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Thursday 23 Nov 2017

फैन्टेसी के महान कवि मुक्तिबोध

यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो साहित्यकार के जीवन की घटनाओं का अक्स भी, जहां से वो होकर गुजरता है। मुक्तिबोध हमारे बीच ऐसे समय आते हैं जब छायावाद समाप्ति की ओर था और प्रगतिवाद कुछ कहना चाह रहा था। ऐसे समय में मुक्तिबोध की कविताएं आत्मगत घटनाओं से समावेशित हो वस्तुपरकता की ओर शीघ्रता से बढ़ती हैं। काव्य जगत उनकी कविताओं के प्रागट्य से विस्मित हो जाता है। वो ऐसी कविताएं सामने पाता है जिनमें भूत-प्रेत, ब्राह्मराक्षस, अंधेरा ताल, भूत की हवेली, चांद का मुंह टेढ़ा आदि है। उनकी कविताएं समीक्षा और आलोचना में विस्तार पाती है। उनकी कविताओं में वस्तुपरकता व विविधाकारों के स्रोत भरे पड़े हैं। ''अज्ञेय’’ की कविताओं में बौद्घिकता है तो उनकी कविताओं में अप्रतिम फैन्टेसी, उनकी कविता का सिरा कहां खत्म होगा ज्ञात नहीं। वे व्यापक, अनुभव, रचनात्मक चिंतन और एक विचित्र जीवन दृष्टि के साहित्यकार थे उन्होंने हिन्दी कविता को एक नई दृष्टि दी। उनके द्वारा माक्र्सवाद को एक अलग पहचान दी गई। अगर उनका जीवन संघर्ष सहज होता तो हमें एक युगीन संदर्भ कहां दिखाई देता। वो जानते हैं ढांचागत व्यवस्थाएँ तोडऩा संभव नहीं हैं :-

कविता में कहने की

आदत नहीं पर कह दूं

वर्तमान समय चल नहीं सकता

पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता

पर वो पूंजीवादी परम्परा को तोडऩे की प्राणपण चेष्टा करते हैं वो चाहते हैं :-

मेरे सभ्यनगरों में

सभी मानव

सुखी सदा व शोषण मुक्त कब होंगे।

बहुत से बुद्घिजीवी कहते हैं कि वे 'तार सप्तक’ में न होते तो उनकी पहचान न बन पाती, परन्तु ऐसा न था, समय ने उन्हें पहचान लिया था। डॉ. नामवर सिंह का कथन है ''मुक्तिबोध उन कवियों में से नहीं जो अपने युग के सफल कवि कहलाए जाए, बल्कि वो सार्थक कवि कहलाने योग्य हैं।‘’

जीवन की यायावरी व मुफलिसी ने उन्हें सबसे अलग खड़ा कर दिया। गजानन माधव मुक्तिबोध 13 नवम्बर 1917 को मध्यप्रदेश के श्योपुर में जन्मते हैं, उनका लेखन 1935 में माधव कॉलेज उज्जन से प्रारंभ होता है और मृत्यु पर्यन्त 11 सितम्बर 1964 तक चलता है। इतने कम समय में वो जयशंकर प्रसाद की तरह साहित्य में अपनी एक अलग पहचान खड़ी करते हैं। सच कहा जाए तो उनके जीवन संघर्ष ने ही उन्हें सबसे अलग बनाया। उनका जीवन देखा जाए तो सन् 1942 में वे शुजालपुर छोड़कर उज्जैन लौट आए, 1945 तक यहीं रहे। यहां उन्होंने ''मध्य भारत प्रगतिशील संघ’’ की स्थापना की। सन् 1945 में मुक्तिबोध ''हंस’’ के  संपादकीय विभाग में शामिल हो गए। आर्थिक विपन्नता में काशी प्रवास पूर्ण कर कलकत्ता चले गए, वहां भी बात न बनी और 1946-47 में जबलपुर लौटे। वहां के बाद 1949 से इलाहाबाद की सैर कर आए। 1954 में नागपुर, वहां से 1958 में राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक हो गए। उन्हें 17 फरवरी 1964 को भीषण पक्षाघात का आघात लगा जिसने 11 सितम्बर 1964 की रात मुक्तिबोध को हमसे छीन लिया।

कहा जाता है मुक्तिबोध अत्यंत भावुक किस्म के व्यक्ति थे इस संदर्भ में देखिए उनकी कविता का अंश :

गंध के सुकोमल मेघों में डूबकर

प्रत्येक दृश्य से करता हूं पहचान

प्रत्येक पुरुष से पूछता हूं हालचाल

प्रत्येक लता से रखता हूं संबंध

उनकी कविताओं में खौफनाक, पूंजीपतियों की बिरादरी का डर है वो इसे कहीं न कहीं एक समूह के रूप में देखने लगते हैं :-

विचित्र प्रोसेशन

गंभीर क्विक मार्च

कलाबत्तू वाला काला जरीदार ड्रेस पहने

चमकदार बैण्ड दल

अस्थिरूप, यकृतस्वरूप, उदर आकृति

आंतों के जालों से बाजे वे दमकते हैं भयंकर

गंभीर गीत स्वप्न तरंगें

उभारते रहते

ध्वनियों के आवर्त मंडराते पंथ पर

बैण्ड के लोगों के चेहरे

मिलते है मेरे देखे हुओं से

लगते हैं उनके कई प्रतिष्ठित पत्रकार

इसी नगर के।

वो जाने किस किस लोक में रहते हैं? वह रक्तालोक है। अंधेरे में उनकी फेण्टेसी में कई चित्र उभरते हैं गुजरते जाते हैं, जैसे कोई भयंकर सपना आता हो और चला जाता हो। वो शब्द चित्र कहां से खड़े करते हैं पता नहीं चल पाता पर उनकी कविताओं में अक्सर देखे हुए लोग ही होते हैं।

''पहचानता हूं

बाहर जो रहड़ा है

यह वही व्यक्ति है, जी हां

जो मुझे तिलस्मी खोह

में दिखा था’’

वो कहते हैं बचपन में मेरा एक दोस्त मुझे प्राइमरी स्कूल में लौटते हुए एक खंडहर के पास 'ब्रह्म राक्षस’ दिखाने की बात करता था, मैं बहुत डर जाया करता। शायद उनके बाल मनोविज्ञान में भी ऐसा ही कुछ रहा होगा, जिसे उन्होंने परिपक्व उम्र होने पर 'ब्रह्म राक्षस’ को रूप देकर एक नई व्याख्या दी :-

सुमेरी बेबिलोनी जनक कथाओं से

मधुर वैदिक ऋचाओं तक

व तब से आज तक के सूत्र

छन्दस मंत्र, थियोरम

सब प्रमेयों तक

कि माक्र्स, ऐंजेला, रसेल टाएब्दी

कि हिडेग्गार व स्पेंएलर, गांधी भी

सभी के सिद्घ अंतों का

नया व्याख्यान करता वह

यही कारण है कि मुक्तिबोध ब्रह्मराक्षस शिष्य बनना चाहते हैं। सच कहा जाए तो ये कविताएं रहस्यवाद के आगे की यात्रा है। ''भूल गलती’’ हमारी ज्ञान प्रक्रिया का सत्य है। सल्तनतें हमेशा से अपना जिंदाबाद कहाती आई हैं। कोई जिंदा रहे न रहे उससे उन्हें लेना-देना नहीं होता, वो चाहती रही हंै जनता उनके सामने बेजुबान रहे, उन्हें बेजुबान कराती रही है सल्तनतों की दहशत :-

सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक

चिंतक, शिल्पकार, नर्तक सब चुप हैं

उसका कारण है वो शासक जो सामने सत्ता पर है :-

भूल गलती है

आज बैठी है जिरह बस्तर पहनकर

तख्त पर दिल के

चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक

आंखें चिलकती है नुकीली तेज पत्थर सी

खड़ी है सिर झुकाए

सब कतारें

बेजुबां बेबस सलाम में

अनगिनत खंभों मेंहराबों में

दरबार ए आम में (भूल गलती)

उनकी प्रसिद्घ कविताएं अंधेरे में,ब्रह्म राक्षस, पूंजीवाद समाजवाद के प्रति, भूल गलती, दिमागी गुछांधकार हैं। उनकी गंध रचना ''भारत इतिहास व संस्कृति’’ (1962) है जिस पर मध्यप्रदेश संस्कार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया था। ''कामायनी’’ पर उन्होंने युगीन समीक्षा लिखी जो ''कामायनी एक पुनर्विचार’’ के नाम से चलित हुई। अपने पहले प्रकाशन से ही वो रातों रात चर्चित हो गए। उनकी तरह की काव्य रचना के अनेक कवियों ने प्रयास किए पर वो सफल न हो सके। शमेशर बहादुर सिंह ने सच ही कहा है उनका काव्य शिल्प एक वस्तुकार जैसा काव्य शिल्प था।

उन्हें विद्वानों ने तीव्र इन्द्रिय बोध वाला कवि, भयानक खबरों का कवि और फैंन्टेसी के कवि की उपमाएं दी। उन्होंने कला के तीन रूप स्वीकार किए हैं (1) अनुभव का फैंटेसी का रूपान्तरण (2) फैंटेसी के शब्दबद्घ होने की प्रक्रिया (3) जीवन का उत्कृष्ट तीव्र अनुभव क्षण।

उनकी कविताओं में विचलन की तीव्रता है। उन्हें कहीं भी नम्रता, विनयशीलता और मानवीयता दिखाई नहीं देतीं। उन्होंने जीवन में विद्वेषताएं देखी हैं :-

संस्कृति के कुहरीले धुँए से भूतों के

गोल गोल मटकों से चेहरों ने

नम्रता के छिछियाते स्वांग में

दुनिया को हाथ जोड़ कहना शुरू किया

बुद्घ के स्तूप में

मानव के सपने गड़ गए

गाड़े गए।

ईसा के पंख सब झड़ गये

सत्य की

देवदासी चोलियां उतारी गई

उघारी गई

सपनों की आंते सब

चीरी गई, फाड़ी गई

बाकी सब खोल है

जिंदगी में झोल है (चांद का मुंह टेढ़ा है)

इस प्रकार उनका काव्य जमीनी हकीकत है, दिखावटी नहीं। मुक्तिबोध की कविता में नाट्यात्मक है, वह संगीत की विरोधी है। यद्यपि उनकी बहुत सी कविताएं छंदबद्घ दृष्टिगत होती है। उनकी कविताओं में घटनाओं की बहुलता है और कहीं-कहीं वो विशिष्ट हो जाती है। उनकी काव्यानुभूति ही उन्हें स्वत: बिम्ब प्रतीक का विधान तदानुरूप देती है। वे बेहद फैंटेसी के कवि ही नहीं महान कवि हैं जो कविता में एक अनुपम शिल्प विधान की प्रस्तुति देते हैं।