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Wednesday 22 Nov 2017

मुक्तिबोध को पढ़ते हुए जो लगा

मुक्तिबोध महान कवि हैं। उनकी महानता उनकी ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान में है। उनका गहरा अध्ययन, अहसास, कल्पना, शब्द-शक्ति ज्ञान उनकी कविताओं में स्पष्टत: झलकता है। वे किसी एक जीवन-अनुभव को नहीं लेते और उसे सीधे-सपाट ढंग से व्यंजित या कलात्मक तरीके से अभिव्यक्त नहीं करते। हालांकि, वे अभिव्यक्ति के इन दोनों तरीकों का प्रयोग करते हुए एक बड़े वृत्त में अनेक जीवन अनुभवों को लेते हैं। कह सकते हैं जीवन-जगत के सामूहिक अनुभवों को वे अपनी कविताओं का विषय बनाते हैं जिससे उनकी कविता में इनका एक कोलाज बन जाता है। एक अनुभव बिन्दु से चलकर देश-काल की यात्राएं करते हुए वे कहां से कहां पहुंच जाते हैं लेकिन जहां से चले थे वहीं फिर आ जाते हैं। इससे कविता बंधी रहती है और लम्बी होने के बावजूद बिखरने से बच जाती है। खास बात यह है कि वे अनुभवों की स्थूलता में नहीं जाते। वे इनकी सूक्ष्म अनुभूतियों से कविता रचते हैं इसलिए इनका बिम्बात्मक और प्रतीकात्मक होना स्वाभाविक है। इसके चलते मुक्तिबोध की कविता सूक्ष्म और जटिल हो जाती है। लेकिन काव्य प्रविधि कथात्मक, समीक्षात्मक, संबोधनात्मक होने के कारण उसमें अमूर्तता नहीं आती। बौद्धिकता और कल्पनाओं की मौलिकता इन्हें इस कदर भाव-सघन और अर्थ प्रचुर कर देती है कि इन्हें पाठक एक बार में आसानी से समझ नहीं पाते। इन्हें समझने के लिए एक पाठकीय श्रम से गुजरना पड़ता है। इनके व्याख्यात्मक पाठ के लिए आलोचना में बहुत जगह बनती है। इसलिए मुक्तिबोध सबसे ज्यादा पढ़ाये जाते हैं। आम पाठक के लिए मुक्तिबोध बोझिल और दुर्बोध कवि हैं। लेकिन कविता वही नहीं है जो सरल और सुबोध हो। कविताओं का मानक उन कविताओं से उठता है जिसमें भावों और विचारों की संश्लिष्टता हो, भाषा का एक अलग तरीके से प्रयोग हो और कल्पनाशीलता मौलिक और बेजोड़ हो। मुक्तिबोध की कविताओं का मानक इसीलिए ऊंचा है और उन्हें जितनी बार पढ़ा जाय वे उतनी बार नयी अर्थवत्ता के साथ होती हैं। संवाद करती उनकी कविताएं संदेश देती चलती हैं।

अगर मुक्तिबोध की समस्त कविताओं को जोड़कर देखें तो वे उनके समय का महाकाव्यात्मक आख्यान रचती हैं। इनमें सामान्यजन के साथ-साथ वे स्वयं हैं। सपनों के साथ, मोहभंगों के साथ और पुन: नये सपनों के साथ। जीवन की तमाम दुखपूर्ण स्थितियां अपने सामाजिक और राजनैतिक संदर्भों समेत एक हिला देने वाली अभिव्यक्ति-क्षमता के साथ हैं और आज भी पूरी प्रासंगिकता के साथ मौजूद हैं।

.....मुझे मालूम,

कैसी विश्व-घटनात्मक

सघन वातावरण में,

विचारों और भावों का कहां क्या काम

कब वह वंचना का एक साधक अस्त्र

कब वह ज्ञान का प्रतिरूप!!

 एक तीखे व्यंग्य के साथ वे कहते हैं-

अब तो रस्ते ही रस्ते हैं

मुक्ति के राजदूत सस्ते हैं

समस्त पराजयों के बाद भी युग-संघर्ष में विजय के स्वप्नों को जो धार मुक्तिबोध दे गये हैं उससे हमारा आशावाद आज भी जीवित है

...हमारी हार का बदला चुकाने आयेगा

संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,

हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर

प्रकट होकर विकट हो जायेगा!!

वर्ग-भेद को दो पंक्तियों में जिस तरह वे परिभाषित करते हैं, अद्भुत रूप से उद्धरणीय है

--तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है

कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है।

सब जय-पराजयों के ऊपर एक कर्मपूर्ण मगर निष्काम जीवन-दर्शन उनका अभीष्ट है जिसे वे बड़े मनोरम तरीके से कहते हैं जो हृदय को छू जाती है और हमें प्राकृतिक और नैतिक बनने का संदेश दे जाती है-

सही है हम पहचाने नहीं जायेंगे।

दुनिया में नाम कमाने के लिए/कभी कोई फूल नहीं खिलता है

हृदयानुभव-राग-अरुण

गुलाबी फूल,प्रकृति के गंध-कोष

काश, हम बन सकें !

मुक्तिबोध की काव्य दुनिया मानवीय सरोकारों से प्रतिबद्ध और उसकी बेहतरी के लिए समर्पित है। वे कहते हैं कि -

 दुनिया जो है उससे बेहतर चाहिए। इसे साफ करने के लिए मेहतर चाहिए। लेकिन मुक्तिबोध के समय से आज की दुनिया और मैली हुई है। और न सिर्फ मैली हुई है बल्कि वंचित भी। न सिर्फ समता और बंधुत्व के मूल्यों से बल्कि प्राकृतिक सौन्दर्य-संपदाओं से भी। मुक्तिबोध की कविताओं में जो भू-दृश्य आते हैं, गांव-कस्बों की शैल्पिक छवियां आती हैं और भाव-विचारों को अपने परिवेश में अभिव्यक्त करती हैं अब वे वैसे ही नहीं रह गये हैं। लेकिन मुक्तिबोध की कविताओं की वह दृश्यात्मकता प्रकृति के उस इतिहास -भूगोल का दस्तावेज है जो कभी वर्तमान था। मानवीय सरोकारों, धरती-आसमान से लगावों, काव्यभाषा और गहन शिल्प की दृष्टि से मुक्तिबोध की कविता ऐतिहासिक महत्व की है मगर उसकी धारा आज भी प्रवहमान है। यह उनके कालजयी होने का प्रमाण है। काव्य की इतनी गहराई और ऊंचाई के बाद भी मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं को पढऩा बोझिल लग सकता है। इसके बावजूद वे सबसे ज्यादा उद्धरणीय कवि हैं। बीच-बीच में उनकी पंक्तियां और पैराग्राफ इस कदर भाव-विचार, संवेदना, कल्पना, जनपक्षधरता से ओत-प्रोत  विशिष्ट रूप से अर्थवान होती हैं कि जीवन-जगत के आधुनिक संदर्भों को बे-मिसाल ढंग से अपने वृत्त में समा लेती हैं। अकादमिक लोगों में मुक्तिबोध की लोकप्रियता का राज यही है फिर वे चाहे समकालीन कविता के कवि हों या समालोचक। हां, गीतकारों और गज़़लकारों के लिए वे अवश्य कविता के ब्रह्मराक्षस स्वरूप हैं। दरअसल यहां रुचि, शैली और विधा एक बड़ा कारण और कारक है।

 कोई जरूरी नहीं कोई कवि सबके लिए सामान्य रूप से ग्राह्य हो। हास्य और व्यंग्य के स्तर पर मुक्तिबोध भले आह्लादित न करते हों लेकिन भाव-विचार और चेतना के स्तर पर वे आलोकित और आन्दोलित करते हैं। यह कवि कर्म की बहुत बड़ी सफलता है। इस सफलता को प्राप्त कर मुक्तिबोध महान कवि हुए हैं। जिसने उनकी ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान की काव्यात्मकता को समझ लिया हो वह आह्लादित भी हो सकता है।