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Thursday 22 Feb 2018

सवाल वैज्ञानिक नजरिए का है

धर्म, जाति, रीति-रिवाज और परंपराओं का दंभ करने वाला भारतीय समाज कितनी तेजी से मध्ययुग की ओर लौट रहा है, इसका ताजा प्रमाण मिला है, पुणे से। यहां भारतीय मौसम विभाग में वैज्ञानिक डॉ. मेधा विनायक खोले ने उनके घर में कार्यरत खाना बनाने वाली 60 वर्षीय निर्मला यादव पर धोखाधड़ी और धार्मिक भावनाएं आहत करने का केस दर्ज किया है। डा.खोले का आरोप है कि उन्हें अपने घर में गौरी गणपति और श्राद्ध का भोजन बनने के लिए हर साल ब्राह्मण और सुहागिन महिला की ज़रूरत होती है, इसलिए उन्होंने निर्मला को काम पर रखा था। निर्मला ने ख़ुद को ब्राह्मण और सुहागिन बताया था और नौकरी लेने के वक्त अपना नाम निर्मला कुलकर्णी बताया था जबकि वह दूसरी जाति से हैं। मेधा को कहींसे निर्मला के ब्राह्म्ïण न होने की बात पता चली तो वे  निर्मला की जाति जानने के लिए धयारी स्थित उनके घर तक गई और निर्मला के ब्राह्मण और सुहागिन न होने की बात मालूम पडऩे पर उन्होंने पुलिस में शिकायत करने का फैसला लिया। पुलिस ने निर्मला यादव के खिलाफ धारा 419 (पहचान छुपा कर धोखा देने), 352 (हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), 504 (शांति का उल्लंघन करने के इरादे से एक व्यक्ति का अपमान करना) के तहत मामला दर्ज किया है। यह तस्वीर का एक पहलू है। दूसरा पहलू निर्मला का है, उनके मुताबिक वे कभी डॉ. मेधा के पास नौकरी के लिए नहीं गई, बल्कि वो ख़ुद उनके पास आई थीं। निर्मला का कहना है कि मैंने कभी अपनी जाति छुपाई। मैंने उनके घर तीन उत्सवों पर खाना बनाया पर उन्होंने अभी तक कोई पैसे नहीं दिए। जब मैंने पैसे मांगे तो उन्होंने मुझे आठ हज़ार रुपये कुछ दिन में देने का वादा किया। मैंने उनकी बात पर विश्वास कर लिया क्योंकि वो बड़ी अधिकारी हैं। मैंने कभी नहीं छुपाया कि मैं मराठा समुदाय से हूं और एक विधवा हूं.।

निर्मला यादव और डा. मेधा खोले के बीच का यह प्रसंग महज धोखाधड़ी के चश्मे से नहींंं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके वृहत्तर आयामों पर भी गौर फरमाने की जरूरत है। एक ओर हम देश की वैज्ञानिक प्रगति पर नाज करने से कहींचूकते नहींहैं, लेकिन दूसरी ओर वैज्ञानिक नजरिए को कैसे धता बताते हैं, पुणे की घटना उसका उदाहरण है। यह कहना गलत नहींहोगा कि डा. खोले ने पढ़ाई और पेशे के लिए विज्ञान को अपनाया, लेकिन अपने जीवन व्यवहार में उससे परहेज ही रखा। उनके व्यवहार को निज आस्था और रीतियों का हवाला देकर भी सही नहींठहराया जा सकता, क्योंकि बात निजता से ऊपर उठकर सामाजिक व्यवस्था तक चली गई है। किसी स्त्री को विधवा होने और गैरब्राह्म्ïाण होने के कारण पूजा का खाना बनाने पर दंडित करने की सोच आधुनिक युग में बर्दाश्त नहींकी जानी चाहिए। यह न केवल सामाजिक गैरबराबरी को बढ़ावा देगा, बल्कि मानवाधिकारों का हनन भी होगा। डा.मेधा खोले की तरह विचार रखने वाले वैज्ञानिकों और अन्य शिक्षित लोगों की इस देश में कमी नहींहै। धर्म, जाति की पुरातनपंथी बेडिय़ों में हमारा समाज इस कदर जकड़ा हुआ है कि निर्मला यादव के साथ हुए व्यवहार को सामान्य माना जाता है, जबकि इसे घोर अनुचित व्यवहार की तरह देखा जाना चाहिए था।

इस प्रसंग पर अभिनेत्री रेणुका शहाणे का यह कथन सटीक है कि ऐसे मामले रोकने के लिए समाज को कैशलेस से पहले कास्टलेस बनाना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि समाज जातिविहीन होगा कैसे, क्योंकि हमारे यहां तो घर के बाद स्कूलों में भी विद्यार्थियों को जाति का पाठ खूब पढ़ाया जाता है। कितने ऐसे प्रसंग हुए हैं जब निचली जाति के बच्चों को ऊंची जाति के बच्चों या शिक्षकों से प्रताडि़त होना पड़ा है। स्कूल-कालेजों में विज्ञान की पढ़ाई भी अच्छी डिग्री और बाद में मुमकिन हुआ तो विदेश में नौकरी करने के लिए की जाती है। वैज्ञानिक दृष्टि जागृत हो, आधुनिक नजरिया अपनाया जाए, ऐसा कहां होता है। जो विज्ञान पढ़ते हैं, वे खुद को औरों से बढ़कर समझते हैं, क्योंकि उनमें बने-बनाए फार्मूले रटने की क्षमता अधिक होती है। स्कूलों में शिक्षक भी होशियार विद्यार्थियों के लिए विज्ञान और शेष के लिए कला संकाय को उपयुक्त समझते हैं। जब बुद्धिमानी के बारे में हमारी समझ ऐसी है, तो फिर वैज्ञानिक समझ विकसित होने में न जाने कितना वक्त लगेगा। और इस तरह विज्ञान पढ़कर जो वैज्ञानिक बनेंगे, वे जाति और धर्म की जंजीरों में अपनी ओर से एक कड़ी और जोड़ेंगे, जिससे समाज की विकासयात्रा और धीमी हो जाएगी।