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Wednesday 22 Nov 2017

अगाध अंत:करण का कवि

बहुमुखी प्रतिभा के धनी गजानन माधव मुक्तिबोध उन अल्पायु रचनाकारों में से हैं जिनकी श्रृंखला आधुनिक युग में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, रांगेय राघव, से होती हुई धूमिल तक पहुंचती है। उनकी भौतिक काया को पूरे सैंतालिस वर्ष भी नहीं मिल पाए, पर उनकी यश:काया जरा-मरण की सीमाओं से परे पहुंच चुकी है। उनके जीवनकाल में तो उनकी कविताएं आतंकित करती ही थीं अतलांत से उभरकर ऊपर आ गए उनके 'ब्रह्मराक्षस’ अब भी पाठकों, आलोचकों, काव्शास्त्रियों और समाजशास्त्रियों के मन-मस्तिष्क को आक्रांत किए रहते हैं।

'पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?’ को तकियाकलाम बनाने वाले मुक्तिबोध की स्वयं की पालिटिक्स वाग्वीरों की पालिटिक्स न होकर दिग्विजयी महानायकों को ठेंगा दिखाती एक प्रबल प्रतिनायक की पालिटिक्स थी, जो अपने लक्ष्य के प्रति आश्वस्त हैं, अपने मार्ग के प्रति आश्वस्त हैं और अपनी निष्कलुष, निश्छल आत्मशक्ति के प्रति आश्वस्त हैं। अभावों से ग्रस्त जीवन, सामाजिक-राजनैतिक स्वार्थ के चक्रव्यूहों से अभिमन्यु की भांति जूझते हुए वे अंतत: अपनी 'अणदागी पाग’ से उन्नत सिर अपराजेय बने रहे। मन-वचन-कर्म में एकाकार मुक्तिबोध हिन्दी साहित्य में एक धूमकेतु की भांति छाए रहे और अपनी सामथ्र्य, अडिग निष्ठा तथा संघर्षजनित जिजीविषा से साहित्याकाश को एक अद्भुत अरुणिम आभा से उद्दीप्त किए रहे। जीविकोपार्जन का जटिल चक्रवात उन्हें मिडिल स्कूल की मास्टरी, वायुसेना, पत्रकारिता और पार्टी, सूचना तथा प्रसारण विभाग, आकाशवाणी, पाठ्यपुस्तक लेखन तक उन्हें बडऩगर, सुजातपुर, उज्जैन, कोलकाता, इंदौर, मुंबई, बंगलुरु, काशी, जबलपुर, नागपुर तक का चक्कर लगवाता रहा और फिर दिग्विजय महाविद्यालय राजनांदगांव में प्रोफेसर बनाकर स्थापित कर पाया।

विद्रोही कवि जीवन और समाज में भी विद्रोही बना रहा। इसकी परिणति प्रेम-विवाह से हुई। बीमारी लम्बी होती-होती उन्हें दिल्ली ले गई जहां से वे 11 सितम्बर 1964 को परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। 'मुक्तिबोध रचनावली’ के छ: खण्डों में प्रकाशित उनकी सामग्री उनके जीवनकाल में पत्र-पत्रिकाओं और कुछ संकलनों तक ही पहुंच पाई थी। उनका एक भी कविता-संकलन उन्हें स्वयं प्रकाशित देखने को नहीं मिला। उनके निधनोपरांत उनके संकलन 'चांद का मुंह टेढ़ा’ और 'भूरी-भूरी खाक धूल’ प्रकाश में आए।

एक सजग कवि को साहित्यालोचन के माध्यम से अपने पथ, पाथेय और गंतव्य को स्पष्ट करना पड़ता है। मुक्तिबोध ने इसके लिए 'कामायनी : एक पुनर्विचार’ को आगे किया जो आनन-फानन साहित्य-जगत पर छा गया। 'नई कविता का आत्मसंघर्ष’ के माध्यम से उन्होंने नई कविता के आलोचकों का मुंह बंद करते हुए अपने मंतव्य को स्पष्ट किया। 'नये साहित्य का सौंदर्य शास्त्र’ और 'एक साहित्यिक की डायरी’ मुक्तिबोध के साहित्य को समझने के लिए अपरिहार्य संदर्भ-ग्रंथ हैं। कथा-साहित्य के क्षेत्र में उनका अवदान 'काठ का सपना’ और 'सतह से उठता आदमी’ जैसे कहानी-संग्रह और 'विपात्र’ उपन्यास हैं। अन्य चिंतकों की भांति उन्होंने अपने विचारों की पुष्टि हेतु इतिहास और संस्कृति का सहारा लेते हुए 'भारत : इतिहास और संस्कृति’ का प्रणयन किया।

परम्परा को स्वीकार करते हुए भी अलग राह के अन्वेषियों के सामने एक खतरा हमेशा रहता है और वह यह कि यदि वे अपने जटिल प्रतीकों, बिम्बों एवं उपमानों की कुंजी न उपलब्ध करा पाएं तो पाठक या तो अर्थ का अनर्थ कर लेता है या फिर मुंहबाएं खड़ा रहता है और कहीं पहुंच नहीं पाता है। इसी कारण से साहित्य के आधुनिक युग के प्राय: सभी साहित्यकार अपने काव्य-विषयों की पहचान-हेतु गद्य में अपने साहित्य-कर्म का उद्घाटन करते रहते हैं। कहानियां और उपन्यास तो वे विषय हैं जो काव्य के माध्यम से नहीं आ सकते थे। मुक्तिबोध के काव्य-जीवन का प्रादुर्भाव प्रगतिवाद के यौवन-काल में हुआ और प्रयोगवाद के प्राय: अंत तक चला। अत: उनकी विचारधारा केन्द्र के बायीं ओर ही रही- मजदूरों, किसानों, मेहनतकशों और रोटी के लिए संघर्षरत प्राणियों की पक्षधर। उनके काव्य-प्रतीक जगह-जगह पर रक्तवर्णी हो जाते हैं। लेकिन उनकी कीर्ति उनकी विचारधारा से अधिक उनकी सजगता, संजीदगी और ईमानदारी के कारण चर्चा और विवाद के केन्द्र में रही।

साहित्य-जगत में उनको बनी-बनाई राहें नहीं भायीं। अपने समय के प्रचलित रस-छंद के वर्चस्व वाले वातावरण से उन्होंने छंद तो ग्रहण किया पर उसको भी अपनी रुचि से मोड़कर एक नया ही स्वरूप दे दिया, तुक से अधिक लय की अंतर्धारा को अपनाया। निराला के छंद-बंध को तोडऩे को भी उन्होंने एक सीमा तक ही स्वीकार किया और एक प्रकार से 'एकला चलो’ ही बने रहे। तत्कालीन छोटी कविताओं के परिवेश में छोटी कविताएं लिखते हुए भी उन्होंने सुदीर्घ (दीर्घ ही नहीं, छत्तीस पृष्ठ तक की अति दीर्घ) कविताएं लिखने का जोखिम उठाया और सफल रहे। उन्हें कभी नहीं लगा कि अपनी बात थोड़े से शब्दों में पूरी तरह से व्यक्त की जा सकती है या निबटायी जा सकती है, पर इसके लिए उन्होंने कभी सत्य के स्वीकार के साथ कोई समझौता नहीं किया। वे इस बात के भी विश्वासी थे कि कविता की व्याख्या नहीं की जा सकती, वह एक ऐसा दिव्य तत्व है जो अनवरत साधना से हस्तगत हो पाता है। पाठक को कवि के अंतस्तल तक उठना या उतरना ही होगा; अन्यथा, उसके हाथ कुछ नहीं आएगा। उनका काव्य-संसार समाज का अपरिचित नहीं सुपरिचित है परत-दर-परत पर कवि की प्राणवत्ता, संघर्षशीलता और सत्य की पक्षधरता तथा मनुष्य की अपराजेय जिजीविषा की पूर्ण आश्वस्ति उसे एक अनोखी आभा से दीप्त कर देती है।  उन्होंने अपने दार्शनिक चिंतन को सृजनात्मक चिंतन बनाया और इस मणिकांचन संयोग से जो काव्य-रस तैयार किया वह उनका सर्वथा अपना है- न किसी से उधार लिया हुआ न किसी पर थोपा हुआ। उन्हें लगातार नए-नए पंथों की खोज करना, नए-नए संघर्ष में रत रहना, नए-नए मुहावरों को आकार देना; असफलता, अधीरता हतोत्साहिता को पास न फटकने देना अच्छा लगता रहा। संसार की बेहतरी के प्रति उनकी पूर्ण आस्था थी और यह आस्था ही उनको अडिग भाव से काव्य-पथ पर बनाए रही। उन्होंने बराबर वर्तमान को अच्छा मार्ग देने का प्रयास किया, अपने उत्तरदायित्व को दृष्टिगत रखते हुए सबके प्रति उदार भाव से आगे बढ़ते रहे-दूसरे के गुण-दोषों से निरपेक्ष। अपनी असफलताओं के लिए कभी किसी को बलि का बकरा नहीं बनाया न नैतिकता बोध को कभी ओझल होने दिया। उनका अलक्षित संसार भी हमारा पथ-प्रदर्शन करने में पूर्ण समर्थ है।

उनके काव्य-जगत में चील, घुघ्घू और चमगादड़ तक का प्रवेश निषेध नहीं है। उनकी 'बेचैन चील’ व्यक्ति के उस बेचैन अंतर्मन का प्रतीक है जो सदैव पर्यटनशील है और पानी की तलाश में झांसा ही प्राय: खाता रहता है। उन्हें उन तथाकथित क्रांतिदृष्टाओं पर 'बहुत शर्म आती है’ जो 'मानव-मुक्ति न्यास का’ ज्वलंत इतिहास बनाने वालों के साथ खून बहाने से कतराते रहते हैं। उनकी 'शब्दों का अर्थ जब’ उनतीस छंदों वाली एक सत्रह पृष्ठ लम्बी कविता है जिसके कुछ प्रयोग बड़े अनूठे हैं- 'श्रद्धा के द्वारों पर लगे हुए। स्वार्थों के तालों-सा’, 'व्रणीभूत दुर्दर की दर्दभरी टेरों-सा’, 'खौंखियाती बिल्ली के रागों-सा’, 'दम भरते दंभों के / सियारों का जंगल में / मंगल का अंधियारा’,  'स्वप्नों की चमचमाती हुई स्याह रश्मि या दीर्घ लहराता हुआ काल-सर्प /महत्वाकेंक्षाओं का सरसराता चढ़ता काल-नाग’, 'लक्ष्यों की अकुलाती/यशवंती कीर्ति-उषा’,  'वेगवान चक्रों को / कुचक्रों के अस्त्रों से तोडऩेवालों की / स्वयं की श्लाघा-सा’, 'वेदों की वाणी-सा / जन-जन की गर्दन पर / शोषक के फरसे की / भीषण कहानी-सा’, 'गर्दन मटकाते दर्पभर कौओं सा’, 'सांस्कृतिक लम्हों में / लफंगों के लास-रास’, 'सत्ता के लोहे के डंडे’, 'सज्जन की आत्मा जब विधवा बन जाती है’, 'प्रतिभा के शिशुओं की / अंतिम-दम-चीखों-सा’, 'अहंकार-तुष्टि के नशे में चित/तर्कों का चक्रव्यूह जाल बुना जाता है’, 'जनता की दु:खजनित / आस्था का स्वार्थग्रस्त दुरुपयोग’, 'सामाजिक-आध्यात्मिक / शोषण के जल प्रलय’, 'आकुलित अनुभव के माथे पर / लक्ष्यों के लाल-लाल कुंकुम-सा’, 'जीवन के विक्षोभित अर्थों की उज्जयनी’, 'प्राणों की सरयू... / तुलसी-स्वर-गंधिता’, अर्थों के हिमनग, आदि।

वे मानते थे कि शब्दों का अभिधार्थ एक होते हुए भी व्यंजना-लक्षणा-ध्वनि और मर्म भिन्न-भिन्न होते हैं तथा जीवन के तथ्यों के सामान्यीकरणों का असामान्यीकरण करना ही पड़ता है। साहस की जिंदगी रोमांटिक होती है, उससे बहुत प्रेरणा मिलती है। उनकी प्रेरणा दूसरों की प्रेरणाओं से इतनी भिन्न थी 'कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है।‘उनके स्वप्न भी दूसरों के स्वप्नों की भांति विश्रृंखलित होते हैं पर उनके स्वप्नों जैसी, विश्रृंखलित कविताएं भी पाठकों के धैर्य और स्मरण-शक्ति की परीक्षा लेने के बावजूद एक सशक्त अंतर्धारा के रूप में प्रवहमान हैं। उनकी 'अंधेरे में’ की ये पंक्तियां जन-जन की जुबान पर हैं और अपने राजनेताओं को धिक्कारती हैं-

'बहुत-बहुत ज्यादा लिया,

दिया बहुत-बहुत कम,

मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम!!

लोकहित-पिता को घर से निकाल दिया,

जन-मन-करुणा-सी मां को हकाल दिया,

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अपने ही कीचड़ में धंस गए!!

विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में

आदर्श खा गए।‘

मुक्तिबोध कठिन समय के एक कठिन कवि थे। उनके इस शताब्दी वर्ष में उन पर और बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जाएगा। आशा करनी चाहिए कि वह सब मिलकर उनके विराट काव्य व्यक्तित्व को सम्पूर्ण करके उनके सम्यक् मूल्यांकन का मार्ग प्रशस्त करेगा।