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Thursday 23 Nov 2017

\'मुक्तिबोध’ की पावन स्मृति को समर्पित

'मुक्तिबोध’ की पावन स्मृति को समर्पित

एक उलझन बड़ी अंधेरे में

खो गई हर कड़ी अंधेरे में

रौशनी में नहाते जनसेवक

और जनता खड़ी अंधेरे में

रोज़  सूरज निकल रहा है मगर

वक़्त है हर घड़ी अंधेरे में

पांव फैला रही है गांव-नगर

एक साज़िश  बड़ी अंधेरे में

एक ओझा दिखा रहा करतब

घूमती खोपड़ी अंधेरे में

राजसत्ता के घर में दीवाली

कांपती झोपड़ी अंधेरे में

मूल्य-मानक पे गिर रहे हैं बम

हम कहें फुलझड़ी अंधेरे में

क्या बढ़ें लोग रौशनी की तर$फ

पांव बेड़ी पड़ी अंधेरे में

शोर है रथ पे आएगा सूरज

आंख जन की गड़ी अंधेरे में

रौशनी का कहीं भी नाम न लो

शर्त इतनी कड़ी अंधेरे में

क्या उठाएं स्वराज का परचम

क्या खुले हथकड़ी अंधेरे में।

 

'मुक्तिबोध' की याद में

 अपनी धुन में मगन अंधेरे में

इक रिवायत कुहन अंधेरे में

क्या खबर दोस्त है कि दुश्मन है

कौन है? हमसुखन अंधेरे में

सारे बाज़ारवाद के हामी

बेचते हैं कफन अंधेरे में

चाटते हैं हवस के तलुवों को

अहले-दिल, अहले-फन अंधेरे में

दीमकें घर की नींव चाट गई

सो रहे हमवतन अंधेरे में

हर गली मोड़ बिक रहे हैं आज

शो$ख सीमीं बदन अंधेरे में

सो गए ज़िन्दगी के हरकारे

ओढ़कर इक कफन अंधेरे में

दूर तक भी नज़र नहीं आती

एक आशा-किरण अंधेरे में

गा रहे सुब्हे नौ की ताज़ा  ग़ज़ल 

अंजुमन-अंजुमन अंधेरे में

मौत का रक्स है उजालों में

ज़िन्दगी का निधन अंधेरे में

मौत का आफताब है 'रौशन'

ज़िन्दगी के गहन अंधेरे में।

 

           ग़ज़ल (अंधेरे में)

                 (1)

 

कौन पहुंचा कहां अंधेरे में - गुम हुआ कारवां अंधेरे में

हर सहर है धुआं अंधेरे में - कदम बे-निशां अंधेरे में

हर अमल रायगां अंधेरे में - हर सुखन बे-ज़बा अंधेरे में

झूठ सादिक-बयां अंधेरे में - हर यकीं इक गुमां अंधेरे में

अनगिनत आफताब दफ्ऩ हुए - रात के बेकरों अंधेरे में

सुन रहे हैं ज़वाल  कदमों की - एक आहट यहां अंधेरे में

हर कदम चीखता है सन्नाटा - है कोई, है यहां, अंधेरे में

वक्त कालिख मले हुए मुंह पर - कह रहा दास्तां अंधेरे में

एक जैसे दिखाई देते हैं - ये ज़मी-आसमां  अंधेरे में

किस कदर हौलनाक मंज़र  है- बे-बयां-बे-ज़बा  अंधेरे में

ठोकरें खा रहे हैं ख़्वाब ओ ख्याल - इस करां-ता-करां अंधेरे में

दूर तक जल रहे दिलों के नगर - दूर तक है धुआं अंधेरे में

रंग-दर-रंग आग बरसाये - जब्र की कहकशां अंधेरे में

आंख वालों का रास्ता रोके - एक कोहे -गरां अँधेरे में

एक बाजार बदनिज़ामी  का - खुल गया है यहां अंधेरे में

कौन किसका करे भरोसा आज - सबके सब बदगुमां अंधेरे में

बस्तियों को निगल रहा है यहां - एक आतिश फिशां अंधेरे में

क्या खबर आग कब लगा बैठे - कौन सा आस्तां अंधेरे में

फैलता जा रहा है गांव-नगर  ज़हर-आसा धुआं अंधेरे में

घूमते हैं पतन के हरकारे - हर गली-मोड़ यां अंधेरे में

ज़िन्दगी  बे-लिबास रक्स-कुनां-मौत है नग़्माख्वां अंधेरे में

 रोज़  साज़िश का जाल बुनते हैं - आज के हुक्मरां अंधेरे में

एक सूरत बनाए फिरते हैं - सारे सूद-ओ-ज़िया  अंधेरे में

बुझ गई है यकीन की बाती - कमनज़र -बदगुमां अंधेरे में

धूल आंखों में झोंक बन बैठे - मातहत हुक्मरां अंधेरे में

बदनज़र  रौशनी सियासत की - ले रही इम्तिहां अँधेरे में

एक साज़िश  है आम जन के ख़िलाफ़  वक़्त के बे-ज़बा अंधेरे में

एक हिन्दोस्तां उजालों में - एक हिन्दोस्तां अंधेरे में।

क़हक़हाजन  है चार सू 'रौशन'

मौत इस जाविदां अंधेरे में।

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                          (2)

 

धड़ अंधेरे में सर अंधेरे में - ज़िन्दगी  सर-ब-सर अंधेरे में

खौफों-दहशत का घर अंदेरे में - खो गई है सहर अंधेरे में

हरनज़र बे-बसर अंधेरे में - हर सदा बे-असर अंधेरे में

कौन है मोतबर अंधेरे में - संग ठहरे गुहर अंधेरे में

कांपते गांव-घर अंधेरे में-   ज़िन्दगी  दांव पर अंधेरे में

बे-ज़बा बुत शजर अंधेरे में - खो गई हर डगर अंधेरे में

एक जैसा सुलूक करते हैं - आदमी-जानवर अंधेरे में

अब वो मानव है या कि दानव है - एक चेहरा है पर अंधेरे में

दोस्त, दुश्मन से मिल रहे हैं गले - कौन देखे मगर अंधेरे में

हर कदम पर है घात में बैठा - एक  भय, एक डर अंधेरे में

नर-पिशाचों का जश्न जारी है - हर डगर, हर नगर अंधेरे में

एक लम्हा नहीं कहीं ज़िन्दगी  - वक़्त जाए किधर अंधेरे में

अपनी निर्लज्जता पे गर्वित है - ज़िन्दगी सर-ब-सर अंधेरे में

मकतबों के दीये घरों के चराग - कुछ नहीं कारगर अंधेरे में

मैं कहां हूं मुझे ये क्या मालूम - कर रहा हूं सफर अंधेरे में

रौशनी के लिएज़िन्दगी न खोल - बात कानों में कर अंधेरे में

जब ये तलवार इक तमाशा है - क्या करेगी सफर अंधेरे में

भूख की फ्सल काटने को कृषक - जा रहे खेत पर अंधेरे में

सारे वाजिब सवाल जन-जन के - हो गये  दरगुज़र अंधेरे में

अपने-अपने महाज़ पर जारी - जंगे-नफ्ओ-ज़रर अंधेरे में

लेखनी के वो सब अपाहिज शब्द - छू रहे हैं शिखर अंधेरे में

कल के इतिहास, कल के बारे में - बोलते हैं खंडहर अंधेरे में

बावड़ी के असीम तहखाने - तह-ब-तह पुरखतर अंधेरे में

मंज़िलो का करीह मातम है - रहगुज़र-रहगुज़र  अंधेरे में

कौन किसकी तरफ है क्या मालूम - सबके सब बेखबर अंधेरे में

रो रहे हैं किसी की दस्तक को - बस्तियों के ये घर अंधेरे में

हर तरफ बेबसी की इक चुप है - रात ऐसी मुखर अंधेरे में

गिर पड़े खाइयों में सब पर्वत - गर्क हैं बहरो-बर अंधेरे में

गुम हुए एक-एक करके सभी - हमकदम-हमसफर अंधेरे में

कल के बाजार  के अमानतदार - अहले-दिल, अहले- ज़र  अंधेरे में

कौन देगा किसे कहो यारो! - गांव-घर की खबर अंधेरे में

 

एक फरियाद है इधर 'रौशन'

एक मातम उधर अंधेरे में