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Tuesday 21 Nov 2017

मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा का सार्थक कथा-पाठ

आजादी के बाद हिन्दी के व्यापक साहित्यिक परिदृश्य में गजानन माधव मुक्तिबोध एक चर्चित कवि के रूप में विगत छह दशकों में बराबर हिन्दी कविता के केन्द्र में रहे हैं। वर्ष 2017 यों भी उनका जन्म-शताब्दी वर्ष है और इससे तीन वर्ष पहले उनकी पचासवीं पुण्य-तिथि के समय से हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक आयोजनों में उनके साहित्य-सृजन को लेकर शोध, अध्ययन और विवेचन की जो सक्रियता बढ़ी, वह इस शताब्दी वर्ष में उनके समग्र मूल्यांकन की दिशा में निश्चय ही कई सार्थक प्रयत्नों  के रूप में दिखाई देने लगी है। 

        हिन्दी में मुक्तिबोध की छवि एक प्रगतिशील और संघर्षशील संश्लिष्ट  कवि के रूप में अधिक प्रचलित रही है, जबकि उनके बहुआयामी रचनाकर्म में कथा, आलोचना, डायरी और सामयिक विषयों पर उनके वैचारिक लेख और टिप्पाणियां उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। हिन्दी में मुक्तिबोध के रचनात्मक साहित्य की अन्य विधाओं कहानी, उपन्यास, डायरी या उनके आलोचनात्मक साहित्यों पर बेशक कम काम हुआ हो, लेकिन उनकी कविताओं पर निश्चय ही बेहतर काम हुआ है। इसी क्रम में पिछले दिनों हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय ने उनकी प्रमुख कविताओं को आधार बनाकर उनका कथापाठ प्रस्तुत करते हुए उन कविताओं के केन्द्र में निहित मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा की कथा को बहुत रोचक ढंग से उकेरा है। अपने इस विवेचन में उन्होंने मुक्तिबोध के मुक्तिकामी स्वप्नाद्रष्टा को अपनी सुविधा के लिए संक्षेप रूप में मुकामुस्व कहकर संबोधित किया है। इसके लिए उन्होंने मुक्तिबोध रचनावली के प्रथम और द्वितीय खंड की 215 कविताओं में से 46 कविताओं को अपने अध्ययन का आधार बनाया है। मुक्तिबोध की कविताओं में निहित इस केन्द्रीय चरित्र को उकेरते हुए रमेश उपाध्याय ने कवि की सन् 1942 तक रची जिन आठ-दस कविताओं को हवाले में लिया है, वहां यह केन्द्रीय चरित्र एक सजग और संघर्षशील युवक के रूप में तो अवश्य दिखाई देता है, लेकिन उन्हीं के द्वारा उकेरी गई स्वप्नद्रष्टा की छवि के अनुरूप वह है या नहीं, यह विचारणीय हो सकता है। उन प्रारंभिक कविताओं में उभरती उस छवि को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा भी है -आरंभ में वह एक युवक है, जिसके हृदय में प्रेम की प्यास है और यौवन के अरमान है। उसके चारों ओर प्रकृति का सौन्दर्य फैला है। ... लेकिन युवक जानता है कि यह वसंत उसका अपना-सा नहीं है और सुख सपना-सा है। ... जीवन के सुख और सौन्दर्य से वंचित, अभावों और कष्टों में नित्य एकरस किस्म का सीमित जीवन जीनेवाला मुकामुस्व अनंत में अपनी मुक्ति खोजता है। ... यह एक स्वप्न है, किन्तु निष्क्रिय भाग्यवादी स्वप्न नहीं है। निष्क्रिय भाग्यवादी स्वप्नजीवी होता है, स्वप्नद्रष्टा नहीं। स्वप्नद्रष्टा अपने साथ-साथ दूसरों की भी, समाज की भी, देश-दुनिया की भी मुक्ति के बारे में सोचता है और यथार्थवादी ढंग से सोचता है।

    अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि मुक्ति का स्वप्न, भविष्य का स्वप्न होता है, जिसके लिए कल्पना की आवश्यकता होती है, लेकिन वह कपोलकल्पना नहीं, यथार्थवादी कल्पना होती है। .. मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा यथार्थवादी है, लेकिन कल्पना का मूल्य और महत्व समझता है। उसके जीवन का यथार्थ यह है कि वह एक तिमिरमय संसार में रहता है, जिसमें ज्वालामुखी का कटु हास है और भूकंप की भीषणता। ... इस स्वप्नद्रष्टा को अंधकार से मुक्ति के लिए प्रकाश चाहिए, जड़ता से मुक्ति के लिए गतिशीलता चाहिए, बंधन से मुक्ति के लिए स्वतंत्रता चाहिए, दुख से मुक्ति के लिए सुख चाहिए और निराशा से मुक्ति के लिए आशा चाहिए।

     इस स्वप्नद्रष्टा की आरंभिक छवि उकेरने में उन्होंने कवि की जिन कविताओं, खासकर नूतन अहं, नाश-देवता या सृजन-क्षण को हवाले में लिया है, उनकी बनिस्पत मुझे मुक्तिबोध की उसी कालखंड में लिखी एक कविता अन्तर्दर्शन अधिक समीचीन प्रतीत होती है ; और ये सारी कविताएं तार सप्तक में शामिल भी हैं। इस अंतर्दर्शन कविता में पहली बार वे अपने भीतर के विभाजित व्यक्तित्व पर जी खोलकर लिखते हैं-

 मेरा जग से द्रोह हुआ पर मैं अपने से ही विद्रोही।

 गहरे असंतोष की ज्वाला सुलग जलाती है मुझको ही।।

आत्म-वंचना पीडि़त मेरा तिमिर-मगन उर बिंबित मुख पर।

 सिहर उठा मैं  अश्रु-मलिन-मुख, अपने अंतर के दर्शन पर।।

मैंने मरण-चिन्तना की, जब जीवन का था दर्द बढ़ चला।

मानवता का कटु आलोचक, अपने को ही दण्ड दे चला।।

और यहीं से मुक्तिबोध की कविताओं में आत्म-प्रताडऩा और आत्म-संघर्ष का स्वर मुखर होता हुआ और तीव्रतर होता दिखाई देता है। इस संघर्षशील मुक्तिकामी को आत्मग्लानि से उबरकर शक्ति और साहस मिलता है। अपने मध्यवर्गीय जीवन से ऊपर उठकर वह देश और दुनिया को व्यापक दृष्टि से देख पाता है। उनकी कविता जन-जन का चेहरा प्रकारान्तर से इसी भाव को और विस्तार में जाकर प्रकट करती है, जहां वे जनमुक्ति का व्यापक स्वप्न देखते नजर आते हैं। उनका मुक्ति-स्वप्न एक देश की क्रान्ति से भिन्न व अखिल विश्व में क्रान्ति का स्वप्न है। इस स्वप्न का आधार यह है कि जैसे पूंजीवाद एक विश्व व्यवस्था  है, उसी तरह समाजवाद भी एक विश्व व्यवस्था है। मौजूदा विश्व व्यवस्था में यह देखना वाकई  दिलचस्प  है कि विभिन्न देशों के पूंजीवादी लोकतंत्र या धर्म संचालित शासन व्यवस्थाओं को इस पूंजीवादी विश्व व्यवस्था से तालमेल बनाने में कोई कठिनाई नहीं है, बल्कि उसके लिए तो उनके दरवाजे हमेशा खुले हैं। वे बढ़ चढ़कर उसकी प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं, लेकिन समाजवादी व्यवस्था में निहित आदर्शों (स्वतंत्रता, समानता, स्वायत्तता, सामाजिक न्याय आदि) का वाचिक गुणगान तो वे करते हैं, लेकिन उसी समाजवाद के लिए उनका आक्रामक रवैया सदा से वैसा ही है, जैसा पूंजीवादी व्यवस्था का रहा है। वही समाजवादी व्यवस्था आज भी उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे दौर में स्वप्नद्रष्टा के आचरण और उसकी दृढ़ता को रेखांकित करते हुए रमेश उपाध्याय लिखते हैं कि जिस तरह स्वप्न अस्थिर, क्षण.भंगुर और सतत परिवर्तनशील होते हैं, उसी तरह स्वप्नद्रष्टा की मनोदशाएं और भावस्थितियां भी बदलती रहती हैं, लेकिन यदि उसमें वैचारिक दृढ़ता और प्रतिबद्धता है तो स्वप्नों  के बनने-बिगडऩे, टूटने-बिखरने और दुस्वप्नों में बदलने के बावजूद वह अपने मार्ग पर अविचल भाव से चलता हुआ आगे बढ़ता रहता है।

     अपने विवेचन में रमेश उपाध्याय ने इस मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा की वामपक्षीय राजनीति को स्पष्ट  करते हुए उसके जीवन संघर्ष में आने वाली कठिनाइयों और असफलताओं के बावजूद जहां देहात और वनपर्वतों के बीच जीवन व्यतीत करनेवाली लोकशक्ति के प्रति कवि के आत्म विश्वास को महत्वपूर्ण माना है, वहीं मध्यमवर्गीय अवसरवादिता के प्रति उसकी सजगता को भी बेहतर ढंग से रेखांकित किया है। कवि की दो खंडों में विन्यस्त लंबी कविता हे प्रखर सत्य में व्यक्त इसी सच्चाई और अन्तर्विरोध की ओर इशारा करते हुए वे लिखते हैं राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में इन्हींं महाअसत्य शूकरों का तमाशा होता रहता है, गोकि उसमें मुंह से भारतीय संस्कृति की भाषा ही बोली जाती है। ये नैतिक आत्मा का तार-तार हुआ कुरता उतारकर नये-नये स्वार्थों का भयानक काला चोला पहनते हैं और बुदबुदाते हैं कि अपने कपड़ों में हर कोई नंगा है। अर्थात् सभी उनकी ही तरह स्वार्थी हैं। यही कारण है कि स्वप्नद्रष्टा इस मध्यवर्ग को अपने मुक्ति-स्वप्न में बाधक के रूप में देखता है। उसके हर स्वप्न के पीछे एक भीषण यथार्थ है, जिसे बदलने के लिए वह स्वप्न देख रहा है। इसीलिए वह निराशा में भी आशावान बना रहता है।

    मानव मुक्ति के इन्हीं स्वप्न के दिग्दर्शन की प्रक्रिया में मुक्तिबोध का यह मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा जनक्रान्ति की पूरी प्रक्रिया को एक महास्वप्न में घटित होते देखता है। इस महास्वप्न  में मानो काल-मूर्ति, क्रान्तिशक्ति और जनयुग ही स्वयं जनक्रान्ति रूप महाशक्ति को संबोधित करता है। लंबी कविता सूखे कठोर नंगे पहाड़ प्रकारान्तर से स्वप्नद्रष्टा के इसी महास्वप्न को अभिव्यक्त करती है।   

    बीसवीं शताब्दी के पांचवें दशक में उपनिवेशवादी शासन के विरुद्ध भारत में आजादी की लड़ाई अपने चरम पर पहुंच चुकी थी और इस आजादी की लड़ाई में देश से विदेशी सत्ता को बेदखल करने में उस पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध श्रमिकों और किसानों के क्रान्तिकारी संघर्ष की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही थी। पंजाब, बिहार, बंगाल, पूर्वोत्तर, आंध्र, महाराष्ट्र, केरल आदि प्रदेशों में जो क्रान्तिकारी गतिविधियां जारी रहीं, यह उसी का परिणाम था कि देश के नवनिर्मित संविधान में श्रमिकों, किसानों और वंचित वर्गों के हितों का पूरा ध्यान रखा गया तथा समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को संवैधानिक संकल्प का दर्जा हासिल हो सका। यद्यपि आजादी के बाद केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व में जो सत्ता कायम हुई, उसका रुझान मुख्यत: उसी पूंजीवादी व्यवस्था के पक्ष में ही अधिक रहा और देश के विभिन्न भागों में चल रही क्रान्तिकारी गतिविधियों को कुछ हद तक अपनी ताकत से दबा दिया गया, लेकिन यह उसी संघर्ष और समाजवादी चेतना का ही असर रहा कि देश के कुछ प्रमुख हलकों बंगाल, त्रिपुरा, बिहार, तेलंगाना, महाराष्ट्र, केरल आदि प्रान्तों में उस क्रान्तिकारी चेतना का प्रभाव वर्षों तक बना रहा, उन प्रदेशों में वामपंथी दलों की राज्य सरकारें भी कायम रहीं और आज भी उन कतिपय राज्यों में उनका प्रभाव बरकरार है।

     मुक्तिबोध की कविताओं में उस क्रान्तिकारी संघर्ष और उसमें आए उतार-चढ़ाव का व्यापक असर दिखाई देता है। वह संघर्ष उनकी कविताओं की प्रमुख विषयवस्तु बना है और उसी व्यापक जनवादी चेतना के साथ वे जीवन-पर्यन्त् जुड़े रहे। उस संघर्ष को व्यक्त करनेवाली  प्रमुख कविताओं में अंधेरे में, चकमक की चिन्गारियां, अन्त:करण का आयतन, जमाने का चेहरा, चांद का मुंह टेढ़ा है, ब्रह्मराक्षस, भूल-गलती, एक स्वप्नकथा, जैसी ऐतिहासिक कविताएं समकालीन हिन्दी कविता में अपनी अलग पहचान रखती हैं।  

रमेश उपाध्याय अपने अनूठे विवेचन के माध्यम से मुक्तिबोध की इन जटिल और संश्लिष्ट शिल्प वाली कविताओं के भीतर निहित उस काव्यनायक, जिसे वे एक मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा के रूप में लक्षित करते हैं, उस स्वप्नद्रष्टा के जीवन-संघर्ष और उस दौर के भूमंडलीय यथार्थ को इन कविताओं में विन्यस्त कथा-पाठ के जरिये खोलकर समझाते हैं, उससे मुक्तिबोध की ये कविताएं आम पाठक के लिए सहज बोधगम्य हो पाती हैं। रमेश जी ने अपनी इस विवेचन पद्धति के माध्यम से मुक्तिबोध की कई लंबी कविताओं और विशेष रूप से अंधेरे में, कविता का जो कथापाठ प्रस्तुत किया है, वह वाकई इन कविताओं के केन्द्रीय चरित्र (मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा) के संघर्ष को अपने पूरे आकार और डिटेल्स के साथ एक रोचक कहानी की तरह बयान कर देता है और वह भी स्वयं कवि के ही शब्द-संयोजन और शैली-शिल्प को सुरक्षित रखते हुए, ताकि पाठक उसे कवि के मूल पाठ के साथ मिलान करके देख सके।

रमेश उपाध्याय ने मुक्तिबोध की कविताओं के इस सार्थक कथा-पाठ के माध्यम से उनकी साम्यवादी विचारधारा और क्रान्तिकारी चेतना को किसी अमूर्त मानवतावाद और साहित्य के स्वधर्म में  सीमित करनेवाली रूपवादी मानसिकता और चालाक चेष्टाओं का भी सटीक उत्तर दे दिया है। निश्चय ही मुक्तिबोध की कविताओं को बेहतर ढंग से समझने में कविताओं का यह कथा-पाठ प्रभावकारी सिद्ध होगा।