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Sunday 19 Nov 2017

अंतिम स्तंभ

तूयह बात किसी को मत बताना....वह मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर चिरौरी सी कर रही थी...मेरी इतनी बात मान लेना।

मेरा मुँह उतर गया...क्या रे तू तो मेरा दिमाग ही खराब कर रही है... मैं तो तेरी दी ये साड़ी पहनकर दुनिया भर मे मटकती फिरती कि देखो देखो सब लोग...। मेरी प्यारी सहेली ने कितनी सुंदर साड़ी दी है। और तू कह रही है कि किसी को मत बताना।

तू मेरा नाम मत बताना बस।

वाह , ये तो कोई भी पूछेगा...इतनी सुंदर साड़ी किस सहेली ने दी। किस खुशी में दी !

तू तो जानती है रे कितनी मुसीबत हो जायगी मेरी।

जनम भर मुसीबत ही रही तेरी तो...

मेरा मन सच में खराब हो गया। असल में मुझे याद आ गया...पैंतीस बरस पहले भी इसने मुझे साड़ी दी थी। ऐसे ही छुपाकर। ऐसे ही कहा था...किसी को मत बताना। अवसर था इसकी पहली संतान, पुत्र, के जन्म का। सास ससुर, जेठ जेठानी, देवर देवरानी, ढेर सारे रिश्तेदारों अतिथियों से भरा घर। पूरे घर में आनंदोत्सव की धूम। वह मुझे अपने कमरे के एकांत में खींचकर ले गई थी। अपनी अलमारी खोल एक साड़ी निकाल कर मुझे पकड़ाते हुए बोली थी...जल्दी से इसे अपने पर्स के भीतर डाल ले। अपने पैसे से खरीद कर लाई हूँ। गुलाबी रंग तुझ पर बहुत खिलता है। जरूर पहनना इसे।

तेरे पास पैसा ही कितना बचता है। सारी तनखा तो तू अपनी सासूमाँ को धरा देती है। अगर साड़ी देने का इतना ही मन था तो आज तो तोहफे में तुझे ढेरों साडिय़ाँ मिली हैं। उन्ही में से कोई मुझे दे देती।

वे सब साडिय़ां, तोहफे तो सासूमाँ को मिले हैं।

बेटा तेरा हुआ है। लोगों ने तोहफे तुझे दिये हैं।

यह तो शिष्टाचार है। घर सासूमाँ का है। इतने लोगों का मानदान उन्हें ही निपटाना है।

और आज !

 आज गृहप्रवेश का शुभ अवसर है। उसी बेटे ने बनवाया है शानदार मकान। मकान क्या है, शानदार शाही बंगला है। जाने कहाँ कहाँ से ढूंढ ढूंढ कर लाया है एक से एक बेशकीमती साजो सामान। भीतर से बाहर, हर ओर जगमगाते टाइल्स वाले फर्श। दमकती दीवारें। सामने हाते में रंग बिरंगे फूलों से महकता बगीचा। पोर्टिको में खड़ी चमचमाती कार। बाजू में दो दमदार दुपहिया वाहन। दोनों पति पत्नी के। रौबदार  कुत्ता। वैभव ही वैभव।

और मुझे याद आ रहा है उसका वह छोटा सा घर। ससुराल का संयुक्त परिवार वाला घर छूटने के बाद पति की नौकरी में जब वह घर बसाने आई थी, तो उसे यही घर मिला था। दो छोटे छोटे कमरे ,एक किचन। छोटा सा बरामदा। उसी से लगा निहायत छोटा सा बाथरूम। बर्तन माँजने की जगह नहीं। न ही कपड़े सुखाने की। वे दिन हम सभी सहेलियों के बड़ी भाग दौड़ भरी जिंदगी के दिन थे। अपनी गृहस्थी से किसी तरह समय निकालकर दो चार बार गई थी मैं उसके घर। एकदम अकबका जाती थी। इतने बड़े घर की लड़की, कैसे रहती है इस दड़बे जैसे छोटे से फ्लैट में ! मगर वह खुश नजर आती। तड़के सुबह से रात गए फुरसत ही नहीं उसे तो। मुँह अँधरे ही अपने नित्यकर्म से निपट परम श्रद्धा से अपनी छोटी सी पूजा समाप्त करती। फिर नाश्ता तैयार करना, चाय बनाना , बच्चों को स्कूल के लिये तैयार करना। पति की तैयारी में मदद करना, सबके बैग में टिफिन रखना। सबसे अंत में अपने पर्स में टिफिन डाल मामूली सी साड़ी लपेट  स्कूल भागना। शाम ढेर सारी कापियों  एवं सब्जी भाजी के थैलों से लदी फंदी जल्दी जल्दी घर लौटना। पति बच्चे सब उसका ही इंतजार करते। उसकी छाती खुशी से भर जाती। बच्चों को छाती से लगा चट से काम में जुट जाती। चाय नाश्ता खाना। बीच बीच में बर्तन साफ  करना। तिस पर सबकी अलग अलग फरमाइशें। सब की फरमाइशें पूरी करती सुख सागर में मगन। ऐसे में कभी कोई सहेली , कोई रिश्तेदार, आ जायें तो क्या पूछना ! पति उसके भारी मजाकिया। छका डालते अपने मजाकों से सब को। नहले पर दहले भी पड़ते उन पर। वह देख देख कर विभोर होती। गृहस्थी का स्वर्गिक सुख। सुखों से भरे दिन बीतते गए। बच्चे बड़े होते गए। स्कूल कॉलेज नौकरी चाकरी काम धंधे शादीब्याह निपटते गए। नाती पोते भी आते गए। व्यस्तताओं के इस दौर में हमारा संपर्क लंबे अरसे तक नहीं हो पाया। बरसों बाद उसे अपने ही शहर में , अपने ही दरवाजे में देखकर मेरी तो चीख निकल गई। भरपूर गले मिलकर हम रो लिये। आँसू पोंछकर मैं पूछने लगी...कैसे आ गई तू अचानक यहाँ ?

मैं तो पिछले कई महीनों से यहाँ हूँ। तेरा घर नहीं ढूंढ पा रही थी।

मेरा घर नहीं ढूंढ पा रही थी ! तेरा तो बचपन ही इन्हीं गलियों में बीता है। इसी सामनेवाले घर में तो रहते थे तुम लोग।

वह घर तो मेरे नानाजी का था न। बाद में पिताजी की नौकरी के साथ जगह बदलते रहे। नानाजी की मृत्यु के बाद यह घर बेच दिया गया। हमारा यहाँ आना भी छूट गया। अब तो पूरी गली बदल गई है। बिल्डिंगे ही बिल्डिंगे नजर आती हैं। पूरा शहर ही बदल गया है। मुझे तो अपनी गली ही पकड़ में नहीं आ रही थी। एक बुजुर्ग सज्जन से तेरे पिताजी का नाम लेकर पूछा तो वे बेचारे तेरे दरवाजे तक पहुँचा गये।  यह भी बता गये कि यह घर तो एक अरसे से सूना पड़ा था अब उनकी लड़की आकर रहने लगी है। अच्छा किया जो पति का साथ छूटने के बाद यहाँ आ गईं। पिता के उजाड़ सूने घर में दिया जला दिया तूने तो। मगर यहाँ पुरानी यादें तो सताती होंगी।

खूब। मगर तू बता रही थी कि तू पिछले कई महीने से यहाँ है। कहाँ ठहरी है ?

खैरागढ़ रोड में। एक फ्लैट किराये पर लिया है बेटे ने। अब उसी तरफ मकान भी बनवा रहा है।

मकान बनवा रहा है इस शहर में। क्यों ?

बहू यहीं शिक्षाकर्मी हो गई है।

और बेटा ?

बेटे का काम तो भागमभाग का है। बहू यहीं रहेगी। मैं तो आता जाता रहूंगा, सोचकर यहीं मकान बनवा रहा हैं।

करता क्या है लड़का ?

कंप्यूटर से संबंधित कुछ काम करता है। मैं आजकल के ये कामधंधे ठीक से समझती नहीं। महीने में पच्चीस दिन तो दौरे में रहता है। घर आता है तो इतना थका रहता है कि मुझसे तो दो बोल भी नहीं बतिया पाता। अब मकान बनाने में भिड़ गया है तो और दम मारने की फुरसत नही।।

फिर वह मेरे घर अक्सर ही आने लगी। हम बातें करते रहते। बचपन की, कॉलेज के दिनों की , अपनी अपनी गृहस्थी की। उसके पति अवकाश प्राप्ति के बाद ही सिधार गए थे। बताने लगी...कह गए थे कि उनके भविष्य निधि वगैरह का पैसा दोनों बेटियों में बांट दिया जाय। मगर लड़के ने उन पैसों से मकान के लिये प्लॅाट खरीद लिया। कह दिया...बहनों को बाद में कमाकर दे देगा सारा पैसा। युद्ध स्तर पर चल रहा है मकान का काम। सारा पैसा उसी में झोंक रहा है। मुझसे स्पष्ट कह दिया , घर का खर्च तो अभी तुम्हें ही चलाना है माँ। वह नहीं कहता तो भी तो मैं करती ही थी। अपनी खुशी से। महीने भर का राशन, फल सब्जियाँ, बच्चों की फरमाइशें। अभी तो पूरी पेंशन इसी सब में जा रही है।

और बहू का पैसा ?

बाप रे...मैं उन पैसों के बारे में मुँह नहीं खोल सकती। जाने क्या सोचकर बेटे ने जमीन का प्लॅाट भी उसी के नाम लिया है। सोचा होगा कुछ।

और मैं गृहप्रवेश पर उसके घर गई तो दंग रह गई। यह तो राजा महाराजाओं का शाही बंगला लगता है। आखिर इतना पैसा इसके पास आया कहाँ से !

मगर वह गदगद थी....बच्चा मेरा जनम भर छोटे से दड़बे में रहा है न। सो अपने सपनो का महल बनाया है। मेरे लिये इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है। आज मेरा बहुत मन हो रहा है कि तुझे तेरी पसंद की साड़ी पहनाऊं।

मैंने फिर वही बात कही...तेरा इतना ही मन है तो जो इतनी साडिय़ाँ तोहफे में आई हैं, मै उन्ही में से एक पसंद कर लेती हूँ।

वह सब तो बहू को तोहफे में मिली हैं। घर बहू का है। मैं तुझे अपनी तरफ से देना चाहती हूँ। अपने पैसों से।

अगली शाम वह मुझे जिद कर दुकान ले गई। उसका मन रखने के लिये मैंने एक साड़ी पसंद कर ली। अब वह कहने लगी...किसी को बताना मत।

उसकी इस बात से मेरा मन खराब हो गया। इधर जब से वह यहाँ आई थी, उसकी स्थिति देखकर मेरा मन खराब ही हो जाता था। उसका घर मेरे घर से काफी दूर था। उस तरफ  रिक्शा या कोई सवारी मिलती ही न थी। घर में दो दुपहिया वाहन और एक कार थी। मगर वह मेरे घर पैदल ही आती। पोते पोती और बहू के स्कूल से लौटने के बाद। उसकी ओपन हार्ट सर्जरी हो चुकी थी। बुढ़ापे पर पहुँचा जर्जर शरीर। मेरे घर पहुँचते ही पस्त पड़ जाती। मेरे घर में बैठे बैठे घंटों हो जाते, न कोई उसे लेने आता न खोज खबर लेता। बेटा घर में हो तब भी नहीं। उल्टे माँ को व्यंग्य करता...तुम ही दौड़़ दौड़ कर सहेली के घर जाती हो। तुम्हारी सहेली तो कभी दर्शन ही नहीं देती।

मुझे सच में उसके घर जाना सुखद न लगता। मेरे जाते ही पोते पोती अपना वीडीयो गेम छोड़कर आकर जम जाते दादी के कमरे में। कान लगाये सुनते रहते हमारी बातें। बच्चों की आँखों में कहीं बाल सुलभ मासूम भाव नहीं। अजीब उपेक्षा और हिकारत भरा भाव होता। दादी के कंधे पर चढ़ रहे हैं..दादी चलो हमको होमवर्क कराओ। दादी की हिम्मत नहीं कि झिड़क सके....जाओ बाहर खेलो। उनके शातिरपने का किस्सा भी सुन चुकी हूँ मैं।

कुछ दिन पहले सहेली की छोटी बेटी की लड़की हुई थी। मेरे घर आई तो बोली...बच्ची की छ_ी में जाना है। छोटी सी सोने की चेन देने का मन है। किसी अच्छे ज्वेलर की दुकान से दिलवा दे। मैं उसे अपने परिचित ज्वेलर की दुकान में ले गई। उसने एक चेन पसंद की। मगर जैसा लॉकेट वह चाहती थी, वैसा दुकान में था नहीं। दुकानदार ने कहा , चार दिन में वह वैसा लॉकेट बनवा देगा।

चार दिन बाद वह दुकान में गई। अकेले ही। लॉकेट लिया। घर लौटी। बेटा बहू बच्चे सामने हाते में ही कुर्सियाँ डाले बैठे थे। बेटा बोला...कहाँ गई थी माँ ?

उसने मेरा नाम बता दिया।

दस वर्षीय पोता आँखें तरेर कर बोला...इतना झूठ क्यों बोलती हो दादी। तुम तो ज्वेलर की दुकान से लॉकेट लेकर आ रही हो।

सहेली का चेहरा फक् पड़ गया....कैसे कह रहा है तू ये ?

मैं गया था न तुम्हारे पीछे पीछे। जब तुम लॉकेट पसंद कर रही थीं, मैं तुम्हारे ही तो पीछे बैठा था सोफे पर।

सारा किस्सा सुनकर मैं अवाक् रह गई....उस लड़के को यह कैसे पता चला कि तू ज्चेलर की दुकान जा रही है ?

मैं मोबाइल में ज्वेलर से पूछ रही थी, क्या लॉकेट बनकर आ गया। लड़के ने सुन लिया होगा। उसने माँ को बताया होगा। माँ ने बेटे को मेरे पीछे लगा दिया।

यह मोबाइल का किस्सा भी अजीब है। वह अपने जमाने की अच्छी पढ़ी लिखी अध्यापिका, मगर अब जैसे एकदम पिछड़ी हुई, मूर्ख गंवार। मोबाइल इस्तेमाल करना तक नहीं आता था उसे। जब मैं उससे कहूँ...तू इतनी दूर से मेरे घर आती है पैदल , तो मुझे फोन कर दिया कर, ताकि मैं घर पर ही रहूँ। तो बोली मुझे तो फोन करना ही नहीं आता। बड़ी बेटी अपना पुराना मोबाइल छोड़ गई है , जिससे मैं किसी का फोन आये तो बात कर लेती हूँ , बस। फोन करना उसे किसी ने नहीं सिखाया ,न बेटे ने , न बेटी ने। न उन नाती पोतों ने जिनकी मोबाइल पर महारत देख देखकर वह चमत्कृत होती रहती है।

मैंने उसे फोन करना, रिचार्ज करना सब सिखा दिया। वह गदगद होने लगी- तूने मुझ पर बड़ी कृपा की। अब मैं खुद भी अपनी बेटियों से बात कर सकती हूँ

अब वह जब भी फोन करे पोता पोती कहीं भी हों आकर डट जाएं।

उसके पोता पोती के सामने तो बात करना भी मुश्किल सो मैं ऐसे समय उसके घर जाती , जब बच्चे बहू सब स्कूल में हों। शहर से दूर उस एकान्त शाही बंगले में वह अकेली और उनका भयानक कुत्ता। फाटक पर मुझे देखते ही भौंकना शुरू कर दे। वह पगली सी फाटक पर आये और मुझे अंक में भरकर भीतर ले जाये। मैं कहती शांति से बैठकर गपशप कर मगर वह पगलाई सी जल्दी जल्दी नाश्ता बनाने लगती...हलवा , पकौड़े , चीले, जो सूझता वही। फिर निहोरा करने लगती...खा न रे गरम गरम। देख मैं नाश्ता बनाना भूली तो नहीं हूँ। चाय नाश्ता खत्म होते ही फौरन सारे बर्तन माँज धोकर किचन में पूर्ववत सजाकर अपार संतुष्टि से बैठ जाती। मेरा मन और खराब होने लगता। याद आ जाता। ठीक ऐसा ही वह तब भी करती थी, जब अपनी सासूमाँ के साथ रहती थी। हम उससे मिलने गये और अगर सासूमाँ घर में न हों तो उसकी चपलता देखते ही बनती थी। फटाफट नाश्ता तैयार कर लेती। जल्दी जल्दी खाने के लिये चिरौरी करने लगती। खाना खत्म होते ही बर्तन माँज धोकर सजा कर रख देती। तब सासूमाँ का आतंकथा। अब बहू का। तब ननद देवर की जासूसी अब पोते पोती की। आतंक से भीतर ही भीतर आक्रंात। मगर उन्ही लोगों की सेवा में तत्पर। मगन।

अजब समानता दिखती मुझे पैंतीस साल पहले देखी उस सास में और धड़ल्ले से बाईक दौड़ाती इस आधुनिक बहू में। सास का चेहरा हमेशा चढ़ा ही दिखता, यह हमेशा मिमियाती ही दिखती। अब बहू का चेहरा हमेशा चढ़ा ही दिखता। यह मिमियाती ही दिखती।

सब कुछ जानते समझते हुए भी इधर शायद मुझसे ही कुछ बेवकूफी हो गई।

हुआ यह कि मेरे घर अचानक हमारी कुछ पुरानी सहेलियाँ आ गईं। मैंने उसे फोन किया कि तू मिलने आ सकती है क्या ! वह एकदम तड़प गई...घर में कोई है नहीं। बहू और बच्चे स्कूल में। बेटा दौरे पर। घर सूना छोड़कर कैसे आऊँ ! मैं सहेलियों को लेकर उसके घर ही पहुँच गई। हमें देखते ही वह मारे खुशी के बेहाल। खूब गले मिलना रोना धोना हुआ। सबको अपने कमरे में बैठा वह दौड़ी किचन की ओर। सहेलियाँ चिल्लाईं...बैठ न रे। बोल बतिया। नाश्ता बनाने में समय बर्बाद मत कर। कितनी मुश्किल से तो हम लोग आ पाये हैं। वह बैठ गईं। ढाई बजते बजते बच्चे आ  गए। वह बच्चों को खाना देने किचन दौड़ी। हम आपस में बतियाने लगे। काफी देर हो गईं। हारकर मैं किचन में गई। देखा, उसने बच्चों के लिये ताजा भात बनाया था और अब रोटियाँ सेंक रही थी। नवाब बच्चे डिब्बे में रखी सुबह की रोटी नहीं खा सकते थे। सहेलियों को देखकर और चढ़ गये...दादी ये कैसी रोटियाँ दे रही हो । फूली फूली दो। मेरे मुँह से निकल गया...ताजी रोटियाँ हैं, चुपचाप खाओ। उसने फौरन मेरे मुँह पर हाथ रख दिया ओर बच्चों को पुचकारने लगी...लो, आज दादी को माफ कर दो। कर दोगे न !

बच्चों को खिलाकर जैसे ही उसने चाय का पानी चूल्हे पर चढ़ाया, मैंने मना कर दिया... सहेलियाँ जल्दी मचा रही हैं, अब चाय बनाने में समय बर्बाद मत कर। मन मारकर वह सहेलियों के बीच आकर बैठ गई। बातचीत में अब वह रस नहीं आ रहा था। मन ही मन सबको कुछ कचोट रहा था। सहेलियों को उसकी स्थिति  और उसे सहेलियों का ठीक से स्वागत न कर पाने की विवशता। तिसपर दोनों शातिर जासूस हमारे ही बीच आकर खड़े हो गये...दादी मेरा रैकेट कहाँ है। मेरा कलर बाक्स कहाँ है। तभी बहू भी आ गई। तीखी नजरों से  सास के कमरे को देखती बाथरूम की ओर चली गई। वहाँ से लौटी तो उसके ट्यूशन वाले लड़के आ गये। ट्यूशन पढ़ाना यानी पैसे बनाना। सो लड़कों को देखते ही वह सामने बैठक़ में ही पढ़ाने बैठ गई। सहेली की स्थिति अतिथियों के बीच अत्यंत दयनीय। आती हूँ , कहकर गई और शायद बहू से चिरौरी की कि मेरी कुछ सहेलियाँ आ गई हैं , कुछ चाय नाश्ता बना दो। बहू तमतमाई हुई किचन की ओर जाती दिखी। काफी देर हो गई। मगर न चाय आई न नाश्ता। वह इतनी देर से सहेलियों को चाय नाश्ते के लिये रोकी हुई थी। हारकर किचन की ओर गई। उसके पीछे मैं भी। बहू ने एक भारी भरकम भगौने में कनस्तर का सारा बेसन उड़ेलकर घोल बना लिया था और तेवर में तनी धड़ाधड़ पकौड़े छाने जा रही थी। बड़ी सी परात में पकौड़ों का पहाड़ लगा हुआ था।

दुख और क्षेाभ में भरी सहेली कुछ पल हतवाक् खड़ी देखती खड़ी रही। आँखों में पानी उतर आया। आँखें पोंछकर प्लेटों में पकौड़े डाले। चटनी निकाली। ले जाकर सहेलियों को परोसा और हाथ जोड़कर आग्रह किया...यही स्वागत कर पा रही हूँ तुम लोगों का। फिर किचन में जाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना की...कृपा करके अब बनाना बंद करो। माफी चाहती हूँ। मैंने तुम्हें डिस्टर्व किया।

सहेलियाँ तो दुखी मन से उसकी चर्चा करते शाम को चली गईं अपने अपने घर। पर मैं परेशान ही रही। क्या फोन करके पूछूं उसकी हालत। मगर अगली शाम को वह खुद आ गई मेरे घर। वैसे ही जर्जर शरीर ढोते। हॉफते हॉफते । बोली...बच्चे स्कूल से आ गये, बहू भी। तब आ पाई हूँ। चाय पिला।

मैंने जल्दी से चाय बनाई। नाश्ता बनाने के लिये चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ाई कि वह बोली...बनाना छोड़। घर में कुछ हो तो वही दे दे।

मुझे संकोच हो आया। बोली...सबेरे मेथी के पराठे बनाई थी। जल्दी काम निपटाने के चक्कर में आखिरी लोईयों को मसलकर दो मोटे मोटे पराठे बना दी थी। वही हैं। तू दो मिनट रुक न। मैं बढिय़ा से कुछ बनाती हूँ।

एकदम अधीर सी वह कहने लगी...मुझे मेथी के मोटे पराठे ही अच्छे लगते हैं। तू दे तो सही।

उसकी बेताबी देख मैंने वही मोटे मोटे पराठे परोस दिये। चटनी भी। वह धड़ल्ले से खाने लगी। खाकर चाय पीने लगी तो मैंने पूछा...तू भूखी थी क्या ?

उसकी आँख में पानी उतर आया। बोली...हाँ

हो क्या गया ?

उसका गला भर आया। कुछ रुककर बोली...कांड ही हो गया था। मेरे हाथ जोड़कर माफी माँगने के बाद बहू अपने कमरे में जाकर मुँह लपेटकर औधे मुँह पलंग पर पड़ गई। मैंने जाकर चौका समेटा। बचे हुए ढेर सारे घोल में से कुछ फ्रिज में रखा। बाकी कामवाली बाई को दे दिया। पकौड़ों में से भी कुछ रखा बाकी कामवाली बाई को दे दिया। रात का खाना बनाकर बच्चों को खिलाया। उसे खाने के लिये निहोरा करने गई ,तो एकदम भड़क गई....मुझे चैन से जीने देना है कि नहीं। नम्रता का आवरण ओढ़े मुझे टार्चर करती रहती है धूर्त बुढिय़ा।

मैं भी पगला गई...तुम चाहती हो कि मैं मर जाऊँ। मौत आयेगी तभी न मरूंगी। अपनी दयनीय विवशता पर मैं रोती जाऊंँ और लड़ती जाऊँ। वह भी रोती जाये और लड़ती जाये।  उसका मुख्य आरोप था कि मैं पाखंडी हूँ। अपने को श्रेष्ठ समझती हूँ और उसे हमेशा नीचा दिखाने के चक्कर में रहती हूँ। दुख से मेरा कलेजा फटा जा रहा था। मैं भी अपने कमरे मे जाकर बिस्तर में रोती पड़ी रही। रात भर नींद नहीं आई। मुझसे कहाँ गलती होती है, यही समझ में न आये। आधी रात के करीब बेटा आया। सीधे अपने कमरे में गया। मैं सहमी सटकी आहट लेती रही....क्या खाना परोसने जाऊँ ! मगर कुछ देर बाद बेटा खुद कमरे में आ गया। बोला...माँ तुम लोग मुझे जीने दोगी कि नहीं ! मैं तुम्हे कितनी बार कह चुका हूँ...उसमें सहनशक्ति नहीं है। उसे डिस्टर्व मत किया करो। वह भूखी प्यासी स्कूल से आई कि लड़के चले आये। किसी तरह लड़कों को पढ़ा रही थी कि तुमने अपनी सहेलियों के लिये नाश्ता बनाने का फरमान सुना दिया। माँ आखिर तुम चाहती क्या हो ! तुम हमको छोड़कर तो रह नहीं सकती। तुम खुद जानती हो। तुम समय से पिछड़ चुकी हो। तुम्हें तो एटीएम से पैसा निकालना तक नहीं आता।

तुझे एटीएम से पैसा निकालना नहीं आता ...मैं हैरान हो गई।

मैं कभी गई ही नहीं। तेरे जीजाजी के बाद से बैंक वैगरह के सारे कागजात बेटे के पास ही रहते हैं। मुझसे सिर्फ दस्तखत लेता रहा हैं। एटीएम से पैसा निकालकर वही देता रहा है। वह न हो तो बहू ला देती हे।

तुझे पता है वे कितना निकालते हैं। तुझे कितनी पेंशन मिलती है।

वे मेरे हाथ में वही रकम थमा देते हैं , जो मुझे शुरू में मिली थी।

मैं सिर पकड़कर बैठ गई। बोली....वह सब मैं तुझे सिखा दूं। मगर यह बता, क्या तू इनको छोड़कर कहीं अलग सच में नहीें रह सकती।

फायदा क्या है। यहाँ मैं बेटे की सूरत तो देख सकती हूँ। पोते पोती से बोल बतिया तो लेती हूँ। मैं जानती हूँ। ये लोग मुझे मूर्ख, गंवार और अवांछित प्राणी समझकर अपमानित करते रहते हैं। कुत्ता भी इनका अपना है, दुलारा है। मगर मैं नहीं। मगर मैं क्या करूँ। मुझे इनके लिये ही प्रेम उमड़ता है। फिर बीच बीच में बेटियाँ आ जाती हैं। दामाद और बच्चे भी। मेरी छाती भर आती है। बेहद सुख लगता है। कभी देवर, जेठ, भतीजे, भतीजी वैगरह भी आ जाते हैं। मेरे पाँव पाँव से नहीं लगते। दौड़ दौड़ कर सबकी आवाभगत करती हूँ। पास के पैसे खतम हों तो चुपचाप दुकान से उधार ले आती हूँ। बहू अपने मायके वालों के अतिरिक्त किसी का आना पसंद नहीं करती। कई बार अपने कमरे से बाहर भी नहीं निकलती। मगर ये लोग बहुत समझदार हैं। उसके कमरे में जाकर खुद बोल बतिया लेते हैं। बेटियाँ तो अक्सर भाभी के लिये तोहफे लेकर आती हैं। भरे पूरे मायके में आने से उनका भी तो ससुराल में मान बढ़ता है। इन्हीं सबसे इस परिवार की प्रतिष्ठा बनी हुई है। बहू को तो परिवार की प्रतिष्ठा की समझ ही नहीं है। शायद आजकल की अधिकतर युवतियों को ही नहीं है। अपना पति, अपने बच्चे, अपनी शान शौकत से भरी जिंदगी, अपना अधिकार, अपनी सत्ता। इन सब के लिये चाहिये पैसा। जैसे बटोर सको बटोरो। इसी में चौंधयाई हुई हैं। प्रतिष्ठा की फिक्र तो हम जैसों को होती है। सच तो यह है, मुझे जितना प्रेम अपने बेटे बेटी, नाती पोते से है, उतना ही परिवार की प्रतिष्ठा से है। बल्कि कुछ ज्यादा ही। अपने जीतेजी तो मैं इस प्रतिष्ठा को बचाये ही रखूंगी।

उसकी आँखों में पानी छलछला आया था....जाने मेरी मौत के बाद इस परिवार की प्रतिष्ठा का क्या होगा।

परिवार की प्रतिष्ठा ! .अच्छे से जानती हूँ , यह तो उसकी घुट्टी में रही है। याद आया , कॉलेज के दूसरे साल में थी कि पड़ोस के एक लड़के से प्रेम कर बैठी थी। लड़का एम. ए. का छात्र था। यह कुछ कुछ पूछने उसके पास जाती थी। भीतर ही भीतर प्रेम का सागर हिलोरे ले रहा था, मगर बातें हो पाती सिर्फ  पढ़ाई की। मुझसे चिरौरी करने लगी....तू उससे पूछ न, क्या वह मुझे चाहता है। लड़का पहले ही मुझे अपने जज्बात बता चुका था। बोली...अगर वह हाँ में जवाब दे तो क्या तू उससे शादी कर सकेगी ! वह एकदम खामोश हो गई। फिर बोली...मैं ऐसा नहीं कर सकती। वह दूसरी बिरादरी का है। बाबूजी को बहुत दुख होगा। समाज में हमारे परिवार की बदनामी होगी। उसकी आँखें छलछलाने लगी थीं....मै इस दारुण दुख को चुपचाप पी लूंगी रे मगर परिवार की प्रतिष्ठा कलंकित नहीं कर सकती।

 और आज !

आज भी उसकी आँखों में पानी छलछला आया था....जाने मेरी मौत के बाद इस परिवार की प्रतिष्ठा का क्या होगा !

विगलित नेत्रों से देखती रह गई मैं , परिवार की प्रतिष्ठा का दुर्भर बोझ उठाये उस जर्जर अंतिम स्तंभ को।