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Saturday 18 Nov 2017

सामान्यीकरण का असामान्यीकरण करते मुक्तिबोध

मुक्तिबोध हिंदी के उन विरले प्रतिबद्ध कवियों में हैं जिन्होंने कविता और कला के उद्देश्य को एक बिन्दु पर केन्द्रित करते हुए कहा था-

 समस्या एक

मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में

सभी मानव

सुखी सुंदर व शोषणमुक्त

कब होंगे?

(चकमक की चिनगारियाँ, चाँद का मुँह टेढ़ा है, पृ 169 )

फिर इसी प्रश्न को एक व्यापक वितान पर तानते हुए लगभग चुनौती भरे स्वर में सबको अपनी पक्षधरता तय करने के लिए ललकारते हुए पूछा था-

बशर्ते तय करो, किस ओर हो तुम, अब

सुनहले ऊध्र्व आसन के

दबाते पक्ष में, अथवा

कहीं उससे लुटी टूटी

अंधेरी निम्न कक्षा में तुम्हारा मन,

कहाँ हो तुम?

(चकमक की चिनगारियाँ, चाँद का मुँह टेढ़ा है, पृ 162)

जिन्दगी की लड़ाई में बुरी तरह हारकर मुक्तिबोध कविता में जीत जाते हैं। कविता उनके लिए हारिल की लकड़ी थी। किसी ने उनका साथ नहीं दिया। मन, विचार और सपनों के लोक में सिर्फ कविता उनके साथ थी जिसके सहारे उन्होंने अपने आकुल हृदय के भीतर ऐसे उधार और मुक्त समाज को रच लिया जहां वे जी सकते थे। सारी अनगढ़ता के बावजूद भूरी भूरी खाक धूल की कविताओं में प्यार से धड़कता बेहद संवेदनशील मन छाह से लहराता दिखाई देता है जिसमें जोखिम से भरे ढेर सारे फैसले लेने का बेपरवाह साहस है। भावना और विचारों की आत्मसिद्धि एक दिन चुपचाप ही किस तरह रचना को बड़ा कर जाती है यह देखने के लिए भूरी भूरी खाक धूल की बारीक चलनी को धीरज से चालना होगा। निश्चय ही सोने के असंख्य कण हाथ लगेंगे।

चांद का मुंह टेढ़ा है की तुलना में इस संग्रह की कविताएं मुखर प्रगतिवादी बल्कि कुछ तो भविष्यवादी भी लगती हैं। इस संग्रह की राजनीतिक आशा की बेहद मुखर और लाउड कविताओं के बरक्स चाँद का मुंह टेढ़ा है की कविताओं को रखकर देखने से जाहिर हो जाता है कि मुक्तिबोध ने दस-पन्द्रह बरस के छोटे से कालखण्ड में ही कितना लम्बा सफर तय किया था, वह भी निपट अकेले। बड़ी कविता निर्मम आत्मदान मांगती है। सचमुच मुक्तिबोध ने अपने को मारकर कविता को जिला लिया, हम लोगों तक पहुंचाने के लिए। अगर किसी हद तक एक साहित्यिक की डायरी, चांद का मुंह टेढ़ा है, की कुंजी है तो नये साहित्य का सौन्दर्य-शास्त्र, भूरी भूरी खाक धूल की।

और बैलगाड़ी के पहिये भी बहुत बार

ठीक यहीं टूटते

होती है डाकेजनी

चट्टान अंधेरी पर

इसीलिए राइफल सम्हाले

सावधान चलते हैं

चलना ही पड़ता है

क्या करें

जीवन के तथ्यों के

सामान्यीकरणों का

करना ही पड़ता है हमें असामान्यीकरण।

(इसी बैलगाड़ी को, पृ. 30)

मुक्तिबोध के लिए कविता और जीवन अभिन्न थे। उनका समस्त साहित्य उस संवेदनशील रचनाकार की मार्मिक अभिव्यक्ति है जिसने अपने युग यथार्थ को बाह्य एवं आंतरिक दोनों स्तरों पर गहराई से महसूस किया। स्वाधीनता के बाद, देश जिस भ्रष्ट, शोषक और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के दंश को झेल रहा था, मुक्तिबोध अपनी कविताओं में उस व्यवस्था का असली चेहरा सामने लाते हैं और साथ ही उसमें व्यक्ति की अपनी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। राजनीतिज्ञों, पूँजीपतियों एवं बुद्धिजीवियों की दुरभिसंधि के बीच मध्यवर्ग की उदासीनता जिस संकट को जन्म दे रही थी मुक्तिबोध का साहित्य उसका विस्तृत वर्णन है। अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हुए उन्होंने वस्तु और रूप के स्थापित ढांचों को चुनौती दी। इसीलिए अपने समय में उनका साहित्य चर्चित होने के साथ-साथ बहुविवादित भी रहा और उसका समुचित मूल्यांकन उनके जीवनकाल के बाद ही संभव हो पाया।

संघर्षपूर्ण जिजीविषा वाले इस कवि का जन्म 13 नवम्बर, 1917 को मध्यप्रदेश के श्योपुर कस्बे में हुआ था। मुक्तिबोध की आरंभिक शिक्षा अनेक स्थानों में हुई। मिडिल और इन्टरमीडिएट की परीक्षा उन्होंने उज्जैन में रहकर उत्तीर्ण की। बीए की पढ़ाई के लिए वे इन्दौर चले आए जहां उनका परिचय वीरेन्द्र कुमार जैन, प्रभागचन्द्र शर्मा और प्रभाकर माचवे से हुआ। इन सबका उनके जीवन पर काफी प्रभाव पड़ा। साहित्यिक यात्रा की शुरुआत भी लगभग इसी समय हुई। 1935-36 में उनकी आरंभिक कविताएं माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा संपादित कर्मवीर में प्रकाशित हुई। इसी तरह वाणी, वीणा जैसी पत्रिकाओं में भी कुछ रचनाएँ आई।

हिन्दी कविता के इतिहास एवं मुक्तिबोध के कवि जीवन में, 1943 में प्रकाशित तार-सप्तक एक नई काव्य-चेतना का संदेशवाहक बनकर आया। अज्ञेय के संपादन में सात कवियों के इस संग्रह में मुक्तिबोध की सोलह कविताएँ प्रकाशित हुईं। तार-सप्तक से उन्हें पहचान तो मिली लेकिन जीवन में संघर्ष का सिलसिला चलता ही रहा। जीवनयापन के लिए अलग-अलग शहरों में अध्यापकी से लेकर संपादकी तक उन्हें जो काम मिला वे करते रहे। उज्जैन, बनारस, कलकत्ता, जबलपुर, नागपुर, इलाहाबाद आदि एक जगह से दूसरी जगह भटकते हुए भी उन्होंने अपना लेखन जारी रखा। प्रकाशचन्द्र गुप्त के प्रभाव व नेमिचंद्र जैन की मित्रता से माक्र्सवाद में उनकी आस्था बढ़ती गई जो उनके लेखन में साफ झलकती है। यूं तो उनके साहित्य में प्रगतिशीलता से लेकर माक्र्सवाद, समाजवाद, अस्तित्ववाद और रहस्यवाद तक की प्रवृत्तियों का प्रभाव देखा गया। अपनी आस्थाओं को समेटे हुए, आर्थिक विपन्नता व अस्थिरता को झेलते हुए अत्यंत कष्टपूर्ण समय में भी मुक्तिबोध ने अपनी मौलिक रचनाशीलता को बचाए रखा।

कुछ समय के लिए मुक्तिबोध हंस के संपादकीय विभाग में भी रहे लेकिन उनकी संपादन कला का उत्कर्ष नागपुर से प्रकाशित नया खून में देखने को मिलता है। उनके दिशा निर्देश में पत्र ने परिवर्तनकामी गतिशीलता का तेवर ग्रहण किया। उन्हीं दिनों जबलपुर से निकलने वाली पत्रिका वसुधा में उनकी लिखी एक साहित्यिक की डायरी धारावाहिक रूप से प्रकाशित हो रही थी। कामायनी: एक पुनर्विचार के माध्यम से वे पहले ही एक नई समीक्षा दृष्टि का ऐलान कर चुके थे। उनकी मौलिकता साहित्यिक इलाकों में सहज स्वीकार्य नहीं हो रही थी। इसीलिए जीवन की भटकन से भी उन्हें मुक्ति नहीं मिल पा रही थी। 1954 में उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एमए पास कर लिया जिससे उन्हें कहीं कोई प्राध्यापकीय पद मिल सके और उनके जीवन में कुछ स्थिरता आ सके। आखिरकार, 1958 में राजनांदगाँव के दिग्विजय कॉलेज में वे प्राध्यापक हो गए। यहां रहते हुए उन्होंने अपना सर्वोत्तम साहित्य रचा। ब्रह्मराक्षस और अँधेरे में तथा अन्य कई महत्त्वपूर्ण कविताओं के साथ-साथ काठ का सपना व सतह से उठता आदमी (कहानी-संग्रह)विपात्र (उपन्यास) आदि की रचना इसी समय में हुई। यहीं उन्होंने कामायनी: एक पुनर्विचार को भी अंतिम रूप दिया।

मुक्तिबोध की कविताओं को पढ़ते हुए जो पहली प्रतिक्रिया होती है वह कुछ इस तरह की है-

समझ में आ न सकता हो

कि जैसे बात का आधार

लेकिन बात गहरी हो।

(ब्रह्मराक्षस, चाँद का मुँह टेढ़ा है पृ 35 )

ये कविताएँ उन महत्वपूर्ण रचनाओं में से हैं जो समझ में आने से पहले हृदय तक पहुँच जाती है। साथ ही यह भी सच है कि इन कविताओं के बार-बार वाचन से कविता के अनेक अर्थस्तर खुलते जाते हैं जो कवि की गहन वैचारिकता और अद्भुत रचना-सामथ्र्य की गवाही देते हैं। मुक्तिबोध की ये लंबी कविताएं संश्लिष्ट संवेदना की अभिव्यक्ति हैं। इनमें अनेक सूत्र, विचार, भाव-दशाएँ, मन:स्थितियां और वस्तुस्थिति के विवरण परस्पर समन्वित होकर एक अपूर्व काव्य संवेदना की रचना करते हैं। इन कविताओं को समझने की सबसे बड़ी कुंजी है। उनका समय। मुक्तिबोध ने भारतीय इतिहास का वह दौर देखा था जिसमें स्वतंत्रता के मुरझाते हुए सपने थे। शासन की बागडोर विदेशी सत्ता से निकलकर भारतीय हाथों में अवश्य आ गई थी लेकिन व्यवस्था का स्वरूप नहीं बदला। समाज अब भी भयानक रूप से विषमताग्रस्त था। काव्य: एक सांस्कृतिक प्रक्रिया नामक निबंध में मुक्तिबोध ने अपने युग की परिस्थितियों और उसमें कवि की स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा, आज का कवि एक असाधारण असामान्य युग में रह रहा है। वह एक ऐसे युग में है, जहाँ मानव सभ्यता संबंधी प्रश्न महत्वपूर्ण हो उठे हैं। समाज भयानक रूप से विषमता-ग्रस्त हो गया है। चारों ओर नैतिक ह्रास के दृश्य दिखायी दे रहे हैं। शोषण और उत्पीडऩ पहले से बहुत अधिक बढ़ गया है। नोच-खसोट, अवसरवाद, भ्रष्टाचार का बाजार गर्म है। कल के मसीहा आज उत्पीड़क हो उठे हैं। मानव-संबंध टूट-फूट गये हैं। समाज में, शोषकों, उत्पीड़कों और उनके साथियों का जोर बढ़ गया है। (नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबन्ध, पृ 14-15)। पूंजीवादी सभ्यता के विकास ने पूरी सामाजिक व्यवस्था को रुग्ण कर दिया। ऐसी अवस्था में प्रत्येक श्रेष्ठ मानवीय भाव अधोगति को प्राप्त हुए। अन्याय, अत्याचार, शोषण, अवसरवाद तथा समझौतापरस्ती का एक पूरा तंत्र समाज में फैल गया। सतह पर सब कुछ सही दिखने पर भी भीतर से पूरी मूल्य-व्यवस्था चरमरा गई थी। मुक्तिबोध को इस विसंगति का गहरा अहसास था। उनकी कविताओं की संवेदना इसी विसंगति-बोध से उपजती है। महत्वपूर्ण यह है कि यह विसंगति-बोध कहीं भी कविता को निराशा की ओर नहीं मोड़ता बल्कि आत्मसंघर्ष की ओर, आत्म-विश्लेषण तथा संशोधन की ओर ले जाता है। मुक्तिबोध आत्म विश्लेषण के माध्यम से इस युग के सामाजिक संघर्ष को समझना चाहते हैं।

 मुक्तिबोध की कविताओं में संवेदना का स्वरूप अति विशिष्ट है। ये कविताएँ एक भावात्मक बेचैनी से शुरू होती हैं लेकिन क्रमश: उनमें विचार की भूमिका दृढ़ होती जाती है। यहाँ आत्मसंघर्ष, केवल आत्मगत नहीं, वस्तु स्थिति के कारणों को रेखांकित करने की अदम्य आकांक्षा उस संवेदना को ज्ञान से जोड़ देती है। अपनी कविताओं में मुक्तिबोध संवेदना के इसी ज्ञानात्मक रूप के पक्षधर रहे हैं। उनके यहाँ ज्ञान और संवेदना एकांगी अवधारणाएं नहीं हैं। एक साहित्यिक की डायरी में उन्होंने भोक्ता की संवेदना तथा दर्शक के ज्ञान की बात कही। ज्ञान और संवेदना दोनों का संबंध हमारे चारों ओर व्याप्त वास्तविक जीवन से है, मनुष्य अपने जीवन में विभिन्न परिस्थितियों व क्षणों को झेलता है। इस अर्थ में वह उनका भोक्ता है। अनुभव की इस प्रक्रिया में वह अत्यंत मूल्यवान संवेदनाएं अर्जित करता है, किंतु जब तक ये संवेदनाएं एकांगी हैं इनका कोई महत्व नहीं। परिस्थिति के ज्ञान, जीवन में प्राप्त शिक्षा-दीक्षा, विभिन्न प्रभावों और संस्कारों के संचित ज्ञान के अभाव में ये संवेदनाएँ हमारी दृष्टि को धुंधला कर सकती हैं। मुक्तिबोध मानते हैं कि संवेदना का ज्ञानात्मक होना जरूरी है अर्थात् संवेदना का ज्ञान द्वारा संयत और निर्दिष्ट होना आवश्यक है। इसी प्रकार, एकांगी ज्ञान भी जब तक कोरा, शुष्क, नीरस और जीवन के प्रत्यक्ष अनुभवों की संवेदना से वंचित रहेगा तब तक मूल्यवान या उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकेगा। कवि इच्छा प्रकट करता है-

हमें था चाहिए कुछ और

....

कि जिससे वक्ष

हो सिद्धान्त-सा मजबूत

भीतर भाव गीला हो।

(नक्षत्र-खंड, चाँद का मुँह टेढ़ा है, पृ 153)

संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना को भीतर संजोने से ही कविता पूर्णता की ओर अग्रसर होती है। मुक्तिबोध उन रचनाकारों में से हैं जिनके लिए व्यापक मानवीय उद्देश्यों के प्रति कवि की प्रतिबद्धता बहुत मूल्यवान है। उनकी कविता में व्यक्त संवेदनात्मक उद्देश्य इसी भावना के अनुरूप हैं। सभी कविताओं में एक प्रक्रिया अनिवार्य रूप से घटित होती है और वह है आत्मग्रस्तता से आत्म चेत होने की स्थिति। कवि अपने सम्मुख एक आदर्श रखता है-

कभी अकेले में मुक्ति न मिलती

यदि वह है तो सबके ही साथ है।

 (चम्बल की घाटी में, चाँद का मुँह टेढ़ा है, पृ 253)

मुक्तिबोध की कविता के उद्देश्य और दिशा स्पष्ट है कि विषम समाज को बदलना होगा। इस संवेदनात्मक उद्देश्य से संचालित होकर ही कल्पना उनकी कविताओं में जीवन की पुनर्रचना करती है, मानस बिम्बों का निर्माण करती है और काव्य-नायक स्वयं को उस फैंटेसी में विचरण करता हुआ पाता है-

मैं विचरण करता-सा हूँ एक फैंटेसी में

यह निश्चित है कि फैंटेसी कल वास्तव होगी।

(एक अंत:कथा, चाँद का मुँह टेढ़ा है, पृ 253)

मुक्तिबोध के यहाँ काव्य-रचना का एक विशिष्ट पैटर्न है जिसे हम चाँद का मुँह टेढ़ा है, काव्यसंग्रह की पहली कविता भूल-गलती के माध्यम से समझ सकते हैं यद्यपि उनकी अन्य महत्वपूर्ण कविताओं की तरह यह कविता लंबी नहीं है फिर भी यहाँ उनकी कविताओं के सभी अनिवार्य घटक मौजूद हैं।

जिन्दगी जब एक सुखद भविष्य की ओर करवट ले रही थी तभी मुक्तिबोध के साहित्यिक जीवन में एक और बड़ी दुर्घटना घटी। 1962 में उनकी पुस्तक भारत: इतिहास और संस्कृति पर मध्यप्रदेश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। इस घटना ने मुक्तिबोध को बुरी तरह झकझोर दिया। उन्हें अपने आस-पास हर ओर एक षड्यंत्र दिखाई पडऩे लगा। भयंकर असुरक्षा की भावना उन्हें घेरने लगी जिसके परिणामस्वरूप फरवरी 1964 में उन्हें पक्षाघात का झटका लगा। कई लेखक साथियों के अनुरोध पर सरकारी मदद से उन्हें नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती किया गया लेकिन उच्च चिकित्सा व्यवस्था भी उन्हें बचा न सकी। 11 सितंबर, 1964 को मुक्तिबोध को अपनी पीड़ा से छुटकारा मिल गया।