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Monday 20 Nov 2017

\'पाँच आँगनों वाला घर’में पारिवारिक विघटन

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। परिवार किसी भी समाज की एक प्राथमिक इकाई है। आदिम समाज से लेकर वर्तमान समाज में परिवार के अस्तित्व एवं महत्त्व को स्वीकार किया गया है। परिवार सामाजिक संगठन की एक मौलिक इकाई है। परिवार शब्द की उत्पत्ति- ''लैटिन भाषा के 'फेमुलस’ शब्द से हुई है। इस फेमुलस शब्द से एक ऐसे समूह का बोध होता है जिसके अन्तर्गत माता-पिता, बच्चे, नौकर और दास आते हैं।‘’1 परिवार के अर्थ के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं है। कुछ समाजशास्त्री परिवार में पति-पत्नी तथा अविवाहित बच्चों को शामिल करने की दलील देते हैं। इसके विपरीत कुछ समाजशास्त्री परिवार में पति-पत्नी, बच्चों एवं दादा-दादी आदि को सम्मिलित करते हैं। परिवार की अनेक विद्वानों ने भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ देकर उसके स्वरूप पर प्रकाश डाला है। समाजशास्त्री मेकाइवर एवं पेज के अनुसार- ''परिवार एक ऐसा समूह है जिसमें यौन सम्बन्ध पाये जाते हैं। जिसका आकार छोटा हो और जो बच्चों का प्रजनन और लालन-पालन करे।‘’2

'पाँच आँगनों वाला घर’ उपन्यास में चित्रित परिवार एक समूह का बोध कराता है जिसके अन्तर्गत माता-पिता, बच्चे ही नहीं, पूरा कुनबा रहता है जो कि तीन पीढिय़ों को एक ही चाहरदीवारी में निभाये हुए है। उपन्यास के प्रारम्भ में ही गोविन्द मिश्र उस परिवार का ऐसा चित्र बनाते हैं- ''राजन.... मुंशी राधेलाल एडवोकेट और श्रीमती शान्तिदेवी का दूसरे नम्बर का लड़का। राजन के दो भाई और एक बहन। उस लम्बे-चौड़े घर में राजन के चचेरे भाई-बहन और उनके परिवार भी रहते थे। खेलकूद के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं होती, घर में ही इतनी भीड़-भाड़ थी।‘’3 ये सगोत्र तथा रक्त सम्बन्ध वाले सदस्य एक साथ रहते ही नहीं, एक साथ खेलते भी हैं। यहाँ जीवन इतना सरल बीतता है कि बचपन से ही युवावस्था जुड़ जाती है। भारत में प्रारम्भ से ही संयुक्त परिवार प्रणाली की प्रधानता रही है, परन्तु पश्चिमी औद्योगीकृत समाजों में एकाकी परिवारों की प्रधानता पाई जाती है। एकाकी परिवार से अभिप्राय ऐसे गृहस्थ समूह से है जिसमें पति-पत्नी तथा उनके अविवाहित बच्चे होते हैं। एकल परिवार औद्योगिक क्रांति की देन है। आज मनुष्य नगरों में वास करने लगा है तथा गाँवों से पलायन हो रहा है। एकल परिवारों को प्रोत्साहन देने में शहरीकरण एक मुख्य कारण है। आज व्यक्ति एकल परिवारों को अधिक महत्त्व दे रहा है तथा उसे समृद्ध कर रहा है। शहरों के अतिरिक्त शहर के निकट बसे गाँवों में भी इस प्रकार के परिवार प्राय: पाये जाते हैं।

संयुक्त परिवार भारतीय समाज की एक प्रमुख विशेषता है इन परिवारों में तीन पीढिय़ों का घनत्व होता है जो कि शोध के लिए नियत गोविन्द मिश्र के उपन्यास के प्रमुख लक्षण हैं। घर की तस्वीर देखें- ''बरगद के पेड़ की तरफ ही घर का मुख्य दरवाजा था। वहाँ से पिछवाड़े तक फैला लम्बा-चौड़ा घर, पाँच आँगनों वाला। कमरों की तो गिनती ही नहीं थी। मुख्य दरवाजे से सटा बैठकखाना था- राजन के पिता का कमरा.... वकालत का दफ़्तर और उनकी बैठकबाजी के लिए भी। बैठकखाने के पीछे घर का सबसे बड़ा आँगन था जिसे गणेश जी वाला आँगन कहते थे। यहाँ मर्दों वाले कार्यक्रम होते-मुशायरा, कवि सम्मेलन, मुजरा वगैरह। छोटी बैठकी हुई थी तो बैठकखाने में ही हो जाती। दूसरे नम्बर पर बेल वाला आँगन था। वह नाम शायद इसलिए पड़ गया कि वहाँ बेल के कई पेड़ थे। इसके बाद काली जी वाला आँगन-यह मुख्यत: बहू-बेटियों का आँगन था, जिसे धार्मिक कार्यों और शादी-ब्याह के लिए भी इस्तेमाल किया जाता। इन मौकों पर वहाँ बड़ी-बड़ी भट्टियाँ खुदतीं। कालीजी वाले आँगन के एक तरफ सदरी दरवाजा था जिसके ऊपर था नौबतखाना। खुशी के मौकों पर शहनाई यहीं से बजती थी। दूसरी तरफ हनुमान जी वाला आँगन था। यहाँ रामलीला, भाँड़ों के नाच वगैरह होते। इसी आँगन में सन्नी बच्चों के साथ खेलते और खेल-खेल में उन्हें हनुमान चालीसा भी रटाते चले जाते-''भूत-पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै...।‘’ सबसे पीछे फाटक के पास जो आँगन था, उसे फटकवा वाला आँगन कहते थे। इस आँगन के एक हिस्से में बग्घी, टमटम, इक्का ढिले रहते। पास ही में छोटी-सी घुड़साल थी।‘’4 इनकी आय, व्यय, निवास स्थान, रसोई, पूजा स्थान आदि समान होता है। परिवार के सभी सदस्य सभी कार्यों में परस्पर सहयोग करते हैं। भारतीय समाज में संयुक्त परिवार अधिक पाये जाते हैं। इसका मूलभूत कारण भारत का कृषि प्रधान देश होना है।

जब परिवर्तन जीवन के सभी क्षेत्रों में हो रहा है तो परिवार उससे अछूता कैसे रह सकता है। समाज की एक इकाई के रूप में परिवार आज परिवर्तन के मध्य है। समाज में व्याप्त संगठन और विघटन का परिवार पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ता है। आज आर्थिक, राजनैतिक, मनोरंजनात्मक, मनोवैज्ञानिक तथा धार्मिक कारक व्यक्ति की अभिवृत्तियों, मूल्यों और व्यवहार को बदलने में महत्त्वपूर्ण योग दे रहे हैं। इसका प्रभाव परिवार पर भी पड़े बिना नहीं रह सकता। यही कारण है कि आज परिवार बदल रहा है।

पारिवारिक विघटन से तात्पर्य परिवार की स्थिति का अशान्तिमय होना है, इससे पारिवारिक एकमत्य का लोप हो जाता है। गिलिन एण्ड गिलिन ने पारिवारिक विघटन की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए निम्न अवस्थाओं का वर्णन किया है- पहला, वैवाहिक पवित्रता की भावना में हृास होता है। दूसरा, पारिवारिक कार्यों का स्थानान्तरण हो गया है। तीसरा, पारिवारिक कार्य में दिन पर दिन कमी आती जा रही है। चौथा, पारिवारिक सम्बन्धों का ढीला पड़ जाना, पुराने आत्मनिर्भर परिवार के सदस्यों के सम्बन्ध घनिष्ठ थे। पाँचवा, संतानोत्पत्ति की अवहेलना से, आज के युग में परिवार संतान की अपेक्षा भौतिक सुख-सुविधाओं की वस्तुओं को अत्यधिक पसन्द करता है और परिवार अस्थाई दशा में पहँुच जाता है। परिवार अपनी सामाजिक आर्थिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से अलग नहीं होते, इस प्रकार के अनेक कारणों से परिवार का हृास यकायक भी नहीं होता, पर उसमें इस प्रकार की क्रिया चलती रहती है। जैसे ''सन्नी, जो समय-समय पर गायब हो जाता था, वह गायब होने वाली अदा के साथ सन्नी की एक लत जुड़ी हुई थी कहीं कोई उम्दा या पुरानी छोटी-मोटी चीज दिखी कि मार दी। ....कोई कहता था कि सन्नी किसी तवाइफ से फंसे हुए हैं, उसके लिए तोहफे ले जाते हैं जब जाते हैं ....वे अपनी सारंगी के पारखियों की तलाश में इधर-उधर मारते थे।‘’5 इस तरह की गतिविधियोंपर जोगेश्वरी को अपनी व अपने घर की इज्जत की फिक्र होती है। यहाँ सन्नी समाज, रीति, विचार, आत्मनिर्भरता सभी से रिक्त है। इसलिए सन्नी के पिता को भी जोगेश्वरी के ताने सुनने पड़ते हैं, ''तोहर दुलार के कारण सनिया निखट्टू होत जात हौं। मेहरारू होत त खींच के राखत। सनिया से कहो कि जहाँ जाकर दस-दस दिन पड़ रहता है वहैं जाके गिरस्थी जमाई लेय।‘’6

जोगेश्वरी पर पूरे घर की व्यवस्था है। घनश्याम, बाँके की गिनती की कमाई है। राधे ही कुछ आर्थिक मदद कर देता है। जिससे ''रुपए-पैसे की तंगई का पहला असर पड़ा राधे के परिवार पर। जिस किस्म के ऊपरी खर्चों के आदी राजन, उसकी माँ और उसके भाई-बहन थे, उसमें हाथ-खिंचाई होने लगी। बाहर तो पहले ही दिखाई देने लगा था-  पहले घर में कुछ-न-कुछ होता रहता था, अब जैसे कसम खा ली गई थी। घर में इस छोर से उस छोर घूमते हुए जोगेश्वरी जैसे बराबर तौलती रहतीं-क्या जरूरी है क्या, गैर-जरूरी, कहाँ कटौती की जा सकती है, कहाँ से कुछ रकम खड़ी हो सकती है?’’7 अब राधेलाल भी आर्थिक परिस्थितयों से दबे जा रहे हैं और एक द्वन्द्व से में रहने लगे हैं। उनको एक तरफ  पत्नी की आस्था पर विस्मय है, दूसरी ओर अपनी लघुता पर संकोच है। राधे शान्ति द्वारा पैर छूने पर भीगी आंखों से कहते हैं, ....कितना विश्वास पति पर ....उस पति पर भी जो सब छीन लेता है, जो पत्नी को आर्थिक सुरक्षा तक नहीं देता। यह द्वंद्व धीरे-धीरे और लोगों की निष्क्रियता को देखते हुए बंटवारे का रूप ले चुका। यह बंटावारा स्वार्थ, आदत, रीतिगत अन्तर, विचार भेद के कारण होता है... दूसरी तरफ, रम्मो को राजन के सिवाय कुछ भी सोच में नहीं आना चाहिए। देखिए राजन सोच रहा है, घोड़ों की और रम्मो तुनक-कर कहती है, ''क्या फायदा बेकार की शान से।‘’8 जब राजन अपने परिवार में सौ-सौ लोगों के खाने की याद करता है, तब रम्मो का तर्क देखें, ''आजकल नहीं चलता यह सब... एक चूल्हा और साथ में रहना। क्या फायदा दबकर, घुट-घुटकर रहने में? क्यों न सब अलग, स्वतन्त्र रहें, जो चाहें खाया-पिया, जो चाहे पहना-ओढ़ा।‘’9 राजन का कानपुर से नागपुर पहुंचने पर तो दम घुटने लगा, लेकिन राजन की भाभी ओमी अम्मा और बड़ी अम्मा की याद पर उसे संभालती थी। रम्मो का अवचेतन घबराया रहने लगा जब से भाभी ने गृहस्थी संभाली। तभी से एक असुरक्षा की भावना थी। उसके साथ अफसरों का घर आना राजन को बुरा लगेगा, यह सोचती थी। ''इसलिए जाल को यहीं काटो, इसी वक्त! रिश्तेदारी के कीड़े को देहरी पर कुचल दो, भीतर दाखिल ही न होने दो।‘’10

उपन्यास में देश के नेहरू के औद्योगीकरण वाले आर्थिक मॉडल पर विचार करते हैं तब राजन खुद सम्मिलित परिवारों के टूटने का कारण आर्थिक ही मानता है- ''पंडित नेहरू देश की परम्परा की कद्र करते थे, पर आधुनिकीकरण उनके लिए सबसे बड़ा मूल्य था अब देखिए कैसे असर फैलता है... कितनी जल्दी गवर्नर, मन्त्रियों की ठाठबाटी स्टाइल शुरू हो गई। वे उस रास्ते चल पड़े जहाँ वे जनता के प्रतिनिधि नहीं, शासक बन गए। अंग्रेजों की जगह तो उन्होंने ली ही थी, वे उन जैसे ही बनने चल पड़े। जनता उनके लिए हेय, या सिर्फ वोट के वक्त याद करने की चीज होती जा रही है। औद्योगीकरण के कारण घरेलू उद्योग-धन्धे खत्म होते जा रहे हैं। एक सम्मिलित परिवार एक जगह रहकर, घरेलू धन्धे से खा-पी रहा था, उसका हर सदस्य अब नौकरी पर आश्रित होता जा रहा है, दूर-दूर बिखर जाएगा, अकेला हो जाएगा। अलगाव बढ़ेगा। कल चचेरे भाइयों में अलग होने की बात थी, आज सगे भाइयों में है, कल कौन जाने बाप-बेटे, माँ-बेटे, पति-पत्नी में ही शुरू हो जाए।‘’... ''परिवार तो एक चीज हुई, असली बात मूल्यों की है। सम्मिलित परिवार तो टूट ही रहे हैं, टूट गए कहिए- अपना परिवार नहीं देखा। वे टूट गए आर्थिक तनावों आर्थिक जरूरतों के कारण... लेकिन उन परिवारों में जो नि:स्वार्थ, बलिदान की भावना थी... इसे तो बचाएँ हम। तुम अपने इस घर में बचाना।‘’11 आर्थिक क्षेत्र में उस समय विघटन उत्पन्न होता है जब परिवार की आर्थिक व्यवस्था अपने सदस्यों की भौतिक आवश्यकताओं की सही ढंग से पूर्ति करने में असमर्थ रहती है। जब लोग मान्यता प्राप्त तरीकों से अपनी भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाते तो परिवार में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है। आर्थिक क्षेत्र में असन्तुलन, सम्पत्ति एवं आय का असमान वितरण बढ़ती हुई निर्धनता एवं बेकारी आदि सम्पूर्ण पारिवारिक जीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं यह स्थिति पारिवारिक विघटन की परिचायक है।

रम्मो का अपनी जेठानी से क्लेश हुआ। शान्ती-अम्मा बीच में आई तो उसे रोकते हुए पूछती है, ''बताइए कितना खर्चा किया है आपने मेरे पति पर... मैं एक-एक पाई चुकाऊँगी। अफसर से ब्याहा, अफसर से ब्याहा... तो हमारा घर भी कोई कंगालों का नहीं है। क्या नहीं है हमारे यहाँ।‘’12 रम्मो जिन्हें स्वयं अपने करीब लाई थी, उनके लिए कुछ भी करती थी, उनके लिए नहीं जो उसे ससुराल में मिले थे। यहाँ तक कि अम्मा के बीमार होने पर उसे मनहूसियत लगती है, ''राजन हक्का-बक्का रह गया अम्मा की बीमारी से मनहूसियत होगी? कोई बीमार हो, अपाहिज हो जाए तो अस्पताल में रहे, घर पर नहीं?’’13 राजन अपने इस परिवार के लिए भैया-भाभी को याद करना तो दूर अम्मा को याद करना भी भूल गया जोकि अब बनारस में हैं। दोस्त से पता हुआ कि उनकी तबियत ठीक नहीं है। राजन आर्थिक तंगी के चलते घर बेचने की सोचने लगता है लेकिन उसकी घर से जुड़ी यादें और अम्मा रुकावट है- ''राजन चिन्ता में पड़ गया-वह अपने हिस्से को बेच देगा, बेच सकेगा, अम्मा के होते हुए?’’ राजन विचार करता है- ''कैसे सबको खींच-खींच इक_ा कर उन्होंने घर बनाया और कैसे उनके सामने ही एक-एक करके सब छोड़े जा रहे हैं- सन्नी गया, राधे गया... मोहन... अब राजन, श्याम भी। क्या फायदा ऐसी नई पढ़ाई का, कमाई का,जिसके लिए घर छोडऩा पड़े।‘’14

एक ओर राजन के घर बेचने की नौबत आ गई दूसरी ओर सम्मिलित परिवार में रस्म अदाइगी रह गई। अब वह मेल-जोल तथा नि:स्वार्थ-बलिदान करना कहाँ? लेखक ने संयुक्त परिवार की इस स्थिति का जो चित्र कुछ घटनाओं को लेकर खींचा है, वह दृष्टव्य है- ''जिस घर में साल में एक-दो शादी-ब्याह जरूर हो जाया करते थे, वहाँ बड़ी अम्मा के जाने के बाद सिर्फ  राजन का ब्याह हुआ। मुंशी जी के चचेरे भाई रमाकान्त के बेटे शैलेश का ब्याह हुआ सो उन्होंने अलग-अलग अपने कोने में कर लिया। शान्ति भी ऐसे हो आई जैसे मौहल्ले-पड़ोस के किसी बुलावे में गई हों। इस घर की चौहद्दी में कभी ऐसा हो सकता था? कुछ महीनों पहले एक बड़ी घटना हुई जिसने सबका जी तोड़कर रख दिया-बाँके भैया का स्वर्गवास! कैसा हाहाकार मच गया था। नइकी तो संभाले न संभले। जैसे भी थे बांके भैया, उनका होना शान्ति के लिए भी आड़ था... और न कोई बीमारी-ईमारी, हार्टफेल और दो मिनट में झक्क। एक-दो बार शान्ति ने समझाया था बांके भैया को-''बहुत हाय-तौबा में न रहा करो, घर-जमीन के लिए अपने शरीर पर तो अत्याचार न करो, घर ही देखना है तो ईंटों के घर को न देख, हाड़ मांस के इस घर को देखो...’’ उन्होंने कुछ भी समझने की जरूरत महसूस न की। बांके भैया को कभी हँसते-खेलते तो देखा ही नहीं, हमेशा भृकुटी ताने, लड़ाई की मुद्रा में जैसे बराबर कमर कसे हुए। धरा रह गया न सब? नइकी बेचारी! भगवान की यह अजीब लीला है कि जो जितना अच्छा, उसको उतने ही दुख। जब से अलग हुए थे बांके, उनके परिवार का खाना-पीना गिरता ही चला गया। बांके भैया की कमाई ही कितनी थी।‘’15

संयुक्त परिवार की यही विशेषता है कि नाकारा भी जीवन निकाल ले जाएं लेकिन अपनी स्वतंत्र सम्पत्ति की प्रेरणा उस परिवार को छुड़ा देती है। राजन संयुक्त परिवार के लाभ-हानि के विषय में सोचता है। राजन के घर में गृह-क्लेश रोज की बात हो गई। रम्मो राजन से अनजान, अजनबी जैसा व्यवहार करने लगी। वह यकायक पूना चली गयी और दो दिन भैया-भाभी के आने पर भभक पड़ी। बात यहाँ तक बढ़ गई कि ''ओह! तो अब यह सिखाकर गई है वह... कि इस उमर में, लड़कों-बच्चों के बड़े होने पर तुम अलग होने, डाइवोर्स का ड्रामा करो! ताकि श्रीमान की दौलत हड़पी जा सके... क्यों? मुझे यह-वह मत समझिए। दौलत कहाँ और कैसे है, कैसे आई है.... हर चीज, एक-एक राज जानती हूँ। मैं चाहूँ तो तुम्हें जेल भिजवा सकती हूँ।‘’16 राजन टूट गया, विवादग्रस्त हो गया। जैसे-तैसे समझौता कर ले गया, किन्तु उनका एक बेटा अमेरिका चला गया और उनके दूसरे बेटे ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया। राजन सदमा बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्हें हार्टअटैक हो गया। राजन अस्पताल में भर्ती थे, तब अमेरिका में रह रहे बन्टू की माँ रम्मो ने उसके पास फोन किया तो उसने कहा- ''तुम आ जाओ बेटा, आओगे तो तुम्हें बताऊँगी। तुम्हारी जरूरत है।‘’ ''मैं आकर क्या करूँगा, ममी ! जो करना है वह डॉक्टरों को।‘’17 बन्टू का यह कथन पारिवारिक विघटन की चरमसीमा को और उसकी व्यैक्तिकता की भावना को भलि-भाँति प्रकट कर रहा है। इसी पारिवारिक विघटन को राजन ताउम्र तिल-तिल घुटकर झेलता रहा और अन्तिम समय में सिर्फ  अकेलाहै।

गोविन्द मिश्र का 'पाँच आँगनों वाला घर’ उपन्यास 1940 ई0 से 1990 ई0 तक के काल-खण्ड को आधार बना कर लिखा गया है। यह तीन पीढिय़ों की कहानी है। यह कहानी वैयक्तिकता के साये में परिवार के सिमटने-उखडऩे को चित्रित करती है। निष्कर्षत: तिवारी के शब्दों में कहें तो ''यह (पाँच आँगनों वाला घर) आधुनिकता के दबाव से क्रमश: भारतीय संयुक्त परिवार के टूटने और संवेदनशीलता के छीजने का अहसास कराने वाला उपन्यास है।‘’18

संदर्भ सूची

1-तोमर, देवेन्द्र पाल सिंह, 'समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तÓ, डिस्कवरी पब्लिकेशिंग हाउस,

नई दिल्ली, पृ0305

2-वही, पृ0 306

3-गोविन्द मिश्र, 'पाँच आँगनों वाला घर’, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पहली

आवृत्ति-2014, पृ005

4- वही, पृ0 09

5-गोविन्द मिश्र, 'पाँच आँगनों वाला घर’, पृ0 19-20

6-वही, पृ0 20

7-वही, पृ0 45

8-वही, पृ080

9-वही, पृ0 80

10-वही, पृ0 97

11-वही, पृ0 94

12-वही, पृ0 105

13-वही, पृ0 111

14-वही, पृ0 79

15-वही, पृ0 113

16-वही, पृ0 147

17-वही, पृ0 216

18-तिवारी, रामचंद्र, 'हिन्दी का गद्य-साहित्य’, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी,

संशोधित तथा परिवर्धित, संस्करण: 2012 ई0, पृ0 242