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Sunday 19 Nov 2017

जुझारू व्यक्तित्व के धनी कवि सम्राट मुक्तिबोध

उंगलियों में बीड़ी दबाए, मुक्तिबोध का विचारशील चेहरेवाला चित्र, साहित्य की दुनिया में बहुत लोकप्रिय है। इस विचारशील चेहरे की एक-एक रेखा जैसे कवि के भीतरी उद्वेलन की साक्षी है। मानो मुक्तिबोध पूछ रहे हों- 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ मुक्तिबोध एक संघर्षशील और विचारशील कवि थे।

मुक्तिबोध हिन्दी के उन विरले प्रसिद्घ कवियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने कविता और कला को एक साथ साधा  है तथा उनका उद्देश्य एक बिन्दु पर केन्द्रित हुआ है। मुक्तिबोध की आत्मस्वीकृति है-

''समस्या एक /

मेरे नगरों और ग्रामों में / सभी मानव

सुखी सुंदर व पोषण मुक्त / कब होंगे?’’

(चांद का मुंह टेढ़ा है- पृष्ठ-169)

मुक्तिबोध के लिए कविता और जीवन के कुछ मायने थे। इनकी रचनाओं में मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है- जो उनकी संवेदनशीलता को रेखांकित करती है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, शोषण, कुशासन, अन्याय, दोषपूर्ण अर्थव्यवस्था आदि उनके भीतर की अभिव्यक्ति को व्यक्त करने के लिए उन्हें उकसाती रहती थीं। यही कारण है कि मुक्तिबोध की कविताओं में सामाजिक कुरीतियां और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का सजीव चित्रण मिलता है। राजनीतिज्ञ हों या पूंजीपति या फिर बुद्घिजीवियों की दुरभिसंधि, उनके प्रति वे सदा गंभीर और चिंतनशील रहें। उनके मानना था कि यह वह कारण है जो मध्यमवर्ग की उदासीनता को जन्म देती है।

अभिव्यक्ति के तमाम खतरे उठाते हुए अपनी कविताओं तथा आलोचनात्मक लेखों के माध्यम से, उन्होंने वस्तु और रूप के स्थापित ढांचों को, चुनौती देते रहने का काम किया है। अपनी रचनाशीलता एवं तेवरपूर्ण रवैये के कारण मुक्तिबोध, चर्चित तो जरूर हुए किन्तु उतने ही बहुविवादित भी रहें। यह अलग बात है कि उनके जीवनकाल में न तो उनकी एक भी काव्यकृति प्रकाशित हुई, न ही उनके जीवन, उनके व्यक्तित्व और उनकी रचनाशीलता का समुचित मूल्यांकन हो पाया। शायद, इसीलिए शरतचंद्र ने एक जगह लिखा भी है कि ''रचनाकार का सही मूल्यांकन, उसके जीवन में शायद ही हो पाता है। उनकी मृत्युपरांत या कई दशक बाद सही स्वरूप दिखाई पड़ता है।‘’

'चांद का मुंह टेढ़ा है’, 'एक अंत कथा’, 'अंधेरे में’, 'ब्रह्मराक्षस’, 'कामायनी एक पुनर्विचार’, 'भारतीय इतिहास और संस्कृति’, 'नई कविता का आत्मसंघर्ष’ जैसी कृतियों के रचयिता का जन्म 13 नवम्बर 1917 को मध्यप्रदेश के श्योपुर कस्बे में हुआ था। मुक्तिबोध संघर्षपूर्ण जिजीविषा वाले जीवंत रचनाकार थे। वे हिन्दी के अतिविशिष्ट रचनाकार थे।

मुक्तिबोध की आरंभिक शिक्षा अनेक स्थानों में हुई। उज्जैन से मिडिल और इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की, तो बी.ए. की पढ़ाई के लिए इंदौर चले गए। इंदौर में वरिष्ठ रचनाकार वीरेन्द्र कुमार जैन, प्रभागचंद शर्मा और प्रभाकर माचवे से उनका संपर्क हुआ, जिनका प्रभाव उनके जीवन और रचनाशीलता दोनों पर पड़ा। इसी समय उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरूआत भी की।

1935-36 के आसपास उनकी आरंभिक कविताएं 'कर्मवीर’ में प्रकाशित होने लगी थीं। 'कर्मवीर’ का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी कर रहे थे। आगे चलकर 'वाणी’ और 'वीणा’ जैसे पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाओं का प्रकाशन होने लगा।

सन् 1943 में अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित 'तार सप्तक’, एक नई काव्य-चेतना का संदेशवाहक बनकर उनके साहित्यिक जीवन में आया। इस संग्रह के सात कवियों में एक मुक्तिबोध भी थे, जिनकी सोलह कविताएं प्रकाशित हुईं और समकालीन कविता के प्रतिनिधि कवि के रूप में उनकी पहचान बनी। इसके बावजूद उनके जीवन में संघर्ष का सिलसिला चलता रहा।

वे संभ्रांत परिवार के नहीं थे। पूरा जीवन अर्थसंकट में जूझते रहे। जीवन यापन के लिए अलग-अलग शहरों में अध्यापक के काम से लेकर संपादक तक का काम उन्होंने संजीदगी से किया।

अपने जीवनयापन के लिए वे अपने जीवन भर जबलपुर, बनारस, उज्जैन, नागपुर, इलाहाबाद, कलकत्ता जैसे कई शहरों में भटकते रहें। किन्तु इस संघर्षमय भटकाव के बावजूद उनकी रचनाशीलता में कोई कमी नहीं आई। एक जगह से दूसरी जगह भटकते हुए भी उन्होंने अपना लेखन जारी रखा।

इसी बीच उनकी आस्था माक्र्सवाद की तरफ बढ़ी। नेमीचंद जैन की मित्रता और प्रकाशचंद्र गुप्त के वैचारिक लगाव ने उन्हें इस विचाराधारा की ओर मोड़ा जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकती है। तमाम बाधाओं को झेलते हुए, अपनी रचनाशीलता को बनाए रखना, हर रचनाकार के लिए संभव नहीं होता। आजकल तो किसी स्थापित रचनाकार के जीवन में थोड़ी सी अस्थिरता क्या आ जाती है तो वे कई-कई दशक तक रचनाशीलता से दूर हो जाते हैं। मुक्तिबोध जैसे कम रचनाकार ही ऐसे होते हैं, जो अपनी आस्थाओं को समेटे हुए, आर्थिक विपन्नता व अस्थिरता को झेलते हुए, अत्यंत कष्टपूर्ण समय में भी अपनी मौलिक रचनाशीलता को बनाए रखते हैं। दरअसल, ऐसे जुझारू रचनाकार ही इतिहास पुरुष होते हैं।

 मुक्तिबोध कुछ समय के लिए 'हंस’ पत्रिका से भी जुड़े थे और संपादकीय विभाग का कार्य देखते थे। लेकिन उनकी संपादन कौशल की पहचान बनी नागपुर से प्रकाशित 'नया खून’ पत्रिका से। उनके दिशा-निर्देश में 'नया खून’ में गजब का बदलाव आया। परिवर्तनकामी गतिशीलता का तेवर ग्रहण किया 'नया खून’ ने।

यही वह समय था, जब मुक्तिबोध को साहित्य में अमर हो जाने वाली कृतियों को सामने आना था। जबलपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'वसुधा’ में धारावाहिक रूप से उनकी 'एक साहित्यिक की डायरी’ प्रकाशित होने लगी। इन्हीं दिनों नई समीक्षा-दृष्टि का ऐलान किया मुक्तिबोध ने- 'कामायनी : एक पुनर्विचार’ जैसे आलोचनात्मक लेख के माध्यम से। यह मौलिकता, साहित्यिक इलाकों में भले सहज रूप से स्वीकार नहीं हो पाई, किन्तु आगे चलकर यही कृति उनके लेखन की मिसाल बनी।

1954 में मुक्तिबोध नागपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी एम.ए. पास कर, प्राध्यापक पद की तलाश कर रहे थे। अंतत: अपने परिश्रम के फलस्वरूप 1958 में राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक पद पाने में वे सफल हुए जो उनके जीवन-यापन के लिए काफी था। यहीं रहते हुए उन्होंने कई श्रेष्ठ रचनाओं का सृजन किया, जिसमें 'ब्रह्म राक्षस’ और 'अंधेरे में’ (काव्यकृति), 'काठ का सपना’ तथा 'सतह से उठता आदमी’ (कहानी संग्रह) 'विपात्र’ (उपन्यास) आदि प्रमुख है।

मुक्तिबोध एक निष्पक्ष और निर्भीक रचनाकार थे। उनके साहित्यिक जीवन में एक बड़ी घटना तब घटी, जब 1962 में उनकी पुस्तक 'भारत : इतिहास और संस्कृति’ पर मध्यप्रदेश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। इस एक घटना ने मुक्तिबोध को भीतर तक आहत किया। वे विचलित हो गए। उन्हें अपने आसपास हर तरफ षडयंत्र दिखलाई देने लगे। भयंकर असुरक्षा की भावना उनके भीतर जड़ गई। इसका प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ा। दिनों-दिन वे कमजोर होते चले गए।

अपने जीवनकाल में उन्होंने कभी गलत तरीके से धर्नाजन नहींकिया, न तो पूंजी जमा कर पाए। अपनी आन-शान में जीते रहें।  मुक्तिबोध टालस्टॉय, गोर्की और कार्लमाक्र्स को खूब पसंद करते थे। हिन्दी रचनाकारों में रवीन्द्रनाथ टैगोर से प्रभावित थे। वे गरीबों, शोषित वर्गों के मसीहा थे। उनकी रचनाओं में उपेक्षित, दलित वर्ग और शोषित वर्ग की पुकार गूंजती थी।

वे जात-पांत, ऊंच-नीच के घोर विरोधी थे। परिवार की नाराजगी के बावजूद उन्होंने जात-पांत और सामाजिक कुरीतियों का बहिष्कार करते हुए प्रेम-विवाह किया और सफल भी रहे। इस प्रेम-विवाह के कारण पूरे परिवार, संबंधियों तथा समाज का विरोध सहने को बाध्य हुए। जीवनभर उन्होंने आदर्श को जीया, जो उनकी रचनात्मक शक्ति थी। यह अलग बात है कि ईश्वर ने उन्हें दीर्घ प्रतिष्ठा तो दी, किन्तु लम्बी आयु न दी और 11 सितंबर 1964 को वे अपना नश्वर शरीर छोड़कर मात्र 47 साल की उम्र में ही स्वर्गवासी हो गए।

यह सच है कि मुुक्तिबोध के लिए कविता और जीवन अभिन्न थे। उनका समस्त साहित्य एक संवेदनशील रचनाकार की मार्मिक संवेदनाओं से भरा-पूरा है जो अवसरवादिता या भौतिकवाद के लिए किसी गलत रास्ते से समझौता नहीं करता।

सुप्रसिद्घ आलोचक डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में- ''नई कविता में मुक्तिबोध की  जगह वही है, जो छायावाद में निराला की थी।‘’

मुक्तिबोध सिर्फ एक रचनाकार नहीं, सामाजिक व्यक्ति थे, जिनका सारा जीवन लेखन के अतिरिक्त राजनीतिक-साहित्यिक बहसों-विचार-विमर्शों में गया। इमसें दो मत नहीं कि जुझारू व्यक्तित्व के धनी थे कवि सम्राट मुक्तिबोध।