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Tuesday 21 Nov 2017

समकालीन कविता का अर्थ है

सांस के लिए संघर्ष करना

- तादेउष रूज़ेविच

लगता है कोई भीषण दुव्र्यवस्था

हमारी रक्षा कर रही

- कुंवर नारायण

 

मुक्तिबोध संभवत: काफ्का को ज़्यादा पसंद नहीं करते थे। उनके हिसाब से काफ्का अस्तित्ववादी भुलभुलैयाओं में भटकते अणु-खंड थे। हालांकि, मुक्तिबोध चाहते रहे हों या न चाहते रहे हों, इतने बरसों बाद यह भी एकदम स्पष्ट है कि हिंदी में अगर काफ्का का कोई बौद्धिक सहोदर है, तो वह सिर्फ मुक्तिबोध हैं। दोनों के पास एक जैसे व्यूह हैं। काफ्का में दु:स्वप्न का संत्रास व्यूहात्मक है, तो मुक्तिबोध में दु:स्वप्न की परिणति व्यूहात्मक है। आप जिसे नापसंद करते हैं, धीरे-धीरे उसके जैसे भी होते जाते हैं- क्या यह बात सच है?

कतिपय आलोचकों ने मुक्तिबोध में भी अस्तित्ववादी बूंदें खोज ली थीं। चूंकि हिंदी में, आज दिनांक तक, अस्तित्ववाद को हेय दृष्टि से देखा जाता है, ख़ुद मुक्तिबोध भी अपने लिखे में कई जगहों पर इसके प्रति अरुचि दर्शा चुके थे, इसलिए भी संभवत:, हिंदी आलोचना के एक दूसरे प्रभावशाली तबके ने उनमें अस्तित्ववादी प्रवाहों की स्थापनाओं का खंडन किया। इस आरोपण और खंडन का जितना रिश्ता मुक्तिबोध की कविताओं से नहीं है, उससे ज़्यादा हिंदी की विचारधारात्मक खेमेबंदियों, अहं-युद्ध, नायक-निर्माण, नायक-भेद, नायक-ध्वंस से है। जो मुक्तिबोध अपने गद्य में खुद को व्यक्तिवादी स्वभाव का कहते रहे, उनकी कविताओं में ज़ाहिरा तौर पर मौजूद व्यक्तिवादी तत्वों तक को न देखने की कोशिश की गई। जो पंक्तियां साफ-साफ अस्तित्ववादी दु:स्वप्नों व आत्मपीडऩ की घोषणा थीं, उन्हें वैसा मानने से इंकार कर दिया गया।

यहां मेरा उद्देश्य मुक्तिबोध को महज़ अस्तित्ववादी करार देना नहीं है, न ही इस अनंत-अनर्गल बहस में पडऩा है। बल्कि इस संदर्भ के बहाने मैं आगे की पंक्तियों में उस प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश करूंगा, जिसकी वर्तमान-रूपा शुरुआत हुए भी संभवत: पचास बरस होने को हैं।

मुक्तिबोध कोई साधारण बौद्धिक नहीं थे। वे जीवन, अध्ययन, संघर्ष, संत्रास, उम्मीद, राजनीति, अकेलापन, जिया हुआ अनुभव, पढ़ा हुआ अनुभव, विचारा गया अनुभव, आशंका, दु:स्वप्न, स्वप्न-भंग, चुनौती और निराशा से बना हुआ एक व्यूह थे। व्यूह-सामग्री में और इज़ाफ़ा गिनाया जा सकता है, किंतु यह स्पष्टत: कहा जा सकता है कि वह एक चीज़ तो क़तई नहीं थे, और वह है- एकांगिता। मुक्तिबोध कहीं से एकांगी नहीं थे। वे जितना राजनीति-दृष्टिसंपन्न-मुखर थे, उतना ही कलात्मक-नावीन्य-जागरूक भी। जितना वह माक्र्सवाद के भीतर थे, उतना ही अस्तित्ववाद के भीतर भी। समस्या इसी वाक्य से शुरू होती है। माक्र्सवादी आलोचना के प्रभावशाली तबक़े को यह मंज़ूर नहीं था कि वह मुक्तिबोध को अस्तित्ववादी माने। संभवत: ऐसा करने से उसकी राजनीति प्रभावित हो जाती। आलोचना की वह पद्धति राजनीति को सर्वोपरि मानती है, साहित्य को द्वितीयक। इसलिए वह साहित्य की मीमांसा-व्याख्या में झोल करना चुन सकती है, राजनीतिक रूप से ग़लत होने (पॉलिटिकली इनकरेक्ट) होने का जोखिम लेने के बजाय।

यह पूरी समस्या खड़ी ही सिर्फ़ इसलिए होती है कि माक्र्सवाद और अस्तित्ववाद को आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है, गोया दोनों में मल्ल-आयोजन हो। साहित्य के भीतर हर दृष्टिकोण के पीछे एक राजनीति होती है, और उसके प्रगटीकरण का ठेका आलोचना ले लेती है, जबकि ख़ुद लेखक भी कई बार यह नहीं बता सकता कि आखिर वह कौन-सी राजनीति थी, जिसके कारण उसने वह दृष्टिकोण अपनाया। अस्त्विवाद भी ऐसा ही एक दृष्टिकोण था, जिसके पीछे किसकी क्या राजनीति होगी, इतने बरसों बाद कहना मुश्किल है, लेकिन कम से कम यह ज़रूर कहा जा सकता है कि अस्तित्ववाद कोई विचारधारा नहीं थी, कोई राजनीतिक दर्शन नहीं था। यह कई सारे दृष्टिकोणों का एक समुच्चय था। हम-आप चाहें, तो उसमें अपने दृष्टिकोण जोड़ सकते हैं, अस्तित्ववाद को उससे कोई नुक़सान नहीं पहुंचेगा, बल्कि उसका विस्तार हो जाएगा। (कुछ यही मामला इन दिनों उत्तर-आधुनिकता का भी है।)

जब यह विचारधारा और दर्शन नहीं है, तो क्या है? यह महज़ एक पैटर्न है, एक डिज़ाइन है। यदि यह दर्शन है, तो ख़ुद नीत्शे और किर्केगार्द भी पूरी तरह अस्तित्ववादी नहीं हैं। अगर यह राजनीतिक विचारधारा होती, तो दुनिया के किसी न किसी देश में अस्तित्ववादी सरकार बनाने का आंदोलन अवश्य चल रहा होता और किर्केगार्द, दोस्तोएव्स्की, सात्र्र, कामू सभी का अस्तित्ववाद एक जैसा ही होता, एक ही जगह जाकर गिरता और उनमें महज़ कुछ लाक्षणिक अंतर ही होते, परंतु इन चारों में तो बहुत फ़र्क है। काफ्का को अस्तित्ववादी कहा गया, लेकिन उनका यह तथाकथित अस्तित्ववाद ऐसा निकला कि ख़ुद अस्तित्ववाद को लांघकर अपने लिए काफ्काएस्क जैसा एकल विशेषण लेता आया। अस्तित्ववाद एक ऐसी डिज़ाइन थी, जिसके पीछे कोई दार्शनिक फोर्स भी काम नहीं करता। यह ऐसी डिज़ाइन थी, जिसका सभी ने अपनी-अपनी तरह से प्रयोग किया। मुक्तिबोध ने भी किया।

मुक्तिबोध ने कुछेक बार कहा है कि हर कलाकार के भीतर सौंदर्य का एक पैटर्न होता है, और वह उसी के आसपास चलता है, जानते-अनजानते। मुक्तिबोध ने अपनी सन् 47-48 के बाद की कविताओं में इसी पैटर्न को अपनाया, जानते-अनजानते। अस्तित्ववाद उनका पैटर्न है, माक्र्सवादी दृष्टि से उनका कंटेंट बनता है।

और यही उनके द्वारा उठाया गया अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा ख़तरा है।

दुनिया में किसी बड़े माक्र्सवादी कवि ने अस्तित्ववादी पैटर्न का प्रयोग करने की हिम्मत नहीं दिखाई। अगर किसी ने इस तरफ़ सोचा होगा, तो वह समझ गया होगा कि ऐसा करना ख़तरे से ख़ाली नहीं, या तो उसकी माक्र्सवादी प्रतिबद्धता ख़तरे में पड़ जाएगी या फिर वह दोनों विपरीत-ध्रुवी अनुकूलनता से तालमेल नहीं बिठा पाएगा, माक्र्सवादी  जीवनदृष्टि/काव्यदृष्टि, अस्तित्वादी जीवनशैली/काव्यशैली से डैमेज हो जाएगी। हिंदी में ही मुक्तिबोध के बाद किसी अन्य कवि के पास वैसा दुस्साहस नहीं आ पाया, जबकि मुक्तिबोध ने रास्ता खोल दिया था।

यदि कोई कवि अपने लेखन को राजनीतिक दृष्टिसंपन्न दिखलाना चाहता है, तो इस पैटर्न का प्रयोग सच में बहुत बड़ा ख़तरा है। पता नहीं, मुक्तिबोध इस ख़तरे को समझ पाए थे या नहीं समझ पाए थे, पर यह सभी जानते हैं कि उनकी बेचैनी अभिव्यक्ति का ख़तरा उठाने को सन्नद्ध थी। यह तो दिखता है कि वह इस पैटर्न को स्वीकृति नहीं देना चाहते थे। नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र में वह नई कविता में जिस तरह की समस्याओं को गिनाते हैं, यदि उन्हीं को कसौटी बनाकर उनकी कविताओं को पढ़ा जाए, तो वे ख़ुद उन समस्याओं से दूर जान नहीं पड़ेंगी। जनता का साहित्य कैसा होना चाहिए के आधार पर अंधेरे में को पढ़ा जाए, तो शायद ही अंधेरे में या उनकी कोई और रचना जनता का साहित्य नजऱ आएगी। जनता अपने आप में एक अमूर्त अवधारणा है और हाईब्रो कला से लेकर पॉपुलर कला तक, जिस किसी ने जनता को क्या चाहिए या जनता को हम क्या दें जैसा मॉडल बनाकर, उसके आधार पर, कला की रचना की, इतिहास गवाह है कि उसने दोयम दर्जे की कला उत्पादित की। यह वृहत्तर तौर पर साहित्य के लिए हितकारी है कि उनकी कविताएं और कुछ गद्य अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं। तर्कों के आधार पर दोनों की दिशा एक साबित करने के कई 'फाउल प्ले’ हो चुके हैं, पर कविता के संदर्भ में तर्क सबसे कमज़ोर औज़ार होते हैं। शुरू से ही कविता अनुभूति को अपना आधार बनाती रही है और जब तक मनुष्य के पास अतीत रहेगा, तब तक वह तर्क के मुक़ाबले अनुभूति को ही चुनती रहेगी। इसलिए मुक्तिबोध के कुछ गद्य-विशेष को उन्हीं के लिए कसौटी बनाना बहुत उचित नहीं होगा, इस लिहाज़ से कि यह लगभग जगजाना है कि किसी लेखक के भीतर का कवि और उसके भीतर का आलोचक, दोनों अलग-अलग ज़बान बोलते हैं और ज़बान का यही अलगाव उस लेखक के आत्मसंघर्ष की कोई एक पगडंडी बनाता है। संस्कृत के कवि यूं ही नहीं कह गए कि कवि की दो जीभ होती है।

उसी पैटर्न ने मुक्तिबोध को ग़ालिब की तरह बना दिया। उन्हें काफ्का वाली भूमिका में भेज दिया। सबके पास अपना ग़ालिब होता है। ग़ालिब के एक ही शेर का बहुत पॉजि़टिव मतलब निकाला जा सकता है, तो बहुत ही नेगेटिव मतलब भी। सबके पास अपना एक काफ्का होता है। नैयर मसूद, काफ्का का प्रयोग अपनी तरह से करते हैं, जेएम कुत्सी के पास अपना एक अलग काफ्का है, पमुक के पास अलग, तो मुराकामी का काफ्का इन सबसे ही जुदा है- बेहद की हद तक।

उसी तरह सबके अपने-अपने मुक्तिबोध हैं। रामविलास शर्मा के पास अपना, नामवर सिंह के पास अपना और अन्य के पास अपना। शर्मा, मुक्तिबोध के अस्तित्ववादी पैटर्न पर सवाल उठाकर उनके कंटेंट को संदिग्ध बताने की कोशिश करते हैं, सिंह मुक्तिबोध के कंटेंट को हावी दिखाने के लिए उनके अस्तित्ववादी पैटर्न का खंडन करते चलते हैं। ख़ामोश सिसकियां भरनेवाला मन, कमज़ोरियों से ही लगाव है मुझको जैसी अनेक स्वयंसिद्ध पंक्तियां, आत्मनिर्वासन-आत्मवंचना-आत्मभत्र्सना का असंदिग्ध स्वर नामवर को कहीं से अस्तित्ववादी नहीं लगते। इनके खंडन के लिए वह जिस तरह तर्कणा करते हैं, वह 'फाउल प्ले’ बन जाती है। एब्सर्डिटी, एलियनेशन, री-इफिकेशन अंतत: मुक्तिबोध को अन्य से अनन्य और अनन्य से अन्य की यात्रा पर ले जाते हैं, जो कि कहीं आत्म की खोज का माध्यम भी है। मुक्तिबोध के यहां यह 'डिसगाइज़्ड’ व 'डिसेप्टिव’ है। आत्मकथात्मक मैं और प्रतीकात्मक मैं के रूप में। यदि मैं को प्रतीक ही मानना है, तो यह छूट हमेशा रहेगी कि उसे  इनमें से किसी का भी प्रतीक माना जाए- ख़ालिस मैं का, परिवार का, मध्यवर्ग का, समाज का या राष्ट्र का।

मुक्तिबोध पर दोनों ही, एक पक्ष की प्रधानता का दावा करते हैं, दूसरे को नकारते हैं, जबकि मुक्तिबोध दोनों पक्षों की प्रधानता हैं। उनमें कंटेंट और पैटर्न का अद्वैत ऐतिहासिक है। वही उन्हें समस्याग्रस्त भी बनाता है और वही उन्हें बार-बार प्रासंगिक भी करता है। इसीलिए उन पर लगातार बहस होती रहती है, और आगे भी होती रहेगी। चूंकि यह पैटर्न ख़ुद कवि ने चुनकर अपनी कविता को आवरण की तरह पहना दिया है, दोनों ही कि़स्म के तर्क बराबर चलते रहेंगे। यह अब एक अनंत प्रक्रिया बन चुकी है। यह कहीं नहीं रुकेगी। जिस दिन हिंदी आलोचना में मााक्र्सवादी कैनन का ह्रास होगा, तब नई आलोचना मुक्तिबोध पर नए सिरे से, इसी तरह के नए सवाल उठाएगी और तब मुक्तिबोध एक बार फिर समस्याग्रस्त होंगे/करेंगे।

जब मुक्तिबोध यह कहेंगे, - वह काव्य या कला जो हमें भावोत्तेजित तो करती है, किंतु हमारे वास्तविक जीवनपथ में मूल्यवान होकर सहायक नहीं बनती, निश्चय ही वह कला श्रेष्ठ होते हुए भी श्रेष्ठतम नहीं है, तब इस वाक्य के आसपास कितनी बार भी जोड़ दें कि ऐसा कहकर मैं स्थूल उपयोगितावाद का समर्थन नहीं कर रहा, इसे उपयोगितावाद का समर्थन ही माना जाएगा, भले वह सूक्ष्म हो या स्थूल। क्योंकि भावोत्तेजना भी एक मूल्य ही है और मूल्यवान होने की मांग अंतत: उपयोगितावाद। क्योंकि जिस कविता या साहित्य के डिफेंस में हम इतनी सारी बातें कहते आते हैं, उस कविता को न्यूटन जैसे लोग सदियों पहले ही कपटी कि़स्म की बकवास जैसा उद्बोधन दे चुके।

ऐसा मुक्तिबोध ने भी नहीं चाहा होगा। अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाकर भी नहीं चाहा होगा। जीवन को महज़ बौद्धिक विश्वासों से देखा जाए, तो जीवन की सुंदरता नष्ट होती है। मुक्तिबोध यह कहकर गए- लोग आलोचना करते समय किसी ख़ास वाद के दायरे में बांधकर ही साहित्य को देख पाते हैं। यह तरीक़ा एकदम ग़लत है। साहित्य के वाद दार्शनिक या वैज्ञानिक प्रणालियां नहीं हैं, वे केवल साहित्य के दृष्टिकोण हैं। ऐसा स्पष्ट कहकर जाने के बाद भी मुक्तिबोध को एक ख़ास वाद के दायरे में बांधकर ही देखा जाता है या देखने की जि़दो-जिरह की जाती है। शायद मुक्तिबोध ने यह भी नहीं चाहा होगा।

मुक्तिबोध की मृत्यु को पचास साल हो गए। इसी के साथ इस जि़दो-जिरह की विराट शुरुआत के भी पचास साल हो गए। वाद में बांधने के कारनामे उसके पहले भी चलते थे, लेकिन मुक्तिबोध के बाद यह बेहद मुखर हो गया। यक़ीनन, इसमें मुक्तिबोध का दोष निकालना सिवाय मूर्खता होगी।

मुक्तिबोध के जाने के बाद उन पर क़ब्ज़े को लेकर जिस तरह संघर्ष हुए, उन्हें देखकर बुद्ध का जाना याद आ जाता है। जब बुद्ध मरे, तो उनके अनुयायी राजाओं में उनके अवशेषों के स्वामित्व को लेकर झगड़ा हो गया। बुद्ध सबके थे, लेकिन कोई उनके पैरों की राख ले गया, तो कोई उनका दांत। द्रोण नामक विद्वान की उपस्थिति में संतोषजनक बंटवारा हो गया और फिर कोई विवाद न हुआ, लेकिन मुक्तिबोध को कोई द्रोण न मिल सका।

मुक्तिबोध पर जिस तरह की बहसें हुईं, उसका सबसे बड़ा नुक़सान यह हुआ कि आने वाले रचनाकार, अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने होंगे जैसी पंक्ति को नारे की तरह प्रयोग करने के बाद भी, अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने जैसे गुण से विमुख रहे। ये बहसें यह नहीं बता पाईं कि आखिऱ ख़ुद मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति का कितना भयंकर ख़तरा उठाया था, ऐसा ख़तरा, जो दुनिया का कोई कवि नहीं उठा सका, ऐसा ख़तरा जो ख़ुद मुक्तिबोध की प्रतिबद्धताओं और काव्यकला-चैतन्यताओं को भी ख़तरे में डाल दे। बहुलांगी मुक्तिबोध ने जो ख़तरा उठाया, उस पर एकांगी बहस हुई। प्रेडिकामेंट कैसा कि ऐसी ट्रैजडी है नीच! आखिऱ मुक्तिबोध के बाद कोई भी कवि उतना जटिल, उतना दुरूह, उतना व्यूहात्मक, उतना तिलिस्मी और उतना बहुलांग क्यों नहीं हो पाया?

इन पचास बरसों में हर दशक का युवा कवि दोहराता रहा- अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने होंगे, तोडऩे ही होंगे सारे मठ और दुर्ग... इन पचास बरसों में कऱीब तीन दशकों का युवा कवि अब बूढ़ा हो चुका है और अब बेचारा ख़ुद भी सोचता होगा- 'दुहराया तो बहुत, पर उठाया कौन-सा?’

मुक्तिबोध की सिर्फ़ यही एक पंक्ति नहीं हैं, लेकिन चूंकि सबसे ज़्यादा इसी पंक्ति को दुहराया गया, इसलिए यह प्रश्न इसी पंक्ति के कोण से।

मुक्तिबोध के पूरे नाम में वैसे तो एक मिडिल नेम जुड़ा हुआ है, लेकिन मेटाफ़ोरिकल तरीके से उनका एक मिडिल नेम बनाया जाए, तो वह यही होगा- 'मैंने पैटर्न और कंटेंट का सबसे बड़ा ख़तरा उठाया'-- तो यह प्रश्न इस काल्पनिक मिडिल नेम के कोण से भी।

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  जाने संस्कृत का वह पहला कवि कौन रहा होगा, जिसने लिखा होगा- चंदन के पेड़ में फूल नहीं उगते। जाने इतालवी का वह पहला कवि कौन रहा होगा, जिसने लिखा होगा कि मरते समय हंस गीत गाता है। जबकि ये दोनों चीज़ें नहीं होतीं। चंदन में बाक़ायदा फूल लगता है और हंस मरते समय कोई गाना नहीं गाता। अगर एकाध बार यह लिखा गया होता, तो हम मान लेते कि दो हज़ार साल की परंपरा के भीतर यह किसी ख़ास कि़स्म की अनुभूति का कवि-विशेष द्वारा किया गया उपमात्मक चित्रण है, लेकिन पूरा संस्कृत काव्य ही चंदन में फूल वाली उस उक्ति का अनुसरण करता है, इतालवी और बाद में अंग्रेज़ी काव्य अब तक हंस वाली उस उक्ति की पुनरावृत्ति करता रहता है।

पूर्ववर्ती कवियों द्वारा दी गई उपमाओं का अनुसरण करते चलना शायद कवियों की प्रवृत्ति होती है। कवि अमूमन अनुसंधानात्मक नहीं होते। हर भाषा की कविता में ऐसी कई सारी पंक्तियां मिलेंगी, जिन्हें दोहराते जाने का कोई आधार नहीं होता, लेकिन जो महज़ इसलिए दोहराई जाती हैं कि वे चली आ रहीं। ऐसी आदत को फ्रेंच में क्लीशे कहा जाता है, लेकिन कविता के भीतर इस प्रवृत्ति के लिए यह शब्द भी सही नहीं है। अंग्रेज़ी का ऑबवियस भी एक पहलू को पूरा करता है, लेकिन यह भी इस प्रवृत्ति को पूरी तरह नहीं दिखाता। चित्रकार साल्वादोर दाली की एक उक्ति याद आती है, जो शायद उन्होंने फ्रेंच कवि ज़ेरार दे नर्वाल से उधार ली थी और कमोबेश बेहतर शब्दों का प्रयोग कर उसे चुकाया था - स्त्री के गालों की तुलना गुलाब से करने वाला पहला व्यक्ति यक़ीनन कवि था, इस तुलना को दोहराने वाला पहला व्यक्ति यक़ीनन मूर्ख। हिंदी कविता में क्लीशे और ऑबवियस का प्रचुर प्रयोग है। यह कहना भी ग़लत नहीं होगा कि 'क्लीशे’ या 'सहज तार्किक चीज़ें’ या 'स्वीकृत सामान्य समझ’ इस समय हिंदी कविता के सबसे बड़े बौद्धिक भयों में से हैं, लेकिन यहां उनके उदाहरणों में जाना उद्देश्य नहीं है।

क्लीशे किसी एक शब्द, मुहावरे के प्रयोग को कहा जा सकता है, लेकिन फॉर्म और कंटेंट को लेकर भी इस तरह का अनुसरण दिखता रहे, तो काव्य-प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति के लिए कवि-समय कहीं बेहतर शब्द है। जब कविता की एक पूरी पीढ़ी या उससे ज़्यादा लोग इस तरह का अनुसरण करने लगते हैं, तो वह कवि-समय कहलाता है। यह पद राजशेखर का दिया हुआ है। उन्होंने काव्यमीमांसा में संस्कृत काव्य के बहुचलित क्लीशे का विश्लेषण करते हुए इस पद की रचना की थी। इस पद का अर्थ कवि का समय नहीं है, यह कवि का युग भी नहीं है, बल्कि यह अपने समय की प्रचलित अवधारणाओं, मान्यताओं, स्थितियों और प्रतीकों के भीतर क़ैद हो जाना है। यह अनुकरण की क़ैद है। दुनिया का कोई भी काव्य-समुच्चय कवि-समय से नहीं बच पाता, लेकिन जो काव्य ख़ुद को इस कवि-समय से बचा ले जाता है, वह कविता को एक सीढ़ी आगे पहुंचा देता है।

हिंदी कविता की कई वर्तमान आदतें, किंचित संशोधित रूप में, कवि-समय ही हैं। कुछ सदियों तक बहुत सारे कवि प्रेम, सिंगार, सेक्स लिखते रहे और उन्होंने संस्कृत का काव्य-साहित्य बनाया। वह भी एक कवि-समय था। वहां मैं उन कवियों को खोजता हूं, जो अपने समय के प्रचलित कवि-समय के खि़लाफ़ खड़े होकर लिखते हैं, इतिहास में नहीं मिलते। फिर कुछ सदियों तक बहुत सारे कवि भक्ति पर लिखते हैं और भक्ति काव्य बनाते हैं। इनके बीच में मैं उसे खोजता हूं, जो इस कवि-समय में मिसफिट होता हो। कोई ख़ास नहीं मिलता। वैसे कवि होंगे ज़रूर, लेकिन हमारा इतिहास उन्हें ठीक से दर्ज न कर पाया होगा। एक देश और संस्कृति के रूप में हमने कविता से बुरा इतिहास-लेखन किया है। बीसवीं सदी के शुरुआती बरसों में वापस प्रेम, प्रकृति और मीठेपन का कवि-समय आया। साहित्य के इतिहास में युगों का जो नामकरण किया गया है, सिर्फ़ उनसे ही इस कवि-समय का मूल्यांकन नहीं होता, बल्कि उस दौर में जो अलग लिख रहे थे, उनका अलग-पना भी उसी मीठेपन से मार्गदर्शित हुआ किया; यह कवि-समय की प्रवृत्ति है।

बीत जाने के बाद कवि-समय की यह अवधारणा स्वीकृत व मान्य हो जाती है। इस पर सवाल नहीं उठाया जाता। ख़ुद राजशेखर भी इस प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाते हैं, लेकिन यह भी कहते हैं कि इसे प्रश्नांकित नहीं करना चाहिए।

किंतु बीत जाने के बाद। जब यह चल रहा हो, तो इस पर कम से कम विचार अवश्य करना चाहिए। और हमारे समय का कवि-समय अभी बीता नहीं है। यह एक रूढ़ प्रवृत्ति की तरह अभी भी हमारी कविता के साथ है। हमारा कवि-समय राजनीतिक है। पिछले पचास साल की हिंदी कविता का प्रमुख स्वर राजनीतिक है। इक्कीसवीं सदी की इस दूसरी दहाई में भी यह स्वर परिवर्तित नहीं हुआ है। किसी एक काव्यांदोलन का मुख्य स्वर किस तरह रूढ़ता के कवि-समय में बदल जाता है, हम इसके कई उदाहरण इन बरसों में देखते आए हैं।

यह सिर्फ़ हिंदी में ही नहीं है। बल्कि दुनिया के कई देश, जिनका काल राजनीति से प्रभावित रहा, राजनीतिक कवि-समय में निवास करते हैं। बीसवीं सदी में राजनीति ने मनुष्य को विराट कटु अनुभव दिए हैं और वह कविता में अभिव्यक्त हुआ है। दूसरे विश्व-युद्ध के बाद पोलिश कविता (और पूरे पूर्वी यूरोप की कविता) का स्वभाव राजनीतिक स्वरों से ही प्रतिश्रुत हुआ। उसने युद्ध की त्रासदी को झेला, फिर कम्युनिस्ट शासन उनके लिए अत्याचार ले आया। उन सारे अनुभवों ने कविता के भीतर जगह पाई और मनुष्य की संवेदनाओं को नई तरह से छुआ। उसने पोलिश कविता को चार बेहतरीन कवि दिए। पूर्वी यूरोप से बेहद मार्मिक कवि सामने आए। लेकिन नब्बे के दशक के बाद से पोलैंड सहित पूर्वी यूरोप के कई देशों के हालात बदल गए। राजनीतिक दमन-चक्र नज़दीकी इतिहास में चला गया। तो क्या तब भी वहां का कवि उसी नज़दीकी इतिहास की कविता लिखता रहा? हां, बहुत हद तक। क्योंकि कवि अनुसंधानात्मक नहीं, अनुकरणात्मक होते हैं, इसलिए नई पीढ़ी के कवि भी वैसी ही कविता लिखते रहे, जैसी मिवोश, रूज़ेविच, हेर्बेर्त, रित्सोस, योज़ेफ़ या इनके तुरंत बाद की पीढ़ी के कवि लिख गए थे। काव्य-विषयों के अनुकरण की वंशानुगत लत छोडऩे और अपने लिए नए विषयों की तलाश करने में उन्हें थोड़ा-सा समय लग गया। आज की पोलिश कविता महज़ राजनीतिक कविता नहीं है।

हिंदी में पूरी तरह ऐसा नहीं हो पाया।

आज़ादी के बाद भारत में राजनीति ने जन-जीवन को उस तरह प्रभावित नहीं किया, जैसा कई अन्य देशों में, लेकिन फिर भी हिंदी की कविता का मुख्य स्वर राजनीतिक ही है, क्योंकि हिंदी का कवि वंशात्मक-अनुकरणात्मक तौर पर राजनीतिक जीव है। वह पोएटिक्स की समझ को दरकिनार कर सकता है, लेकिन राजनीतिक समझ को नहीं। वह वृहत् मानवता के पक्ष में खड़ा होने के लिए भी कविता के भीतर पॉलिटिकली इनकरेक्ट होने का जोखिम नहीं ले पाता। उसकी करेक्टनेस उसकी पॉलिटिक्स पर आधारित होगी। अगर आप उसकी पॉलिटिक्स में यक़ीन नहीं रखते, तो उसकी करेक्टनेस भी संदिग्ध हो जाएगी। कविता के भीतर मानवीय अनुभूतियों पर राजनीतिक अनुभवों को एक बालिश्त ऊपर रखना भी एक कवि-समय है; उसका यह एक मुखर नुक़सान है, जो कि समूची कविता को भुगतना पड़ता है।

मैं बहुत सारे उदाहरणों में नहीं जाना चाहूंगा, क्योंकि उससे एक पूरे ग्रंथोत्पादी विस्तार की गुंजाइश बन जाएगी, किंतु एकाध उदाहरण रखे बिना काम भी नहीं चलेगा। सत्तर के दशक में एक कविता ने घोषणा की थी कि वह कविता नहीं है, वह गोली दागऩे की समझ है। वह कविता पूछती है कि अगर आदमियत को जीवित रखने के लिए दारो$गा को गोली दागऩे का अधिकार है, तो मुझे क्यों नहीं? यह कविता सत्ता के षड्यंत्रों के खि़लाफ़, शोषकवर्ग के दमन के खि़लाफ़ उतनी ही आक्रामकता से खड़ी होती है। लेकिन यह कविता अंतत: क्या पूछती है? अपने लिए क्या चाहती है? यह अपने लिए गोली दागऩे का अधिकार चाहती है, क्योंकि यह जिनके पक्ष में लिखी गई है, वे गोली खाते रहे हैं और जिनके खि़लाफ़ लिखी गई है, वे गोली दाग़ते रहे हैं। यह कविता अधिकार मांगती है कि वह जिनके खि़लाफ़ खड़ी हो रही है, किन्हीं मामलों में उनके जैसी हो जाए?

अगर दारोग़ा गोली दाग़ता है, तो मैं भी गोली दागऩे की समझ हूं। कल को दारोग़ा अगर बलात्कार करेगा, तब क्या मैं बलात्कार करने की समझ हूं? दारोग़ा कल को लोगों के हाथ-कान-नाक काट देगा, तो मैं कविता नहीं, हाथ-कान-नाक काटने की समझ बन जाऊंगी? इन एक-दो वाक्यों से यह कविता संकटग्रस्त हो जाती है। संकट में डालने वाले ऐसे वाक्यों का इज़ाफ़ा, उसी कविता के विन्यास और व्याकरण में जज़्ब रहते हुए भी, किया जा सकता है। अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधाराओं की विवशताओं के बावजूद व्यापक मनुष्यता के पक्ष में खड़े लोर्का, राद्नोती, हिकमत, माण्डेलस्ताम जैसे कवियों को पढ़कर पता चलता है कि कविता गोली खाने की नियति तो हो सकती है, किंतु हिंदी का कवि सगर्व कहता है कि कविता गोली दागऩे की समझ है।

यह बेहद हिंसक कविता है। बेहद हिंसक समय में कविता का भी बेहद हिंसक हो जाना कोई बहुत उम्मीद से भरा नहीं है। हिंसा को किसी भी तर्क से जस्टीफ़ाय नहीं किया जा सकता। मनुष्य का पूरा इतिहास सबसे ज़्यादा हिंसा से ही भरा हुआ है, लेकिन कविता कभी हिंसा के पक्ष में खड़ी नजऱ नहीं आती। महाभारत अकूट हिंसा से भरा है, लेकिन शांतिपर्व प्रायश्चित और ग्लानि का पर्व है। ओडिसस तमाम मार-काट मचाता है, लेकिन इथाका लौटते समय वह ग्लानि में रहता है। हिंसा की पीड़ा और हिंसा की ग्लानि में कविता का अवसर हो सकता है, लेकिन हिंसा के विरुद्ध प्रतिहिंसा में भी कविता का अवसर हो सकता है, हिंदी में यह कविता बताती है। हिंसा (और प्रतिहिंसा) मानवीय गुणों में पैबस्त है, लेकिन क्या वह विराट मानवीय मूल्य है? या सूक्ष्म मानवीय मूल्य भी? और क्या यह ऐसा मूल्य है, जिसके पक्ष में कविता को खड़ा होना चाहिए?

यह शुचितावादी दृष्टिकोण नहीं है, बल्कि यह मानवीय दृष्टिकोण है। यह शोषकों द्वारा की जा रही हिंसा का पक्ष लेना नहीं है, लेकिन उस हिंसा के विरुद्ध कविता के भीतर, व जीवन के भी, प्रतिहिंसा का पक्ष लेने पर प्रश्नांकन है।

इसलिए यह सवाल सिर्फ़ इस कविता पर नहीं है, यह सवाल उस पूरी राजनीति से है, जिससे दृष्टि पाकर यह कविता संचालित होती है। चूंकि यह राजनीति-विशेष दृष्टि से संचालित कविता है, इसलिए यह विराट व सूक्ष्म, मानवीय मूल्यों को कविता के भीतर त्याग देने के लिए तैयार हो जाती है।

अगर कोई कवि दक्षिणपंथी कट्टर राजनीति में विश्वास रखता है, तो क्या वह ऐसी कविता लिख देगा, जिसमें वह अल्पसंख्यक मुसलमानों को काटकर फेंक देने की इच्छा व्यक्त करे, क्योंकि पिछले दंगों में मुसलमानों ने उसके लोगों पर हमला किया था? या इस वाक्य में मुसलमान की जगह हिंदू कर दिया जाए, तब भी वाइस वर्स की स्थिति पैदा होगी। तो क्या ऐसी कविता को राजनीतिक कविता मान लिया जाए? क्या दक्षिणपंथी कट्टर राजनीति से मिली दृष्टि से संचालित उस कविता को राजनीतिक कविता की तरह अध्ययन में शामिल किया जाए? उस राजनीति का भी आखिऱकार अपना एक तर्कशास्त्र तो है ही।

पार्टीशन के समय राजनीतिक निर्णयों के कारण सरहद के इस तरफ़ मुसलमानों को मारा गया, सरहद के उस तरफ़ हिंदू-सिखों को मारा गया, तो अगर दोनों तरफ़ के कवि अपनी कविता के भीतर अपने विपक्षियों को मार-काट डालने की प्रतिहिंसा से भरी कविताएं लिखने लगें, तो उन्हें राजनीतिक कविता मान लिया जाए? सदियों से यहूदी प्रताडि़त रहे हैं, तो क्या यहूदी कवियों को प्रताड़कों को गोली मार देने की समझ वाली कविता लिखनी चाहिए? या वर्तमान में फ़लीस्तीनी, यहूदी राष्ट्र की हिंसा से बेहाल हैं, तो फ़लीस्तीनी कविता द्वारा समूचे यहूदी राष्ट्र को बम से उड़ा देने की घोषणा को राजनीतिक कविता मान लिया जाए? राजनीतिक उपसर्ग हटा देते हैं, बहुत आसान सवाल कि क्या उसे कविता भी माना जाए? श्रेष्ठ फ़लीस्तीनी कविता उस आतंक का, भेदभाव का, अपने लोगों को मनुष्य न समझे जाने का विरोध करती है, लेकिन प्रतिहिंसा से प्रतिश्रुत होकर नहीं।

यदि गोली दागऩे की समझ कविता है, तो दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे जैसे घृणास्पद वाक्य भी कविता हैं। नहीं मानेंगे आप? मैं भी नहीं मानता, लेकिन मैं दोनों को ही नहीं मानता।

कविता नहीं, गोली दागऩे की समझ है- जैसी पंक्ति वाली कविता को इतना सेलेब्रेट किया गया, उसके कवि को युगांतरकारी बताया गया, तो किसने बताया? जिस राजनीतिक दृष्टि से संचालित होकर वह कविता लिखी गई थी, उसी राजनीतिक दृष्टि से संचालित होकर कविता-आलोचना आदि लिखने वाले खेमे ने बताया। हिंदी में वह खेमा प्रभावशाली और प्रभुत्वकारी है, तो अपने जैसी राजनीति की कविता करने वालों को वह महान बता देता है, अपनी राजनीति का समर्थन करने वाली कविताओं को श्रेष्ठतम कहने का तर्कशास्त्र गढ़ लेता है, तो उसके ऐसा करने से साहित्य का इतिहास भी इस कविता को, इस कवि को या इसके जैसे तमाम कवियों व उनकी कविताओं को राजनीतिक चेतना से लैस श्रेष्ठ कविता मान लेगा, क्योंकि किसी भी इतिहास की तरह साहित्य का इतिहास भी प्रभुता का ही दस्तावेज़ होता है।

मैं सोचता हूं कि कल को अगर हिंदी साहित्य में दक्षिणपंथी कट्टर राजनीति में विश्वास रखने वाला खेमा प्रभुता पा ले, वह उतना ही ताक़तवर हो जाए, जितना आज व बीते बरसों में माक्र्सवादी कैनन रहा है, तब क्या होगा? तब तो वह मध्ययुग से ही हिंदुओं पर अत्याचार करने वाले मुसलमानों को चीरकर रख देने की समझ वाली कविता को श्रेष्ठ राजनीतिक कविता बता देगा?

यह कितना नुक़सानदेह, कितना घातक होगा! यह प्रतिहिंसा को मानव-मूल्य में स्थापित कर देने का अक्षम्य अपराध होगा। बहुत सारी सरकारें, बहुत सारे आतंकी संगठन यह काम पहले ही कर रहे, क्या कविता को भी यह काम करना चाहिए?

जब सबसे क्रूर तानाशाह भी हिंसा करता है, तो उसके पास अपनी हिंसाओं को वैध ठहराने के लिए तीक्ष्ण तर्क होते हैं, लेकिन वे सारे तर्क मानवीय अनुभूतियों और मूल्यों का उपहास करते हैं, उनसे घात करते हैं। इसी तरह गोली दागऩे की समझ जैसी कविताओं के पक्ष में की जाने वाली तर्कणा बुनियादी मानवीय मूल्यों के साथ घात ही करती हैं। इससे अपनी राजनीति का समर्थन करने वाली कविता को श्रेष्ठ बताने की फाउल प्ले की परंपरा का ही अंग-विकास होगा।

यह अंतत: बुनियादी तौर पर एक अनुभूति, एक तत्व, एक अभिव्यक्ति के रूप में उपस्थित कविता-मात्र से भी घात होगा। हिंदी कविता इस तरह की हिंसक-प्रतिहिंसक प्रतिश्रुतियों से भरी पड़ी है, और दुर्भाग्यजनक तरह से न केवल इस प्रतिश्रुति को मान्य किया जाता है, बल्कि उसका उत्सव भी मनाया जाता है। यह कविता है या राजनीति का खेला? जिस विचारधारा की राजनीतिक-साहित्यिक प्रभुता होगी, उस राजनीति की कविता श्रेष्ठ हो जाएगी, तो कविता किस पृष्ठभूमि में बिला जाएगी?

यदि यह आपकी राजनीति है, तो यह आपकी निजी राजनीति है। इस राजनीति से संचालित कविता आपकी निजी कविता है। यह कविता मेरे समय में मौजूद तो है, लेकिन यह मेरे समय की कविता नहीं है। ठीक है, कविता अंतत: एक निजी अभिव्यक्ति होती है, लेकिन वह कितनी उदात्तता से निजी के दायरे का अतिक्रमण कर सार्वभौमिक हो जाती है, यह कोई कहने की बात नहीं है। आज ही नहीं, बहुत पहले से ही पर्सनल पोएट्री की परंपरा रही है, बहुत सारी पर्सनल पोएट्री को बहुत बड़े पैमाने पर बहुत बड़े तबक़े के साथ कनेक्ट होते देखा गया है, यह पर्सनल का निर्बंधीकरण है, लेकिन पर्सनल पोएट्री में भी पर्सनल प्रतिहिंसा को वैध नहीं कहा जा सकता।

यहां मुझे सर्बिया का एक युवा कवि याद आता है। मैंने उसके बारे में किसी किताब में पढ़ा था। वह मनोरोगी सीरियल किलर था। हत्याएं करता, कविताएं लिखता। हत्या को सही ठहराने के लिए अपनी कविताओं में वह भावप्रवण तर्कणा करता। मरने वाले के चरित्र का ऐसा चित्रण करता कि पाठक को यक़ीन हो जाए कि ऐसे व्यक्ति की हत्या कर देना ही उचित है। निश्चित ही, वे उसकी पर्सनल कविताएं थीं, पर क्या काव्य व जीवनमूल्यों के आधार पर उन कविताओं को मान्य किया जा सकता है? बिलकुल नहीं। किंतु जब दुनिया में मनोरोगी सीरियल किलर्स का बाहुल्य हो जाएगा, हत्या को वैध बताने वाली उस कविता से कई लोग कनेक्ट होने लगेंगे, तो क्या उस कविता को मान्य-महान कह देंगे? संभव है, कह दें। बाहुल्य का प्रताप है।

हिंदी की जिस कविता का मैंने ऊपर उल्लेख किया है, उसमें मौजूद प्रतिहिंसा पर्सनल भी नहीं है।

यह एक राजनीतिक रूढ़ कवि-समय से निकली कविता है, जो उस कवि-समय को और रूढ़ कर देती है। यानी यह अकेली, अपवाद जैसी कविता नहीं है। इस कविता का हिंदी में बेहद अनुकरण हुआ और आज की कविता में भी इसके अंशावशेष पाए जा सकते हैं। इनके कारण हिंदी के गंभीर साहित्य में मास मीडिया कवि की उपस्थिति प्रबल हुई है। यह मास मीडिया कवि हिंदी के मंचीय कवियों जितना लोकप्रिय तो नहीं, लेकिन फिर भी लोकप्रियता के तत्व उसकी कविता को प्रभावित करते हैं। हिंदी में ये कवि हर जगह आगे खड़े हैं, इनकी कविताएं सरल को सरलीकृत ढंग से दिखाने को प्रचलन में लाती हैं। ये बार-बार मांग करते हैं कि कविता को सरल होना चाहिए; कि सरल कविता लिखना बेहद कठिन काम होता है और ये कठिन काम कर रहे हैं; इनकी मांग होती है कि किसी भी कविता का अर्थ उसके पहले पाठ में ही पूर्णत: स्पष्ट हो जाना चाहिए; कि ये बार-बार ख़ुद को ग़ालिब-निराला-मुक्तिबोध की परंपरा का कवि बताते हैं और जऱा-से कठिन से भी उबकाई भरने लगते हैं; उनकी काव्य-दृष्टि की आंतें इतनी कमज़ोर होती हैं कि वे सतत सुपाच्य की खोज में रहते हैं; इनके पास हर स्थिति के लिए डायलॉगबाज़ी जैसा एक वाक्य होता है, बक़ौल पुराने किंवा नए आलोचक, जैसे ही कविता में वह वाक्य छूटता है, कविता एकदम से अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है (भले अपनी समग्रता में हिंदी कविता सिर के बल खड़ी हो जाए)। आठवें व नवें दशक में लिखी गई कई कविताएं सरल को सरलीकृत ढंग से प्रस्तुत करने का अप्रतिम उदाहरण हैं। ज़मीनी यथार्थ से मुठभेड़ का दावा करने वाली यह कविता अपने लिए एक काल्पनिक यथार्थ का सृजन करती चलती है। जैसे तानाशाह के आसपास बहुत सारी कविताएं लिखी गईं। ज़्यादातर कवियों की वोकाबुलेरी में तानाशाह जैसा शब्द कम से कम एक बार ज़रूर आया। आज़ाद भारत के छह दशक छोटे-से इतिहास में कोई तानाशाह गद्दीनशीं नहीं दिखा, लेकिन हिंदी कविता में इतनी बार तानाशाह आता है कि लगता है, भारत में तानाशाही व्यवस्था चल रही है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य महत्तम है, इसीलिए वे तानाशाह पर कविताएं लिख पाए। सच में तानाशाही होती, तो वे अपनी कविताओं में ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं कर पाते। हिंदी कविता ने बहुत कुछ पश्चिम से अर्जित किया है, जिसमें इस शब्द का कविता के भीतर प्रयोग का सलीक़ा भी शामिल है। दरअसल, पूर्वी यूरोप, निष्कासित-निर्वासित सोवियत कवियों और लातिन अमेरिकी तानाशाहियों के खि़लाफ़ लिखी गई प्रतिरोध की कविता से हिंदी कविता गहरे तक प्रभावित हुई। उनसे हिंदी का कवि शायद दुखी हुआ होगा कि हमारे यहां तानाशाही क्यों नहीं? होती, तो हम भी उसी तरह प्रतिरोध करते। मूल में प्रतिरोध की इच्छा थी, तो भला तानाशाह की ज़रूरत ही क्या? सो, तानाशाह की एक काल्पनिक उपस्थिति तैयार कर दी गई और प्रतिरोध शुरू हो गया।

विराट मानवीय दमन, विराट प्रतिरोध के अवसर हैं। जैसे हिंदी में विभाजन पर बड़ा साहित्य नहीं रचा जा सका, उसी तरह इमर्जेंसी पर भी बड़ा साहित्य नहीं आया। काल्पनिक यथार्थ की सृष्टि कर उसकी ज़मीन पर प्रतिरोध में मुब्तिला हिंदी कवि को इतनी फ़ुरसत नहीं मिल पाई कि वह अपनी कविता में मात्रा का ही परिवर्तन कर देता, आ की जगह ई की मात्रा लगा लेता, तानाशाह कहता है की जगह तानाशाह कहती है जैसा मामूली संशोधन भी कर लेता, तो भी कुछ मायनों में वह असल यथार्थ की ज़मीन पर आ जाता। पर वैसा भी नहीं हो पाया।

 लोकतांत्रिक दायरों में रहकर भी सत्ता किस तरह दमन करती है, इसके कई प्रसंग संक्षिप्त नज़दीकी इतिहास में हैं, लेकिन कवि की नजऱ वहां तक भी नहीं पहुंच पाई। लोकतांत्रिक दायरे में रहकर भी सत्ताएं हिंसक दमन करती हैं और उस दमन तक दृष्टि न पहुंचा पाना, हिंदी की वर्तमान राजनीतिक कविता की एक बड़ी असफलता रही है।

कविता में भारतीय ज़मीन, विदेशी ज़मीन जैसा अलगाव मैं नहीं मानता। ये सारी बातें सिर्फ़ इसीलिए कही हैं कि काल्पनिक यथार्थ का प्रयोग करने वाली ये कविता-पीढिय़ां बार-बार यह दावा करती हंै कि उनने ज़मीनी यथार्थ की कविता रची है। यदि इस तरह के दावे न हों, तो कभी भी काल्पनिक यथार्थ को प्रश्नांकित नहीं किया जा सकता। काल्पनिक यथार्थ भी यथार्थ-चित्रण का एक महत्वपूर्ण अंग है। कवि स्वभावत: विश्व-नागरिक होता है। वह देश और काल की सीमा से परे चला जाता है। इसमें आपत्ति जैसी कोई बात नहीं, यह कविता का एक मान्य उपकरण है। ख़ुद राजशेखर ने इस तरह की प्रवृत्ति को कवि-समय से भिन्न माना है।

बशर्ते वह कविता ऐसे काल्पनिक यथार्थ का भार वहन कर सके। कविता तमाम कि़स्म के भार वहन करती है। कवियों का वह गद्य जो कविता के साथ संवाद करता है, और पिछले तीस बरसों में वह प्रचुर-प्रकाशित है, उसे पढ़ा जाए, तो अंदाज़ा लग सकता है कि कवि, कविता से किस क़दर उम्मीद करते हैं, उस पर कितनी मांगें चढ़ाए रखते हैं, छोटी-सी एक कविता, और उससे इतनी ज़्यादा मांग? कई बार आश्चर्यजनक लगता है कि दुनिया के बेहतरीन कवि भी अपना आधा समय डिफेंस ऑफ पोएट्री में ख़र्च करते हैं। कविता को इतने डिफेंस की ज़रूरत है, इसी से अंदाज़ा लग जाता है कि कविता कितने संकट में है। या शायद यह दबाव का रूमान है? दुनिया में किसी को इस बात की चिंता नहीं है कि आप कविता में क्या करते हैं, क्या नहीं करते। बुरी कविताओं के खि़लाफ़ कोई जुलूस तो नहीं ही निकलता। कवि अपनी-अपनी तरह से अच्छी कविता, बुरी कविता रचने के लिए स्वतंत्र है। साठ-सत्तर साल पहले तक राज्य को तीखी कविताओं से फि़क्र हो जाती थी, वह तिलमिला जाता था, लेकिन पूंजी के इस पुष्ट काल में उसे कोई चिंता नहीं। संभवत: वह मान चुका है कि कविता, जो इस समय जैसी है, (या साहित्य) उसे कोई नुक़सान नहीं पहुंचा सकती। विकसित देशों में सत्ता का तंत्र इतना मज़बूत हो चुका है कि अब साहित्य को ताड़ा नहीं जाता। ताडऩे के जो उदाहरण अब भी आते रहते हैं, उनमें धार्मिक भावनाओं के आहत होने मात्र का ज़ोर रहता है और वे अमूमन उन जगहों से आते हैं, जहां मात्र धर्म, सत्ता-शक्ति-विमर्श का अनिवार्य अंग है। ऐसी तमाम चीज़ों के बाद भी कविता-कर्म-व्यापार चल रहा, तो यही लगता है कि कोई भीषण दुव्र्यवस्था हमारी रक्षा कर रही।

जिस कविता की फि़क्र कोई नहीं करता, वह कविता सभी की फि़क्र करती है। उसका कवि अपने काव्येतर लेखन में उन तमाम चीज़ों की फ़ेहरिस्त बनाता चलता है, जो उसकी कविता पर किसी कि़स्म का दबाव बनाती हों। उसका कवि अपने काव्येतर लेखन में उन तमाम चीज़ों की फ़ेहरिस्त बनाता चलता है, जो उसकी कविता पर किसी कि़स्म का दबाव बनाती हों। वह कवि अब भी उम्मीद करता है कि कविताएं किसी न किसी तरह बदलाव का कारण बनेंगी, वे मनुष्य को थोड़ा और मनुष्य बनने का सलीक़ा व सलाहियत देंगी। छोटे-से अपने बौद्धिक जीवन में मुझे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला, जिसने कहा हो कि फलां कविता ने उसका जीवन बदलकर रख दिया। जिनका बौद्धिक जीवन ज़्यादा लंबा हो, जिनका काव्य-व्यवहार-अनुभव कहीं चौड़ा हो, शायद उन्हें इस तरह के अनुभव हुए हों। कविताओं ने लोगों को आनंदित किया, उन्हें कि़स्म-कि़स्म की अनुभूतियां दीं- यह सब पता चलता रहता है। पाठक को ख़ुशी से भर दिया, या निराशा में डुबो दिया जैसी कई बातें। कैसी भी अनुभूति हो- ख़ुशी की, निराशा की, सुख या दुख की, चिंता या बहस की, स्फुरण या अनिद्रा की, यदि व्यक्ति स्वेच्छा से उसकी ओर बढ़ता है, तो यह उसका आनंद है। यहां आनंद का अर्थ व्यापक है। कविता व्यापक अर्थ वाला यही आनंद देती हैं। अधिकतम यह आनंद। उससे ज़्यादा वह कुछ नहीं देतीं, लेकिन कवि, कविता से इस आनंद को छोड़कर बाक़ी सभी उम्मीदें लगाए रखता है। संभवत: यह आधुनिक काल की उपज है और हिंदी में पिछले चालीस-पचास बरसों में यह प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है कि कविता, और प्रकारांतर से कवि को, मसीहा की तरह देखा जाए। एक सुधारक की तरह। मैं इतिहास के कई मसीहाओं और सुधारकों को देखता हूं, और यक़ीनन, उन्होंने किसी न किसी स्तर पर समाज के एक तबक़े के सुधार या परिवर्तन में भूमिका भी निभाई है, लेकिन उनमें से कोई भी कवि या लेखक नहीं दिखता। बुद्ध से लेकर गांधी तक, कोई भी लेखक नहीं था। ये सभी वक्ता थे।

कवि और कविता से यदि सुधारक होने की उम्मीद की जाएगी, तो वह समाज कविता-च्युत होता जाएगा। कविता सवालोंं को प्रस्तुत कर सकती है, वह एक सवाल के खि़लाफ़ दूसरा सवाल खड़ा कर सकती है, लेकिन वह कभी भी जवाब प्रस्तुत नहींं करेगी। कविता द्वारा प्रस्तुत किया गया जवाब यथार्थ के साथ किया गया छल है। यह शोचनीय है कि हिंदी में वरिष्ठ कहलाने वाले कई आलोचक भी अपनी समीक्षाओं-लेखों में यह समस्या गिनाते रहते हैं- आज की कविता में परिस्थितियों का मार्मिक चित्रण तो है, लेकिन यह कविता विकल्प या परिवर्तन का कोई मॉडल प्रस्तुत नहीं करती। वरिष्ठ ही क्या, युवा आलोचक-समीक्षक भी इसी का अनुकरण करते जान पड़ते हैं। (फिर वही, अनुकरण के कवि-समय की प्रवृत्ति।)

यदि कविता सच में विकल्प का कोई मॉडल लेकर चलती, तो अब तक वह अपनी जिल्द से निकल समाजशास्त्र और नागरिकी की जिल्द में समा चुकी होती।

दान्ते-शेक्सपीयर को कोई सुधारक के रूप में चित्रित नहीं करता, कबीर को लोग सुधारक के रूप में दिखाना चाहते हैं। यदि वह सुधारक थे, तो उन्हें पढ़कर अब तक किसी को तो सुधर जाना चाहिए था। वह समाज की तीखी आलोचना करते थे। कवि यह कर सकता है। इस आलोचना के स्वप्न में सुधार का लक्ष्य भले हो सकता है, कर्म में सुधार का लक्ष्य नहीं। कर्म में कविता है। यह सूरत बदलनी चाहिए में बदलाव का स्वप्न है। यह स्वप्न भावोत्तेज पैदा करता है, जो कि कविता के अनिवार्य गुणों में से है। जीवनपथ में मूल्यवान होकर सहायक होने की मांग भी किंचित भावोत्तेज ही है। यदि इस मांग को ही मुख्य मांग बना लिया जाए, तो वह सूक्ष्म उपयोगितावाद को पैदा करेगी। कालिदास की अभिज्ञान शाकुंतलम को पढ़-पढ़कर सराहने वाला, उससे संवेदित होकर ख़ुद को थोड़ा और मनुष्य अनुभूत करने वाला व्यक्ति भी अपनी प्रेमिका को विस्मृति के भंवर में डुबोए छोड़ सकता है। अपराध और दंड पढ़कर, उससे संवेदित होने वाले व्यक्तियों ने भी हत्याएं की हैं। जीवनपथ में मूल्यवान होकर सहायक होने की मांग न केवल उपयोगितावाद को बढ़ावा है, बल्कि मसीहावाद की उत्प्रेरक भी है।

यह तथाकथित तीसरी दुनिया के देशों का शग़ल है कि वे अपने बौद्धिक-साहित्यिक नायकों में सुधारक का पक्ष निवेश करते हैं। यह कविता के ग़लत आस्वादन की रूढि़ के विकास का पोषण है। यह आनंद के उस मूलभूत उत्सर्जन के मार्ग में अवरोध है। कविता ने इसके अलावा कोई और मांग पूरी नहीं की, पिछली तीन सहस्राब्दियों से। वह आगे ऐसी मांग पूरी करेगी, संदेह है। किंतु दबाव का रूमान बना रहेगा। उससे और कुछ भले न हो, कविता की अप्रोच और रेंज को विस्तार मिलता रहेगा। इसीलिए कवि को तमाम प्रेरणाओं को प्रश्नांकित करने रहना चाहिए।

                                                                                    * * *

कविता की प्रक्रिया में प्रेरणा-शक्ति की क्या भूमिका है, इस पर अलग-अलग विचारों के स्कूल हैं। कई सारे कवि अब भी मानते हैं कि कविता की एक प्रेरणा होती है। चेस्वाव मीवोश तो जीवन-भर यह बात कहते रहे कि वह कविता ख़ुद से नहीं लिखते, वह किसी डायमोनियन या प्रेरणा के प्रभाव में रहते हैं। उनके भीतर कविता का आवेश वही करती है। वहीं, पॉल वैलरी जैसे कवि, जिनके अफॉरिज़्म्स का दुनिया में भरपूर सम्मान है, कहते रहे कि कविता के लिए किसी प्रेरणा-शक्ति की ज़रूरत नहीं होती, कविता एक सुगठित दिमाग़ की रचना है।

प्रेरणा को किसी शक्ति के रूप में लिया जाए, या किसी बाहरी घटना के रूप में, किसी न किसी उत्प्रेरण से कविता घटित होती है, यह सभी मानते हैं। प्रेरणा बेहद सब्जेक्टिव कि़स्म की चीज़ है, इसलिए इस बारे में हर कवि की राय अलग होती है।

चाहे प्राचीन ग्रीक या रोमन कविता हो या प्राचीन संस्कृत कविता, ज़्यादातर कवि, प्रेरक-देवियों का प्रभाव बताया करते थे। होमर ने ओडिसी और इलियड की शुरुआत अपनी पसंदीदा म्यूज़ से संवाद के रूप में ही की है। कविता की दस प्रेरक-देवियों में से एक, कलीपी उनकी म्यूज़ थी। ऐसा माना जाता है कि एकांत में वह उससे संवाद कर सकते थे। उसी तरह सैफो, जो प्रेम कविताओं की भावप्रवण कवि थी, अपनी म्यूज़ एरातो से संवाद करते हुए अपनी कविता शुरू करती थीं। एरातो, प्रेम व काम के देव इरोस का स्त्री-रूप है।

संस्कृत और हिंदी में यह स्थान सरस्वती को मिला है। संस्कृत के लगभग सभी कवि अपने काव्य की शुरुआत देवी सरस्वती के मंगलाचरण से किया करते थे। (यदि कवि बौद्ध है, तो 'नम: बुद्धाय’ से शुरू करता।) आधुनिक हिंदी कविता तक यह परंपरा चलती आई, लेकिन जिस तरह बीसवीं सदी की विश्व-कविता में प्रेरक-देवियों को श्रेय देने का चलन कम हुआ, हिंदी में भी निराला की वीणा-वादिनी वर दे के बाद यह चलन कम होता गया। अब की हिंदी कविता में इस तरह का कोई भी मंगलाचरण कवि को निश्चित ही उपहास का पात्र बना देगा। किंतु फिर भी प्रेरणाएं होती हैं, व्यक्त या अव्यक्त रूप में। उसे देवी या शक्ति न मानकर कोई घटना, स्थिति, उत्प्रेरण या कारक के रूप में देखा जाता है। कई बार यह बेहद अमूर्त होती है और कई दफ़ा बेहद मूर्त। राजनीति और विचारधारा भी एक कि़स्म की प्रेरणा हैं।

प्रेरणा के बारे में बात करते हुए मैं दंडी और विज्जिका का उदाहरण देना चाहूंगा। सातवीं सदी के संस्कृत महाकवि दंडी ने काव्यशास्त्र पर लिखी अपनी पुस्तक काव्यादर्श की शुरुआत भी सरस्वती की वंदना से की है। उनके पहले श्लोक का अंतिम पद है :

चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूर्मम

मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती।

(हंस पर विराजमान चार मुखों वाली, पूर्णत: सफ़ेद रंग वाली, हे देवी सरस्वती, तुम सदैव मेरे मन में निवास करो।)

विज्जिका (संस्कृत संभावित नाम- विजया) कर्नाटक में रहने वाली संस्कृत कवि थीं। वह संभवत: दंडी के तुरंत बाद की पीढ़ी की थीं। जब उन्होंने दंडी का यह श्लोक पढ़ा, तो उसके जवाब में लिखा-

नीलोत्पलदलश्यामा विज्जिकां मामजानता

वृथैव दंडिना प्रोक्ता सर्वशुक्ला सरस्वती।

(मेरा रंग उतना ही काला है, जितनी नीलकमल के फूल की पंखुडियां। दंडी मुझे नहीं जानता। अगर जानता होता, तो वह सरस्वती को सर्वशुक्ला या पूर्ण सफ़ेद नहीं लिखता।)

आम मान्यता है कि सरस्वती का रंग गोरा है, वह पूरी तरह सफेद के आवरण में रहती हैं, उनकी समस्त प्रिय चीज़ें सफ़ेद रंग की ही होती हैं, इसीलिए सरस्वती को सर्वशुक्ला या सर्वशुभ्रा कहा जाता है। प्राचीनतम ग्रंथों में तीन तरह की सरस्वती मिलती हैं। शुक्ल सरस्वती, नील सरस्वती और पीत सरस्वती। शुक्ल सरस्वती को ज्ञान-रूपा शक्ति, नील सरस्वती को क्रिया-रूपा शक्ति और पीत सरस्वती को इच्छा-रूपा शक्ति माना जाता है। कवि ज्ञान के आराधक होते हैं। परंपरा और रूढि़ दोनों से ही भारतीय ज्ञानोपासक, ज्ञानयोगी रहे हैं। इसीलिए कवियों ने शुरू से ही शुक्ल सरस्वती को महत्व दिया, उसी के लिए मंगल-गान किया और बाक़ी दोनों सरस्वतियों को पृष्ठभूमि में डाल दिया। ये दोनों सरस्वतियां जटिलतम तंत्र-शास्त्र में चली गईं। साहित्य और कला में शुक्ल सरस्वती का परचम बुलंद रहा। इसीलिए सरस्वती स$फेद हो गईं।

लेकिन मुद्दा यहां दंडी और विज्जिका का है। उनके श्लोक-संवाद के कई अर्थ निकलते हैं। यह भारतीय साहित्य में रंगभेदी टिप्पणी पर ली गई पहली आपत्ति है। यह गौरवर्ण को श्रेष्ठ बताने, उसे साहित्य की अधिष्ठात्री घोषित करने पर एक मुखर महिला द्वारा उठाई गई उंगली है। विज्जिका एक तरह से यह कह देती हैं कि यदि दंडी सच में सरस्वती को जानते होते, जोकि मैं ख़ुद हूं, तो वह उसे शुक्ला नहीं कहते। शायद वह उसे रंग में परिभाषित करने की कोशिश भी नहीं करते। यह ऐतिहासिक और महान आपत्ति है। इससे यह भी पता चलता है कि सबकुछ निर्विवाद नहीं था और अपनी पसंद से आराध्यों तक का रंग निर्धारित कर देने वाली ताक़तवर सत्ता के खि़लाफ़ एक स्त्री खड़ी हो सकती थी, वह उस सत्ता का उपहास कर सकती थी। मख़ौल उड़ाते हुए यह गर्वीली स्त्री कहती है- तुम्हारा रंग नहीं चलेगा, दंडी!

इसे यदि तत्व रूप में देखा जाए, तो कह सकते हैं कि दंडी जिस तत्व को (यानी शुक्ल सरस्वती में छिपे ज्ञान को) अपनी प्रेरणा बताते हैं, विज्जिका उसे दंडी का अज्ञान कहती है। वह उन्हें किसी और तत्व को (नील सरस्वती में छिपी क्रिया-शक्ति को) प्रेरणा बनाने की सलाह देती है।

यह प्रेरणा का प्रश्नांकन है। किसी की प्रेरणा पर प्रश्न करना उसकी काव्य-दृष्टि पर प्रश्न करना है। काव्य-दृष्टि का विकास जिन सारे उपादानों से होता है, उन सब पर प्रश्न करना है। विज्जिका, दंडी की प्रेरणा के साथ-साथ वृहत्तर रूप में उनकी काव्य-दृष्टि पर प्रश्न करती हैं। इसीलिए मैंने ऊपर कहा कवि को तमाम प्रेरणाओं का प्रश्नांकन करते रहना चाहिए। सिर्फ़ अपनी ही प्रेरणा का नहीं, बल्कि अन्य कवियों की प्रेरणाओं का भी।

चाहे राजनीतिक विचारधारा हो, चाहे सामाजिक शिरकत, चाहे गहन अध्ययन, चाहे एकांत का मनन- काव्य-दृष्टि का विकास जिस भी चीज़ से होता है, उस पर प्रश्न करते रहना। अपनी काव्य-दृष्टि को भी प्रश्नांकित करते रहना। अपनी काव्य-दृष्टि ख़ुद कवि के लिए भी कभी निर्विवाद नहीं हो सकती।

दंडी की प्रेरणा पर विज्जिका ने जिस तरह प्रश्न किया है, कुछ वैसा ही प्रश्न मुक्तिबोध भी करते हैं-

मैं तुम लोगों से इतना दूर हूं

तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है

कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है।

अपनी प्रेरणाओं (व काव्य-दृष्टि) को सतत प्रश्नांकित करने की प्रेरणा अगर इन तीन पंक्तियों से भी ले ली जाए, तो हिंदी कविता अपने कई रूढ़ कवि-समयों को तोड़ सकती है। उन कवि-समयों को भी, जिनका उल्लेख इस लेख में नहीं हो पाया।