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Saturday 18 Nov 2017

मुक्तिबोध का आलोचनात्मक लेखन

मुक्तिबोध का आलोचनात्मक लेखन उनके रचनात्मक संघर्ष और आत्मसंघर्ष का ही हिस्सा है। वे मुख्यत: कवि हैं, आलोचना मुख्यत: उन्होंने अपने समय के आलोचना की प्रवृति से असंतुष्ट होकर लिखी है। उनके आलोचनात्मक लेखन के मुख्यत: तीन भाग हैं- (1) नयी कविता की अंत: प्रवृत्तियों के संबंध में (2) काव्य की रचना प्रक्रिया के संबंध में (3) तत्कालीन आलोचना की प्रवृत्तियों के संबंध में। कामायनी पर लिखी आलोचना को जरूर एक पेशेवर आलोचक के हैसियत से लिखी कृति कहा जा सकता है, मगर उसे भी मुक्तिबोध एक पाठक की हैसियत से बीस वर्षों से लगातार अध्ययन से उत्पन्न जिज्ञासा एवं समस्याओं के फलस्वरूप खंड-खंड में लिखते रहें। भक्तिकाल पर लिखे एक लेख से उनके साहित्य के इतिहास की समस्याओं पर उनकी रूचि का पता चलता है. सम्भवत: यदि उन्हें और समय मिलता तो कुछ मूल्यवान विश्लेषण सामने आ पाता। इसके अतिरिक्त उन्होंने त्रिलोचन, शमशेर, पंत, सुभद्राकुमारी चौहान, कुंवर नारायण, परसाई जी, के रचनाकर्म और कृति पर महत्त्वपूर्ण समीक्षाएं भी लिखी हैं।

मुक्तिबोध की आलोचना को एक महत्त्वपूर्ण देन संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना है, यह उनकी आलोचना का मूलाधार है। आलोचक और रचनाकार के लिए इन दोनों का होना बहुत जरुरी है। बिना संवेदना के आलोचक किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और जीवन में गहरी रुचि नहीं लेगा, और इस तरह उसकी रचनात्मक कमियों और असफलताओं के, उसकी रचनाओं में प्रयुक्त प्रतीकों, बिम्बों के और अंतत: उसके कृतित्व की सही समझ से चूक सकता है। मुक्तिबोध बार-बार आगाह करते हैं कि बिना रचनाकार के जीवन-संघर्ष को समझे उसके कृतित्व का मूल्यांकन अधूरा रह जाएगा। मगर संवेदना महज क्षणिक भावुकता नहीं रह जाना चाहिए, उसके साथ यथार्थपरक ज्ञान भी जरुरी है। ज्ञान जितना जरुरी आलोचक के लिए है, उतना ही रचनाकार के लिए भी। महज भावावेश में रची गई रचना में उस भाव में संपूर्ण आयाम प्रकट नहीं हो पाते, इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिपरक ज्ञान की जरूरत होती है। मगर यह ज्ञान पूर्ण नहीं होता, विकासमान होता है। मुक्तिबोध द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को इसी निगाह से देखते हैं। रचना को उसके सभी आयामों में देखे जाने के लिए ही उन्होंने सभ्यता समीक्षा शब्द का प्रयोग किया।

नयी कविता की अन्त: प्रवृत्तियों को समझाने के लिए मुक्तिबोध ने कई लेख लिखे, क्योंकि उन्हें महसूस हो रहा था कि आलोचक संपूर्ण नयी कविता को एक ही दृष्टि से देख रहे थे, जबकि उसमें अलग-अलग अन्त: धाराएं थीं। एक धारा अभिजनवादी व्यक्तिवाद की थी, जो क्षणवाद और लघुमानव का दर्शन गढ़ रही थी। यह धारा व्यक्ति स्वतंत्रता और विशिष्टता तथा अद्वितीयता के नाम पर यथार्थवादी प्रगतिशील कविता का विरोध कर रही थी। दूसरी धारा जिसमें मुक्तिबोध अपने को जोड़ते थे, निम्न मध्यमवर्ग की थी, जो शिल्प के स्तर पर जरूर पहली धारा के कुछ करीब थी, किंतु संवेदना और विचारधारा के स्तर पर इससे भिन्न थी, और जिसमें जीवन के जद्दोजहद, रोटी-कपड़ा-मकान, जीवन की मूलभूत जरूरतों के अभाव की पीड़ा, निराशा प्रकट हो रही थी। मगर तत्कालीन प्रगतिवादी आलोचकों ने दोनों के अंतर को नजरअंदाज कर दिया, और अभिजनवादी, अस्तित्ववादी कुंठा और अभावजनित निराशा और आत्मसंघर्ष को बिना अलगाये दोनों की एक समान आलोचना की। मुक्तिबोध ने इस अंतर को रेखांकित किया और उसे नयी कविता का आत्मसंघर्ष कहा।

 मुक्तिबोध ने कविता की रचना प्रक्रिया पर काफी लिखा है। इनमें एक साहित्यिक की डायरी में संकलित निबंध कला का तीसरा क्षण प्रमुख है। कविता की रचना प्रक्रिया को उन्होंने तीन क्षणों में विभक्त करते हुए बताया कि पहला क्षण जीवन का अकूत अनुभव क्षण है। दूसरा क्षण अनुभव का अपने कसकते-दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और फैंटेसी का रूप धारण कर लेना है और तीसरा और अंतिम क्षण फैंटेसी का शब्दबद्ध होना। मुक्तिबोध ने अपनी रचनाओं में फैंटेसी का काफी प्रयोग किया है। फैंटेसी को सामान्यत: भाववादी शिल्प माना जाता है, लेकिन उन्होंने लिखा है कि कभी-कभी जिन्हें भाववादी शिल्प कहते हैं, यथार्थ को अच्छी तरह प्रकट करते हंै। कहना न होगा कि वे इसमें सफल रहे। उन्होंने यह भी बताया कि फैंटेसी के प्रयोग से यथार्थ के दीर्घ चित्रण से बचा जा सकता है।

मुक्तिबोध ने छायावाद की आलोचना की है। छायावाद से उन्हें मुख्य शिकायत यह थी कि छायावाद ने अर्थ-भूमि को संकुचित कर दिया है। सौंदर्य, दु:ख, कष्ट, लक्ष्य, आदर्श, क्रोध, क्षोभ का चित्रण जो छायावाद में हुआ है, वह वास्तविक मनोदशाओं का नहीं, वरन कल्पित, दु:ख, कष्ट,क्रोध, लोभ, आदि का है, और भी उसमें करुणा का विलास है, उसकी तकलीफ नहीं। यहां मुक्तिबोध छायावाद की सीमाओं को रेखांकित करते हैं, और नयी कविता को इसकी प्रतिक्रिया से उत्पन्न मानते हैं। लिखते हैं- नयी कविता का जन्म छायावादी व्यक्तिवाद के विरुद्ध यथार्थोन्मुख व्यक्तिवाद की ही बगावत थी। यहां मुक्तिबोध की स्थापना से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता। छायावाद में भी, अपने युगीन सीमाओं के बावजूद यथार्थबोध है, खासकर निराला की कविताओं में।

कामायनी की आलोचना(कामायनी: एक पुनर्विचार) मुक्तिबोध की महत्त्वपूर्ण आलोचना कृति है। इसमें उनका उद्देश्य उसके सौंदर्य पक्ष या कलात्मक विशिष्टता को उद्घाटित करना नहीं है, वरन उसमें निहित जीवन संवेदनाओं, कवि के भावों में समाहित विचारों, रसात्मकता में निहित वस्तुतत्व की पड़ताल करना है। उनके अनुसार- कलाकृति, मूलत: संवेदनात्मक उद्देश्यों की पूर्ति के निमित्त, कल्पना की कीमिया द्वारा जीवन की पुनर्रचना है, अतएव हमें अपने जीवन के ही लिए पुनर्रचित जीवन को देखना होगा। यदि साहित्य हमारे जीवन के लिए रचित पुनर्जीवन है तो देखना होगा कि यह जीवन की समस्याओं का क्या निदान प्रस्तुत करता है, इसमें निहित जीवन सन्देश अपने रसात्मकता और कलात्मकता के बावजूद जीवन के अंतर्विरोधों और समस्याओं का वैज्ञानिक निराकरण प्रस्तुत करते हैं कि कहीं-कहीं लेखक अनजाने में, अपनी तमाम सदिच्छाओं के बावजूद, अपने भाववादी दृष्टि के कारण कहीं, जीवनगत समस्याओं का भाववादी निराकरण तो नहीं प्रस्तुत कर रहा है। इस दृष्टि से मुक्तिबोध कामायनी से निराश ही होते हैं। कहना न होगा कि इस दृष्टि से कामायनी को उनसे पहले किसी ने नहीं देखा था।

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के उद्भव और प्रवृत्ति का विश्लेषण करते हुए मुक्तिबोध समाजशास्त्रीय कारकों की महत्ता को स्वीकार करते हैं। वे भक्ति आन्दोलन की जनवादी प्रवृत्तियों के महत्त्व को स्वीकार करते हैं, परन्तु भक्तिकाल के प्रचलित व्याख्या के अनुरूप निर्गुण शाखा को क्रान्तिकारी तथा सगुण रामभक्ति शाखा को एक तरह से प्रतिक्रियावादी, समझौतावादी घोषित करते हैं। लेकिन खुद वे इस स्थापना से भिन्न समग्रतावादी बातें भी करते हैं। किंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भक्तिभावना की तीव्र आर्द्रता और सारे दुखों और कष्टों के परिहार के लिए ईश्वर की पुकार के पीछे जनता की भयानक दु:स्थति छिपी हुई थी। यहां यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि यह बात साधारण जनता और उसमें से निकले हुए संतों की है, चाहे वे ब्राह्मण वर्ग से निकलें हों या ब्रह्मेत्तर वर्ग से। इस तरह मुक्तिबोध व्यापक संदर्भ में भक्ति आंदोलन की महत्ता को स्वीकार करते हैं।