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Saturday 18 Nov 2017

हमारे कवि मुक्तिबोध

 

लालटेन हाथ में

ऊर्जा घनी साथ में

घट में बिराज रहे, विद्युत चेतना गाज रहे

हमारे कवि मुक्तिबोध।

 

वर्ग शिक्षा

नहीं शिक्षा, कैसे पाऊं 'अग्नि दीक्षा’

जीवन संघर्षों के ताप में, पीडि़तों के संताप में

पल-प्रति-पल तपाए रहे

हमारे कवि मुक्तिबोध

 

भाव-विचार कैसे निखरे, गंद-कीच से कैसे सुथरे,

उत्साह, ऊर्जा, चंचल गति-पुर्जा

सृजन वेग द्युति सुरभि-आभा, कैसे फैले, कैसे निखरे

रंग में रंगाय के, पंगत में जमाय के

संगत में बिठाय के... जीवन-चक्र समझाए रहें,

अनुभव सीख... सिखलाए रहे,

हमारे कवि मुक्तिबोध।

 

कहते- पूंजी का प्रपंच बहुत है

सच है थोड़ा, पग-पग झूठ बहुत है

जीवन-जाले, झाड़ू बुहारे, कैसे हों लगन उजाले

उरझन-तरझन, तेवर तनाव... रंज बहुत है

धीरता-अधीरता में

मंद गति.. तीव्रता में

सुरझी कविता कैसे लिखूं... उजला मानस कैसे दिखूं

जूझते, झुंझलाए रहे

आखर-पट्टी, कलम-कला थमाए रहे

सच-सच लिखवाए रहे, दिशा-पथ दिखलाये रहे

हमारे कवि मुक्तिबोध।

 

मध्यवर्गीय जमातों में, भव्य भाव अहातों में

अहंकार की बातें बहुत हैं

यश-कामनाएं कीर्ति-सुकीर्ति कैसे मिले

अवसर साध, रोशनी कैसे झिलमिले;

स्वार्थियों-लोभियों की, यहां तांतें बहुत-बहुत हैं

घातें बहुत हैं।

 

पद मर्दित जागा नहीं...

जीवन डर भागा नहीं, ..

साहस-जोश जन अभियानों में, उमंग बेग उन्वानों में

लक्ष्य भेद दागा नहीं...

मित्र शत्रु जान बूझ समझ के

संगठन चरित्र व्यवहार समझ के

सर्वहारा की क्रांतिकारी राजनीति में

अर्थतंत्र की गूढ़ नीति में

दांव पेंच... समझाए रहे...

आत्मसंघर्ष रिझाए रहे...

हमारे कवि मुक्तिबोध।

 

कहते हैं- अंतर्विरोधी बहुत झमेले

जीवन-जगत के गड़बड़ मेले... ठेलम ठेल बहुत हैं रेले

धूल-गुबार... अन्धड़-बवण्डर यहां बहुत हैं

वर्ग-पर्तें...घुप्प अंधेरे यहां बहुत हैं

लालटेन की मद्घम-मद्घम धीर गंभीर रोशनी

अगला पथ, दृढ़ रखना डग

दिखलाए रही कविता में इसको समझो

चंचल गति... बहुत फिसलन बहुत विचलन

लौ लपट समझाए रही... इसको समझो...

 

धमनभट्टी आग-अलाव सुलगाये रहे, भाव- ऊर्जा जगाए रहे

हमारे भीतर

हमारे कवि मुक्तिबोध।