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Saturday 18 Nov 2017

पहाड़ की शाम

पहाड़ की शाम

वह थकी-हारी औरत है

जो दौड़ी रहती है अंधेरी सुबह से ही

पहाड़ के उबड़-खाबड़ रास्तों पर

ओढे सतरंगी वस्त्र

उसकी बुलंदी को छूती

थकते हुए

परंतु

बिना किसी थकान के

 

वह गूंथती है सपने

परिवार की खुशहाली के

पीठ पर लादे घास, लकड़ी

और दुखों का बोझा भी

साथ-साथ

 

नाचती है वह

नटी की हर ठुमक पर

जोर-जोर से

दिल खोलकर

अपने हर गम को फेंकते हुए

अपने जिस्म से कोसों दूर

 

चुनौतियों को बांधती है

अपने ढाठु की गांठ में

खूब कसकर

पहाड़ की शाम

पहाड़ की औरत को साथ लिए

ढल जाती है

कुछ इस तरह हर रोज

नए सपनों

नई आकांक्षाओं के साथ

अगले दिवस की बाधाओं को

एक नई तसल्ली और मजबूत हौसले संग

अपने कदमों की नोक पर रखते हुए।

 

नोट -ढाठु- हिमाचल के ऊॅंचाई वाले इलाकों की औरतें अपने सिर पर एक छोटे कपड़े को बांधकर रखती हैं। जिसे ढाठु कहा जाता है।

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ईंट मजदूर

वह रचता है हमारे घरों की नींव

जब हम सोते हैं गहरी नींद

वह जागता है अपने तैहड़े

और परिवार की जरुरतों को ध्यान में रखते हुए

हर अंधेरी रात में

सुबह के 2 या 3 बजे

एक छोटी टॉर्च साथ में लिए

या फिर जलाए कुछ लकडिय़ां अपने आस-पास

ईंटों की पंक्ति को समझने के लिए

वह तपता है कड़क और तपती दोपहर में भी

मौसम की मार को देता हुआ खुली चुनौती

 

मिट्टी के बनाती हुई घनाभ पर घनाभ

बढ़ती ईंटों की संख्या

कम्पनी की मोहर सजाए

छूटती रहती है हाथों से थोड़ी थोड़ी देर में

और इसी लय में चुपचाप वह

करता रहता है

परिवार की जरुरतों का हिसाब

 

हर अंधेरी सुबह में हर रोज

ईंट की हर थाप के साथ

 

इस कड़ी मेहनत के संग

वह खाता भी है सब खरा-खरा

हर नए दिन को एन्जॉय करता हुआ

कहता है,'बाबूजी आजकल जिंदगी का क्या भरोसा

जो दिन जीयो खुश होकर जीयो’

 

घर से बहुत दूर परिवार संग

नाचता है वह हर त्यौहार की उमंग में

खूब सारी मस्ती समेटे

मैंने देखा है उसे करीब से

अभावों में घिरे

लेकिन वह जीता है अपना हर दिन

नए उल्लास के साथ

जिन्दगी की हर मुश्किल

और दुखों को छापते हुए

ईंट के सीने पर

तैहड़े की जोरदार धमक के साथ।

 

नोट-

तैहड़ा-ईंटे डालने का सांचा

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तुम्हारा जाना.....

आज उदास है घर

कमरा चुपचाप एकटक देख रहा है सब

कमरे की दीवारों को सिमटते

बिस्तर की एक जैसी रुकी हुई सी सिलवटें

दे रही है उसके न होने की गवाही

दरवाजा देख रहा है

साए को दहलीज लांघते हुए

 

बच्चों के आंसू रुकते ही नहीं

मॉं आज दो महीने की छुट्टी के बाद

लौट चली है घर से कोसों दूर

अपनी ममता को घर के एक कोने में

रखते हुए सहेजकर

एक बार फिर हम सबको अकेला छोड़

मजबूरीवश

खुद को भी करती हुई तन्हा

आज हम सब रोते रहे काफी देर तक

जुदाई की इस बेला को कोसते रहे देर रात

और सुबह तक भी

 

मैं बच्चों को बार-बार गले से लगाता

उन्हें मां और बाप का प्यार देने की कोशिश करता रहा

पर नहीं दे पाया मैं

मॉं का सा अहसास

बाप की कठोरता छलक ही जाती रही गाहे बगाहे

 

छुट्टियों की इस रौनक में

घर रहा खिला-खिला पूर्ण-पूर्ण

पर अब उदास है वह

जैसे पसर गया है सन्नाटा हर कोने में

सब चुप हैं परिवार में

फूल झुक गए हैं

कलियां नहीं चाहती खिलना अब

काफी दिन तक करती रहेगी वह उदास हमारे मन को

वह भी रोती रहेगी चुपचाप अकेले-अकेले

अपने क्वार्टर के किसी कोने में

कई दिनों तक

हम सबसे अपनी उदासी छुपाए

 

बस, अब घर रहेगा कई दिनों तक खामोश

बिखरी रहेंगी चीजें यहां-वहां बेतरतीब

कभी-कभी मॉं भी रोएगी अब

अपनी बहु की याद में जोर-जोर से

उसकी हर अच्छाई को दोहराते हुए बार-बार

मैं बच्चों को सुबह-सुबह स्कूल के लिए तैयार करते हुए

पुकारुंगा तुम्हें फोन पर अंजु

और पूछूंगा आदी, नैंसी और अपने

कपड़ों, टाई, बैल्ट और जुराबों का पता