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Tuesday 21 Nov 2017

आधुनिक दुनिया में विचारधारा का विकास

विचारधारा विचारों का विज्ञान है। 'विचारधारा’ शब्द एवं इसकी परिभाषा फ्रांसीसी विद्वान देस्तत द त्रेसी के नाम से जुड़ी है जिन्होंने सबसे पहले यह कहा था कि सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों का संसार ज्ञान के अपने पृथक विभाग को निर्मित करता है जो कि स्वयं के तर्क का अनुसरण करता है तथा जिसके स्वयं के सिद्धान्त एवं नियम होते हैं, यानी जो अस्त-व्यस्त विचारों का घालमेल नहीं होता अपितु निश्चित एवं अकाट्य नियमों से संचालित होता है।

यदि यह कहना सही हो कि दार्शनिक श्रेणियों एवं वैज्ञानिक अवधारणाओं की अपनी नियति होती है तो यह सहज रूप से कहा जा सकता है कि विचारधारा शब्द का विकास काफी उत्तेजनापूर्ण एवं दिलचस्प रहा है।

इतिहास के किलों को सदा ही विकसित विचारों की सहायता से फतह किया गया। विचारधारा की भूमिका स्थैतिक कतई नहीं है। इतिहास के समग्र प्रवाह की भांति यह पूरी तरह से गतिशील है तथा विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक कारकों से उद्भुत होती है। ट्रैसी ने फ्रांस की क्रांति के दौरान आए बौद्धिक उबाल के समय विचारधारा का प्रयोग किया था। इसलिये इसका संबंध विचारों के सिद्धान्त से, जैसे अध्यात्म और धर्मशास्त्र में होता है। लेकिन इसका संबंध प्रयोग और अनुभव पर आधारित ज्ञान-दर्शन से ज्यादा है। लेकिन आजकल इसका अर्थ कार्ल माक्र्स और फ्रेडरिक एंगेल्स की पाण्डुलिपियों के अनुसार समझा जाता हैं जो बाद में एंगेल्स द्वारा प्रकाशित हुई और 'जर्मन आइडियौलाजी के नाम से प्रचारित और प्रकाशित हुई। उनके अनुसार आइडियौलाजी के विचार हैं जो शासक वर्ग अपने हित में अपनाते हैं और उन्हें आदर्श सामाजिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

इसके साथ ही आइडियौलाजी पर शोध कार्यों का एक लम्बा सिलसिला शुरू हुआ जिसका फोकस समाज-विज्ञान के सभी क्षेत्र थे। उनमें प्रमुख थीं वे विचारधाराएं जिनकी बुनियाद थी माक्र्स की 'ए क्रिटिक ऑफ  इकनौमिक्स। लेकिन उन्होंने इसके साथ उन नैतिक सिद्धान्तों का भी निर्माण किया जिनके अनुसार समाज को चलना चाहिए।

विडम्बना यह है कि माक्र्सवाद भी बड़े परिप्रेक्ष्य में एक विचारधारा ही है। माक्र्स विचारधारा की संकुचित व्याख्या करने में सही थे अगर हम इंग्लैंड में सदियों से आ रही टोरी और हवीग्स की विचारधाराओं को देखें जिसे आधुनिक जनतंत्र का जन्मदाता माना जाता है। वे सामन्तवादी-पूंजीवादी शासक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। फ्रांसीसी क्रान्ति ने सब कुुछ बदलकर रख दिया और नई विचारधाराओं का जन्म हुआ जिन्होंने वामपंथियों की तरफ  से बुर्जुआ को चुनौती दी। बाद में उन्हें ज्यादा प्रभावी ढंग से दक्षिणपंथियों से चुनौती मिली। माक्र्स से प्रेरित उन्नीसवीं सदी के मध्य से लेकर बीसवीं सदी के मध्य के करीब सौ वर्षों की विचारधाराओं के संघर्ष ने यूरोप में फासिस्ट शासन-तंत्रों को परास्त किया। इसने पश्चिम को हमेशा के लिए बदल दिया। इस काल में हमने यूरोप के साम्राज्यों का पतन देखा और रूस में अक्टूबर क्रान्ति की युगान्तकारी जीत देखी। इन हिंसक अनुभवों के चलते यूरोप में ऐसी राजनीतिक पार्टियों का वर्चस्व बढ़ा जो विचारधारा में कम अतिवादी थीं। लेकिन यूरोप में दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथियों के बीच स्पष्ट वैचारिक अन्तर कायम रहा। सभी पार्टियों में पारदर्शी जनतांत्रिक ढाँचा था और नेता समय-समय पर पार्टी कांग्रेस में या चुनाव बदलते रहते थे।

जब से समाज तथा व्यक्ति के बारे में चिन्तन आरंभ हुआ है, तभी से विचारधारा का भी जन्म माना जा सकता है। सामाजिक विचारधारा एक मूल्यात्मक व्यवस्था है जो व्यक्ति, समाज, राज्य, नैतिकता, संस्कृति तथा अन्य सामाजिक शक्तियों के मूल्यों, आदर्शों, वास्तविकताओं तथा संस्थाओं आदि को निश्चित करती है। हर विचारधारा विचारों की एक प्रणाली होती है, जो वास्तविकताओं, आदर्शों तथा मूल्यों का विश्लेषण करती है तथा एक सामाजिक आर्थिक उद्देश्य की पूर्ति करती है।

समय तथा परिस्थितियों में परिवर्तन एवं समाज में वर्गों की स्थिति के अनुसार विचारधाराओं का उदय होता है और उनमें परिवर्तन होता रहता है। हर विचारधारा एक वर्गविशेष के वर्गहित तथा मूल्यों के दार्शनिक विश्लेषण पर आधारित होती है और इसी आधार पर ही वैज्ञानिक विधि से समझी जा सकती है। जैसे-जैसे वर्गों की स्थिति में परिवर्तन होता जाता है, वैसे-वैसे विचारधारा के स्वरूप में भी परिवर्तन आता जाता है। विचारधाराएं वर्गों की सामाजिक-आर्थिक आवश्यकता अनुसार तथा वर्गों के विकास के अनुसार बदलती तथा विकसित होती रहती है । समय, परिस्थितियों तथा वर्ग की भूमिका के अनुसार ही विचारधारा प्रगतिशील या प्रगतिविरोधी, क्रांतिकारी या क्रांतिविरोधी बन जाती है। आज की प्रगतिशील तथा क्रांतिकारी विचारधारा वर्ग तथा वर्ग संघर्ष के आधार पर पूरी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के संदर्भ में ही अच्छी प्रकार समझी जा सकती है। उदारवाद उभरते हुए मध्यम वर्ग की विचारधारा मानी जाती है; मजदूर तथा मेहनतकश वर्ग की विचारधारा माक्र्सवाद है, तथा संकट में फंसे पूंजीपति वर्ग की विचारधारा फासीवादी मानी जाती है। हर विचारधारा विभिन्न दृष्टिकोणों से विभिन्न बातों की व्याख्या करती है। राजनैतिक दृष्टिकोण से विचारधारा की मुख्य बातें व्यक्ति, समाज तथा राज्य से संबंधित रहती हैं तथा ये राजनैतिक दर्शन की मूल अंग हैं।

विचारधारा तथा व्यक्ति

       मानव हर समाज तथा सामाजिक व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु है और हर विचारधारा मानव स्वभाव की स्पष्ट या अस्पष्ट व्याख्या करती है। जैसे, उदारवाद मानव स्वभाव को स्वार्थी, अहंकारवादी तथा तर्कसंगत मानता है, माक्र्सवाद इसे सामाजिक परिस्थितियों तथा सम्बन्धों पर आधारित मानता है, फासीवाद मानव को शक्ति एवं गौरव का पूजक मानता है।

हर विचारधारा मानव के कल्याण, तत्व, उद्देश्य तथा सार इत्यादि के बारे में विचार प्रकट करती है। उदारवाद के अनुसार व्यक्ति का उद्देश्य अपना भला, सुख तथा विकास करना है, माक्र्सवाद के अनुसार सामाजिकता को प्राप्त करना है; माक्र्सवाद व्यक्ति तथा समाज के संबंध को वर्गविश्लेषण के आधार पर देखते हुए यह मानता है कि समाज में वर्ग के सदस्य के रूप में व्यक्ति रहता है तथा वर्ग मुख्य है; फासीवाद राज्य तथा समाज को एक मानते हुए व्यक्ति को राज्य तथा समाज पर बलिदान कर देता है। व्यक्ति तथा राज्य या सत्ता का आपसी संबंध क्या है और क्या होना चाहिए? यह भी हर विचारधारा बताती है। उदारवाद के अनुसार राज्य व्यक्ति द्वारा निर्मित है तथा व्यक्ति के लिए है; माक्र्सवाद राज्य को वर्गयंत्र मानते हुए व्यक्तियों पर दमन का यंत्र मानता है; फासीवाद राज्य को सर्वोच्च नैतिकता, पृथ्वी पर भगवान का रूप मानते हुए व्यक्ति को राज्य के लिए मानता है।

हर विचारधारा व्यक्ति तथा स्वतंत्रता और अधिकार के बारे में भी अपने विचार व्यक्त करती है। उदारवाद, व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता तथा अधिकारों को अत्यन्त आवश्यक मानता है; माक्र्सवाद स्वतंत्रता को न केवल आवश्यक मानता है बल्कि वास्तव में इसे कैसे प्राप्त किया जाए? यह भी बताता है; फासीवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अधिकारों को महत्व नहीं देता।

विचारधारा तथा समाज

हर विचारधारा समाज के बारे में कुछ मूलभूत बातों पर प्रकाश डालती है।

समाज की प्रकृति क्या है ? यह हर सामाजिक विचारधारा में स्पष्ट या अस्पष्ट होती है। उदारवाद समाज को नियंत्रित या अनियंत्रित बाजारू समाज मानता है; माक्र्सवाद इसे आर्थिक व्यवस्था के अनुसार वर्गविभाजित मानता है; तथा पूंजीवाद इसे आंगिक मानता है।

समाज का संगठन कैसा हो? इस बारे में हर विचारधारा विचार व्यक्त करती है। उदारवाद के अनुसार समाज खुला समाज होना चाहिए जिसमें स्वतंत्र व्यापार, प्रतियोगिता, स्वतंत्र विचारों का आदान-प्रदान तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोच्च माना जाना चाहिए; माक्र्सवाद वर्गहीन समाज को अच्छा तथा संगठित समाज समझता है; फासीवाद समाज के संगठन में व्यवस्था तथा अनुशासन को महत्व देता है।

हर समाज व्यक्तियों की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की एक महत्वपूर्ण संस्था होता है। अत: समाज के आर्थिक संगठन के बारे में भी हर विचारधारा स्पष्ट या अस्पष्ट विचार देती है। उदारवाद स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का समर्थक रहा है तथा अब राज्य द्वारा कुछ भागों में नियंत्रित मिश्रित अर्थव्यवस्था का समर्थक है; फासीवाद राज्य पूर्णत: नियंत्रित अर्थव्यवस्था तथा राज्य एकाधिकार पूंजीवाद का समर्थक है।

हर सामाजिक विचारधारा समाज की मुख्य समस्याओं पर प्रकाश डालती है। उदारवाद के अनुसार समाज की मुख्य समस्या अनेकता में एकता, सामंजस्य, तालमेल, विवादों का निपटारा, सामान्य कल्याण आदि है; माक्र्सवाद के अनुसार समाज की मुख्य समस्या वर्गसंघर्ष तथा वर्गविहीन समाज की स्थापना है; फासीवाद के अनुसार समाज की मुख्य समस्या एक तथा शक्तिशाली होने की है।

       समाज में एकता के बारे में हर विचारधारा कुछ न कुछ अस्पष्ट या स्पष्ट विचार देती है। उदारवाद के अनुसार समाज में एकता लाने का काम उदारवादी प्रजातंत्रीय राज्य आसानी से कर सकता है; फासीवाद सर्वशक्तिमान तानाशाही राज्य की बंदूक की नली को एकता लाने वाला मूलमंत्र मानता है।

समाज में परिवर्तन लाने और न लाने का सवाल तर्कसंगत नहीं है क्योंकि समाज में समय तथा परिस्थितियों के साथ परिवर्तन आवश्यक है। उदारवाद धीरे-धीरे विकासवादी परिवर्तन में विश्वास व्यक्त करता है। माक्र्सवाद वर्ग-संघर्ष के तीव्र होने तथा क्रांतिकारी परिवर्तन का समर्थक है। फासीवाद राज्य द्वारा मनोनीत तरीके से परिवर्तन लाने या परिवर्तन रोकने में विश्वास रखता है।

अत: उपरोक्त आधारों पर हर विचारधारा एक आदर्श समाज का नक्शा पेश करती है और यह उनके सामाजिक दर्शन के मूल्यों को निश्चित करता है।

विचारधारा तथा राज्य

       हर राजनीतिक विचारधारा राज्य तथा राजनीति पर भी स्पष्ट या अस्पष्ट विचार व्यक्त करती है। अत: सत्ता का अर्थ, कारण, आकार, व्यक्ति और सत्ता तथा सत्ता और समाज का परस्पर संबंध विषयक प्रश्न उठाते हैं। इनमें मुख्य निम्नलिखित हैं: -

राज्य की प्रकृति तथा उत्पत्ति: हर राजनैतिक विचारधारा इस बारे में निश्चित या अनिश्चित विचार देती है। उदारवाद के अनुसार राज्य एक मानव निर्मित संस्था है, इसकी उत्पत्ति सामाजिक समझौते के फलस्वरूप हुई। माक्र्सवाद के अनुसार राज्य एक वर्गयंत्र है, इसकी उत्पत्ति समाज के वर्गविभाजन तथा समाज में वर्गसंघर्ष के आरंभ के साथ हुई; फासीवाद राज्य तथा समाज में भेद नहीं करता तथा इसे आंगिक प्राकृतिक संस्था मानता है और समाज की उत्पत्ति के साथ ही इसकी उत्पत्ति मानता है।

राज्य तथा समाज के संबंध के बारे में उदारवाद राज्य को पूरे समाज का सेवक तथा समाज के कल्याण का यंत्र मानता है; माक्र्सवाद इसे समाज की उत्पादन-व्यवस्था के आधार पर आर्थिक रूप से शक्तिशाली वर्ग से जोड़ता है; फासीवाद इसे और समाज को एक ही मानता है।

राज्य का शासन कैसा हो: इसके बारे में भी हर राजनैतिक विचारधारा पृथक विचार देती है। उदारवाद प्रजातांत्रिक सीमित सकारात्मक या नकारात्मक राज्य के शासन का समर्थक है। माक्र्सवाद हर शासन को किसी वर्ग विशेष की तानाशाही मानता है; फासीवाद राज्य के शासन की तानाशाही तथा सत्तात्मक स्वरूप का समर्थन करता है।

उदारवाद के अनुसार सत्ता का आधार नैतिक है जिसमें सामाजिक समझौता, सामान्य कल्याण तथा व्यक्तित्व का विकास करने की इसकी क्षमता आदि शामिल हैं; माक्र्सवाद सत्ता के आधार के अंतर्गत वर्गहित को शामिल करता है; फासीवाद सत्ता के आधार को एकता लाने की आवश्यकता मानता है।

राज्य के कार्यों के विषय में उदारवाद राज्य के कम से कम नकारात्मक कार्यों का समर्थक था, किन्तु अब इसे कल्याणकारी सकारात्मक कार्य भी देना चाहता है। माक्र्सवाद राज्य का मुख्य कार्य एक वर्ग का आर्थिक हित मानता है। फासीवाद राज्य का कार्यक्षेत्र असीमित मानता है।

स्वतंत्रता, अधिकार, समानता, न्याय आदि के बारे में उदारवाद के अनुसार राज्य स्वतंत्रता का दुश्मन माना गया तथा स्वतंत्रता को नकारात्मक समझा गया। किंतु आजकल उदारवाद सकारात्मक स्वतंत्रता का समर्थक है तथा राज्य एवं स्वतंत्रता में विरोध नहीं देखता। माक्र्सवाद राज्य को स्वतंत्रताओं का दुश्मन मानता है तथा राज्यविहीन समाज में ही स्वतंत्रता देखता है। फासीवाद स्वतंत्रता को महत्वहीन मानते हुए, राज्य के आज्ञापालन में ही स्वतंत्रता निहित मानता है।

अत: उपरोक्त आधारों पर ही विचारधारा राज्य का एक सिद्धान्त पेश करती है।

(दो)

विचार चिन्तन की दृष्टि से आधुनिक दुनिया तीन दौरों से होकर गुजरी है। पहला दौर 18वीं सदी से चलता है और 20वीं सदी के पूर्वाद्र्ध तक एक लम्बी यात्रा करता है। दूसरा दौर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद 1970 तक चलता है। इस दौर को विचारधारा के अन्त की विचारधारा का युग कहा गया है। तीसरा दौर दूसरे दौर को ही एक ऊँचाई पर दोहराता है और 1970 से आज तक निरन्तर जारी है।

ऊर्जा प्रौद्योगिकी में हुए मूलगामी परिवर्तन स्वयं प्रौद्योगिक क्रान्ति के निर्णायक दौरों से सीधे जुड़ा है। पूंजी के साथ मशीनों के विकास की तीन गुणात्मक उछाल को हमने देखा है। 1848 से 1890 तक वाष्प शक्ति द्वारा चालित मशीनी उत्पादन, 1890 से 1940 तक विद्युत दहन संयत्रों द्वारा मशीनी उत्पादन और तीसरा है, 1940 से अब तक परमाणु विद्युत यंत्रों द्वारा उत्पादन। सामान्यत: यह प्रौद्योगिकीय विकास की तीन निर्णायक मंजिलें हैं जिसे उत्पादन की पूंजीवादी प्रणाली ने 18वीं सदी की औद्योगिक क्रान्ति के बाद अब तक जन्म दिया है। प्रौद्योगिकी की तीनों मंजिलें क्रमश: स्वयं पूंजी के विकास के तीन महत्वपूर्ण दौरों की ओर संकेत करती हैं; औद्योगिक पूंजी, महाजनी पूंजी एवं आज की अन्तरऔद्योगिक पूंजी जिसे बहुराष्ट्रीय निगमों की संयुक्त पूंजी कहा जा रहा है। आज जिसे उत्तर औद्योगिक अथवा उत्तर आधुनिक समाज कहा जाता है वह वस्तुत: बहुराष्ट्रीय पूंजीवाला समाज है -पूंजीवाद का विशुद्ध रूप है- जो सामाजिक गठन के प्राय: सभी प्राक् पूंजीवादी रूपों को पूरी तरह ध्वस्त करता है और उसके अवशेषों को अतीत की स्मृत्तियों का शोकगीत बना देता है। पूंजी और प्रौद्योगिकी द्वन्द्वात्मक रूप से जुड़े हैं और प्रत्येक उत्तर कदम अपने पूर्व कदम का ही स्वाभाविक विकास है।

औद्योगिक पूंजी, महाजनी पूंजी और आज की उत्तर औद्यौगिक पूंजी के मालिकों ने अपनी पूंजी की रक्षा के लिए समय-समय पर तर्क गढ़े, सिद्धान्त बनाये और उसके रक्षार्थ बुद्धिजीवियों को अपनी पक्षधरता करने के लिए तैयार किया। शुरू में पूंजीवाद की रक्षा में व्यक्तिवाद और उदारवाद की विचारधारा का जन्म हुआ जिसने व्यक्ति को साध्य और राज्य को साधन माना। राज्य को कम से कम काम करने की नसीहत दी।

       कल कारखानों में काम करनेवालों का शोषण जब बढऩे लगा तो मजदूरों ने पूंजीपतियों का विरोध करना शुरू किया। फिर क्या था - मजदूरों और शोषित पीडि़त जनगण की पक्षधरता में भी सिद्धान्त गढ़े जाने लगे। तरह-तरह के समाजवादी विचारों का जन्म हुआ उनमें प्रमुख थे - फेबियनवाद, श्रेणी समाजवाद, सिण्डिकलवाद, अराजकतावाद, गांधीवाद और सबसे बढ़कर माक्र्सवाद। 20वीं सदी की सबसे बड़ी परिघटना थी - रूस में समाजवादी क्रान्ति का होना। इस क्रान्ति ने दुनिया को दो भागों में बांट दिया। एक ओर पूंजीवाद की विचारधारा थी तो दूसरी ओर माक्र्स, एंगेल्स और लेनिन के सिद्धान्तों पर आधारित क्रान्तिकारी विचारधारा। दोनों धाराओं के बीच लम्बा संघर्ष चला और एक तरह से आज भी जारी है।

20वीं सदी के पूर्वाद्र्ध में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद जब संकट का सामना करने लगा तो उसकी पक्षधरता के लिए नग्न तानाशाही की वकालत की गई और फासीवादी विचारधारा का जन्म हुआ।

(तीन)

विचारधारा के विकास का दूसरा दौर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू होता है।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो शिविरों में बंट गई थी। एक ओर अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों का पूंजीवादी शिविर था तो दूसरी ओर सोवियत रूस के नेतृत्व में समाजवादी शिविर। दोनों एक दूसरे के विरुद्ध सामरिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक व्यूह रचना करते थे। लोगों का ब्रेनवाश करने का प्रयास होता था। अमेरिका की खुफिया एजेन्सी सीआईए की भूमिका इस संदर्भ में महत्वपूर्ण थी। अमेरिका ने समाजवादी विचारों के बढ़ते प्रभाव के विरुद्ध अपने अभियान के क्रम में एक संस्था स्थापित कर रखी थी जिसका नाम था - कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम। इस संस्था में दुनिया भर के बुद्धिजीवियों, साहित्यिकारों और लेखकों को इक_ा किया गया था। ये बुद्धिजीवी अमेरिका के हित में नीतियाँ और सिद्धान्त गढ़ते थे और किताबें लिखते थे। 1945 से 1990 तक का कालखण्ड शीतयुद्ध का कालखण्ड था। इसी कालखण्ड में वियतनाम में अमेरिका की बुरी हार हुई थी जिसकी भरपाई के लिए उसने जी जान लगा दिए थे। इसी कालखण्ड में अमेरिका ने पश्चिमी देशों के कुछ कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को अपने साथ करने में सफलता हासिल की। उनकी मदद से माक्र्सवाद के विरुद्ध सिद्धान्त गढऩे के प्रयास रचाये गये। इसी प्रयास का परिणाम 'विचारधारा के अन्त की विचारधारा’ का सिद्धान्त है।

यह विचारधारा औद्योगिक समाजों के संदर्भ में गढ़ी गयी थी किन्तु इसका मुख्य उद्देश्य समाजवादी विचारधारा का विरोध करना था।

सितम्बर 1955 में इटली के मिलान शहर में पश्चिमी बुद्धिजीवियों की सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए एक महासभा हुई, जिसमें 150 के करीब लेखकों, राजनीतिज्ञों, पत्रकारों, विद्वानों आदि ने हिस्सा लिया। इस महासभा में मुख्य विषय यह था कि मौजूदा समाजों में स्वतंत्रता के भविष्य को सुरक्षित रखने तथा स्वतंत्र समाज को बनाए रखने की विधि क्या हो? इस बारे में इन विद्वानों ने विचार मंथन कर यह विचार दिया कि आज की दुनिया में विचारधारा के आधार पर तनाव नहीं होना चाहिए तथा 'विचारधारा का अन्त’ इस स्वतंत्र समाज की आवश्यकता है। विचारधारा के आधार पर आपसी समझौता होना चाहिए। इसके बाद और बहुत सी महासभाएं हुईं तथा इस सिद्धान्त को उन सबमें महत्व दिया गया। इसके साथ ही साथ और भी बहुत सी समाजशास्त्रीय तथा आर्थिक धारणाओं का जन्म हुआ जैसे - 'एक औद्योगिक समाज’, 'मूल्यविहीन सामाजिक विज्ञान’ आदि। ये तमाम धारणाएं 'विचारधारा के अन्त’ के सिद्धान्त से जुड़ी थीं। 1945 से 1985 तक करीब दस साल अमेरिका की पूंजीवादी विचारधारा का समाजवादी विचारधारा से शीतयुद्ध चला, जिसमें हर सम्भव तरीके से समाजवादी विचारधारा को धूमिल करने की चेष्टा की गई। किन्तु समाजवादी विचारधारा की शक्ति इस शीतयुद्ध की वजह से घटने के बजाए और बढ़ गई। ऐसे समय में संकटग्रस्त पूंजीवादी अर्थव्यवस्था तथा राज्य एकाधिकार पूंजी की वैचारिक आवश्यकताओं के अनुसार इस ''विचारधारा के अन्त’’ के सिद्धान्त का जन्म हुआ। यह बताया जाने लगा कि समाजवाद तथा पूंजीवाद दोनों का उद्देश्य एक औद्योगिक समाज की स्थापना है तथा यह दोनों एक उद्देश्य की प्राप्ति के केवल दो तरीके हैं। दोनों प्रकार - समाजवादी तथा पूंजीवादी - की अर्थव्यवस्थाओं में राज्य ''औद्योगिक’’ राज्य बन गया है। पूंजीवाद की प्रकृति बदल गई है तथा अब पश्चिमी समाज ''पूंजीवाद के बाद का समाज’’ है। पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाएं तथा उन्नत समाजवादी देशों की अर्थव्यवस्थाएं अब एक समान हो गई हैं क्योंकि ये दोनों ही औद्योगिक समाज हैं। तकनीकी तथा वैज्ञानिक विकास ने दोनों व्यवस्थाओं के अन्तर को मिटा दिया है। पश्चिमी समाजों में मजदूर वर्ग को आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं और उनका शोषण नहीं होता। पूंजीपति तथा मजदूर उद्योगों के मुनाफे तथा समाज के तमाम मामलों में बराबर के हिस्सेदार हैं। वर्ग संघर्ष खत्म होकर वर्ग सामंजस्य स्थापित हो गया है। राज्य किसी एक वर्ग का न रहकर कल्याणकारी राज्य बन गया है जो अमीरों से टैक्स वसूल कर गरीबों के कल्याण के कार्यों को कर रहा है। अमीर-गरीब का अन्तर मिटता जा रहा है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था खत्म हो गई है तथा आजकल पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था मिश्रित अर्थव्यवस्था है। समाजवादी तथा पूंजीवादी समाजों की समस्याएं वैचारिक नहीं हैं, बल्कि तकनीकी, वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक हैं। सामाजिक क्रांति मुख्य सवाल नहीं है, बल्कि मुख्य समस्या सामाजिक इंजीनियरिंग की है। औद्योगिक समाजों में पहुंच तकनीकी होनी चाहिए न कि वैचारिक। अत: ''विचारधारा का अन्त’’ का सिद्धांत मुख्यत: पिछले करीब बीस सालों में विकसित हुआ। यह मौजूदा पूंजीवादी समाजों की आर्थिक तथा सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की सिफारिश करने वाला विचार था।

''विचारधारा के अन्त’’ नामक सिद्धान्त के समर्थक लेखकों के एक नए समूह का फ्रांस में जन्म हुआ जो नए दार्शनिकों के नाम से जाना जाता है। इन लेखकों को पश्चिमी जनतंत्रों में बहुत महत्व दिया गया। इनकी एक खूबी यह थी कि इनमें से अधिकतर लोग किसी समय माक्र्सवादी माने जाते रहे थे। इनका मुख्य विचार माक्र्सवादी विचारधारा के खिलाफ  पूंजीवाद के प्रचार के रूप में स्थापित किया गया था। किन्तु इन लेखकों के विचारों ने स्पष्ट कर दिया है कि ''विचारधारा का अन्त’’ का अर्थ माक्र्सवादी विचारधारा का अन्त है। इन लेखकों में से एक ब्रिस की पुस्तक का नाम रखा गया था: ''ईश्वर मर गया, माक्र्स मर गया और मैं स्वयं अच्छा महसूस नहीं कर रहा हूँ।‘’ इन लेखकों ने माक्र्सवाद तथा पूंजीवाद दोनों की आलोचना की। फ्रांस, इटली तथा स्पेन की कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा समर्थित संशोधनवादी विचारधारा ''यूरो कम्युनिज्म’’ की भी इन्होंने आलोचना की। कुछ लोगों का विचार था कि मार्च 1978 में फ्रांस में हुए आम चुनाव में फ्रांस की कम्युनिस्ट पार्टी की जीत की प्रबल सम्भावना थी तथा फ्रांस के पूंजीपति इन लेखकों को अधिक से अधिक मदद देकर इन चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टी को धक्का पहुंचाना चाहते थे।

अमेरिका में किसिंगर ने अपनी विदेश नीति में ''विचारधारा के अन्त’’ के सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप प्रदान किया और रूस तथा चीन से अमेरिका के विदेशी सम्बन्धों के दृढ़ करने की चेष्टा की। अमेरिका के राष्ट्रपति कार्टर ने भी ''विचारधारा का अन्त’’ को अपनी नीतियों में मान्यता प्रदान की। अत: पश्चिमी प्रजातंत्रों में इस सिद्धांत ने काफी जोर पकड़ा।

'विचारधारा का अन्त’ के सिद्धांत का समर्थन विभिन्न आधारों पर किया गया। एक आधार यह है कि तमाम उन्नत पश्चिमी देशों में विभिन्न राजनीतिक दलों में वैचारिक मतभेद नहीं रह गया है, पार्टियां भिन्न लेबलों वाली शराब की बोतलें हैं। इसलिए राजनीति के मामले में तो विचारधारा महत्वहीन हो ही चुकी है।

'विचारधारा के अन्त’ के सिद्धान्तकार यह मानते हैं कि अभी अद्र्धविकसित समाजों में विचारधारा का महत्व है तथा यहां विचारधारा का अन्त नहीं हुआ है। लिप्सेट के अनुसार इन अद्र्धविकसित या विकासशील समाजों की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं के लिए विचारधारा का होना आवश्यक है। किन्तु उन्नत पश्चिमी समाजों में इस विचारधारा की आवश्यकता नहीं है।

समाजवादी देशों द्वारा अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्र में विश्वशांति के लिए दिए गए सिद्धांत, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का हवाला देते हुए भी ''विचारधारा के अन्त’ के सिद्धांतकार अपने विचारों की पुष्टि करते थे। इस बारे में प्रो. लोबेनथाल का विचार महत्वपूर्ण था। किन्तु शांतिपूर्ण सहअस्तित्व वैचारिक संघर्षों को खत्म नहीं कर देता। साम्राज्यवाद तथा समाजवाद का समझौता होने की कल्पना नहीं की जा सकती। किन्तु यह विचार इनके समझौते को वास्तविक मानता था। इस सिद्धांत का समर्थन इस आधार पर भी किया जाता था कि समाजवाद का उद्देश्य गैर-समाजवादी समाजों में पूरा हो चुका था, समाजवादी समाज स्वयं समाजवाद के आदर्शों से भटक कर अफसराना समाज बन गया था। समाजवाद तथा पूंजीवाद दोनों में परिवर्तन आ जाने के कारण दोनों विचारधाराएं खत्म हो गई हैं। किन्तु वास्तव में ऐसा हुआ नहीं है। पूंजीवादी समाज सुधारों के बावजूद पूंजीवादी समाज ही हैं।

एक वर्ग विभाजित समाज में जब हम इस सिद्धान्त की परीक्षा करते हैं तो पाते हैं कि पूंजीपति और मजदूर वर्गों की सामाजिक वास्तविकताएं भिन्न-भिन्न होती हैं, अत: विचारधाराएं भी अलग-अलग होंगी। विचारधाराएं केवल आदर्शों, सिद्धान्तों, मूल्यों आदि के बारे में ही नहीं बताती बल्कि मनुष्य के सामाजिक क्रियाकलापों का भी मार्ग दर्शन करती हैं। जब विचारधारा सामाजिक क्रियाकलापों के संदर्भ में देखी जाती है तब विचारधारा का महत्व समझ में आता है तथा वर्ग केवल विचारधारा नहीं बल्कि एक वस्तुवादी सत्य बन जाता है। बिना विचारधारा के सामाजिक-राजनीतिक क्रियाकलाप उद्देश्यहीन रहते हैं तथा विचारधारा सामाजिक कार्यों के मार्गदर्शन के बिना अर्थहीन है।

(चार)

विचारधारा का तीसरा दौर 1970 से शुरू होकर अब तक जारी है। अमेरिका जैसा विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली देश 15 वर्षों तक वियतनाम से लड़ा। अरबों-खरबों डॉलर पानी की तरह बहाया, लाखों लोगों की हत्या की लेकिन युद्ध जीत नहीं सका। अमेरिका और इंगलैंड आर्थिक संकट से घिरने लगे। 1970 आते-आते लोककल्याणकारी राज्य की  लालफीताशाही की चपेट में आकर अर्थव्यवस्थाएं अपने पूंजीवादी प्रतिद्वन्द्वी से लगभग हर क्षेत्र में पिछडऩे लगी। अचानक सोवियत शिविर के ढहने के साथ कम्युनिस्ट देशों की अर्थव्यवस्थाएं भरभराकर गिर पड़ी। इस घटना से रीगन-थैचर के विचार को बल मिला कि आपातकालीन ऑक्सीजन के दम पर चल रहा कल्याणकारी राज्य का ऐतिहासिक अंत समीप आ गया है। फिर क्या था रीगन के अनुयायियों ने लोक कल्याणकारी राज्य को व्यावहारिक विचार नहीं माना। राज्य के कामों को बाजार को सौंप देने की वकालत की गई। सारी दुनिया को वाशिंगटन आम राय से जिसे भूमंडलीकरण कहा गया द्वारा शासित करने का काम या डिक्टेट करने का काम अमेरिका ने करना शुरू किया। दुनिया में भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, बाजारीकरण और उपभोक्तावाद का शोर मचा। विचारधारा का अन्त, इतिहास का अन्त सभ्यताओं के संघर्ष के विचार दुनिया के सामने आया। सोवियत संघ के विघटन और समाजवादी शिविर के बिखराव के साथ यह घोषणा होने लगी कि इतिहास का अन्त हो गया। समाजवाद सदा के लिए खत्म हो गया। पूंजीवादी जनतंत्र को अमरत्व की घूंटी पिला दी गई। अब वही दुनिया का सत्य विचार है।

सैम्युअल हटिंग्टन ने 'सभ्यताओं की भिड़न्त और विश्व व्यवस्था की पुनर्रचना’’ नाम से किताब लिखी और यह बतलाया कि वर्ग संघर्ष की जगह अब विभिन्न संस्कृतियों या सभ्यताओं के बीच भिड़न्त या टकराव प्रमुख हो गया है। हटिंग्टन ने फरमाया इक्कीसवीं सदी संस्कृति की शताब्दी के रूप में शुरू हो रही है। अब दुनिया को तीन भागों - पहली, दूसरी और तीसरी दुनिया के बीच नहीं बांटा जा सकता। यह कृत्रिाम विभाजन शीतयुद्ध के साथ ही समाप्त हो गया है। अब दुनिया को सात प्रमुख सभ्यताओं - पश्चिमी, चीनी, जर्मनी, मुस्लिम, हिन्दू, लातिन अमेरिकी और अफ्रीकी के बीच विभाजित किया जा सकता है। हटिंग्टन ने यह भी कहा कि आज असली लड़ाई वेस्ट वर्सेज रेस्ट के बीच है। इस विचार ने क्या कहर बरपा किया, यह दुनिया के सामने है। इस पश्चिमी विचार ने इस्लाम और ईसाई धर्म-संस्कृतियों को संघर्ष के लिए आमने-सामने खड़ा कर दिया है। दुनिया के सांस्कृतिक माहौल में आधारभूत परिवर्तन हुआ है। जेहादी इस्लाम आतंकवाद और लोकतंत्र का चोला पहने पहले ईसाई मूलवाद (फंडामेन्टलिज्म) ने पूरी दुनिया की भिन्न संस्कृतियों को अपने चपेट में ले लिया। धार्मिक कट्टरता ने नया जीवन पाया। धर्मों की कर्मकांडी संस्कृति ने जोर पकड़ा और धर्म के असली तत्वों को नेपथ्य में डालकर, धर्म के प्रदर्शनकारी पक्ष को बढ़ावा मिला।

       विगत शताब्दी के उत्तराद्र्ध में दो चीजें बदली। एक तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नई-नई खोजें हुई। सूचना तकनोलॉजी में गुणात्मक बदलाव आया। कम्प्यूटर, इन्टरनेट का सर्वत्र शोर मचा। इस तरह दुनिया के चेहरे को नई खोजों और नये आविष्कार ने बदल दिया।

       दूसरा बदलाव नये साम्राज्यवाद से आया है। पुराना साम्राज्यवाद यूरोप में जन्मा था। उसने एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिकी देशों को गुलाम बनाया था। उन देशों को अधिकार में लेकर उन पर शासन किया था। 1970 आते-आते दुनिया के सौ देश जो साम्राज्यवादी देशों के गुलाम थे, आजाद हो गए। पुराना साम्राज्यवाद दुनिया के नक्शे से विलोपित हो गया। नया साम्राज्यवाद अमेरिकी साम्राज्यवाद है। आज भूमंडलीकरण के जरिए सम्पूर्ण दुनिया में इस नये साम्राज्यवाद का प्रयोग चल रहा है। बिना किसी देश को गुलाम बनाये उस देश की अर्थव्यवस्था को साम्राज्यवादी अपने अधिकार में लेकर उसका संचालन कर रहे हैं।

       यूरोप का पूंजीवाद वहां की औद्योगिक क्रान्ति की देन था। इसकी अपनी विशेषता थी। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति से वस्तुनिष्ट- आत्मनिष्ठ द्वन्द्व महाद्वीपीय हो गया था। इसी तरह फ्रांस भी अपनी राजनीतिक-सामाजिक क्रान्ति के द्वारा एक नये समाजशास्त्र के गठन में पूरे महाद्वीप को अगुआ दिखाई दिया था। जर्मनी में इस आधुनिक औद्योगिक क्रान्ति से इतिहास दर्शन की नींव पड़ी थी। परिणामत:, पूरे यूरोप में ज्ञानोदय की नई धारा प्रवाहित हुई थी। इसने यूरोपीय आधुनिकता को जन्म दिया था। इसलिए दुनिया में जिसे आज आधुनिक यूरोप की तरह जाना जाता है, वह आधुनिकता वहाँ की औद्योगिक क्रान्ति का उत्पाद तो है ही, वह औद्योगिक पूंजीवाद की प्रगति का तथा आधुनिक 'राष्ट्र राज्यÓ और राजनीति का घर है।

       अमेरिकी वर्चस्व और उसके विश्व विजय के प्रयास के कारण उदारवाद हाशिए से उठकर केन्द्र में आ गया। उत्तर आधुनिकतावाद, नव व्यवहारवाद, नव इतिहास, उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण जैसे सुन्दर-सुन्दर शब्द विश्व क्षितिज पर प्रकट हो गये। इतिहास के अन्त की घोषणाएं होने लगी। आवश्यकताएं आविष्कार की जननी नहीं रही, आविष्कार ही आवश्यकता की जननी बन गया।

       देरिदा ने समझाया - किताब मर चुकी है, सिर्फ पाठ बाकी रह गया है। माग्रेट थैचर ने बतलाया अर्थशास्त्र किताब से मुक्त हो गया है। अब पोथी पढ़-पढ़कर अर्थशास्त्र समझने की कोई जरूरत नहीं रह गई है। रिचर्ड रोटरी ने कहा - राजनीति भी सिर्फ एक 'भाषा खेल’ का मामला होकर रह गयी है।

       विनोद खोसला कम्प्यूटर तकनीक की दुनिया में एक जाना- पहचाना नाम है। सन माइक्रोसिस्टम्स के सह-संस्थापक रहे खोसला ने कम्प्यूटर की जावा प्रोग्रामिंग की भाषा और नेटवर्क फाइलिंग सिस्टम को तैयार करने में प्रमुख भूमिका अदा की थी। उनकी नयी कंपनी खोसला वेंचर्स सस्टेनेबल एनर्जी और सूचना तकनीकी निवेश के क्षेत्र में एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय कंपनी है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पत्रिका फोब्र्स के लिए एक लेख में लिखा है, जिसमें बताया है कि तकनीक के विकास के साथ दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि उसका आसानी से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। अपने इस लेख में खोसला ने मनुष्य और उसकी सृजनशीलता तक के सामने पेश आनेवाली गंभीर चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

खोसला लिखते हैं कि आनेवाले समय में और भी बड़ी-बड़ी तकनीकी क्रांति होने वाली हैं। इसमें जिस एक चीज का मनुष्य पर सबसे अधिक असर पड़ेगा, वह है ऐसी प्रणालियों का निर्माण, जिनमें मनुष्य के विचार करने की शक्ति से कहीं ज्यादा गहराई से विचार करने की, निर्णय लेने की क्षमताएं होगी। जैसे, पांच साल पहले तक गाड़ी चलाना कम्प्यूटर के लिए मुश्किल चीज समझी जाती थी, लेकिन अब यह एक सच्चाई है।

खोसला लिखते हैं कि मैं नौकरियों को बचाने के लिए तकनीकी बदलाव को धीमा करने की वकालत नहीं कर रहा हूं, लेकिन इस बात पर चिंतित हूं कि मशीनी ज्ञान की क्रान्ति आय में असमानता बढ़ायेगी और यह असमानता एक बिन्दु के बाद सामाजिक तनाव पैदा करेगी। मुझे आशंका है कि एक दिन सॉफ्टवेयर सिस्टम कौशल क्षमता से आगे निकल जायेगा, तब शिक्षा के माध्यम से व्यक्तिगत विकास के रास्ते बंद हो जायेंगे, जो पहले हमेशा कार्यदक्षता के लिए खुले होते थे। यहां तक कि बेहतर शिक्षा और कौशल के बावजूद अधिकतर मनुष्य बुद्धिमान सॉफ्टवेयर सिस्टम को पराजित नहीं कर सकेंगे। यह संभावना ज्यादा लगती है कि मनुष्यों की मशीनों के साथ यह दौड़ उसकी हार में बदलेगी। कामों के क्षेत्र में कुछ उसी तरह का बदलाव आ रहा है, जैसे 20वीं सदी की शुरुआत में हम कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से उद्योगों की तरफ बढ़े थे। पहले हमने शारीरिक श्रम को इंजन से खोया और अब शायद हम मानसिक श्रम की लड़ाई भी हार जाएं। हमारे पास देने को क्या है - सर्जनात्मकता, लेकिन मशीनें शायद उसमें भी मनुष्यों से बेहतर कर जाएं। खोसला लिखते हैं, लगता है कि किसी भी पेशे के 10-20 फीसदी लोग, चाहे वह कम्प्यूटर प्रोग्रामर हों, इंजीनियर, संगीतकार, एथलीट या कलाकार, बेहतर करते रहेंगे, लेकिन सवाल यह है कि बाकी 80 फीसदी का क्या होगा। क्या वे कम्प्यूटर सिस्टम से प्रभावी तरीके से प्रतियोगिता कर पायेंगे? खोसला बताते हैं कि मनुष्य की श्रम-शक्ति और मानवीय विचारशीलता की जरूरत जितनी कम होगी, पूंजी की तुलना में श्रम शक्ति की ओर विचारशील मशीन की तुलना में मनुष्य के विचारों की कीमत उतनी ही कम होती जायेगी।

विचारवान बनाने के क्षेत्र में दुनिया की अनेक कंपनियां काम कर रही हैं। कहते हैं, इनके कारण खेतिहर मजदूरों, गोदानों में काम करने वाले मजदूर, कानूनी शोधकत्र्ताओं, वित्तीय निवेश के मध्यस्थों, हृदय रोग और इएनटी रोग के विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों वगैरह की जरूरत नहीं रह जायेगी। इन कामों को मशीनेंबेहतर ढंग और ज्यादा दक्षता से करेगी, ध्यान रखिए यह नया समाज पूरी तरह से मशीनों के अधीन होगा। मशीन की इस नयी दुनिया में मानवीय रिश्ते, मानवीय संबंध कहां और कैसे होंगे, इसका अनुमान करना फिलहाल कठिन है। पर फिलहाल मशीनों के कारण दुनिया जिस मुकाम पर पहुँच गयी है; उसके कारण जो जटिलताएं सामने आयी हैं, उनपर पश्चिम में बहस हो रही है।

द टाइम्स (लंदन) की खबर है - 'सॉफ्टवेयर इज ईटिंग द वर्ड’। इसी खबर में यह भी लिखा है कि एमेजन कम्पनी बुनियादी रूप से सॉफ्टवेयर कंपनी है; इसने किताबों की दुकानों को खत्म कर दिया है।

(पांच)

भारत की अवधारणा या आइडिया ऑफ इंडिया को समझने- समझाने के प्रयास में प्राचीन से लेकर आधुनिक इतिहास के हर अध्याय को खंगाला जा रहा है, लेकिन इस बात पर एक हद तक सहमति है कि आइडिया ऑफ इंडिया का स्वरूप स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सृजित हुआ था जिसका स्वरूप हमारा संविधान है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हमारे सेनानी सिर्फ अंग्रेजों से मुक्ति के लिए नहीं लड़ रहे थे, वे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा का खाका खींचने के लिए भी जूझ रहे थे।

 स्वतंत्रता संग्राम के शुरू होने के पहले से और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बहुत सारे विचारक और विचार भारतीय क्षितिज पर उभरे - उनके विचारों के छिटपुट प्रभाव भी पड़े लेकिन उन विचारकों और विचारों के मध्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण विचारकों के विचार जो विमर्श के केन्द्र में है - जिनके विचारों का प्रभाव जनता पर विशेष रूप से पर पड़ा है - प्रमुख हैं -गाँधी का विचार चिन्तन, नेहरू की विचारधारा, अम्बेडकरवादी राजनीति, वामपंथी दावे, लोहिया का चिन्तन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिन्दुत्व।

इन खेमों के अंतर संघर्षों से ही भारत की उस अवधारणा का निर्धारण होना है, जिस पर गणराज्य के रूप में भारत का भविष्य तय होगा।

इन विचारकों का भारतीय समाज के सभी तबकों पर कमोवेश प्रभाव पड़ा है। साथ ही हमारी राजनीति, हमारी अर्थप्रणाली, हमारी संस्कृति और साहित्य भी इनसे प्रभावित हुआ है।