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Saturday 18 Nov 2017

कुछ छोटी कविताएं

कुछ छोटी कविताएं

(अंतिम छठे संग्रह अरे, अब और नहीं से)

 

स्वीकार

छूँछा जीवन है तो स्वीकारो इसे

इन्कार करके कहाँ जाओगे?

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आगे

बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले

आगे की सुध क्या ले

जब आगे कुछ है ही नहीं ।

न राह, न पगडंडी,

न पेड़, न पहाड़,

न नदी, न नाला

सिर्फ  एक मुठ्ठी पानी का गड्ढा है

जहाँ डुबकी भी नहीं लग सकती।

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हरीश

मेरे घर में एक बेटा है हरीश

विचित्र प्राणी है

घर के हर सदस्य से उतना ही प्रेम करता है

जितना अपनी माँ से ।

इस बार आया तो हमारे सारे कपड़े-लत्ते ठीक कर गयाए

दुबारा आया, अपनी चारपाई घर के किसी सदस्य को दे गया

पता नहीं क्यों?

इतना प्यार ठीक नहीं ।

हमारे न रहने पर कितना खालीपन महसूस करेगा.

सोच.सोच घबराहट होती है..

होती है, तो हो ।

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पूर्ण के बाद

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमे्वावविष्यते

क्या पूर्ण, क्या अपूर्ण

पता नहीं, जब पूर्ण ही बचता है

तो अब हमें क्या करना है?

कुछ नहीं, केवल सोना,

सोना नहीं, सोना । 

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 बच्चे

देश विश्वव्यापी भले हो गया हो

पर बच्चे अपने देश के बच्चे ही हैं आखिरकार

अब जैसे आस्था और अथर्व दादी का स्केच बनाने के बाद

पेंसिल यहीं छोड़ गए ।

उसकी नोक चुभ-चुभकर मुझे उनकी याद दिलाती है

वह जो पीछे लगे इरेजऱ से मिटाई नहीं जा सकती । 

 

भरन

अपना खोखला जीवन कविता-रस से भला कैसे भरेगी?

जब याद है केवल

काम करनेवाली माई से यह खाना बनवाना है, यह नाश्ता

बाज़ार से घर का राशन और सब्ज़ी क्या-क्या मँगवाना है?

सुबह केवल अखबार पढऩा है, वह भी अधूरा

कविताई कहाँ से फूटेंगी?

केवल मन की भड़ास निकालने के लिए कलम घसीटती रहो

फिर थककर सो जाओ

नींद भी पूरी नहीं आती ।

क्या बनेगी कविता? कभी नहीं, कभी नहीं ।

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 काफूर

 

सुबह कविता काफूर हो गई

याद आया, पोस्ट आफिस में कितना पैसा है,

बैंक में कितना, घर में कितना?

हारी-बीमारी में कैसे, कौन पैसे निकालेगा?

यह भी कोई कविता का विषय हुआ?

अपने को सारा दिन धिक्कारते रहें

और टीवी के प्रोग्राम देखते रहें.

ऐसे जीवन का क्या करें? निरर्थक !

सार्थक अब कभी कुछ हो नहीं सकता।

फिर भला कविता क्या देगी मेरा साथ!

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 इस साल

सुना है, इस साल सब सालों से अधिक ठंड पड़ेगी

जितनी पहले कभी नहीं पड़ी ।

दिसम्बर में जब यह हाल है.

हाथ-पैर ठंड से सिकुड़ रहे हैं.

जनवरी में क्या होगा? मालूम नहीं

मन तो कब का जम चुकाए

 

अब तन पर क्या असर होगा?

शरीर पर ऊनी कपड़े, टोपा, मोज़ा

बी कैप चाहे जितना लादो

कुछ असर नहीं होनेवाला

जब कुछ नहीं तो रूम-हीटर जलाओ ।

कमरा गरम करने का

गऱीब देश में और कोई उपाय नहीं.

लकड़ी जलाने पर पाबन्दी है

और वह मिलती भी कहाँ है !

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 तुरंग

यह कैसा मन का तुरंग है?

एक साथ ही मौरावाँ का ज़मीदारी इलाका

दुबई की जगमगाती शाम

और रामगढ के आडू, खूबानी, प्लम याद आते हैं

भूलते ही नहीं देर तक

आँखों के सामने से हटते ही नहीं दृश्य

सब सजीव साकार होकर नाचने लगते हैं

क्या करूँ इस मन का?