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Saturday 18 Nov 2017

मुक्तिबोध-चिन्तन और रचनात्मकता

गजानन माधव मुक्तिबोध को प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु माना जाता है। सच पूछा जाये तो स्वातन्त्रोत्तर काल में जिस वामपंथी चेतना ने विश्व स्तर पर रचनाकारों की कलम को एक विशेष चिन्तनधारा की ओर मुडऩे को मजबूर किया, मुक्तिबोध उसके मुकम्मल चित्र नजर आते हैं। तार-सप्तक में उनकी उपस्थिति जिस प्रकार दजऱ् है उसे प्रयोगवाद की ऐसी तैयार की गई जमीन के रूप में स्वीकार किया गया है जो उनके बाद आने वाली रचनाकारों की पीढ़ी के लिये इतनी उर्वरा सिद्ध हुई कि उन्हें प्रयोगवाद के सर्वाधिक सशक्त रचनाकार के रूप में स्मरण किया जाता है। मुक्तिबोध तारसप्तक के प्रथम कवि थे। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंर्घष और प्रखर राजनैतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार तार सप्तक के माध्यम से सामने आये और इसे एक विडम्बना ही कहा जायेगा कि उनके जीवनकाल में उनका एक भी काव्यसंग्रह प्रकाशित नहीं हुआ यह बिल्कुल शेक्सपियर की रचना यात्रा जैसा ही उदाहरण है। शेक्सपियर की रचनाओं को उनकी मृत्यु के कई साल बाद समकालीन विद्वत समाज ने स्वीकार किया था और मुक्तिबोध का पहला संग्रह चांद का मुंह टेढ़ा है भी उनकी मृत्यु के लगभग एक वर्ष बाद और दूसरा संकलन भूरी भूरी खाक धूल उनकी मृत्यु के सोलह वर्षों बाद प्रकाशित हुआ।

कविता के साथ-साथ कविता विषयक चिन्तन और आलोचना पद्धति को विकसित और समृद्धि करने में भी मुक्तिबोध का योगदान अलग से रेखांकित किया जाता है। 'एक साहित्यिक की डायरी’, 'नयी कविता का आत्मसंघर्ष’ और 'साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र’ उनकी कलम के वे शाहकार हैं जिन्हें आज भी प्रासांगिक माना जाता है। तार सप्तक के अन्य कवियों नेमिचन्द्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजा कुमार माथुर, रामविलास शर्मा एवं स्वयं अज्ञेय की तुलना में मुक्तिबोध कहीं अधिक मौलिक आधुनिक कवि नजर आते हैं। इस मौलिकता का बीज सूत्र उनके जीवन दर्शन में है वो जीवन दर्शन जो उनकी कविताओं में भी प्रतिबिम्बित होता है

''मुझे कदम कदम पर/

चौराहे मिलते हैं/

बाहें फैलायें

एक पर पैर रखता हूं कि सौ राहें फूटती हैं

 मैं उन सबसे गुजरना चाहता हूंू

बहुत अच्छे लगते हैं

उनके तजु़र्बे और अपने सपने सब सच्चे लगते हैं

अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है ।

मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूं जाने क्या मिल जाये

(चांद का मुंह टेढ़ा है पृष्ठ -72 )

जिनका शोषण एक सार्वभौमिक सत्य है उससे युद्ध भी उतना ही पौरूषेय सत्य है। सामाजिकता से प्रेरित क्रान्तिकारी की जिजीविषा कभी नहीं हारती

''शोषण की अतिमात्रा/

स्वार्थों की सुख यात्रा/

जब जब सम्पन्न हुई।

आत्मा से अर्थ गया,

मर गई सम्यता’’

(एक स्वप्न कथा)

एक रचनाकार, वह भी सजग रचनाकर का दायित्व निर्वहन करते हुए मुक्तिबोध ने मानव जीवन के सभी रूपों को चित्रित किया है। अभावग्रस्त, अपमानित, क्षुधित और साथ ही मुस्कुराता, दमकता,चमकता मानव जीवन।

 मातृभाषा पर उनकी कुछ काव्य पंक्तियां देखें

फर-फर आंचर तुमको निहार।

मानो की मातृभाषा बोली

जिससे गूंजा हो घर आंगन /

खनके मानो कि बहुओं की चूड़ी के कंगन

किन्तु समग्र रूप से देखा जाये तो मुक्तिबोध का पूरा का पूरा साहित्य प्रतिरोध के स्वर के गुंजन का साहित्य है। घात से प्रतिघात का प्रतिरोध, जीवन से संघर्ष का प्रतिरोध, शोषित से शोषक का प्रतिरोध एवं समाज की प्रत्येक उस कटुता का प्रतिरोध जो मानव को मानवीय मूल्यों से अलग करती है। तभी तो तथाकथित सभ्य समाज से वे प्रश्न करते हैं

'मेरे सभ्यनगरों और ग्रामों में सभी मानव

सुखी मानव

सुखी, सुन्दर व शोषण मुक्त कब होगें’

राजनीति का अपना गणित है और अपने मूल्य-अमूल्य। हर युग में  राजनीति ने देश और उसकी अस्मिता पर निहित स्वार्थों हित प्रहार ही किया है।

'अंधेरे में’ कविता में इसी पर चोट करते हुए मुक्तिबोध कहते हैं

'मर गया देश अरे जीवित रह गये तुम’

राजनीतिक साहित्य क्षेत्र भी महा असत्य शूकरों का एक तमाशा

यद्यपि बोली जाती है  मुंह से भारतीय संस्कृति की भाषा’’

वामपंथी विचारधारा में क्रान्ति हर समस्या का हल माना गया है। मुक्तिबोध भी इस बोध से मुक्त नहीं है

''हुंकारेंगे प्राण,/

 क्षितिज भी बोलेंगे सब बदलेंगे निजमान/

हमारे भूखे पथ पर गूंजेगा नवज्ञान /

विकल्पित द्वार में से महाक्रान्ति आह्वान।

नमित दीवारों में से बरगद की सुनसान/

छांह खण्डहरों में से गंूजेगा वह भाव।।

हृदय के विचारों में से भाप भरा अभियान।

किन्तु यह भी सत्य है कि मुक्तिबोध बिम्ब प्रधान कवि है। हां यह अलग बात है कि उनकी बिम्ब योजना नितान्त मौलिक है और उनकी प्रयोगधर्मिता की वाहक भी। उनकी रचनाओं में दृश्यबिम्ब है तो श्रव्यबिम्ब भी है। घ्राण बिम्व है तो रस आस्वाट्य बिम्ब भी हैं। कुछ उदाहरण देखें-

इन आकांक्षाओं की देहली पर /

भीतर के भैरवी राग को सुनते हुए /

 काल का चरण रूका है।

स्याह परदे से ढंका चेहरा /

सुरीली किन्तु है आवाज /

 व यद्यपि चीखते से शब्द’’

(दृश्यबिम्ब )

देखता हुआ कमरे की सूनी दीवारें /

वीरान हवा सूंघता हुआ /

मानो मैं दर्द भरे सपने में घूम रहा

(श्रव्यबिम्ब )

जिन्हें देख/

याद आतीं खुर्राट निगाहें /

दांव-पेंच , झगड़े व युद्ध

जागते में फिर से याद आने लगा वह स्वप्न/

फिर से याद आने लगे अंधेरे में चेहरे

(स्मृति बिम्ब )

मुक्तिबोध स्वयं काव्य को दो भागों के विभाजित करते हैं यथार्थवादी और भाववादी किन्तु दोनों में ही विम्ब विधान स्वानुभूत जीवन के यथार्थ विम्बों ं को ही चित्रित करता होना चाहिए। इसी कारण उनकी रचनाओं में रचना और जिंदगी का अन्तराल नहीं है। मुक्तिबोध का रचनाकार सौन्दर्य और विश्व मानव का सुख-दु:ख इन दोनों के संघर्ष का हर पल जीता है। यह एक संश्लिष्ट दर्शन है। उनकी कवितायें ही स्वयं ही उनका, उनके रचनाकार का इतिहास है। छायावादी सोच से प्रगतिवाद तक के सफर का बल्कि उससे भी आगे के सफर का इतिहास है परम्परागत प्रतिमानों को तोड़कर समकालीन व्यवस्था के तमाम गढ़ों को ढहाकर, साहित्यसृजन में नवीन उपमानों को तलाशने के प्रयास का इतिहास है, तोडऩे ही होंगे दुर्गम पहाड़ों के उस पार तब कहीं देखने को मिलेंगी बाहें /जिसमें की प्रतिपल कांपता रहता है। अरूण कमल

 संक्षेप में कहा जाये तो मुक्तिबोध एक दृढ़ वैचारिक चिन्तक एवं बहुमुखी सृजनात्मक प्रतिभा के ओज से आभूषित ऐसे रचनाकार हैं जो साहित्यमें न केवल नये मुहावरे गढऩे में सिद्धहस्त हंै वरन जिनका साहित्य समकालीन क्षितिज की रेखाओं के पार झांकता नजर आता है।