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Saturday 18 Nov 2017

गोरखपुर की त्रासदी

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एक त्रासदी की सफेद चादर के नीचे

सदा के लिए सो गये बच्चो

मुझ जैसे मरे हुए आदमी का सलाम

जो अन्याय के खिलाफ  खड़ा नहीं हो सकता

वो मरा हुआ ही होता है

तुम्हारे और हमारे बीच अन्तर केवल इतना है

तुम मारे गये हो

हम डर के मारे हुए हैं

नेताओं और उनके भक्तों को

मैं कैसे दे दूं गाली

सबके सब आदमी के ही कुनबे से हैं

कहीं इसी गली-मोहल्ले से निकले हैं

हॉं, धिक्कार दे सकता हूं 

उन बेरहमों को

उन बेशरमों को

जो पांच दिन बाद सज-धज के आयेंगे

पताकाएं प्रशस्ति के पतंगों से आकाश भर देंगे

अपने गुलामों के गुलाम बच्चों में

मिठाईयॉं बांटेंगे

कैमरे के सामने कुछ बच्चों के गाल छुयेंगे

सभा में उपस्थित बन्दर तालियॉं बजायेंगे

 

लेकिन ऐसा नहीं होगा कि गोरखबाबा जाग जायेंगे

हर घर से निकलेगी सारंगी बजती हुई

गूंजेंगे बोल राजा भर्तरी अब नहीं देरी

एक, एक पर तीन, तीन

नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा

बस, जिन माताओं की गोद सूनी हुई है

उन माताओं की गोद में आश्वासनों के फूल डाले जायेंगे

मरे हुए बच्चों के बाप

डबडबाई आंखों से देखेंगे गुलाबी नोट

 

(2)

 

भीड़ तंत्र के षड्यंत्र से भरे गणतांत्रिक शासन में

भ्रष्टाचारी त्रासदी के शिकार शताधिक शिशुओं

क्या कहूं तुम सबको

नमस्ते सदा वत्स ...

या फिर रूग्ण लाल सलाम

हां, मैं बीमार हूं

तभी तो खड़ा न हो सका

इस हालत के गुनाहगारों के खिलाफ

मुझमें वो आवाज भी पैदा न हुई

कि देश को बता पाता

हम तुम्हें शहीद नहीं कह सकते

क्योंकि तुम सब दुश्मन की गोली से नहीं मरे

बल्कि शिकार हुए हो हमारी गिरी हुई मानसिकता के तीर से

वे शिकारी कौन थे

तुम बता नहीं सकते

हम उन्हें पकड़ नहीं सकते

और गरीबी वो अभिशाप है

जो धर्म की गोद में मरना चाहता है

लेकिन विज्ञान है कि जिलाये रखता है

मैं कैसे बताऊं विश्व को

यह शिशु हत्या नहीं

समय के एक यथार्थ की हत्या है

समाज की सोच की हत्या है

देश की दिशा की हत्या है