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Thursday 23 Nov 2017

मुक्तिबोध से मिलना

मुक्तिबोध से मिलना

मैं न जाने कबसे

देखना चाहता हूं

उस फूल को

जिसको देखते ही

दोनोंकी आंखें

ओस की बूंदों सी नम हो जाती हैं।

 

मैं न जाने कब से

बातें करना चाहता हूं

तुम सा सागर से

जिनसे बातें करते ही

दोनों के होंठ

शून्य की कसक से सील जाते हैं

मैं न जाने कब से

काम करना चाहता हूं

तुम्हारे ही संग

और अपेक्षा करता हूं

दोनों के हाथ

कविता के पक्ष में लहरा उठेंगे

 

न जाने कब से

लिखना चाहता हूं

तुम्हारे नाम की कविता

जिनको आंकने से ही

दोनों की संवेदनाएं

चूल्हे की आंच से दहक उठेंगे।

 

मुक्तिबोध होना

 

तुम्हारे विचारों में

फिर जाग गया प्रहरियों सी नींद

और रच गया

रंग त्योहारों से

आरजू भाषाओं से

प्रेम धरोहरों से

 

तुम्हारे बाजुओं में

प्रकट हुआ गुरिल्ला

लाव-लश्कर के साथ

और मिटने लगा भय

हमारे खलिहानों से।

 

यहां अनुराग की आंच में

बेडिय़ों से मुक्त उत्सव

और चिरागों की आभाएं

बौरा गए हैं गांवों में

कि आंसुओं में तब्दील

हर दिल की आरजुएं

भूखा-प्यासा भटके न कभी।

 

हां तुम्हारे रास्तों में

प्रकट होती है नदी

मुस्कुराते हैं फूल

और चाहकर भी कोई जन

किसी चौराहे पर

लाश में तब्दील नहीं होता

और तुम्हारे होने भर से

हम बाख पाते हैं

और  बचा पाते हैं तुम्हारे आइने।