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Saturday 18 Nov 2017

ग्लोबल गाँव के देवता : आदिवासी विमर्श का महाआख्यान

प्रख्यात आदिवासी चिंतक डॉ. रामदयाल मुण्डा ने कभी कहा था कि विश्व बाजार की सभी शक्तियों की नजर आदिवासी क्षेत्रों पर लगी है, क्योंकि विश्व के सारे प्राकृतिक संसाधन आदिवासी क्षेत्रों में ही है। भारत में विकास के नाम पर, विशेषकर आजादी के तुरंत बाद से अब तक के वर्षों में जो तबाही मची है वह किसी से छिपी नहीं है। पूरी आबादी का पंचमांश (करीब दो करोड़) विकासजनित विस्थापन के कारण बेघर हो गया है और गरीबी-भुखमरी, बीमारी और निरक्षरता में देश के महानगरों की झुग्गी-झोपडिय़ों में जीवनयापन करने को विवश हैं। जिन क्षेत्रों में उनका सामाजिक जीवन अपेक्षाकृत कम टूटा हुआ है, वह अपने अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा की लड़ाई लड़ रहा है। अब तक साँस लेने की जो भी जगह बची है, वह इन्हीं संघर्षों से बची है। 1 आदिवासियों के इन्हीं संघर्षों का महाआख्यान है, रणेंद्र द्वारा रचित उपन्यास  'ग्लोबल गाँव के देवता’। यह उपन्यास अपने लघु कलेवर के बावजूद आदिवासी विमर्श के सभी पहलुओं को उजागर करने में सक्षम है। आदिवासियों के बारे में आम धारणा है कि इनका जीवन हर्षोल्लास, नृत्य-संगीत से भरा पड़ा है। किंतु गत कुछ वर्षों से चर्चा में आए आदिवासी विमर्श के माध्यम से पता चलता है कि वास्तविकता कुछ और है। दरअसल आदिवासियों के जीवन का ध्येय ही रह गया है- जीने के लिए संघर्ष, अपनी अस्मिता एवं जाति को बचाए रखने के लिए संघर्ष। ग्लोबल गाँव की अवधारणा ने विकास के जो पैमाने तैयार किए उसमें ये आदिवासी स्वयं को 'फिट’ नहीं पाते हैं। इस कारण इनकी कई जनजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं, जो कि चिंताजनक स्थिति है। अंडमान-निकोबार की जारवा, ओंग और सेंटीनली जनजातियाँ विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं। कुछ वर्षों पहले बोआ जनजाति के एकमात्र सदस्य की मृत्यु होने से, उनके द्वारा बोले जाने वाली 'बो’ भाषा भी विलुप्त हो गयी है। पश्चिम बंगाल की विलुप्तप्राय टोटो और राभा जनजाति की तरह ही न जाने कितनी जनजातियाँ विकास के इस मॉडल की भेंट चढऩे को तैयार हैं। 

          'वसुवैध कुटुम्बकम’ की तर्ज पर 'विश्वग्राम’ या 'ग्लोबल गाँव’ की परिकल्पना तो कर ली गयी किंतु भारतीय संस्कृति में 'वसुवैध कुटुम्बकम् : सम्पूर्ण विश्व एक परिवार’, रूपी जो अपनत्व की भावना थी वह 'विश्वग्राम’ की अवधारणा में निहित नहीं हो पायी। 'विश्वग्राम’ में मानव कल्याण की कोई जगह नहीं, क्योंकि यह व्यापार और शोषण-तंत्र पर आधारित भोग-केंद्रित व्यवस्था पर बल देता है जबकि 'वसुवैध कुटुम्बकम’ मानव कल्याण पर आधारित त्याग और सहकार जैसे उदात्त मूल्यों पर केंद्रित व्यवस्था पर बल देता है। आदिवासियों ने भारतीय संस्कृति को पूरी तरह से आत्मसात् किया हुआ है जबकि 'विश्वग्राम’ तो एक खास वर्ग द्वारा सुनहरा सपना दिखाने के नाम पर भोली-भाली जनता के शोषण हेतु सोची-समझी साजिश का परिणाम है। अब जब मैदानी इलाकों पर इनके 'मैक्डॉनलीकरण’ का जादू पूरी तरह चल चुका है, वहाँ की खनिज-सम्पदा का उपभोग कर चुके तो इनकी गिद्ध-दृष्टि पहाड़ों एवं जंगलों में वास करने वाली आदिवासी जनजातियों की खनिज-सम्पत्ति पर आकर टिक गयी है। वैसे तो ये ग्लोबल गाँव के देवता इन आदिवासियों के विकास की बात करते हैं किंतु यह विकास के नाम पर इन्हें इनके ही जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने की साजिश मात्र है। 

          'ग्लोबल गाँव के देवता’ में झारखण्ड राज्य के कोयलबीघा के भौंरापाट में निवास करने वाली 'असुर’ जनजाति के माध्यम से कथाकार ने सम्पूर्ण आदिवासी समाज से जुड़े हर पहलू एवं समस्याओं से हमारा साक्षात्कार कराया है जो आदिवासी विमर्श का केंद्रबिंदु है। वस्तुत: झारखण्ड की धरातल पर इसी असुर जनजाति का आगमन सबसे पहले हुआ है। यह जनजाति अल्पसंख्यक है और इसे आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा गया है। इस जनजाति का उल्लेख ऋग्वेद, आरण्यक, उपनिषद, महाभारत आदि ग्रंथों में भी मिलता है। आज इनका अस्तित्व संकट के घेरे में है। ये अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए प्रतिदिन संघर्ष कर रहे हैं। यह स्थिति लगभग सभी आदिवासी जनजातियों की है। लेखक ने सबसे पहले तो यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि 'असुर’ का अर्थ विकराल रूप धारण किया हुआ दैत्य नहीं है, जैसा कि हम परंपरा से मानते आये हैं। रूमझुम नामक एक असुर युवक मास्टर साहब से कहता है, असुर सुनते दो ही बातें ध्यान में आती हैं। एक तो बचपन में सुनी कहानियों वाले असुर, दैत्य और न जाने क्या-क्या ! वर्णन भी खूब भयंकर। दस-बारह फीट लम्बे। दाँत-वाँत बाहर। हाथों में तरह-तरह के हथियार। नरभक्षी, शिवभक्त, शक्तिशाली। किंतु अंत में मारे जाने वाले। सारे देवासुर संग्रामों का लास्ट सीन पहले से फिक्स्ड। दूसरी एंथ्रोपॉलोजी की 1926, 1947 या 1966 की किताबों में छपी केवल कॉपीन पहने मर्द और छाती तक नंगी औरतों वाली तस्वीरों वाले असुर। अब आप खुद ही तय कर लीजिए मास्टर साहब की हम क्या हैं? 2 मास्टर साहब ने भी असुरों के बारे में ऐसी ही प्रचलित कथाएँ सुन रखी थीं। लेकिन लालचन को देखकर सब उलट-पुलट हो गया, बचपन की सारी कहानियाँ उलटी घूमने लगती हैं। उन्हें सहसा विश्वास ही नहीं होता कि असुर समाज में छरहरी-सलोनी एतवारी जैसी सुंदर युवतियाँ भी हो सकती हैं। रूमझुम आगे बताता है कि 'असुर’ आदिवासी तीन भागों में बँटे हैं, बीर असुर, अगरिया असुर और बिरिजिया असुर। हालाँकि 'बीर’ यहाँ बहादुर के सेंस में नहीं आया, बल्कि जंगल के अर्थ में आया है। लेकिन प्राचीन असरिया-बेबीलोन सभ्यता में असुर का अर्थ बलवान पुरूष ही होता है। अपने यहाँ भी सायणाचार्य असुरों को बलवान, प्रज्ञावान, शत्रुओं का नाश करने वाला और प्राणदाता पुकारते हैं। ऋग्वेद के प्रारम्भ के लगभग डेढ़ सौ श्लोकों में असुर देवताओं के रूप में हैं। मित्र, वरूण, अग्नि, रूद्र सभी असुर ही पुकारे जा रहे हैं। बाद में यह अर्थ बदलने लगता है और असुर दानव के रूप में पुकारे जाने लगते हैं। 3 ऐसी मान्यता है कि हिंदुओं के देव भगवान शिव मूल रूप से आदिवासी देवता ही थे। हड़प्पा में मिली पशुपति योगी की मुहर इसका साक्षात् प्रमाण है। आर्यों ने भी उन्हें देव रूप में स्वीकार कर लिया। रामायण में भी आदिवासियों का वर्णन हुआ है, जिसमें राजा गोह अपनी प्रजा के साथ मिलकर चित्रकूट में वनवास के समय श्रीराम की सहायता करते हैं। इसी से इनके परोपकारी स्वभाव का पता चलता है। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि भील आदिवासी थे। गौतम बुद्ध की शरण में आया डाकू अंगुलिमाल भी आदिवासी था। प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुण्डा आदिवासी थे। अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा आदिवासियों को अपने इसी नेता से मिलती है। आदिवासियों तथा गैर-आदिवासियों सभी में ये काफी सम्मानित व्यक्तित्व हैं। आदिवासी जनजाति के ये लोग हमारी ही तरह आम इंसान हैं। इनकी रगों में भी वही लाल रक्तकण बहता है जो हमारी रगों में है। अत: इन्हें असभ्य, जंगली, दैत्य-दानव समझना व्यक्ति की दूषित मानसिकता के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

          ग्लोबल गाँव के देवताओं द्वारा आदिवासियों की खनिज-सम्पत्ति की लूट लगातार जारी है। ये लोग खनन के नाम पर नैसर्गिक वातावरण से छेड़छाड़ कर रहे हैं, प्रकृति को उजाडऩे में लगे हैं, पहाड़ों का सौंदर्य भी बिगाड़ रहे हैं। अब तो जंगल भी पहले की तरह सघन नहीं रहे। ये देवता खदानों से बॉक्साइट निकाल कर खदानें खुली छोड़ देते हैं। ये खुली खदानें देखने में ऐसी लगती हैं मानो धरती माँ के चेहरे पर चेचक के बड़े-बड़े धब्बे हों। खदानों के खुलने से अगर आदिवासी जनजातियों को मजूरी मिली है तो इसके कई दुष्परिणाम भी सामने आए हैं। जैसे बॉक्साइट के खदान खुले छोडऩे से उनमें बरसाती पानी भरने से मलेरिया का महामारी बनकर फैलना। डॉ मुण्डा की एक टिप्पणी के अनुसार, झारखण्ड के आदिवासी इलाकों में मलेरिया ने महामारी का रूप ले लिया है। बरसात के दिनों में 'डायरिया’ फैलना एक आम बात है। स्वर्णरेखा जैसी प्रदूषित नदी के किनारे के ग्रामीणों में कुष्ठ रोगियों की संख्या तुलनात्मक रूप से ज्यादा है। खदानों में काम करने वाली आबादी में टी.बी. खाँसी रोग के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। जादूगोड़ा के इलाके में रेडियो एक्टिव कचरे ने आदिवासियों की अगली पीढ़ी को ही विकलांग बना दिया है। 4 उपन्यास में ग्लोबल गाँव के देवताओं के खिलाफ असुर आदिवासियों का गुस्सा इस प्रकार फूटता है, 'चाहे वह शिंडाल्को जैसी बड़ी कम्पनियों की खदानें हों या पोद्दार-रूँगटा जैसी कम्पनियों की। सबको केवल बॉक्साइट से मतलब है। उसके बाद मिट्टी भरने का खर्च कम्पनी को भारी लगने लगता है। चाहे मुनाफा करोड़ों से अरबों की ओर उछलता जा रहा हो, ये लोग पाट क्षेत्र में एक पैसा खर्च करने के लिए तैयार नहीं। दरअसल, असली बात यह है कि ये हम लोगों को आदमी में गिनते ही नहीं हैं। अब तक इन खुले खदानों की बरसाती जमे पानी में पल-बढ़कर मच्छरों ने हमारा जीना हराम कर रखा है। हमारे होश में चार दर्जन से ज्यादा नयी उम्र के लड़के माथा बुखार-सेरेब्रल मलेरिया से मरे हैं। बूढ़े-बुजुर्गों की तो गिनती ही नहीं। हमारे दुख से इन्हें क्या, इनको तो बस अपने मुनाफे से मतलब है।‘ 5 अस्तु, ग्लोबल संस्कृति 'विकास’ के नाम पर आदिवासियों की खनिज-सम्पत्ति तो लूट ही रही है, साथ ही उनके स्वास्थ्य पर भी कुठाराघात कर रही है। सोचने को विवश होना पड़ता है कि क्या यही है, ग्लोबल गाँव के विकास का पैमाना जिसमें सामने वाले के माल के साथ-साथ जान का भी नुकसान होता हो। जबकि ध्यान दिया जाए तो हम पायेंगे कि इस विकास का वास्तविक लाभ तो ग्लोबल गाँव के देवताओं को हो रहा है जो शहरों में वास करते हैं, जिनका इन गरीब आदिवासियों के दुख-दर्द से कोई सरोकार नहीं है। इनका सरोकार तो केवल लाभ कमाने से है। ग्लोबल गाँव के देवताओं के समाज और असुरी समाज की वास्तविक स्थिति का वर्णन करते हुए रूमझुम की आवाज थरथराने लगती है और आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं। वह मास्टर साहब को बताता है, हमारा बॉक्साइट यहाँ से डेढ़-दो सौ किलोमीटर दूर जहाँ प्रोसेस होकर अल्युमिनियम में ढलता है, वह सिल्वर सिटी ऑफ इंडिया कहलाती है। एक बार घूमने का मौका मिला था। फूलों-पार्कों से लदी हरी-भरी खूबसूरत कॉलोनी। एक से एक स्कूल, चमचमाते बजार, क्लब घर, योगा केंद्र, लाइब्रेरी, खेल के मैदान और न जाने क्या-क्या! सुंदर-सुंदर कुत्तों को घुमाती सुंदर-सुंदर महिलाएँ, बर्फ के गोलों-से गुलथुल उजले-उजले बच्चे, रंग-बिरंगी गाडिय़ाँ। लगा, इंद्रलोक धरती पर उतर आया हो। और यहाँ पाट में अब तो आप आ ही गये हैं मास्टर साहब। धीरे-धीरे सब जान जाइएगा। पानी और जलावन जुटाने में ही हमारी औरतों की आधी जिंदगी गुजर जाती है। बरसात के गिंजन की तो मत पूछिये। बंद खदान के सैकड़ों गड्ढे विशाल पोखरों में बदल जाते हैं। कीचड़ में लोटते सूअरों और हमारे बच्चों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। वहाँ के गेस्ट हाउस के मेस में छत्तीस तरह के व्यंजन। मुहावरे वाले नहीं, सचमुच के। क्या खाएँ, क्या नहीं खाएँ! एक ही दिन में पेट खराब हो गया। यहाँ मकई का घट्टा खा-खाकर जीभ पर घट्टा पड़ जाता है। हमारे ज्यादातर घरों में भात-दाल सब्जी भी पर्व-त्योहार का भोजन है। 6 यही है 'शाइनिंग इंडिया’ का सच, जहाँ ग्लोबल गाँव के देवता वास करते हैं, वह बिल्कुल देवताओं के वास-स्थल अर्थात् स्वर्ग जैसा होता है। किन्तु इसके विपरीत पक्ष पर किसी का ध्यान नहीं जाता, जहाँ ये गरीब आदिवासी वास करते हैं। ये सभी सुख-सुविधाओं से वंचित किसी तरह बस अपने दिन काट रहे हैं (प्रतिदिन संघर्ष करते हुए)। पाथरपाट स्कूल के बड़े से कैम्पस और विशालकाय भवनों को देखकर पता चलता है कि भौंरापाट जैसे दो-तीन गाँवों को उजाड़कर उस स्कूल की नींव रखी गयी और गाँव वालों के बच्चों को ही उसमें पढऩे की मनाही थी। रूमझुम अपनी व्यथा और आक्रोश इस प्रकार व्यक्त करता है,  पिछले तीस वर्षों का रजिस्टर उठाकर देख लीजिए जो एक भी आदिम जाति परिवार के बच्चे ने इस स्कूल में पढ़ाई की हो! मैंने खुद कितनी कोशिश की थी। पिछले दो-तीन वर्षों से कैजुअल शिक्षक के रूप में काम करने की इच्छा है। लेकिन वहाँ भी दाल नहीं गलती। आखिर हमारी छाया से भी क्यों चिढ़ते हैं ये लोग? माड़-भात खिलाकर, अधपढ़-अनपढ़ शिक्षकों के भरोसे, फुसलावन स्कूल के हमारे बच्चे, ज्यादा-से-ज्यादा स्किल्ड लेबर, पिऊन, क्लर्क बनेंगे, और क्या? यही हमारी औकात है। हमारी ही छाती पर ताजमहल जैसा स्कूल खड़ा कर हमारी हैसियत समझाना चाहते हैं लोग। 7 उपन्यास में मुख्यधारा में शामिल करने के नाम पर आदिवासियों को अपमानित करने की भी चर्चा हुई है। आदिवासियों के लिए मुख्यधारा का आकर्षण एक भ्रम है जबकि वास्तव में उनका मुख्यधारा में शामिल होने का अर्थ होगा, अपने लिए अनंत काल तक गुलामी स्वीकार करना।  

          कथाकार ने अखड़ा के सौंदर्य वर्णन द्वारा आदिवासियों के सांस्कृतिक पक्ष पर भी प्रकाश डाला है। अखड़ा हर गाँव के बीच या किनारे एक सार्वजनिक स्थल होता, जहाँ गुरूवार के दिन गाँव के सारे बुजुर्ग, समझदार, सयाने बैठते और गाँव-घर-समाज की समस्या पर बतियाते। उसी अखड़ा में पर्व-त्योहार सरहुल, हरियारी, सोहराय पर रात भर माँदर बजता। रात भर गाँव-गाँव से जवान लड़के जुटते। लड़कियाँ जुटतीं। झूमर, जदुरा के बोलों पर रात भर चाँद नाचता। सखुआ और पलाश नाचता। कनेर और अमलतास नाचता। नदी-झरना पहाड़ नाचते। एक साथ पूरी प्रकृति नाचती।8 यही एक ऐसा स्थल है जहाँ आदिवासी समाज अपने पर्व-त्योहार मनाने के बहाने सुख-दुख भुलाकर प्रकृति के रंग में रंग जाते हैं। आखिरकार यह जल, जंगल, जमीन, खनिज सम्पदा, पूरी प्रकृति ही तो इनके देवता हैं। जैसे भक्त अपने देवता की शरण में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं, वैसे ही यह आदिवासी समाज प्रकृति की गोद में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं। उपन्यास में ललिता को आदिवासी सभ्यता एवं संस्कृति पर गर्व है। वह गर्व से कहती है, हम प्रकृति के पूजक हैं। हमारा महादेव यह पहाड़ है। यह पाट है, जो हमें पालता है। हमारी सरना माई न केवल सखुआ गाछ में, बल्कि सारी वनस्पतियों में समायी हैं। हम सारे जीवों से अपने गोत्र को जोड़ते हैं। छोटे जीवों-कीट-पतंगों को भी अपने से अलग नहीं समझते। हमारे यहाँ अन्य की अवधारणा ही नहीं है। 9 इसके विपरीत, ग्लोबल गाँव का विकास न केवल आदिवासी सभ्यता एवं संस्कृति के लिए विनाशकारी सिद्ध हो रहा है बल्कि पर्यावरण को भी नष्ट करने पर तुला है। बॉक्साइट का खनन करने और उसे एल्यूमिनियम में बदलने का ऐसा कोई तरीका नहीं जिसमें पर्यावरण-अनुकूलता हो। यह एक बेहद ही जहरीली प्रक्रिया है जिससे स्वास्थ्य पर तो बुरा असर पड़ता ही है, साथ ही पर्यावरण का भी बहुत नुकसान होता है।

          जिन आदिवासियों के यहाँ साल भर अनाज नहीं होता, जमीन या मजूरी नहीं होती तो उनके घर का पेट जंगल ही पालता है। महुआ, कटहल, कई तरह के कंद और साग, सब पेट भरने के काम आते हैं। वन-सम्पत्ति के अतिरिक्त घरों में पाले जाने वाले पशु-पक्षी भी उनकी सम्पत्ति हैं, जो आवश्यकता पडऩे पर उनके काम आते हैं। गाय-गोरू, बकरी-छगरी, मुर्गी-सूअर केवल पशु-पक्षी नहीं, बल्कि आदिवासियों के पासबुक भी हैं। हारी-बीमारी, शादी-विवाह इन्हीं के भरोसे। जब भी जरूरत होती, बेचारे मूक प्राणी हाट पहुँचा दिये जाते हैं। मुख्यधारा के लोगों द्वारा आदिवासियों की खनिज-सम्पत्ति, जमीन, जंगल सभी हथिया लिए गये तो अब उनकी दृष्टि आदिवासियों के पशु-पक्षियों पर आकर टिक गयी। यह सब कुछ इतनी चालाकी से होता है कि आदिवासियों को इसकी भनक तक नहीं लग पाती कि कब ये अपनी पशु-सम्पत्ति भी गँवा बैठे। इसी क्रम में एक ढोंगी बाबा शिवदास की चर्चा होती है जो अपनी दूकान चलाने के लिए एक कंठी अभियान चलाता है। वह असुर आदिवासियों को काले वस्त्र, काली वस्तु, काले गाय-गोरू, मुर्गी-सूअर से दूर रहने के लिए कहता है। उस ढोंगी बाबा के अनुसार ये काले जानवर दरअसल जानवर नहीं थे, बल्कि वेश बदले हुए पिशाच थे। इनसे हर हाल में बचना आवश्यक था। इससे कई तरह की परेशानियाँ सामने आयीं। सबसे बुरा हाल तो काले रंग के पशुओं का हुआ। कोई भी कंठी धारी भगत अब अपने घर में काले रंग की गाय-गरू, मुर्गी, सूअर कुछ भी रखने को तैयार नहीं था। अपने गोहाल में ये मूक जीव उन्हें एक दिन के लिए भी बर्दाशत नहीं थे। हाटों में काले पशुओं की इतनी आमद बढ़ी कि इनकी कीमतें अचानक नीचे गिर गयीं। व्यापारियों को सारी खबर थी। वे मिट्टी के भाव इन पशुओं को खरीदते हुए ऐसे नखरे दिखाते मानो वे आदिवासी किसानों पर उपकार कर रहे हों। जब ट्रक के ट्रक मवेशी इलाकों के हाटों से उठने लगे तब प्रशासन की नींद खुली। शुरू में इस अंधविश्वास को दूर करने के लिए हाटों में नगाड़ा पिटवाकर प्रचार करने की कोशिश की गयी। तब भी स्थिति नहीं सुधरी तो जिला प्रशासन ने निषेधाज्ञा लगायी कि कोई भी किसान एक हाट में एक से ज्यादा पशु नहीं बेच सकता। लेकिन भगतों को प्रशासन से ज्यादा पिशाचों का भय था। वे यह समझने के लिये तैयार नहीं थे कि ये गाय-गरू, मुर्गी, सूअर केवल पशु नहीं, बल्कि उनकी जमा-पूँजी थे, घरेलू बैंक के पास-बुक। हारी-बीमारी, शादी-ब्याह, अन्य प्रयोजनों में यही काम आते हैं। किंतु शिवदास बाबा के एक चमत्कार ने इन घरेलू बैंकों को एक झटके में दिवालिया कर दिया और मजे की बात तो यह कि इन्हें खबर तक नहीं हुई। लेकिन बहुत फायदे में पशु-व्यापारी भी नहीं रहे थे। अन्दरूनी खबर थी कि बाबा के खास लोगों ने उन पशुओं की वाजिब कीमत व्यापारियों से वसूल ली थी। उम्मीद से ज्यादा आमदनी हुई। उसके बाद बाबा के आश्रम-विद्यालयों की भव्य शुरूआत हुई। 10 आश्रम के बहाने वह कम उम्र की लड़कियों के साथ जबरदस्ती करता, उनका शारीरिक शोषण करता और जो लोग उसका विरोध करते, उन्हें एक सिरे से खारिज कर दिया जाता। डॉक्टर साहब के अनुसार, कितनी-कितनी बार उन्होंने बाबा की कोठरी में बेहोश पड़ी कमसिन बच्चियों की पानी-खून चढ़ाकर जान बचाई थी, उसका कभी हिसाब नहीं रखा, लेकिन देखते ही इनके मन में उसके चेहरे पर थूकने का मन करता। बबवा पर्वटेड था। उसे मानसिक इलाज की जरूरत थी। अकेले में किसी भी उम्र की महिला को देखकर वह अपना मानसिक नियंत्रण खो देता था। भाँग-गाँजे के नशे में हो तब तो पूछिये मत, पक्का जानवर बन जाता, जानवर।11 इन सबके मूल में आदिवासियों का अशिक्षित होना ही कहीं-न-कहीं इसका प्रमुख कारण है। यदि ये शिक्षित होते तो अवश्य ही अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहते। शिक्षा की कमी के कारण ही ये आसानी से किसी भी अंधविश्वास के शिकार हो जाते हैं, जिससे बचने के लिए इनका शिक्षित होना बेहद जरूरी है।

          आदिवासियों की मजबूरी का फायदा उठाकर बहुत कम कीमत पर उनकी जमीन हथिया ली जाती है। उपन्यास में, सोमा के बाबा ने एक एकड़ खेत मात्र पाँच हजार रूपये में एक खदान के दलाल को दे दिया था। बिना घर में बात-विचार किये, बिना जवान-जहान बेटे के भविष्य का ख्याल किये, सादे कागज पर ठप्पा लगाया, क्यों? सवाल सोमा बाबा का ही नहीं था। जिसे देखो, वही फुसलावन-लस्सा लगावन के चक्कर में पड़ रहा था।12 बाद में पता चलता है कि अपनी बेटी के मृत शरीर को छुड़वाने के लिए सोमा के बाबा के पास पैसे नहीं थे। इसीलिए मजबूरीवश उन्हें अपनी जमीन बेचनी पड़ी। गरीबी और पेट भरने की मजबूरी का एक अन्य पक्ष भी सामने आता है जिसे उपन्यासकार के एक छोटे-से गीत के माध्यम से प्रस्तुत करता है। 'काठी बेचे गेले असुरिन,/ बाँस बेचे गेले गे,/ मेठ संगे नजर मिलयले,/ मुंशी संग लासा लगयले गे,/ कचिया लोभे कुला डूबाले,/ रूपया लोभे जात डूबाले गे’ यह गीत नौजवान लड़कों के मुँह के अकसर सुनाई पड़ता कि लकड़ी और बाँस बेचने गयी असुरिन, तुमने खदान के सेठ के साथ नजर क्यों मिलायीं? तुमने खदान के मुंशी के साथ लगाव क्यों बढ़ाया? पैसे (कचिया) के लोभ में तुम कुल का नाम डूबा रही हो। रूपये के लोभ में जाति का नाम डूबा रही हो।13 यह वास्तव में शिकायत नहीं बल्कि विलाप है। अंदर से बुरी तरह टूट चुके समाज का विलाप। भूख और गरीबी ने अंदर से इतना खोखला कर दिया है कि सामाजिक व्यवस्था भरभरा गयी है। अखड़ा में बैगा-पाहन-पुजार और गाँव के बड़े-बूढ़ों की बात का वजन दिन पर दिन घटता जा रहा है। ठीक ही बात है कि घर में तीन-चार माह से ज्यादा का अनाज नहीं हो तो कौन बेटों को गाँव छोडऩे और बेटियों को डेरा में काम के बहाने रखनी बनने से रोक सकता है?14

          जिनमें कुछ आत्मसम्मान बचा रहता है वे अपना घर छोड़कर दूसरे प्रदेशों में कमाने निकल जाते हैं। किंतु इससे इनकी परेशानियाँ समाप्त नहीं होतीं बल्कि इनकी जिंदगी ही दाँव पर लग जाती है। इसका चित्रण वे बुधनी के माध्यम से करते हैं। 'एक आदमी की कमाई से बड़े घर का खर्च नहीं पूरता था। सो चार-पाँच साल पहले बुधनी अपने गोमके (मर्द) और बाल-बच्चों के साथ असम-भूटान निकल गयी। कई तरह के काम धंधे किये। डिब्रूगढ़ के शिवसागर के चाय बगान के पास उसकी चाय-गुमटी चल निकली थी। ... सब ठीक-ठाक ही चल रहा था कि हिन्दी बोलने वाले एकाएक वहाँ पराये हो गये। रात में चाय बगान कॉलोनी में गोलियाँ बरसने लगीं। काली रात, स्याह, गर्म कोलतार की नदी में बदल गयी। देखते-देखते कॉलोनी के जवान-जहान देह निर्जीव लकड़ी के ल_े से गर्म-खौलते कोलतार की स्याह नदी में डूबने-उतारने लगे। उस रात की कोई सुबह ही नहीं हुई। सूरज भी शायद अपने मुँह पर कोलतार मले यहाँ-वहाँ छुपता रहा।15 किसी तरह बुधनी सपरिवार जान बचाकर वापस सखुआपाट पहुँचती है और नये सिरे से जीवन शुरू करती है। इसी तरह, जिन लड़कियों को बाहर काम करने के लिए भेजा जाता है, उन्हें देह-व्यापार के दलदल में धकेल दिया जाता है। जिन लड़कियों के परिवार वाले थोड़ी-बहुत दौड़-भाग करते हैं तो उनकी लड़कियाँ वापस घर आ जाती हैं किंतु कईयों का कुछ पता ही नहीं चल पाता है।

          आदिवासियों के विस्थापन का दर्द भी उपन्यास में दिखाया गया है। सरकार को भेडिय़े बचाने की तो चिंता है किंतु आदिवासियों को बचाने की नहीं, जो प्रतिदिन संघर्ष के साथ जीवनयापन कर रहे हैं। उपन्यास में, डॉक्टर साहब की खबर थी कि वन विभाग ने बहुत पहले रिपोर्ट भेजी थी कि लगभग चौंसठ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पहले भेडिय़ों की संख्या सात सौ अ_ासी हुआ करती थी, वह घटती-घटती एक सौ छिहत्तर रह गयी है। तैंतीस पेज तो खाली इन भेडिय़ों की इस खास नस्ल पर ही लिखा गया है, तब यह बताया गया है कि इनका बचाया जाना कितना जरूरी है। वन विभाग असुरों और आदिवासियों को अपने क्षेत्र में घुसपैठिया मानता है। वह यह मानने के लिये तैयार नहीं है कि वन गाँवों में लोग सैंकड़ों वर्षों से रहते आये हैं। वन विभाग ही बाद में आया है। वनस्पतियों और जीवों की तरह आदिवासी-आदिम जाति भी जंगल के स्वाभाविक बाशिंदे हैं। यह स्वीकार करने से उनकी पढ़ाई रोकती है। वे गाँव खाली कराकर ही दम लेंगे।16 यह विडम्बना ही है कि पशु को मनुष्य से ऊँचा स्थान दिया जा रहा है।

          उपन्यास में ग्लोबल गाँव के देवताओं की मनमानी करने की प्रवृत्ति की भी चर्चा हुई है। सामान्य तौर पर इन आकाशचारी देवताओं को जब अपने आकाशमार्ग से या सेटेलाइट की आँखों से छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखंड आदि राज्यों की खनिज सम्पदा, जंगल और अन्य संसाधन दिखते हैं तो उन्हें लगता है कि अरे, इन पर तो हमारा हक है। उन्हें मालूम है कि राष्ट्र-राज्य तो वे ही हैं, तो हक तो उनका ही हुआ। सो इन खनिजों पर, जंगलों में, घूमते हुए लँगोट पहने असुर-बिरिजिया, उराँव-मुंडा आदिवासी, दलित-सदान दिखते हैं तो उन्हें बहुत कोफ्त होती है। वे इन कीड़ों-मकोड़ों से जल्द निजात पाना चाहते हैं। तब इन इलाकों में झाडू लगाने का काम शुरू होता है। जख्मी हिरणें पूर्ण मृत्यु के लिए शिकारियों का इंतजार भर कर रहे हैं।17 इन सबमें पुलिस-प्रशासन भी इन्हीं का साथ देती है। आदिवासी तो आसानी से किसी के भी झाँसे में आ जाते हैं। इन्हें कोई भी आसानी से बेवकूफ  बना सकता है। जो आदिवासी इन मुनाफाखोरियों के बहकावे में आ जाते हैं, उनके घर में किसी चीज की कमी नहीं होती, लालच दिखाकर आदिवासियों में से ही दलाल उत्पन्न किये जाते हैं और जो इनके बहकावे में नहीं आते वे बेचारे बदहाली की जिंदगी जीने को विवश रहते हैं। उनकी स्थिति बद-से-बदत्तर होती जाती है। इस पर अगर ये लोग अपने हक के लिए आवाज उठाएँ, विरोध करें तो उनका कत्लेआम करके उन्हें नक्सली करार दे दिया जाता है। यह बड़ा ही आसान तरीका है, आदिवासियों के विद्रोह को दबाने का। दरअसल उनके संघर्ष के सवालों से ध्यान हटाने का इससे अच्छा कोई तरीका हो ही नहीं सकता है। इसमें व्यवस्था संचालकों का अपना लाभ जो है। इन सबमें आदिवासी जनजातियों का संघर्ष तो कभी समाप्त ही नहीं हुआ है, जब-जब इन्हें इनके अधिकारों से वंचित किया गया तब-तब इन्होंने विद्रोह किया। इनके संघर्ष का एक लम्बा इतिहास रहा है। धाल विद्रोह (1767-1777 ई.), चुआड़ विद्रोह (1769 ई.), पहाडिय़ा विद्रोह (1772-82 ई.), तमाड़ विद्रोह (1782ई.), तिलका आंदोलन (1783ई.), चेरो विद्रोह (1800-02 ई.), हो विद्रोह (1820-21 ई.), कोल विद्रोह (1831ई.),भूमिज विद्रोह (1832ई.), संथाल विद्रोह (1855 ई.), सहफोड़ आंदोलन (1870 ई.), खरवार आंदोलन (1874 ई.), बिरसा मुंडा का उलगुलान विद्रोह (1895 ई.), टाना भगत आंदोलन (1914 ई.), 1857 का विद्रोह, सबके मूल में आदिवासियों को बाहरी शक्तियों द्बारा उनकी सुख-सुविधाओं से वंचित करने की कोशिश प्रमुख रही है। इन सबके प्रति आक्रोश ही आदिवासियों के विद्रोह का कारण बना। जब शोषण होता है, अत्याचार होता है तब क्रांति की ज्वाला फूटनी तो स्वाभाविक-सी प्रतिक्रिया है। ये क्रांति पहले भी होती रही है और समय आने पर आगे भी होंगी। भले ही अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए ये ग्लोबल गाँव के देवता इन्हें 'नक्सली’ ही क्यों न घोषित कर दें। ऑपरेशन ग्रीन हंट भी एक साजिश थी, जंगल समाप्त करके आदिवासियों को बेदखल करने की। वास्तव में इन ग्लोबल गाँव के देवताओं का उद्देश्य - प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों की ही नहीं सांस्कृतिक लूट के साथ गुण्डागर्दी भी है।

          उपन्यास में प्रधानमंत्री को लिखी गयी चिट्ठी के बहाने आदिवासियों के दुख-दर्द को समझा जा सकता है। वे लिखते हैं, हमारे पूर्वजों ने जंगल की रक्षा करने की ठानी तो उन्हें राक्षस कहा गया। खेती के फैलाव के लिए जंगलों के काटने-जलाने का विरोध किया तो दुष्ट दैत्य कहलाये। उन पर आक्रमण हुआ और लगातार खदेड़ा गया। लेकिन बीसवीं सदी की हार हमारी असुर जाति की अपने पूरे इतिहास में सबसे बड़ी हार थी। इस बार कथा-कहानी वाले सिंगबोगा ने नहीं, टाटा जैसी कम्पनियों ने हमारा नाश किया। उनकी फैक्टरियों में बना लोहा, कुदाल, खुरपी, गैंता, खंती सुदूर हाटों तक पहुँच गये। हमारे गलाये लोहे के औजारों की पूछ खत्म हो गयी। लोहा गलाने का हजारों-हजार साल का हमारा हुनर धीरे-धीरे खत्म हो गया। मजबूरन पाट देवता की छाती पर हल चलाकर हमने खेती शुरू की। किंतु बॉक्साइट के वैध-अवैध खदान, विशालकाय अजगर की तरह हमारी जमीन को निगलता बढ़ता आ रहा है। हमारी बेटियाँ और हमारी भूमि हमारे हाथों से निकलती जा रही हैं। हम यहाँ से कहाँ जाएँगे? यह हमारी समझ में नहीं आ रहा। ... हम असुर अब सिर्फ आठ-नौ हजार ही बचे हैं। हम बहुत डरे हुए हैं। हम खत्म नहीं होना चाहते। भेडिय़ा अभयारण्य से कीमती भेडिय़े जरूर बच जाएँगे श्रीमान। किंतु हमारी जाति नष्ट हो जाएगी।18 इस चिट्ठी के माध्यम से आदिवासियों की स्थिति का अत्यंत हृदय विदारक चित्रण हुआ है। इस प्रकार, कभी वीरता का पर्याय रही ये जनजातियाँ आज गरीबी एवं उपेक्षा का दंश झेल रही हैं। अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्षरत हैं। इन्हें बचाना है तो सरकार को इन्हें संरक्षण के साथ-साथ इनके जीने लायक पर्यावरण भी देना होगा, जहाँ किसी बाहरी व्यक्तित्व का हस्तक्षेप न हो।

          पशु धरातल से ऊपर उठा मनुष्य आज वापस पशुवत् व्यवहार करने लगा है, उसके सोचने-समझने की शक्ति क्षीण होती जा रही है। उसके लिए दूसरों के जीवन का कोई मोल नहीं रहा, केवल अपना स्वार्थ सर्वोपरि हो गया है। जो लोग ग्लोबल गाँव की बात करते हैं, वे वास्तव में जीना ही भूल गये हैं। अपने आस-पास नकली पर्यावरण ओढ़ नकली संस्कृति में जी रहे हैं; वास्तविकता से कोसों दूर, तनाव एवं आगे निकलने की होड़ को धारण किये हुए। इन्हें मानासिक पक्षाघात के शिकार लोगों की श्रेणी में रखा जा सकता है। जबकि आदिवासी शासन में आर्थिक दोहन, शोषण एवं लूट-खसोट आदि के लिए कोई जगह नहीं है। वे प्रकृति से उतना ही लेते हैं जिनसे उनका गुजारा हो सके। बिल्कुल बैंक में रखे गये मूलधन के ब्याज की तरह। वे प्राकृतिक सम्पदा का मूलधन की तरह संरक्षण करते हैं। प्रकृति आधारित जीवन दर्शन उनकी विरासत है। ये पर्यावरण संरक्षण की बात करते हैं, तब ये कहाँ-से पिछड़े हुए, जबकि पर्यावरणिक उदारता आज की सबसे बड़ी जरूरत भी है। बल्कि ये तो मुख्यधारा के लोगों के मुकाबले अधिक व्यापक दृष्टि रखते हैं। ये ही विकास के असल मॉडल हैं जो सहजीविता, सहभागिता, सहअस्तित्व एवं सामूहिकता की बात करते हैं। पिछड़े हुए तो समाज के वे ठेकेदार हैं जो स्वार्थ-सिद्धि को जीवन का लक्ष्य बनाये हुए हैं। आज अगर हमें ग्लोबलीकरण के कुप्रभावों से छुटकारा चाहिए तो हमें आदिवासी जीवन-दर्शन को अपने जीवन में उतारना होगा। इसी क्रम में प्रसाद के 'कामायनीÓ की ये पंक्तियाँ याद हो आयीं जिसमें वे लिखते हैं,

औरों  को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ,

अपने सुख को विस्तृत कर लो सबको सुखी बनाओ।

जब हम दूसरों के सुख में अपना सुख तलाशेंगे तब सभी मनुष्य स्वत: सुखी हो जायेंगे और किसी विमर्श पर अलग से चर्चा का कोई औचित्य ही नहीं रहेगा। आज हमें ऐसे ही जीवन दर्शन की आवश्यकता है।  

संदर्भ-

1.     तिवारी, मुक्तेश्वर नाथ (सम्पा.), विश्वभारती पत्रिका, खंड-60, अंक-2, जुलाई-सितम्बर, 2014, शांतिनिकेतन, पृ.104

2.     रणेंद्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, पाँचवाँ संस्करण, 2016, पृ.17

3.     वही, पृ.18

4.     सिंह, अविनाश कुमार (सम्पा.), इस्पातिका (पत्रिका), अंक-1, वर्ष-2, जनवरी-जून, 2012, पृ.88

5.     रणेंद्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, पाँचवाँ संस्करण, 2016, पृ.62

6.     वही, पृ.16-17

7.     वही, पृ.19

8.     वही, पृ.26

9.     वही, पृ. 72

10.    वही, पृ.58

11.    वही, पृ.65

12.    वही, पृ.26

13.    वही, पृ.38

14.    वही, पृ.39

15.    वही, पृ.29-30

16.    वही, पृ.79

17.    वही, पृ.93

18.    वही, पृ.83-84