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Monday 20 Nov 2017

मुक्तिबोध के काव्य में राष्ट्रीय चेतना

नई कविता में राष्ट्रीय चेतना की अनुभूति की दृष्टि से मुक्तिबोध का सृजन अन्यतम है। उनकी चेतना प्रधान कविताओं में बाह्य आवरण शुष्क, खुरदरा और जटिल लक्षित होता है, और संभवत: यह एक सच्चाई भी है जो मुक्तिबोध के काव्य को समझने में रहस्यात्मक संसार की सृष्टि करती है। हिंदी के आलोचकों ने मुक्तिबोध के साथ, उनके लेखन के साथ न्याय नहीं किया है। मुक्तिबोध को एक साजिश के तहत आधुनिक कविता के केशव दास कहकर मात्र पाठ्यक्रम में ही सीमित कर दिया है। मुक्तिबोध को नई कविता के केशवदास कहना मुक्तिबोध के काव्य के प्रति एक डर पैदा करना है।

अपनी मातृभूमि और अपने देशवासियों के प्रति अगाध प्रेम, श्रद्धा, विश्वास और आस्था का भाव मुक्तिबोध के काव्य को राष्ट्रीय काव्यधारा से जोड़ देता है। मुक्तिबोध की कवि शिराओं में भारतीय जनता का रक्त संचारित है जिनमें उनके भीतर बैठे देशभक्त को सदा स्फूर्ति प्रेरणा अभय एवं धैर्य मिला करता है। कवि मुक्तिबोध एक सच्चे  राष्ट्रभक्त के रूप में अपने देशवासियों की आशाओं-आकांक्षाओं और सफलताओं एवं असफलताओं पर न्योछावर है। वह राष्ट्रीयता के रंग में रंगे हर किसी चरण पर शत-शत जीवन समर्पित करने को तैयार है -

जिन लोगों ने

अपने अंतर में घिरे हुए

गहरी ममता में अगरन धूम के बादल सी

मुझे अथाह मस्ती प्रदान की

                  ***

जिनके स्वभाव के गंगाजल ने

युगों-युगों को तारा है

जिनके कारण यह हिंदुस्तान हमारा है

कल्याण कथाओं में घुलकर

जिन लाखों हाथों-पैरों ने यह दुनिया पार लगाई है

जिनके कि पूत-पावन चरणों में हुलसे मन से निछावर जा सकते हैं

सौ-सौ जीवन

उन जनजन का दुदंती रुधिर

मेरे भीतर

         ***

उनकी हिम्मत ,उनका धीरज ,उनकी ताकत

पायी मैंने अपने भीतर

अत:

मंडराता है मेरा जी चारों ओर सदा

उनके ही तो 

(जब प्रश्न चिन्ह बौखला उठे)

यह कवि की भारतीय दृष्टि है। मुक्तिबोध को समझौते का अस्तित्व मान्य नहीं है। समन्वय उसे पाखंड लगा है। वे वर्तमान अर्थतंत्र को नष्टभ्रष्ट कर नवीन व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं। समुन्नत राष्ट्र के लिए कवि राष्ट्रीय शक्तियों की भावत्मक एकता का आकांक्षी है। कवि की मान्यता है कि शोषणहीन समाज की स्थापना राष्ट्रीय ऐक्य पर ही आधारित है-

मुझे मालूम

अनगिन सागरों में क्षुब्ध फूलों पर

पहाड़ों-जंगलों में मुक्तिकामी लोक-सेनाएं

भयानक वार करती शत्रु मूलों पर

व मेरे स्याह बालों में उलझता और चेहरे पर लहराता है

उन्हीं की अग्नि क्षोभी धूम

(चकमक की चिनगारियाँ) 

मुक्तिबोध ने पौराणिक मिथकों के प्रयोग से जो भी बातें कहनी चाही हैं उसमें भी राष्ट्रीय चेतना की गंध फैली हुई है-

हम सब साथ मिल

दण्डक वन में से लंका का पथ खोज निकाल सके

प्रतिपल

धीरे-धीरे ही सही बढ़े उत्यानों में अभियानों में  (डूबता चाँद कब डूबेगा )

मुक्तिबोध बन्धनों को तोड़कर जिये। उन सारे बन्धनों को जो आदमी को परे पालने के लिए स्वीकार करने पड़ते। मुक्तिबोध ने कभी भी समझौता नहीं किया। वे ईमानदारी के प्रतीक थे, वे तथाकथित संकीर्ण जनवादी, प्रगतिवाद की लीक से हटकर चलते हैं।

मुक्तिबोध आस्थावादी साधक कवि थे जैसे कबीर ,तुलसीदास उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशान्वित हंै, वैसे ही मुक्तिबोध भी। जैसे भक्त का हृदय राम की झलक देखकर असीम उल्लास का अनुभव करता है, वैसे ही मुक्तिबोध भी अपनी परम दुर्निवार अभिव्यक्ति की झलक पाकर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

 मुक्तिबोध के काव्य की समग्र राष्ट्रीय चेतना ने व्यक्तिपरकता, सामाजिकता, समसामयिक परिवेश  की, सामाजिक मूल्यों की पुनस्र्थापना, सामाजिक क्रांति की जिज्ञासा, ललक, मानवीय समभाव, दीन-हीन वर्ग के प्रति सहृदयता की भावना, मानवीय संवेदना के निर्माण, राष्ट्रीय जागरण और नव संवेदना, लिए व्यापक परिवर्तन की और क्रांति की आकांक्षा, अतिवादी दृष्टिकोण का विरोध, राष्ट्रीय कल्याण के प्रति आस्था और जिजीविषा, लोकहितवादी जीवन दृष्टि आदि अनेक आयामों के आलोक में जो कुछ भोगा है, महसूस किया है, देखा है, बेबाक, बेहिचक, निर्भीक होकर उसे वाणी दी है। अत: मुक्तिबोध अपने युग के अन्यतम हस्ताक्षर हैं-राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति के सबल प्रहरी।

राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति की अन्तर्धारा कवि मन को प्राय: प्रत्येक रचना प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में आन्दोलित करती रहती है। राष्ट्रीय भावना सामाजिक चेतना और नैतिक मूल्यों के प्रति कवि की दृष्टि पूर्णरूपेण सजग रही है। देश की अधोगति के प्रति कवि सर्वत्र मुखर रहा है। मुक्तिबोध की अधिकांश कविताओं में लडख़ड़ाती जिन्दगी की छटपटाहट तो है ही, शोषण का प्रबल विरोध भी देखने को मिलता है।

वर्षों तक पिसते-पिसते समाज का मध्यवर्ग जन-विद्रोह और आक्रोश का पक्षधर बन गया है। वह अब शोषण से मुक्ति पाने के लिए बेचैन है। कवि मुक्तिबोध 'इस चौड़े ऊँचे टीले पर' कविता में आम आदमी के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए जनक्रांति का आह्वान करता है। कवि जनाक्रोश को पूरी तरह से महसूस करता है-

यों महसूस हुआ

अँधियारे वीरान में कहीं दूर      

अनगिनत तरह से नाच रही

कोई ऊँची जादुई आग

है लाल-लाल

जाने किस मानी में

(चाँद का मुँह टेढ़ा है )

इन पंक्तियों के चलते कुछ विद्वानों ने मुक्तिबोध को माक्र्सवादी चेतना का कवि माना है, पर वास्तविकता यह है कि मात्र 'लाल लालÓ शब्द की आवृत्ति से किसी कवि को माक्र्सवादी विचारधारा का पोषक मान लेना न्याय दृष्टि नहीं जान पड़ती।

व्यक्तिगत जय-पराजय की अज्ञात भावना राष्ट्रीय हितों के मार्ग की सबसे बड़ी विडम्बना है। देशहित और देश की प्रगति के लिए व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठने की प्रेरणा मुक्तिबोध अपनी कविता नूतन अहं के द्वारा देते हैं-

किन्तु आज लघु स्वार्थों में घुल क्रंदन विह्व्रल

अंतर्मन यह तार रोड के अंदर नीचे बहने वाली

गटरों से भी अस्वच्छ अधिक

यह तेरी लघु विजय और लघु हार।

(तारसप्तक ,नूतन अहं -58 )

मुक्तिबोध व्यक्ति की स्वतन्त्रता को देश की स्वतंत्रता के लिए अनिवार्य मानते हैं। वह मानवता की मुक्ति हेतु आकुल है तथा आत्मा की स्वतंत्र सत्ता के लिए व्याकुल है। गुलामी चाहे सामाजिक हो, आर्थिक या राजनीतिक, वह प्रत्येक स्तर पर मानव के विकास में बाधक है। पराधीनता की समस्या ही मानव विकास के मार्ग का सबसे बड़ा अवरोध है। कवि मुक्तिबोध की छटपटाहट इन पंक्तियों में अभिव्यक्त है-

जिन्दगी के दल-दल कीचड़ में धँसकर

वक्ष तक पानी में फंसकर

मैं वह कमल तोड़ लाया हूँ

(चाँद का मुँह टेढ़ा है 129)

मुक्तिबोध का काव्य विशुद्ध भारतीय चेतना का काव्य है। मुक्तिबोध न तो माक्र्सवादी थे और न विशुद्ध व्यक्तिवाद की उपेक्षा कर समाजवादी ही। उन्हें न तो प्रगतिवाद खेमे का कवि कहकर बांधा जा सकता है और न प्रयोगधर्मी कह कर उन्हें भारतीय काव्य दृष्टि से गिराया जा सकता है। वे नयी कविता की दृष्टि, प्रगतिवादी झुकाव, तार-सप्तकीयसामर्थ्य, काव्य-संवेदना की बोझिल ऊँचाई लेकर जब हमारे सामने आते हैं तो उनकी इस बहुमुखी प्रतिभा की भाव-तरंगों की अनुगूँज हमें सुनाई पड़ती है किन्तु उनकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति का सर्वोच्च स्वर राष्ट्रीय चेतना की भावप्रवणता से ओतप्रोत है।

परिस्थितियों एवं परिवेश के कृत्रिम दबाव से भले ही मुक्तिबोध माक्र्सवादी घोषित कर दिए गये हैं। मूलत: उनके भीतर का कवि सच्चा देश और राष्ट्रीय चेतना का समर्थ संवाहक ही रहा है।

मुक्तिबोध का सम्पूर्ण जीवन एवं साहित्य ईमानदारी का प्रतीक है। उनकी महानता इसे प्रमाणित करती है। मुक्तिबोध उन कवियों की तरह या साहित्यकारों की तरह नहीं थे जो सुखद स्थिति तक पहुंचने के लिए भविष्य की सुरक्षा के ख्याल से जायज-नाजायज समझौते कर लेते हैं।

'अँधेरे में' कविता का एक अंश देखिए जिसमें मुक्तिबोध को राष्ट्रीय आलोक में नहाते हुए देखा जा सकता है-

वह कुछ

बुदबुदा रहा है

किन्तु मैं सुनता ही नहीं हूँ ,

ध्यान से देखता हूँ वह कोई परिचित

जिसे खूब देखा था निरखा था कई बार

पर पाया नहीं था

डॉ सुन्दरलाल कथुरिया ने भी मुक्तिबोध के काव्य चिंतन के संदर्भ में जो निष्कर्ष दिया है वह मुक्तिबोध की कविता की अनुभूति, संवेदना और भाव, राष्ट्रीय चेतना के रंग में रंगे हुए हैं। डॉ कथुरिया के शब्दों में -मुक्तिबोध के काव्य चिंतन का विवेचन-विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका साहित्य लोचन पर्याप्त सीमा तक भारतीय रस-दृष्टि के अनुकूल है। ( गजानन माधव मुक्तिबोध-संपादक-डॉ लक्ष्मण दत्त  गौतम 90)

'चाँद का मुँह टेढ़ा है' संकलन की अंतिम कविता तथा कवि मुक्तिबोध की जीवन यात्रा का अंतिम काव्यात्मक पड़ाव 'अँधेरे में' पर शमशेर बहादुर सिंह का कथन भी मुक्तिबोध को राष्ट्रीय चेतना की प्रासंगिकता से जोड़ता है। यह कविता देश के आधुनिक जन इतिहास का एक दस्तावेज है। इसमें अजब और अद्भुत रूप से व्यक्ति और जन का एकीकरण है। देश की धरती, हवा, आकाश, देश की सच्ची मुक्ति, आकांक्षा नस-नस में फड़क रही है ......और भावनाओं के अनेक गुंफित स्तर पर (गजानन माधव मुक्तिबोध-संपादक-डॉ लक्ष्मण दत्त  गौतम पृष्ठ-124)

सच्चाई तो यह है कि मुक्तिबोध शुद्ध और मौलिक रूप से राष्ट्रीय चेतना के सृजनशील साधक थे, जिनकी प्रत्येक कृति में उनके भीतर का राष्ट्रीय भक्त तिलमिलाता हुआ उफनने को आतुर है, अव्यवस्था, अभाव और शोषण की चट्टानों को खंड-खंड कर डालने को।

मुक्तिबोध का काव्य जीवन के प्रति अटूट आस्था का काव्य है। जीवन की विषम परिस्थितियाँं भी उनकी आस्था को नहीं तोड़ पाती है, आधुनिक सभ्यता की विसंगतियों को मुक्तिबोध ने पहचाना। निर्धन की प्रतिभा और ईमान को अपमान की आग में सुलगता हुआ देखा था। वचन और कर्म के विरोध को समाज में व्याप्त देखा था, लेकिन शोषण के प्रति धैर्य पूर्ण संघर्ष को और मानव के प्रति विश्वास को नहीं त्यागा था मुक्तिबोध ने।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि मुक्तिबोध का काव्य सृष्टि की अन्तस्त राष्ट्रीय चेतना की उर्जा से गरमाया हुआ है।