने जितना समझा वैसा अन्य लेखक की लेखनी में नहीं दिखा। गरीबी का चित्रण, उन्होंने जिस अभिव्यक्ति से किया है वह अनूठा बन पड़ा है। मुक्तिबोध की कहानियॉं हिन्दी के समकालीन कथा साहित्य की चुनौती है।  नारी पात्रों में पीड़ा, वेदना, ममता का चित्रण जिस काव्यात्मक ढंग से उन्होंने किया है वह अद्वितीय बन पड़ा है। मुक्तिबोध की कहानियों का कोई आन्दोलन नहीं था, हर रचना उनके लिए एक भयानक दीवार को लांघने की कोशिश है। मध्यवर्ग पर छाये संकटों के बादलों से होड़ लेने का संघर्ष है।  मुक्तिबोध की कहानी ''जिन्दगी की कतरन'' का केन्द्र बिन्दु आत्महत्या है। आत्महत्या के साथ जुड़ी कहानी का मर्म हिला के रख देता है। परिवार और समाज को ही उन्होंने दोषी माना है कि वह समाज ही क्या जो अंधविश्वास पर चलता है। समझौता, चाबुक और सतह से उठता आदमी ऐसी कहानियां हैं जिनके पात्र मध्यवर्गीय स्त्री-पुरूष हैं जो सत्य की खोज में अंधकार में प्रेतात्मा की तरह भटक रहे हैं। इन्हें रोशनी की दरकार है। समाज के विषैले तत्व को मुक्तिबोध ने जिस तरह उठाया है वह हमें समाज के विभिन्न पहलुओं को सोचने को विवश करता है।

उनकी तमाम कहानियों में पात्र मध्य वर्ग के आध्यात्मिक संकट के गवाह हैं, भोक्ता विरोधी हैं। हम उनके पात्र को मुक्तिबोध कहें तो अतिशयोक्ति नहीं है, लेखक पात्र के रूप में उतर जाता है, वही कहता है जो लेखक ने भोगा है। पात्र के इस रूप को मुक्तिबोध ने इस तरह उकेरा है कि यथार्थ के धरातल पर समाज का घिनौना रूप ही दिखता है। कहानी ''सतह से उठता आदमी'' संघर्ष की गाथा है। मुक्तिबोध सहयात्री बन उतरे है, समाज को नसीहत भी देते हैं। मुक्तिबोध का कहना है कि जीवन दृष्टि शिक्षा से नहीं आत्मसंघर्ष से प्राप्त होती है। ''आखेट'' कहानी भी कुछ इस तरह की है। कहानी का नायक कांस्टेविल मेहरबान सिंह है जो एक अशिक्षित व्यक्ति है जिसे केवल जुल्म और उत्पीडऩ की टे्रनिंग दी गई है। उसकी अन्तरात्मा शुद्ध, पवित्र है। जो हार नहीं मानती। अन्तरात्मा से किया कार्य शिक्षा से प्रबल है। सर्वहारा के साथ मुक्तिबोध की सहानुभूति है, वे उसे उठते हुए देखना चाहते हैं।

मध्यवर्ग पर थोपी गई तथाकथित आधुनिकता के वे धुरंधर विरोधी हैं। झूठी आर्दशवादिता को उन्होंनेे संहार का खण्डहर कहा है। सारगर्भित कहानियां ही उन्होंने लिखी हैं। मानव विरोधी सिद्धांतों और नियमों को उन्होंने कटघरे में रखा है। बिखरी सामाजिक व्यवस्था तंत्र के खिलाफ  एक अकेली आवाज उठायी है।