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Saturday 18 Nov 2017

गीतिका

 

              गीतिका 

राम तेरे बन्दों से, कांपते हुए

जिया किए राम-राम जापते हुए

 

जीवन के बोझ तले दबे-कुटे हम

दुनिया भर रंज-गम अलापते हुए

 

दूर खड़ी खुशियों को टोह-टोहकर

हासिल का इंच-इंच नापते हुए

 

फ़िरा किए इज्क़ात का ताज लिए हम

आर्टनुमा थिगड़ों से ढांपते हुए

 

भगवे, या नीले या लाल देश में

रंग जा रे सत्ता को छापते हुए

 

शोहरत के चार-चांद ढल गए हुजूर

राजा को जब-तब सन्तापते हुए

 

गालिब के हम ही तो चचा हैं जनाब

करते हैं उस्तादी, हांफते हुए

 

        ग़ज़ल

बुद्घिजीवी तेवर के स्वांग दरगुज़र कर दे

बिक गया तो कम-अज़-कम खुद को बा-खबऱ कर दे

 

''सबसे बड़ा हत्यारा देश’’ कहा जिसको

अब उसी के कदमों में इल्मो-फन नज़र कर दे

 

चाहिए है मैनेजर हर नई हुकूमत को

खोखली सियासत को जो जगर-मगर कर दे

 

था कभी प्रचारक वह, अब वजीरे- आज़म है

वीर गाथा लिख उसकी, लेखनी अमर कर दे

 

फिर अडानी-अम्बानी, फिर ठहाका डालर का

सेठ की तिजोरी फिर, मालो-ज़र से तर कर दे

 

हर नफर बजाए जब आज उसकी शहनाई

हर खबर मुखालिफ को, धार से सिफर कर दे

 

गालियां दीं कल जिसको आज उसके जयकारे

बोल उसके जयकारे, शाम की सहर कर दे

 

भाई मियां, मैं खांटी हिन्दू राष्ट्रवादी हूं

आ गया हूं घर वापस, मुझको मोतबर कर दे

 

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आप अपने स्वर्ग में खुश, मैं तने-तनहा में खुश

कौन है सौ फीसदी इस दी हुई दुनिया में खुश

 

यूं अकेलेपन के भीतर कौन कितना सोगवार?

मैं जुनूं की जंग में खुश, वह नई चिडिय़ा में खुश

 

एक ही बिस्तर है लेकिन करवटों के रुख हैं दो

ओढ़कर शिकवे-गिले हम लज्क़ाते-रुसवा में खुश

 

हो किसानों को मुबारक क़र्ज़ से तर खुदकुशी

मुल्क के मालिक सियासी ताज की पूजा में खुश

 

शब्द के फैशन में डूबी ज़िन्दगी जीते हुए

बुद्घिजीवी आत्ममुग्धा झूठ की रचना में खुश

 

गम के चरचे और कुछ, गम झेल जाना और कुछ

आप तो एहसासे-गम के हुस्न की छलना में खुश

 

कर दिया तब्दील सारा देश का इक बाज़ार में

आज शासक कामयाबी के नए फण्डा में खुश

 

आप कहते हैं ग़ज़ल को औरतों से गुफ्तगू

और हम भी लिजलिजे रूमान की मदिरा में खुश

 

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हथेलियों पे सजाकर उठाए जाते हैं

महान होते नहीं है, बनाए जाते हैं

 

खुला है खेल ये गालिब, फरक्काबादी है

कि लेन-देन से सौदे पटाए जाते हैं

 

तुझे बुलन्द की हसरत, मुझे शबाब तेरा

हवस में दोनों अदब को जलाए जाते हैं

 

कहां का फर्क अदब या कि बॉलीवुड में, जहां

हसीन खुद को खुशी से लुटाए जाते हैं

 

जो बेच आते हैं शोहरत के भाव तन अपना

सितारावार वही जगमगाए जाते हैं

 

बला के हुस्न को शोहरत बला की दे मौला

दलाल बीच में पंगा अड़ाये जाते हैं

 

जो लोग लेते हैं ठेका महान करने का

हमीं में-आप में शातिर वो पाये जाते हैं

हमारा कूड़ भी अब चंद्रचूड़ हैं जानम

यहीं तो आपसी रिश्ते निभाए जाते हैं

 

न आबो-ताब, न दामन, न आबरू, न हया

तो आप किसलिए आंसू बहाये जाते हैं

 

कोई भी शै नहीं मिलती जहां में फोकट में

महानता के भी डालर चुकाये जाते हैं।

 

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वतन परस्तों का हाल क्या है

ये दिल हिलाता सवाल क्या  है

 

उसी में खाया, उसी में छेदा

कमीनपन की मिसाल क्या है

 

कहा वतन-फिर उसी को बेचा

कि हमसे बढ़कर दलाल क्या है

 

पचा गए तुम जिसे अकेले

मियां वो रिश्वत का माल क्या है

 

बुलेट उत्तर है तर्क का तो

हराम क्या है, हलाल क्या है

 

है कत्लो-गारत भी पाक-म•ाहब

तुझे पड़ोसी मलाल क्या है

 

दो चैन के कश लगा के मर जा

अलस्सुबह आटा-दाल क्या है

 

कमाल था कल जो आस्मानी

अरे! वो डूबा, ये चाल क्या है?