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Wednesday 22 Nov 2017

स्मृतियों का सफर : आसमान मेरा हमसफर

मानव-सभ्यता के विकास में स्मृतियां मेरुदंड हैं। साहित्य स्मृति-कोष ही तो है, जिसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी का अनुभव संचित-सुरक्षित है- ''बीती बातें सब भूल जाएं? फिर जीवन में शेष क्या रहेगा?’’ (13) के.सी. चंद्रशेखरन पिल्लै की कहानियां स्मृतियों का सफर कराती हैं और दे देती हैं हर प्रबुद्घ पाठक को वह पाथेय, जो उसके वर्तमान एवं भावी जीवन-यात्रा में काम आ सके। आसमान मेरा हमसफर की सभी बाइस कहानियां जीवन के वास्तविक धरातल पर घटित घटनाओं एवं उनके संवाहक पात्रों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती हैं- कहीं आत्मालाप से, कहीं लेखक की जबान से, तो कहीं पात्रों के कथोपकथन से।

मूल कहानियां मलयालम में हैं, जिनका हिन्दी-अनुवाद के.जी. बालकृष्ण पिल्लै और डॉ. एस.तंकमणि अम्मा ने किया है। भाषागत कतिपय त्रुटियों के बावजूद यह अनुवाद मूल-जैसा आस्वाद देता है, जिसे सफल अनुवाद की श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसे अनुवाद-कार्यों से ही हिन्दी की श्री-वृद्घि संभव है, जिनमें दो भिन्न-भिन्न भाषाओं/संस्कृतियों की संवादिकता का आनंद लिया जा सकता है। मलयालम भाषाभाषी केरल-समाज के खान-पान, पहनाव-ओढ़ाव, साज-श्रृंगार के साथ-साथ उनके आचार-विचार एवं रीति-रिवाज अंतरंगता की अनुभूति तो कराते ही हैं, पाठकों में स्वाभाविक जिज्ञासा एवं रोचकता की भी सृष्टि करते हैं।

जिदगी के सफर में कितने और कैसे-कैसे पड़ाव आते हैं, ठीक-ठीक बता पाना कठिन है, क्योंकि न चाहते हुए भी कभी-कभी सफर स्थगित करना पड़ जाता है ('सफर का अंत’, 26-31)। लेखक प्रत्येक स्थिति का सूक्ष्म निरीक्षण करके मन के भीतर झांकने की कोशिश करता है- ''एक बात तो सही है यह जानकर भी कि कोई बात सही है, उस पर दुखी होने से कोई लाभ नहीं, फिर भी हम दुखी हुए बिना नहीं रह पाते। दुखी होने के लिए दुनिया में और भी समस्याएं व परेशानियां हैं।‘’ (27) विद्याधरन की सहज-अविचलन मुस्कान किस तरह स्वयं को तथा दूसरों को सुखी/दुखी कर सकती है, 'सुभाषिनी के सवाल’ में लेखक ने संजीदगी के साथ चित्रित किया है, जिसकी 'भाषा’ समझने के लिए अपने से बाहर निकलना पड़ता है।

व्यक्ति का चरित्र/आचरण परिस्थितियों में ढलकर घटना का रूप ग्रहण कर लेता है। छोटी-छोटी घटनाओं की श्रृंखला ने ही मास्टर रामचंद्रन को 'गांधीराम भैया’ (46) बना दिया, तो आश्चर्य क्या! स्वतंत्रता के छह दशक बीत जाने के बाद भी महिलाओं का लम्बे सफर में अकेले जाना कितनी और कैसी-कैसी समस्याओं को जन्म देता है, यह 'एरणालुम सेन्ट्रल’कहानी में जीवंतता से आरेखित हुआ है। सुमित्रा और एलसी के माध्यम से लेखक ने यह बताया है कि ''... हम महिलाओं की दुर्दशा के लिए बड़ी हद तक हम महिलाएं ही जिम्मेदार हैं।‘’ (58) पुनश्च, यह प्रश्न कितना महत्वपूर्ण है : ''क्या यह संभव हो पाएगा? ऐसा •ामाना कभी आएगा, जब किसी साधारण होटल में रात के समय कोई स्त्री अकेले जाकर वहां ठहरने का साहस कर पाएगी? कभी वह दिन आएगा, जब देर तक के वक्त़ कोई स्त्री सड़क पर अकेली चल सकेगी?’’ (59)

लेखक स्वयं के अनुभवों को ही शिल्प, शैली और भाषा में आकार प्रदान करता है- ''... अनुभव समय के बीतते-बीतते ही... कहानियों में बदल गए हैं।‘’ (44) 'अ-भाव’ का 'भाव’ में रूपांतरण ही तो सारी ललित कलाओं की उद्भव-कथा है। वाल्मीकि का 'शोक’ ही 'श्लोक’ में परिणत हो गया और 'रामायण’ की रचना संभव हुई। तब लेखक का यह कहना कि ''जब मन बेचैन रहता है, तब कहानी कैसे लिखी जा सकती है?’’ (63) गले नहीं उतरता। अस्तु, ऐसे ही अनेक लेखकीय निष्कर्ष है, जिनसे सहमत होना जरूरी कदापि नहीं है। मसलन, संघर्ष की आग में तपकर ही व्यक्ति कुंदन-सा निखरता है; उसमें हौसला आता है; दैन्य नहीं, जो 'मां की मुस्कराहट’ में मां के चेहरे पर लेखक का दिखाई देता है। (66)

जिन्हें हम 'मानवेतर प्राणी’ कहकर तुच्छ समझते हैं, वे प्रकृतिजीवी हैं, अत: अनेक दृष्टियों से मानव से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि ''इंसान दिन-प्रतिदिन अधिक अंतर्मुखी व संवेदनहीन होता जा रहा है। उसे तो दिखता है केवल अपना स्वार्थ, बस! ‘’(71), जबकि ''चिडिय़ा का छोटा-सा दिल, उसमें प्रेम लबालब भरा हुआ है, पर इंसान? आजकल की शव-यात्राएं देखी हैं? कितनी शुष्क है! दूसरे की मृत्यु को इंसान कितनी लघुता से लेते हैं!’’ (71)

भारत गांवों का देश है, परंतु आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के चलते गांव-गांव नहीं रहे। ''अपने गांव में काफी परिवर्तन हो गए हैं। लेकिन गांव की प्रगति कई बड़ी इमारतों, विशाल सड़कों, रात में भी दिन का प्रकाश देनेवाले असंख्य विद्युत-दीपों, असंख्य दुकानों और असीमित जन-प्रवाह में सीमित रह गई है। लेकिन गांववासियों में सरलता, आत्मीय भाव, व गांवपन मुझे कहीं भी दिखाई नहीं दिया।‘’ (80)

गरीबी मानव-समाज का कोढ़ है, जिसे मिटाने के लगभग सारे प्रयास विफल प्रतीत  हो रहे हैं- ''सबसे बड़ी दुर्गति है कमजोर और ‘गरीब रहना।‘’ (86) आज जयदेव- जैसे संवेदनशील लोगों का अभाव है, जो दूसरों के दुख में न केवल दुखी होते हैं, बल्कि अपनी जरूरतों को कम करके उनकी सहायता भी करते हैं। दूसरी ओर, अमीरी का ख़्वाब देखने वाले बिरजू-जैसे लोग भी हैं, अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति में जो ब्याज तो ब्याज, मूल भी गंवा देते हैं (88-96)। दरअसल, इस पृथ्वी पर सद्भाव-सुख-शांति स्थापित करने के लिए साधन-सुविधाएं नहीं, अच्छे इंसान चाहिए- संवेदनशील, विवेकशील, श्रमशील। पीटर का यह भ्रम कि ईसाई लोग ही अच्छे होते हैं, सही नहीं है, क्योंकि महात्मा ईसा के आदर्शों का पालन करने वाले महात्मा गांधी-जैसे लोग ही इंसानियत को जिंदा रखते हैं-

''दीर्घकाल की अपनी मेहनत का हिसाब पेश कर जब देश के कर्णधार विविध ओहदे पाने के लिए दावा करते हुए आपस में झगड़ रहे थे, तब वह पुण्य-पुरुष सभी पदों को एक-एक कर ठुकरा कर गंदी गलियों से चलते हुए मारकाट करते भाइयों को समझा रहा था। नादान शिशु के समान रो-रोकर उस पुण्य-पुरुष ने पृथ्वी पर शांति स्थापित की थी। गांधी नाम का ईसाई! एकमात्र ईसाई मैं जिसे ज्ञान पाया था।‘’ मानव-समाज स्त्री-पुरुष संबंधों का ताना-बाना है, जिसमें कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है- ''को बड़ छोट कहत अपराधू।‘’ सामाजिक कार्यकर्ता और उसकी पत्नी की बीच संबंधों की दरार को चिन्हाती कहानी है 'अजनबी औरत’। 'छोटी-सी खुशी’ यह कहती है कि छोटी-छोटी खुशियां किस तरह दांपत्य को चहकाती-महकाती हैं। 'चौथा प्रयोग’ कहानी लंबी ही नहीं; उपदेशात्मक-विवरणात्मक होने के कारण उबाऊ भी है, जबकि उसकी अंतर्वस्तु है गांधीजी के सत्य के प्रयोग। 'सांत्वना’ कहानी आज के उस भयावह सच का पर्दाफाश करती है, जिसमें निर्दोष-ईमानदार सुधांशु को मरते तक मार खानी पड़ती है। 'वेलू’ उस स्वामिभक्त कुत्ते की कथा है, जो बाल जनसंघ की रक्षा करते हुए अपने प्राण गंवा बैठता है। 'मावेली का मन’ में केरल के प्रमुख त्योहार ओणम के पीछे छिपे मिथ को उजागर करती है।

अंतिम कहानी 'आसमान मेरा हमसफर’ प्रतीकात्मक है, जो पुस्तक का शीर्षक है तथा जिसमें लेखक का प्रकृति-साहचर्य प्रकट हुआ है। मनुष्य जब अपने मूल स्थान से हटकर दूर चला जाता है, तब वह अपनी माटी की महक भी स्मृतियों में सहेज कर रखता है। जब वह रिक्तता का बोध करता है, उसकी क्षतिपूर्ति प्रकृति ही करती है। नई जगह में समुद्र और नदी तो नहीं, एक तालाब और उसमें पलती मछलियां उसकी सहचरी बनती हैं। लेखक को आधुनिकता के उस चलन पर क्षोभ होना प्रकृत है, जब तालाब भी नहीं रहा। मनुष्य का अतिक्रमण सिर्फ आसमान पर नहीं हुआ है। लेखक इसी से संतोष कर लेता है कि ''अब मेरा हमसफर है केवल आसमान। वह तो हर दिन, हर वक़्त, हर जगह रहेगा ही।‘’ (152) आसमान मनुष्य की आशा-आकांक्षा का प्रतीक सनातन काल से बनता रहा है।