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Tuesday 17 Oct 2017

मुझे शब्द में देखो: त्रिलोचन

यह त्रिलोचन जी का जन्म शताब्दी वर्ष है। स्वाभाविक है उनके कवि व्यक्तित्व की चर्चा हो, उनके कृतित्व का समग्र मूल्यांकन हो, उनकी कविता और समाज से संबंध पर चर्चा हो, उनके रचनाओं की भाषिक संरचना, शिल्प और शैली पर विचार किया जाय।

कवि-व्यक्तित्व

एक कवि के कवि व्यक्तित्व को उसके निजी जीवन का परिवेश, परिस्थितियाँ, शिक्षा आदि मिलजुल कर संघटित करते हैं।

त्रिलोचन 20 अगस्त, 1917 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के चिरानीपट्टी गांव में एक सामान्य कृषक परिवार में पैदा हुए। परिवार बेहद गरीब था। संयुक्त परिवार था। परिवार धार्मिक प्रकृति का था। उनके पिता ठाकुर जगरदेव सिंह रामचरित मानस का स्वसर पाठ करते थे। त्रिलोचन उनके पाठ को पूरी तन्मयता से सुनते थे। स्वयं त्रिलोचन शरीर से बलिष्ठ थे एवं सामान्य व्यक्ति की क्षमता से अधिक शारीरिक कार्य करते थे। वे बचपन से ही ज्ञान पिपासु एवं स्वाध्यायशील थे। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त की। गरीबी इतनी अधिक थी कि किताब-कापी के पैसे नहीं जुट पाते थे। छठी कक्षा की पुस्तकें एवं फीस की व्यवस्था नहीं होने से उन्हें बहुत कठिनाई होती थी। मां ने तो आगे पढ़ाने से मना कर दिया था पर बुआ ने उनकी प्रतिभा, ज्ञान पिपासा एवं अध्ययन के प्रति लगनशीलता पहचान ली थी। त्रिलोचन जी ने पैसे की इस खींचतान को एक कविता में भी दिखाया है-

दुलहिन (माँ को वह यही कहा करती थी) इस बच्चे को

मैंने श्रद्धा से, प्रेम से, निष्ठा से

विद्या को दान कर दिया है

जानबूझ कर दान कैसे फेर लूं

ऐसा कभी नहीं हुआ

विद्या माता ही अब इसको निरखें, परखें

रक्षा और पालन पोषण करें।

ज्ञान पिपासा और स्वाध्याय की लगन ऐसी थी कि गांव से मैट्रिक पास कर जब वे बनारस आए और क्वींस कॉलेज में इंटर में नाम लिखाया तो कॉलेज का खर्च पूरा करने के लिए बनारस की सड़कों पर रिक्शा चलाते थे और रिक्शे पर उपनिषद, पुराण, साहित्य की पुस्तकों की गठ्ठर लाद कर चलते थे। स्वाध्याय से ही उन्होंने अंगे्रजी, उर्दू, फारसी संस्कृत, बांग्ला आदि कई भाषाएं सीख ली।

वे ग्रामीण जीवन, किसानी संस्कृति में बचपन से ही बड़े हुए। गांव की शोषित, दलित, निम्न जातियां जैसे बुनकर, मल्लाह, धोबी, लकड़हारा, मजदूर, खेतिहर मजदूरों के बीच वे ज्यादा समय बिताते थे। वे इन वर्गों के दु:ख दर्द, सोच, कठिनाइयाँ, संघर्ष, विवशताओं से सूक्ष्म रूप से परिचित थे। इस पृष्ठभूमि ने उनके संवदेनशील, सृजनशील मन को अपने परिवेश के पात्रों की पीड़ा को कविता में ढालने में सहायता दी। इन्हीं परिस्थितियों ने उनकी कविता को जीवनोन्मुखी कविता बनाया, उनकी कविता मानवतावाद की प्रवक्ता बनी। वे अनुभूति के प्रति बेहद ईमानदार थे अर्थात उन्होंने अनुभूतियों का स्पष्टीकरण किया। व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा। इस बात को एक प्रकरण से समझा जा सकता है-

उनके गांव में मजदूर पुरुष गांव में उपार्जन की संभावना क्षीण होने के कारण बाहर दूर शहरों में जाने लगे। उनकी स्त्रियां अकेली उदास रहती। चि_ी का ही सहारा था। वे त्रिलोचन जी से चि_ियाँ लिखवाने आतीं। वह पूछते 'बताओ, क्या लिखूं' तो वे कहतीं- 'हमें देख लो, हमारी हालत देख लो, फिर जो लिख सकते हो, लिख दो।Ó कवि का संवेदनशील मन उनके हृदय की पीड़ा उतरता। शब्द कवि के, भाव स्त्रियों के, भावों की गहराई में गोताखोरी कवि की। वे उन्हीं की भाषा में लिखते-पात्र के अनुकूल शब्द-

सोसती सर्व उपमा जोग बाबू रामदास को लिखा

गनेसदास का रामनाम बांचना/छोटे बड़े को सलाम

आसिरबाद जथा उचित पहुंचे/आगे

यहां कुसल हैं, तुम्हारी कुसल कालीजी

 से दिन रात मनाती हूँ।

सीधे साधे शब्द, आडंबर, अलंकारहीन शब्द गहरा प्रभाव डालते। शब्द जहाँ कथ्य सरलता से गंतव्य तक एकदम सही-सही पहुंच जाते हैं। यही तो कविता है जो बोलती है, संवाद करती है, अपनी बात कहती है, दूसरे की सुनती है। त्रिलोचन जी ने एक साक्षात्कार में कहा था-

''कविता लिखते समय शब्दकोशों से भारी भरकम शब्द खोजकर कविता में रोपने की बजाय इसे जिंदगी की भाषा से ग्रहण करना चाहिए। कविता में नए-नए मुहावरों, लोकोक्तियों का प्रयोग हो। भाषा स्थानीय संदर्भों से प्रवाहित होती है जिनको समझने के लिए व्याख्याओं और टिप्पणियों का सहारा आवश्यक हो जाता है। किसी भाषा की गहराई में उतरना हो तो उस क्षेत्र के ग्रामीणों से मिलना चाहिए, उनका सुख दु:ख बांटना चाहिए। उनसे बातचीत कीजिए। अशिक्षितों, अनपढ़ों के बीच रहिए। भाषा का मूल रूप और सही रूप वहीं मिलता है। भाषा को नया तेवर मिलता है।

(महावीर अग्रवाल को दिए गए साक्षात्कार का अंश त्रिलोचन का रचना संसार पृ. सं. 76-77)

त्रिलोचन के कवि व्यक्तित्व के गठन में परिवेश ने अहम् भूमिका निभाई। उनके पिता ठाकुर जगरदेव सिंह घर में बहुत सधे स्वर में प्रेम से गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस का पाठ करते थे। त्रिलोचन ने उस रामचरितमानस के पाठ के उस समय की समझ और कविता की स्थिति समझ के अंतर का स्पष्ट विवेचन किया है। वे कहते हैं-

''पिता के मुंह से सुना गया रामचरितमानस बचपन में कविता का कथा तत्व और प्रवाह, आदर्श मुझे प्रभावित करते थे। उम्र बढऩे और अध्ययन के कारण धीरे-धीरे कथा तत्व और प्रवाह तो गौण हो गए, तुलसी काव्य की भाषा, कथ्यों का लोकपक्ष, शिल्प, छंद मुझे ज्यादा प्रभावित करने लगे-

अच्छा बाँच लेते हो रामायन

तुम्हारे बाबू कहते थे जैसे

अब कोई क्या कहेगा

उनकी भीतर की आँख खुली थी

सुर भी क्या कंठ से निकलता था

जैसे आषाढ़ के मेघ की गरज

(ताप के ताए हुए दिन: 1980)

उन्होंने पाया कि तुलसी ने पौराणिक राम को, ईश्वर राम को लोक संदर्भ के अनुकूल ढाल कर तत्कालीन समाज की जरूरतों के अनुकूल प्रस्तुुत किया। त्रिलोचन ने रामचरितमानस की रचना प्रक्रिया की गहन पड़ताल की। यह उनके लिए प्रबल जिज्ञासा का विषय था कि रामचरित मानस में ऐसे कौन से तत्व थे जिनका पाठक वर्ग सबसे निचले तबके से ऊपर तक फैला है, कविताएं जुबां पर हैं और साढ़े चार सौ साल से भी अधिक समय से पाठक के मन मस्तिष्क में वही जगह बनाए हुए हैं। इस काव्य की भाषिक संरचना, छंद योजना, लोकरुचि, परंपरा, अपेक्षाओं के अनुकूल कथ्य को कविता के व्याकरण के सभी अवयवों ने उन्हें प्रभावित किया। छंद, सोरठा, दोहा, चौपाई आदि में उन्हें नवोन्मेष का नया द्वार खुलता दिखाई पड़ा। तभी तो उन्होंने हाथ उठाकर घोषणा की-

तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुमसे सीखी

मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो।

                     (दिगंत)

कवि व्यक्तिगत के भाषिक संघटन में तुलसी के बाद निरालाजी ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। साहित्यिक शब्दावली में कहें तो त्रिलोचन की रक्त शिराओं से कबीर, तुलसी, निराला ही बह रहे थे। उनमें निराला के ही भाषाई संस्कार थे। दरअसल हिंदी साहित्य में एक ऐसा पथरीला रास्ता रहा है जिस पर चलने वाले पथिक फक्कड़, अलमस्त थे, परंपराओं, लीक पर नहीं चलते हैं। उनमें बस पुरानों में तोड़ फोड़ करने, एक नया रास्ता बनाने का जुनून रहता है। वे अतीत के स्वरूप में परिवर्तन कर वर्तमान को सार्थक एवं लोकोन्मुखी बनाना चाहते हंै। कबीर, तुलसी, निराला, त्रिलोचन के संघर्ष की प्रकृति ऐसी ही रही। उन्होंने अपनी समकालीन विसंगतियों के विरुद्ध संघर्ष किया, विरोध झेला पर एक नया संसार दिया। निराला ने छंदों में नव-नूतन प्रयोग किया। त्रिलोचन तो उनकी प्रखरता, निर्भयता एवं समय को लांघने के साहस से अभिभूत थे। निराला जी ने परंपरागत छंदों का विरोध किया। 'परिमल' की भूमिका में निराला जी ने लिखा है-

मनुष्यों की मुक्तिकी तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों में मुक्ति कर्मों के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना है।

(परिमल की भूमिका, पृ. 14)

प्रगतिशील कवियों, विशेष रूप से शमशेर बहादुर सिंह और त्रिलोचन ने यही तो किया। शमशेर ने उर्दू की गज़़लों के प्रचलित व्याकरण में हिन्दी का भाव दिया और त्रिलोचन ने अंग्रेजी के विन्यासपरक सानेट छंद में तोड़-फोड़ कर मात्रा की संख्या में बदलाव कर उसे हिन्दी के भाव में बदला और उन्होंने परंपरागत रोला छंद में भी बदलाव किया। यह थी त्रिलोचन की प्रगतिशीलता, यह था उनका प्रयोग, यह थी उनकी नवोन्मेषी रचना-प्रक्रिया।

त्रिलोचन और भाषा

त्रिलोचन भाषा के प्रति जुनून की हद तक सजग थे। भाषा के संबंध में उनकी एक निश्चित मान्यता रही है। वे कहते हैं कि काव्य की उत्पत्ति लोक परिवेश में ही होती है अत: शब्द भी लोक से ही आना चाहिए। मुहावरे, लोकोक्ति, कथ्य सबका स्रोत तो लोक ही है। त्रिलोचन भाषा गढ़ते हैं और गढऩे के लिए कच्चा माल लोक से ही लेते हैं। यह प्रगतिवाद का मूल चरित्र भी है। नागार्जुन की कविताओं में कहीं न कहीं मैथिली की छाया रहती ही है और त्रिलोचन की कविताओं में लोक भाषा के रूप में अवधी की छाया रहती है। त्रिलोचन ने 'अमोला' कविता संग्रह पूरी तरह अवधी भाषा में लिखा और बरवै छंद में लिखा। वे लिखते हैं:-

भासा टहइ उहइ सकइ कहनाइ

पावइ ऊ जेकर नगीच रहनाइ

वे पिर्थी अर्थात पृथ्वी को ही अपना विशाल घर मानते हैं और बाहरी जीवन उनका कर्मक्षेत्र-

पिर्थी बिसरइ कबहुन आपनि चाल

दिन बीतइ रितु बीतइ, बीतइ साल।

यह अवधि ही उस क्षेत्र की जनभाषा है, लोकभाषा है जो भावों, अनुभूतियों के रचनाकार और पाठकों के बीच एकात्म करने का सशक्त उपकरण है। यह जनभाषा कवि के जीवन का स्रोत है। अनुभूति का स्तर गहरा जाता है।

प्रसिद्ध आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय ने लिखा है-

''त्रिलोचन हमारी भाषा के सही मायने में उदात्त मेधा और अनूठी प्रतिभा के मेहनतकश कवि हैं। उनके द्वारा रचा गया कवि मुहावरा अपनी कद काठी और दृढ़ चरण और सादे लिबास में हमारी धरोहर है... वे आत्म निरपेक्ष थे फिर भी भीतर से भरे हुए, समृद्ध रचनाकार और इंसान थे। उनकी रचना की परिकल्पना आज भी मूल्यांकन की बाट जोह रही है। उनकी भाषा व्याकरण, अभिधा, व्यंजना और छंद के चतुष्पाद पर खड़ी नंदिनी है जिसकी रक्षा में वे धनुष ताने हैं। इससे त्रिलोचन की मनीषा, विद्वता, कविता और जीवन की गहरी पहचान के पूरे ताने-बाने में ही आंका जा सकता है। इससे हम एक महान जीवन को भी पहचानेंगे और कविता को भी और यह काम अभी बाकी है।

(कवि परंपरा: तुलसी से त्रिलोचन तक )

नि: संदेह त्रिलोचन की भाषा में वैविध्य और पांडित्य था। उन्हें विषय/ कथ्य की गहरी पकड़ थी। किसी भी विषय पर घंटों बोल सकने की क्षमता थी। पाण्डेय नर्मदेश्वर सहाय ने उनसे संबंधित एक संस्मरण में एक आश्चर्यजनक घटना लिखी है।

एक बार त्रिलोचन प्रेमचंद से मिलने उनके हंस कार्यालय गए। देखा प्रेमचंद जी बहुत बेचैनी से टहल रहे थे। त्रिलोचन ने उनकी बेचैनी का कारण पूछा तो बोले- ''हंस का विशेषांक निकालना है, लेख आदि आ नहीं रहे हैं, समय कम है। क्या करूं समझ में नहीं आता।'' त्रिलोचन जी ने उनसे कहा, ''आप चिंता न करें। मैं लेख जुटाने की चेष्टा करता हूँ। मैं मित्रों से लेख लिखवाऊंगा। परंतु कम से कम दस दिन की अवधि चाहिए। मुझे भी अवकाश मिलना चाहिए।'' उसके बाद कुछ डाक से और कुछ पत्रवाहकों द्वारा लेख आने लगे। भिन्न भिन्न शैली, भिन्न भिन्न विषय, कविता, कहानी, समालोचना आदि से सुसज्जित हंस का विशेषांक निकला। प्रेमचंद त्रिलोचन शास्त्री पर अत्यंत प्रसन्न थे। बाद में प्रेस के एक कर्मचारी ने (जो त्रिलोचन के साथ रहता था और यह बात जानता था), एक दिन उसने त्रिलोचन का यह रहस्य खोल दिया। सारी रचनाएं एक ही व्यक्ति की, त्रिलोचन की! प्रेमचंद अवाक् रह गए। बहुत पूछने पर उन्होंने स्वीकार किया। प्रेमचंद बोले, ''धन्य हैं आप। आपकी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा का बखान जितना भी किया जाए, थोड़ा होगा।''

यह घटना उनकी भाषा, शैली, शिल्प की विविधता को निबाहने की उनकी क्षमता का घोतक है।

त्रिलोचन का छंद संसार

नागार्जुन की तरह त्रिलोचन भी यही मानते थे कि नए से नए कवि के लिए भी छंद ज्ञान आवश्यक है। अगर आप छंद का शास्त्रीय ज्ञान नहीं रखेंगे तो उसमें बदलाव कैसे करेंगे? बिना समग्र स्वरूप जाने उसका रूपांतरण कैसे करेंगे? वे तो यहां तक कहते हैं कि छंद को भले ही मुक्त कर दीजिए पर छंद से आपकी मुक्ति नहीं है। डॉ. नीरव अडालजा लिखते हैं-

''प्रगतिशील कवियों में नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, रामविलास शर्मा जैसे अनेक कवि हैं जिन्होंने पुराने पथ का संस्कार किया है। कोई कवित्त तोड़ता है तो कोई अंग्रेजी उर्दू के प्रचलित छंद।''

(प्रगतिशील कवियों का काव्य चिंतन: पृष्ठ 291)

त्रिलोचन ने परंपरा से चली जा रही तुकांत कविताओं के तुक को तोडऩे में निराला के पथ का ही अनुसरण किया। वह महाकवि निराला के इस मत का पुरजोर समर्थन करते थे- 'मुक्त छंद तो वह है जो छंद की भूमिका में रहकर भी मुक्त है।.... मुक्त छंद का समर्थक उसका प्रवाह ही है। वही उसे छंद सिद्ध करता है और उसकी नियम सहित मुक्ति। त्रिलोचन की निम्न दो कविताओं में तुकांतहीनता के साथ मुक्त छंद का प्रवाह स्पष्ट है-

1      आँखें मूंदे पेट पर सिर टेक, गाय करती है घमौनी, बंधी जड़ से पेड़ की छाया, खड़ी दीवार पर हैै।

(गाय करती है घमौनी-अरघान)

2      पहले पहल तुम्हें जब देखा

सोचा था,

उससे पहले ही

सबसे पहले

क्यों न तुम्हीं को देखा

(तुम्हें जब मैंने देखा- तुम्हें सौंपता हूँ)

सानेट

त्रिलोचन जी ने बड़ी कुशलता से अंग्रेजी के छंद, सानेट के रूप में परिवर्तन कर उसे हिंदी का स्वभाव दिया। उन्होंने सानेट के सभी रूपों को आजमाया पर ज्यादा मेहनत और इस्तेमाल पेट्रार्कन और शेक्सपीरियन सानेट का ही किया है। उन्होंने सानेट के प्रथम चरण में चौबीस मात्रिक ध्वनियां रची हैं। ये हिन्दी के रोला छंद हैं, सम मात्रिक छंद हैं। इसके प्रत्येक चरण में ग्यारह और तेरह मात्राएं हैं। चारों चरणों में मात्राओं का एक ही क्रम है। सानेट में वे पूरे वाक्य को अपनाते हैं। छंद रचना में यह विलक्षण प्रक्रिया है। सानेट के गठन का आधार भाव, विचार, कथा, चरित्र-चित्रण और दर्शन की भूमि है और अंतिम चरण में प्राय: दर्शन का पुट मिलता है। 'सानेट का पथÓ कविता में वे लिखते हैं-

इधर त्रिलोचन सानेट के ही पथ पर दौड़ा

सानेट सानेट सानेट सानेट क्या कर डाला

यह उसने भी अजब तमाशा/ मन की माला

गले डाल ली / इस सानेट का रास्ता चौड़ा।

(सानेट का पथ)

'उस जनपद का कवि हूं' 'अनकहनी भी कुछ कहनी है', फूल नाम है एक 'दिगंत', 'शब्द' जैसे काव्य संग्रह सानेटों के ही संग्रह हैं। उन्होंने लगभग एक हजार सानेट लिखे पर 538 सानेट ही प्रकाशित हैं। शमशेर बहादुर सिंह लिखते हैं- 'सानेट और त्रिलोचन, काठी दोनों की है / एक कठिन प्राकार में बंधी सत्य सरलता है।'

शमशेर सिंह की इस पंक्ति पर डा. अनिल त्रिपाठी पूछना चाहते हैं- त्रिलोचन सत्य सरलता को कठिन प्राकार में क्यों बाँधना चाहते हैं? या फिर प्राकार में सत्य सरलता क्यों बंधी है? देखता हूँ कि सरलतम की अभिव्यक्ति और प्राप्ति के लिए कठिनतम अभ्यास, अनुभव, समझ से गुजरना पड़ता है। (तद्भव: अंक 34, पृष्ठ 18)

फणीश्वरनाथ रेणु ने सानेट के प्रति त्रिलोचन की मेहनत और प्रयोग को देखते हुए उन्हें 'शब्द योगी' कहा है। 'सानेट सम्राट' तो वे कहे ही जाएँगे।

रेणुजी ने त्रिलोचन जी को शब्द योगी सच ही कहा है। यही उनका पता है। उनके लिए शब्द एक साधना है। शब्द किसी लिपि की टेढ़ी मेढ़ी रेखाएं नहीं हैं। उनमें पूरा जीवन दौड़ता है -

शब्दकार, इन शब्दों में जीवन होता है

ये चलते फिरते और बातें करते हैं

शब्दों में भी हाड़ मांस होते हैं

..शब्द शब्द से धमित जीवन की

तलाश में कवि भटका करता है।

(शब्द)

बिसरा दिए गए

यह भी विडंबना है कि हिंदी साहित्य को 15 काव्य संग्रह और एक कथा संग्रह देने वाले, छंद, दोहा, चौपाई, सोरठा आदि में नवोन्मेषी प्रयोग करने वाले इस महान लोक कवि की जमकर उपेक्षा हुई। उनकी रचना यात्रा के प्रारंभिक चरण में भी किसी समकालीन कवि या आलोचक ने उन्हें कवि नहीं माना, न ही उनकी कविता को कविता। जबकि उनका काव्य संग्रह 'धरतीÓ प्रकाशित हो चुका था। जब वे कविता पाठ करते थे तो लोग हँसते थे। कारण, तत्कालीन आलोचकों और कवियों को जिस यथार्थवादी अप्रोच और आधुनिकता बोध पर गर्व था वह लोक से कटा हुआ यथार्थवाद था, मध्यम वर्ग उनके केन्द्र में था और मस्तिष्क-पटल पर पाश्चात्य साहित्य के सिद्धांत थे। भारतीय साहित्यिक परिवेश लोक केन्द्रित था, लोगों के बोलचाल की भाषा, उनके अनुभव, दु:ख सुख थे। त्रिलोचन का यथार्थवाद पूर्णत: अनुभूति से उपजी जीवन दृष्टि पर आधारित था। भारतीय लोक मानस खुद को त्रिलोचन की लोकभाषा के करीब पाता था।

यही तो सच्ची आधुनिकता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- 'मनुष्य ने अनुभवों द्वारा जिन महनीय मूल्यों को उपलब्ध किया है, उन्हें नए संदर्भों में देखने की दृष्टि आधुनिकता है। रचनाकार में युगीन संदर्भों की ग्रहणशीलता भी अपेक्षित है, इससे सर्जक को अनुभव व जीवन दृष्टि मिलती है।'

इस अभिमत को आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी पुष्ट करते हुए कहते हैं कि आधुनिकता बोध की यह जीवन-दृष्टि और अनुभव लोक संपर्क से आते हैं और ये ही किसी काव्य की आधुनिकता के प्रतिमान हैं।

(आधुनिक कविता और युग दृष्टि: पृष्ठ 73)

त्रिलोचन आधुनिकता बोध के इस मानदण्ड पर खरे उतरते थे। 'नगई महरा', 'धरती', 'अमोला' पूरी तरह लोक काव्यगाथा है। पर उन दिनों विपरीत ध्रुव पर खड़े प्रगतिवाद के महंतों को त्रिलोचन का 'धरती', 'नगई महरा' के गाँव-गँवई किसान मजदूर का दर्द, रोना, हंसना समझ में नहीं आया। 1986-87 में इतिहास और आलोचना की दो पुस्तकें आई - 'हिन्दी साहित्य व संवेदना का इतिहास (राम स्वरूप चतुर्वेदी) और नई कविता और अस्तित्ववाद (रामविलास शर्मा)। इन दोनों पुस्तकों में त्रिलोचन कहीं नहीं थे। उनके अभिन्न मित्र डा. नामवर सिंह ने चुप्पी साध रखी थी। शायद इन्हीं हालातों से आजिज़ आकर उन्होंने लिखा-

प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है

उनमें कहीं त्रिलोचन का नाम तो नहीं था

आँखें फाड़ फाड़ कर देखा, शुद्धि पत्र देखा

उनमें नामों की माला छोटी न थी, यहां भी देखा- कहीं त्रिलोचन नहीं। (उसी जनपद का कवि हूं, पृष्ठ 111)

सन् 1945 में 'धरती' का प्रकाशन का विलक्षण घटना थी पर 1946 से 1980 तक कोई चर्चा नहीं, कोई 'नोटिसÓ नहीं। पासा पलटा 1980 में। उनका एक काव्य संग्रह 'ताप के ताए हुए दिन' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उस संग्रह पर डॉ. केदारनाथ सिंह ने एक आलेख में टिप्पणी की - 'त्रिलोचन एक खास अर्थ में आधुनिक हैंÓ और सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि वे आधुनिकता के सारे प्रचलित सांचों को अस्वीकार करते हुए भी आधुनिक हैं। असल में त्रिलोचन की कविता जानी पहचानी समकालीन कविता के समानांतर एक प्रति कविता की हैसियत रखती है और इसीलिए इस बात की भी मांग कहती है कि उनका मूल्यांकन करते समय आधुनिक कविता के प्रचलित मान मूल्यों को लागू करने की जल्दबाजी न की जाए। '' (अभिरुचि पत्रिका: अंक -1, 1981)

केदारनाथ सिंह की इस टिप्पणी से लोगों का ध्यान त्रिलोचन पर गया। उनकी कविताओं का मूल्यांकन शुरू हो गया। 1980 से 1987 के बीच उनके नौ काव्य संग्रह ताप के ताए हुए दिन (1980), शब्द (1980) उस जनपद का कवि हूँ (1981), अरघान (1985), अनकही भी कुछ कही है (1985), तुम्हें सौंपता हूं (1985), फूल नाम है एक (1985), सबका अपना आकाश (1987) और चैती (1987) प्रकाशित हुए। इन काव्य संग्रहों के प्रकाशन ने समूचा साहित्यिक परिदृश्य ही बदल दिया। आलोचना के दो दिग्गजों- डॉ. नामवर सिंह और रामविलास शर्मा ने उन पर आलेख लिखे। डा. नामवर सिंह ने 'आलोचनाÓ (अंक 82, 1987) में एक आलेख ''एक नया काव्यशास्त्र: त्रिलोचन के लिए' शीर्षक से और जनसत्ता के अगस्त 1987 के अंक में एक आलेख 'साधारण का असाधारण कविÓ लिखा तो 1990 में रामविलास शर्मा  ने 'रूप तरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि में उन पर तीन लेख लिखे।

सच पूछिए तो सन् 1946 से 1987 तक त्रिलोचन की उपेक्षा प्रकारांतर से साहित्यिक अपराध है। साहित्येतिहास का विद्यार्थी जब इतने महत्वपूर्ण कवि की उपेक्षा को पढ़ता है तो स्तब्ध और क्षुब्ध रह जाता है। एक समकालीन युवा कवि ललित कार्तिकेय ने एक कविता में अपने इस क्षोभ को यूँ व्यक्त किया है-

पानी अगर सिर पर से गुजर गया आलोचकों

तो किसी दिन आजिज़ आकर अपने शरीर की

परात में गूंथ कर मैदे की लोई बना डालूँगा

और अपने पिछले तमाम वर्षों की रचनाओं को, मसाले में लपेट कर

बनाऊंगा दो दर्जन समोसे

और सारे समोसे आपकी थाली में परोस दूंगा।

तृप्त हो जाएंगे और निश्चित

कि आपसे अखाड़े से चला गया

एक अवांछित कवि - कथाकार

(वर्तमान साहित्य, मई 2002 पृ. 334)

यह तो थी लगभग 40 वर्षों तक उनके अवमूल्यन की गाथा। आज जब हम उनकी जन्म शताब्दी वर्ष मना रहे हैं तब भी कहीं कोई चर्चा नहीं, सेमिनार, गोष्ठी, आयोजन नहीं। आज उन्हें स्मरण करने और उनके कृतित्व के ईमानदार आकलन की बहुत जरूरत है।