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Tuesday 21 Nov 2017

जीवन और कविता का बोध- मुक्तिबोध

मानो या मत मानो / इस नाजुक घड़ी में / चन्द्र है, सविता है/

पोस्टर ही कविता है / वेदना के रक्त से लिखे गए /

लाल नीले अक्षरों में झलकती / सृजन की नई परछाइयां /

गलियों के कानों में गूंजती है / भाव की झाइयां /

धड़कती छाती की

प्यार भरी गरमी में / भाप बने आंसू के / दुर्निवार अक्षर /

चराख से लगी हुई कारतूस गोली के धड़ाकों से टकरा /

प्रतिरोधी कविता / बनते हैं पोस्टर / जमाने के पैगम्बर /

आसमान थामते हैं कंधों पर / हड़ताली पोस्टर / कहते हैं-

आदमी को दर्द भरी गहरी पुकार सुन / जी दौड़ पड़ता है,

आदमी है वह भी, / जैसे तुम भी आदमी, वैसे मैं भी आदमी।

सच तो ये है कि किसी भी समय के मुकाबले हमें कविता की  ज़रूरत आज कहीं ज्यादा है। हमें कविता से प्राप्त होने वाले दुष्कर सत्य की जरूरत है, हमें उस अप्रत्यक्ष आग्रह की जरूरत है जो 'सुने जाने के जादू' के प्रति कविता करती है।

इस दुनिया में जहां बंदूकों की होड़ लगी हुई है, बम बारूदों की बहसें जारी हैं और इस उन्माद को पोसता हुआ विश्वास फैला है कि सिर्फ हमारा पक्ष, हमारा धर्म, हमारी राजनीति ही सही है, दुनिया युद्ध की ओर एक घातक अंश पर झुकी हुई है, हमें उस आवाज की जरूरत है, जो हमारे भीतर के सर्वोच्च को संबोधित हों।

हमें उस आवाज की जरूरत है जो हमारी खुशियों से बात कर सके, हमारे बचपन और निजी राष्ट्रीय स्थितियों के बंधन से बात कर सके। वो आवाज जो हमारे संदेहों, हमारे भय से बात कर सके और उन सभी अकल्पित आयामों से भी, जो न केवल हमें  मनुष्य बनाते हैं, बल्कि हमारा होना भी बचाते हैं, हमारा होना जिस होने को, सितारे अपनी फुसफुसाहटों से छुआ करते हैं। सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं के कारण टूटते-बिखरते संबंधों और मूल्यों को बचाए रखने के लिए सतत प्रयत्नशील मुक्तिबोध ने ये कहा था- ''ये बात संदेह से परे है कि सच्चा आशावाद मनुष्य की ज्वलंत वास्तविक ऊष्मा से उत्पन्न होता है, केवल भविष्य स्वप्न से नहीं, आज की परिस्थितियां ऐसी हैं कि जब कष्टग्रस्त मानव श्रेणी को अपने उद्धार का रास्ता स्वयं अपने हाथों बनाना होगा। उसके पास न केवल एक विश्व स्वप्न है वरन विश्व के क्रांतिकारी अनुभवों का एक खजाना भी है। मुक्तिबोध की धारणा रही है कि मनुष्य का जीवन त्रिकोणात्मक है और इस त्रिकोण की एक भुजा यानी मानव संबंधों से निर्मित बाह्य विश्व। दूसरी भुजा यानी मनुष्य का आंतरिक जीवन। और उसके इस अंतरंगी जीवन में अनेक बातें समाहित हैं। जैसे बाह्य वास्तविकता, समाज और प्रकृति में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करना। मनुष्य का अंतरंग जीवन और बाह्य विश्व यही दो भुजाएं तीसरी भुजा को जन्म देती हैं और ये तीसरी भुजा है, मानवीय संवेदना। कविता या कला स्वानुभूत जीवन की पुनर्रचना है, कल्पना की सहायता से की गई पुनर्रचना।''

यह रचना या सृजन देखने में बेजान होती है, लेकिन जानदारों से ज्यादा जानदार होती है और मनुष्यता की निरंतरता इसी सृजन में है।

कवि आपसे कुछ नहीं चाहता, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की, गहन ध्वनि को सुने- मुक्तिबोध अपनी 'अंधेरे में' कविता में स्वार्थी, कुचक्री मनोवृत्ति का चित्रण वे करते हैं।

ओ मेरे आदर्शवादी मन /

ओ मेरे सिद्धांतवादी मन /

अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया?

 उदरम्भ रिवन अनात्म बच गए।

भूतों की शादी में कनात से तन गए।

किसी व्याभिचार के बन गए बिस्तर।

 दु:खों के दागों को तमगों का पहना /

 अपने ही खयालों में दिनरात रहना /

 असंग बुद्धि व अकेले में सहना /

 जिन्दगी निष्क्रिय बन गई तल घर /

 अब तक क्या किया जीवन क्या जिया?

इन पिछले दशकों में न जाने कितनी बातें घटित हुई हैं वे सब हमारे सामने हैं, कभी उन्हें प्रत्यक्ष देखा है, कभी पढ़ा सुना है, तो कभी स्वयं उसका हिस्सा बने हैं। तंग गलियों में चक्कर काटती जिन्दगी को देखते हुए यही मानना पड़ता है, कि साधारण श्रेणी में रहने वाले यानी आम लोगों को अस्तित्व संघर्ष के प्रयासों में ही समाप्त होना है। सच तो यह है कि व्यक्ति की सच्ची आत्म परीक्षा, उसकी आध्यात्मिक शक्ति की परीक्षा का सबसे प्रधान समय, इम्तिहान का सबसे नाजुक दौर यही आज का समय है। आज का युग है। और हमारे सामने तीन प्रकार के संघर्ष हैं, जिन्हें करना आवश्यक है, मुक्तिबोध के शब्द हंै- तीन प्रकार के संघर्ष करना आवश्यक है। अभिव्यक्ति का संघर्ष, आत्मसंघर्ष और तत्व प्राप्ति के लिए संघर्ष। सच्चे मनीषी कलाकार के जीवन में, ये तीनों संघर्ष एक साथ स्वाभाविक रूप से चलते रहते हैं और इसलिए कलाकार का जीवन पीड़ा से ग्रस्त जीवन होता है। केवल सृजन की पीड़ा से नहीं अन्य पीड़ाओं से भी।

इन तमाम पीड़ाओं से स्वयं गुजरे हैं मुक्तिबोध, और उनके सम्पूर्ण रचना व्यक्तित्व में से एक साथ गुजरना था। इस गुजरने की चाह एक उत्तेजक अनुभव भले ही हो, पर संभव नहीं है।

अब इसे दुर्भाग्य ही कहना होगा कि अभिव्यक्ति के जिन खतरों को मुक्तिबोध आजीवन डसते रहें, जिन संघर्षों को उन्होंने वाणी दी उसकी व्याप्ति उनकी मृत्यु के पश्चात ही हो सभी यानी मुक्तिबोध की अधिकांश रचनाएं मृत्यु के पश्चात ही प्रकाशित हुई।

काव्य संग्रह- चांद का मुंह टेढ़ा है, भूरी भूरी खा$क धूल, कहानी संग्रह- काठ का सपना और सतह से उठता आदमी, उपन्यास- विपात्र, आलोचना- नई कविता का आत्मसंघर्ष / कामायनी- एक पुनर्विचार, एक साहित्यिक की डायरी, और नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र में व्याप्त मुक्तिबोध- कालहीनता और क्षणभंगुरता के बाह्य बोध से मुक्त कर हमें उस आंतरिक भावबोध की ओर ले जाते हैं, जो तमाम संकीर्ण विचारों से मुक्त कर मनुष्यता को बचाए रखने के प्रयास में एक कदम आगे बढ़ाता है।

जीवन और कविता के संबंध का बोध कराते मुक्तिबोध हमारी संवेदनाओं को जगाते हैं, अभिव्यक्ति के $खतरे उठाते हैं, और अपने समय को झकझोरने के शब्द सिखलाते हैं।