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Saturday 18 Nov 2017

बंदूकबाज़ की धाय धाय और सेंसरबोर्ड

कार्निवाल सिनेमा में बाबू मोशाय बंदूकबाज़ देखने गया। फिल्म के संदर्भ में यह पहले ही मीडिया की सुर्खियों ने बता दिया था कि यह 18 वर्ष के ऊपर की आयु वर्ग के लिए ही उचित है। कार्निवाल सिनेमा अपने ही विज्ञापन में जिस प्रकार से यह दिखाने का प्रयास करता है कि एक बच्चा जिस पर सिनेमा का प्रभाव इस कदर है कि सत्तर और अस्सी के दशक की फिल्मों के संवाद उसके जीवन का हिस्सा बन चुका है । इसी विज्ञापन में एक महिला द्वारा उसके नाम पूछे जाने पर वो कहता है  नाम-राहुल, पूरा नाम राहुल चटोपाध्याय, बाप का नाम अमित चटोपाध्याय, माँ का नाम रेखा चटोपाध्याय, कुत्ते का नाम टामी बीप... उम्र आठ साल, दो महीने, तीन हफ्ते, तभी उसकी माँ आती है तब वो कहता है कि ये सिनेमा हॉल है तुम्हारे बाप का घर नहीं,जब तक बैठने को कहा न जाएँ तब तक मत बैठना, फिर फेड इन में थप्पड़ की आवाज़। यह विज्ञापन बच्चों पर पड़ रहे सिनेमा के असर का चित्रण करता है। और उनके परिवार द्वारा सिखाये जा रहे नैतिकता के पाठ को भी दर्शाती है ।

बीप की आवाज़ पर गौर करें तो कुत्ते का नाम किसी आदमी के नाम पर रखा और बोला गया था इसी कारण उस पर बीप सेंसरबोर्ड के सिपाहियों द्वारा रखा गया है। बाबू मोशाय बंदूकबाज़ को इन्हीं सिपाहियों के चलते 45 कट्स के साथ एडल्ट प्रमाणपत्र देने की बात कही थी। हिन्दी सिनेमा के विकास और विस्तार के लिहाज से फिल्म के निर्देशक और निमार्ता कुशान नंदी द्वारा इस फैसले को ट्रिब्यूनल में चुनौती देना अच्छा कदम माना जा सकता है । ट्रिब्यूनल ने फिल्म को 8 हिंसा के छोटे और स्वैच्छिक दृश्यों के काँट-छांट के बाद प्रदर्शित करने का फैसला सुनाया। एक ऐतिहासिक सर्वेक्षण करें तो भारत के सिनेमा माध्यम पर नियंत्रण और निगरानी के लिए बने इस ट्रिब्यूनल के फैसले लगभग फिल्मकारों के हित में ही रहे है । कभी-कभी तो ऐसी फिल्मों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगने पर उन नये फिल्मकारों का भविष्य ही अधर में फंस जाता है जिन्हें न जाने कितनी मेहनतों के बाद फिल्मों में काम मिल पाता है। फिल्म ट्रिब्यूनल के ताजा फैसले से खुश बाबूमोशाय की लीड एक्ट्रेस बिदिता बाग अपनी फेसबुक प्रोफाइल के स्टेटस में लिखती है कि एक्टर एट द मर्सी ऑफ सीबीएफ़सी। जी हाँ ऐसे कई नये कलाकार सीबीएफ़सी के फैसलों की भेंट चढ़ जाते है और गुमनामी में जीते हैं। खुद नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी 12 साल के अपने सिने कैरियर में उसी तरह खोये रहते अगर अनुराग कश्यप की फिल्म गैन्ग्स ऑफ वासेपुर सीबीएफ़सी सिपाहियों द्वारा पूर्ण प्रतिबंधित कर दी गयी होती। फिल्म के लिए अनुराग ने काफी मेहनत की और उसका नतीजा आज हम सब के सामने है। फिल्म सेंसर की बात हो और गैन्ग्स ऑफ वासेपुर का जिक्र न हो ऐसा हो नहीं सकता।

बंदूकबाज़ एक ऐसे कांट्रैक्ट किलर की कहानी है जो पैसे के लिए किसी भी भी जान ले सकता है। यही उसका व्यवसाय है। वह महिला नेत्री जिजी (दिव्या दत्ता) के लिए काम करता है। उसका यह धंधा फिल्म में बढ़ते बढ़ते खुद महिला नेत्री को मारने तक पहुँच जाता है। फिल्म में बाबू (नवाज़ुद्दीन) को फुलवा (बिदिता बाग) से हुए प्यार को पेश किया गया है। खुद फुलवा ऐसे लोगों द्वारा रेप की पीडि़ता है जिन्हें मारने का ठेका बाबू को मिला था। फिल्म की पृष्ठभूमि एक ऐसे समाज कि है जहां गोला, बारूद, रेप, हत्या आदि आम है । हम सभी के  इर्द- गिर्द भी यह आम ही है। फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, बिदिता बाग, और दिव्या दत्ता, के अलावा मुरली शर्मा, जतिन गोस्वामी, अनिल जॉर्ज, श्रद्धा दास और भगवान तिवारी जैसे कलाकार बाबू मोशाय के इर्द गिर्द ही घूमते है। जो पर्दे पर बाबू के किरदार को और भी मजबूत करते हैं। छोटी कद काठी, काला चेहरा, सामान्य कपड़ा पहने बाबू हम सबको गैन्ग्स ऑफ वासे के फैजल की याद दिलाता है। गोली भी उसी अंदाज में चलाता है। संवाद भी वैसे ही हैं। बाबू मोशाय फिल्म के ही संवाद -लोग करके भूल जाते हैं लेकिन उसका किया एक दिन उसके सामने जरूर आता है, से समझे तो नवाजुद्दीन की अदाकारी एक बार फिर 5 साल बाद हम सभी और खुद उनके सामने भी आई है।

फिल्म की लोकेशन कमाल की है। गाने पर्याप्त है और सटीक हैं। संवाद और दृश्य भले ही कहीं-कहीं पर अति करते हुए लगते हैं लेकिन ऐसी पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में संस्कारी भी बन जाना कहीं से शोभा नहीं देगा। नवाजुद्दीन और बिदिता के इंटीमेट सीन का अपना लॉजिक है इन्हेंजरूरत से ज्यादा नहीं रखा गया है। फूहड़ता वाली कॉमेडी फिल्मों से तो ठीक ही है। कम से कम दर्शक को फिल्म देखने जाने से पहले ही पता है कि फिल्म में उत्तेजक दृश्य हैं। द्विअर्थी कुछ भी नहीं। सब सटीक। कलाकारों के किरदार में फिट बैठते दृश्य और संवाद इसमें आपको मिल जाएंगे। फिर भी कहीं कहीं पर फिल्म समझ से परे हो जाती है। खासकर उन दृश्यों में जहां एक कांट्रैक्ट किलर द्वारा चलाई गोली मिस हो जाती है। बार-बार गोली लगने पर भी किरदार जीवित रहते हैं। बाबू मोशाय बंदूकबाज़ में मोशाय किस लिए है यह ढूंढ पाना मुश्किल है।

फिल्म को वयस्क विषय के लिहाज से खूब पसंद किया जा रहा है। रक्त को पर्दे पर देखना दुखद होता है। इसीलिए फिल्म को वयस्कों के लिए ही प्रमाणित किया गया। लेकिन इसके साथ ही यहाँ कई बड़े सवाल फिर से सीबीएफसी पर खड़े होते हंै कि बाहुबली जैसी फिल्मों पर दिखाएँ रक्त और गैन्ग्स ऑफ वासेपुर के रक्त में क्या अंतर है? उदाहरण कई और भी हैं लेकिन उन्हे यहाँ पेश करने कि जरूरत अभी मालूम नहीं देती। वयस्क प्रमाण पत्र वाली फिल्म बंदूकबाज़ को नवाजुद्दीन और बिदिता के लिए देखी जानी चाहिए वहीं निर्देशक और निर्माता का फिल्म को लेकर सीबीएफ़सी के फैसले को चुनौती देने के लिए भी हम सभी सिने दर्शकों को बधाई देनी चाहिए। कुशान नंदी हमारे समय के उन फि़ल्मकारों की फेहरिस्त में शामिल हो चुके हैं जो फिल्मों को अभिव्यक्ति का सशक्त जरिया मानते हैं। उन्होंने बंदूकबाज़ के जरिये इसी समाज की सच्चाई को पेश करने की एक कोशिश की है। नए सेंसरबोर्ड अध्यक्ष तक यह संदेश जाना चाहिए कि फिल्मों पर प्रतिबंध अब पुराने जमाने की बात हो गयी है। फिल्म में क्या रहेगा क्या नहीं यह हक अब दर्शकों को दे दिया जाना चाहिए। कभी सेंसरबोर्ड चीफ  विजय आनन्द ने भी कहा था कि भारत में भी पोर्नोग्राफी को खुली छूट इसी आधार में दी जानी चाहिए कि  भारत के इन्टरनेट उपभोक्ताओं में पॉर्न देखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हालांकि उनको इसी कारण इस्तीफा देना पड़ा था।