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Saturday 18 Nov 2017

खतों में साकार होता युगीन परिदृश्य

मैंआज कटिबद्ध हूं /पार्वत्य अपने प्राण में

प्रतिपल धड़कती जो कि निर्झर शक्ति है/उसको समर्पित कर चलूं।

कैसे पराजित हो सकेगी बोल! मेरी शक्ति यह।

 मुक्तिबोध /कविता - पराजित हो चलंू

रमेश गजानन मुक्तिबोध और अशोक वाजपेयी ने मुक्तिबोध के नाम 11.03.1936 से 07.04.1964 तक अठ्ठाइस  वर्षों की अवधि में 43 लेखकों द्वारा लिखे गए कुल 306 पत्रों को मेरे युवजन मेरे परिजन में संकलित किया। यह संकलन मुक्तिबोध के भीतर निर्मित होते हुए साहित्यकार की प्रेरणा व जिजीविषा, बनती-बिगड़ती आर्थिक-सामाजिक स्थितियों में गठित होते हुए उनके चरित्र व साहित्यकार बंधुओं के प्रति उनके सहृदयपूर्ण दृष्टिकोण का सम्यक चित्र प्रस्तुत करता है। 28 वर्ष एक लंबी अवधि है जिसमें साहित्यकारों ने परतंत्र भारत की बंदिशों से लेकर नव स्वतंत्र राष्ट्र के सपनों को भी महसूस किया। हिंदी जगत में तार सप्तक का प्रकाशन एक युगान्तर घटना है जिसके विकास व निर्माण के प्रत्येक चरण का इन पत्रों में जि़क्र मिलता है। अत: यह पत्र संकलन तत्कालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों के विहंगावलोकन का सुदृढ़ आधार बन गया है।

मुक्तिबोध का समकालीन रचनाकारों से अत्यंत आत्मीय और हार्दिक संबंध रहा। ये संबंध साहित्यिक प्रेरणा को उर्जस्वित करते रहे। अक्सर पत्र लेखक ने मुक्तिबोध को बड़े मन से याद किया, देखने की उत्कट इच्छा प्रकट की, मिलने पर बहुत-सी महत्वपूर्ण गतिविधियों के विषय में जि़क्र करने का वायदा किया। कहीं पत्र लिखने में विलंब के लिए खेद प्रकट किया गया है तो कहीं मुक्तिबोध का पत्र न मिलने पर प्यार भरी उलाहना।

ये तथ्य पाठकों के समक्ष मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के सूक्ष्म तंतुओं को उभारते हैं। इन पत्रों में मुक्तिबोध के व्यक्तित्व की नए रूप से शिनाख्त की जा सकती है। खासकर उन आलोचकों के लिए जो उनके लेखन को कठिन कहकर पाठकों को भटकाते हैं। तात्पर्य यह है कि जिसका व्यक्तित्व शीशे की तरह पाक-साफ  हो उसके लेखन पर सवाल उठाने से पूर्व उसके व्यक्तित्व की गहराइयों में गोते लगाना आवश्यक शर्त है। आम पाठक भी जानता है कि हिन्दी के लेखक अक्सर संघर्षपूर्ण जि़ंदगी जीते रहे हैं किंतु मुक्तिबोध का जीवन कभी भी सपाट मैदान में प्रवाहित नदी की तरह नहीं बहा बल्कि उसमें आद्योपांत पहाडिय़ों से उछल-कूदकर उतरने वाली निर्झरिणी का उफान रहा। ये पत्र उनके जीवन के इसी घायल पक्ष, क्षत-विक्षत चिंतातुर हृदय की तकलीफ  की झलक देते हैं, बावजूद इसके उनकी प्रखर जीवन-दृष्टि को भी बयान करते हैं। अपने दोस्तों को अक्सर 'पार्टनर' कहकर संबोधित करने वाला यह रचना-शिल्पी अपने समय में अधिकांश विचार-शिखाओं के केंद्र में रहा। दरअसल नियमित रूप से पत्र लिखकर साहित्यकारों से विचारों का आदान-प्रदान करते हुए मुक्तिबोध अपनी रचनाशीलता को पल्लवित करते रहे।

प्रभाकर माचवे एवं अज्ञेय के पत्रों ने तार सप्तक के निर्माण के प्रत्येक चरण को उद्भासित किया है। अज्ञेय 29.09.42 को लिखे खत में लिखते हैं कि तार सप्तक में यदि प्रत्येक व्यक्ति को 16 पृष्ठ दिए जाएं, और 16 भूमिका के लिए रख लें, तो कुल जमा आठ रिम कागज़ लगेगा। 500 प्रति के लिए 120/- लगेगा, अतएव यदि प्रत्येक व्यक्ति 20/-रुपए की किश्त भी डाल दे तो पुस्तकें तैयार हो जाएंगी और प्रत्येक कवि के घर 12-12  प्रतियां भी पहुंचा दी जाएंगी। वे मुक्तिबोध पर पुस्तक की भूमिका हो या नहीं, कौन भूमिका लिखे, प्रत्येक कवि का संक्षिप्त साहित्य चरित्र हो कि नहीं, कवि अपनी कविता पर एक छोटा-सा वक्तव्य दे या नहीं, आदि मुद्दों पर भी राय मांगते हैं। अज्ञेय द्वारा लिखे अधिकतर पत्रों को पढ़कर तार सप्तक के जन्म तथा तत्कालीन युगीन परिवेश का आभास अनायास ही मिलता है। शिवदान सिंह चौहान द्वारा 19 फरवरी 1963 को लिखे खत में आलोचना पत्रिका के मूल्यांकन स्तंभ में तीन पुस्तकों की समीक्षा दिए जाने के विचार की चर्चा की गई है। त्रिलोचन के पत्रों में प्रदीप पत्रिका की रूपरेखा तो जगदीश भारती की चिठ्ठी में पत्रिका के माध्यम से प्रचलित वादों को चलाने के विषय में महत्वपूर्ण तथ्य उपलब्ध है। ध्यातव्य है कि मुक्तिबोध अपने समय की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। जगत शंखधर संदर्भ पत्रिका निकालने से पूर्व मुक्तिबोध से परामर्श लेते हुए लिखते हैं कि जनवरी 63 से संदर्भ नाम से भाषा, कला और संस्कृति का आलोचना त्रैमासिक प्रकाशित किया जाएगा जिसका मूल्य दस रुपए वार्षिक रखा जाएगा। इस पत्रिका के विषय में मुक्तिबोध से सुझाव मांगे गए हैं  तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण: रचना प्रक्रिया के अन्वेषण का प्रश्न, विषय पर निबंध लिख भेजने का आग्रह भी संलग्न है। इसी प्रकार तार सप्तक के पुनर्मुद्रण के दौरान भारतभूषण अग्रवाल अपने खत में मुक्तिबोध से पुरानी रचनाओं में कुछ जोडऩे-घटाने की इच्छा तथा दो-तीन नई रचनाएं भेजने की बात कहते हैं। हिन्दी का साहित्यिक परिवेश पत्रिकाओं के प्रकाशन व उनसे जुड़ी गतिविधियों से निश्चित रूप से सम्वर्धित होता गया एवं इन पत्रों में मुक्तिबोध के साथ किए गए विचार-विमर्श पाठकों को उनकी सहभगिता तथा एकाग्रता का आभास दिलाता है। हरिशंकर परसाई अपने पत्र में वसुधा और नरेश मेहता कृति के अंकों के संबंध में मुक्तिबोध के सुझावों की अपेक्षा रखते हैं।

नारायण विष्णु जोशी के पत्रों में कठिन आर्थिक संघर्ष से गुजऱते हुए मुक्तिबोध की तकलीफ  को महसूस किया जा सकता है। वह साहित्यकार जो पाठकों को राह दिखाता रहा, स्वयं नौकरी की तलाश में भटकता रहा, जि़ंदगी की गाड़ी खींचते हुए आहत होता रहा। किंतु अपने स्नेहिल स्वभाव की बदौलत अपने मित्रों का प्रिय बना रहा। तभी तो नारायण विष्णु जोशी 01.02.1947 को भेजे अपने पत्र में लिखते हैं- 'Although you are so far off from me I had always the feeling that our hearts beat the some beats.I was feeling thought as if some time bird of mine has flown away from my case to Banaras I was expecting that it would return to me sometime or the other. Your letter gave me the evidence of the familiar chirping and I was assured of having you once again.'

मुक्तिबोध के व्यक्तित्व की गहराइयों को उनके कवि मित्रों के पत्रों से परखा जा सकता है। वीरेन्द्र कुमार जैन 17 सितंबर 1939 के पत्र में लिखते हैं  कि तुम तो मनोविज्ञान और मेटाफिजिक्स के पंडित हो, फिलॉसफर हो इसलिए तुम्हारे छोटे से पत्र में भी तुम्हारी पर्सनैलिटी का कंप्लेक्स या यों कहें कन्फ्लिक्ट बड़े ही सुंदर विश्लेषणात्मक ढंग से रुजू हुआ है। तुम्हारे जीवन के दो पहलू, अंधेरा और प्रकाशमय, रियल और आइडियल या कहें 'पे' और 'ought' को तुमने objectively सुलझाकर रखा है। श्रीकांत मेहता 13.12.1963 के पत्र में अपने हृदय की गहराइयों को यों व्यक्त करते हैं- 'मैं जिस तरह की निर्वैयक्तिक दुनिया में रह रहा हूं उसमें आपके आत्मीय पत्र ने मुझे एक बार फिर से अपने और न जाने कितनी बातों के बारे में सोचने के लिए बाध्य किया। ....मैं स्वयं चाहता था कि आपसे मुलाकात होती तो इन बातों पर आपका मत और विचार जानने-समझने की कोशिश करता। मेरे लिए अन्य किसी भी विचारों से अधिक महत्वपूर्ण आपके विचार रहे हैं और हैं। आपका पत्र आता है तो बहुत करीब से आपकी आवाज़ सुनाई पड़ती है। रेगिस्तान में चलते हुए आदमी को जैसे अचानक हरित भूमि दिखाई पड़ जाए, वैसा ही अनुभव होता है।

 तो ये थे मुक्तिबोध, जो अपने मित्र साहित्यकारों की प्रेरणा व उर्जा भी थे और उच्चतम वैचारिक संभावनाओं में जिन्होंने अपनी ठोस भूमिका निभायी। विनोद कुमार शुक्ल, परसाई आदि के पत्रों में मुक्तिबोध के गिरते स्वास्थ्य के प्रति व्यक्त चिंता पाठकों को उन क्षणों को महसूस कराते हैं जब इस लेखक ने कठिन बीमारियों से जूझते हुए साहित्य की मशाल जलाए रखा। परसाई ने मुक्तिबोध के नाम पर लिखे अपने लेख में इस कवि की कर्तव्यपरायणता पर यों विचार किया है-जो थोड़े-पैसे उनके हाथ में आ गए थे, वे कुलबुला रहे थे। उन्हें कितने ही कर्तव्य याद आ रहे थ। कोई मित्र कष्ट में है, किसी की पत्नी बीमार है, किसी की लड़की बीमार है, किसी के बच्चों के लिए कपड़े बनवाना है। उस अवस्था में जब वे खुद अपंग हो गए थे और अर्थाभाव से पीडि़त थे, वे दूसरों पर इन पैसों को खर्च कर देना चाहते थे। परसाई रचनावली-6

साहित्यकारों ने समय-समय पर आंदोलन छेड़े हैं, ये पत्र उन्हीं के प्रामाणिक दस्तावेज हैं। मुक्तिबोध ऐसे कई आंदोलनों में शरीक हुए, अपने साहित्यिक स्वार्थ व उन्नति की परवाह किए बिना। उनका दबंग व्यक्तित्व केवल उनके लेखन का श्रृंगार नहीं था बल्कि उनकी साहित्यिक निर्भीकता को उनके चारित्रिक गठन में देखा जा सकता है। 08.04.1941 को वीरेन्द्र कुमार जैन के पत्र में मुक्तिबोध से मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के प्रधानमंत्री के खिलाफ साहित्यिक आंदोलन चलाने तथा हस्ताक्षर अभियान हेतु परामर्श किया गया है। इसके बाद के पत्रों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि मुक्तिबोध आंदोलनों में महत भूमिका निभाते रहे। वीरेंद्र कुमार जैन के 14.12.1942 का पत्र बताता है कि मुक्तिबोध एक लेखक सम्मेलन के विचार के साथ सामने आए थे जिसका उनके बंधुओं ने हार्दिक स्वागत किया। प्रकाशचंद्र गुप्त 29.09.1948 को अंग्रेज़ी में लिखे अपने खत में हिंदी भाषा से जुड़ी विभिन्न समस्याओं के विषय में मुक्तिबोध से सलाह मशविरा करते हैं जैसे हिंदी व उर्दू को क्या दो अलग भाषा माना जाए, ब्रजभाषा, अवधी, बुंदेलखंडी, भोजपुरी, मैथिली को स्वतंत्र भाषा माने या हिंदी की बोलियां, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश व गढ़वालियों की मातृभाषा हिंदी ही है या अन्य कोई बोली या भाषा, भारत की अन्य भाषाओं के साथ राष्ट्रभाषा का कैसा संबंध हो, पारिभाषिक शब्दावली की समस्या इत्यादि। मुक्तिबोध से अनुरोध किया जाता है कि वे इस प्रकार के सभी मुद्दों पर अपने सटीक मत लेकर इलाहाबाद में होने वाली बैठक में शामिल हों। हरिनारायण व्यास के पत्रों में देश की आजा़दी के मोहभंग का दर्द छलकता है जिसे वे मुक्तिबोध से शेयर करते हैं क्योंकि वे जानते थे कि यह कलमकार सच से कभी मुंह नहीं मोड़ता।

लेखक अपने दर्द का विषपान कर जगत को सृजनात्मक अमृत परोसता है। मुक्तिबोध के बड़े बेटे की मृत्यु पर उनकी तकलीफ  को 12.11.1959 को वीरेंद्र कुमार जैन का पत्र आभासित करता है। नौकरी के लिए इस लेखक को बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी पर उनकी सहृदयता ने उनके दोस्तों को सदा उनके करीब बांधकर रखा तभी नेमीचंद्र जैन द्वारा 22.09.1947 को अंग्रेज़ी में लिखे पत्र में एक बार फिर मुक्तिबोध की नौकरी के संघर्ष के संकेत मिलते हैं।  मुक्तिबोध एक संवेदनशील कलमकार ही नहीं, एक भावुक व सहृदय बंधु भी थे। उनके मित्रों के जवाबी पत्र अक्सर उनकी संवेदना से आवेष्टित होते हैं। जैसे जब कवि वीरेंद्र कुमार जैन स्वयं को नितांत अकेला महसूस करते हैं तो वे मुक्तिबोध को पास पाने की तमन्ना जाहिर करते हैं। उनका व्यक्तित्व उनके बंधुओं को प्रभावित किए बिना नहीं रहता तभी तो नरेश मेहता 18.08.1958 को लिखे अपने पत्र में मुक्तिबोध की तुलना वासुदेव से करते हैं जो अपने जीवन के लिए जल, वायु आदि प्रकृति से ग्रहण नहीं करते किंतु व्यक्ति के गंगा-भाव को अपने लिए अघ्र्य बनाते हैं।

अत: इस पत्र संकलन के पत्र मुक्तिबोध के व्यक्तित्व से संवाद कर रहे हैं। उनके दृष्टिकोण के अति सूक्ष्म तार भी नजऱ में आ रहे हैं। उनके लेखन का वैविध्य पाठकों की एक बड़ी बिरादरी को दशकों से सक्षम रूप से प्रभावित करता रहा पर लेखक का निजी जीवन और आत्मीय बंधुओं से उनके अंतरंग संबंधों के आलोक में उनके लेखन को आस्वादित करना कदाचित एक विरला अनुभव है।