Monthly Magzine
Tuesday 17 Oct 2017

शर्त लगाने वाले

शुक्रवार की शाम बीत गयी, खाना पीना खत्म हो गया, तथापि रजत दीपदान में अभी भी मोमबत्तियाँ जल रही थीं। अंगीठी के पीछे घुमड़ रहे किसी झींगुर की चिंचियान के साथ, लैम्प की, घासलेट सोख रही, बत्ती का मद्धम स्वर राग मिला रहा था। वस्त्र आच्छादित मेज पर मदिरा भरी एक स्फाटकीय मीना के साथ किसी भग्न दीवार का चित्र उत्कीर्णीत एक मांगलिक रजत प्याला रखा था; उनके समीप मोतियों से टके हत्थे से जुड़ा एक ब्रेड नाइफ और सुनहरे धागे के कशीदे से सिरजा हुआ एक रिवाजी नेपकिन था।

घर के-बेशक, अभी भी जवान-मालिक की नीली नीली आँखें और छोटी सी पीताभ दाढ़ी थी। सैबाथ के दिन पहना जाता उसका खाफ्तान, (चोगा) रिवाज के मुताबिक साटन का होना चाहिये लेकिन वह, रेशमी था। उसकी ग्रीवा पर भुरभुरा गरेबान और कण्ठ पर, टाई समान लटका, कोई फीता था। परस्पर उलझी-लहराती-तिर्यक रंगबिरंगी रेखाएँ खिंची भाँत से सिरजा परिधान और नाना कंघियों से सजा कोई विगधारी गृहस्वामिनी के गोलमटोल, शिकनहीन, एकदम युवा चेहरे पर आसमानी आँखों के बीच नन्हीं सी नाक थी।

बाहर, पूर्णिमा की चाँदनी में, बर्फ के विशालकाय ढेर झिलमिला रहे थे। खिड़कियों के शीशों के ऊपर गिर रहा तुषार किसी पेड़, फूल, तालपत्र की सूरत अनंत सिरजना चाह रहा था, लेकिन कक्ष की ऊष्मा से वे आकृतियाँ पल-पल पिघल रही थीं।

किसी कुर्सी पर, मेज से फेंके गये चटपटे व्यंजनों के टुकड़े खा चुकने के बाद पूरी कोख भर गाभिन एक पालतू बिल्ली अलमस्त बैठी थी। पीताभ झाँई में बसी उसकी हरी हरी आँखें, अतिथि की जानिब टकटकी लगाये हुईं थीं। करधनी से कसा सादा खाफ्तान कसे, सीधी कड़क पीठ किये हुए उस शख्स की दाढ़ी को यों, मानो गोया कपास के गंदे गुच्छों का फोया हो। उसकी नाक लाल सुर्ख हो चली थी क्योंकि प्राय: आधी बोतल वोडका गले उतार चुका होगा। घनी भूरी भौं के नीचे से बेहद पैनी निगाहें फूट रही थीं। सफेद मेजपोश पर टिकी उसकी भुजा की शिराओं का जाल नीला नीला और बड़े बड़े रोओं के गुच्छे भूरे-भूरे, तथा उंगलियों के नाखून श्रृंगी थे।

वह बोला, \'\'बड़ी लंबी कहानी है। आज छोड़ दें। तुम दोनों शायद अब सोने जाना चाहोगे।\'\'

\'\'सोने ?\'\' गृहस्वामिनी चिल्ला पड़ी; \'\'अभी सिर्फ सवा छह ही हुआ है। देखो!\'\' यहूदी हरफों द्वारा अंकित घंटों से गणित बिठाया एक लंबा सा लोलक घुमाती दीवाल घड़ी की जानिब उसने तर्जनी तान दी।

खाविंद ने कहा, \'\'जनाब, जल्दी क्या है? जाड़े की लंबी रात भर नींद कहाँ आती है। अभी हम चाय और फिर पेस्ट्री ले सकते हैं।\'\'

\'\'ओह, वाकई, जवानी के दिनों एक ही दौर के अनंतर बारह घंटे खर्राटे भरता। लेकिन वय बढ़ते नींद घटती जाती है। अभी आँख लगी और गरदन पलटी कि खुल गयी। सख्त बेंच ही पर लेटे लेटे बेमतलब खयालों से भरी नाना बातें घुमड़ती रहती हैं\'; अतिथि बोला:

\'\'आज रात मुलायम बिस्तर पर सोना है ना !\'\'

\'\'कोई फर्क नहीं है। उसके बाद, बेंच और भी ज्यादा सख्त मालूम देगी...। अभी मुझे देख, तुमने सोचा होगा मेरा परिवार निम्नवर्गीय होगा, कि मैं किसी कंगाल घर जन्मा होगा। बकवास! मेरा वालिद सौदागर था; माँ आनुष्ठानिक माँस विक्रेता और काष्ट विक्रेता की वंशज थी। मैं हृुविशोव कुटुम्ब का हूँ। मेरा दादा पूरे कुनबे का सरदार था। मेरे पिता की बर्तनों और इस्पाती वस्तुओं की दुकान थी। हम धनी नहीं थे तथापि अच्छे खाते पीते घर के थे। माँ ने आठ बच्चों को जन्म दिया, लेकिन दो लड़के ही बच पाये - मैं और मेरा भाई बेंडिट। मेरा नाम एवरोम वुल्फ है।......

\'\'बच्चे सिर्फ दो ही हों तब परिवार उन पर झूमा तो रहता ही है, साथ ही मनमुदित हो सीना फुलाये रहता है। जबकि हम दोनों ही पढऩे-लिखने में जरा मन नहीं लगाते। हमें सर्वश्रेष्ठ चेडारों (मदरसों) में भेजा गया लेकिन हमारा ध्यान तोराह (धर्मग्रन्थ) की किसी बात में नहीं लगा। भाई बेंडिट को कबूतरबाजी का शौक लगा। उसने हमारे घर की छत पर कबूतरबाड़ा बनाया जहाँ दूर-दूर से कबूतर उड़ते आते। वह उन्हें पटसन के बीज, मटर, बाजरा, और जहाँ कहाँ से ला नाना भाँति के दाने खिलाता। वोडका के प्याले का भी शौकीन था। उस मामले में मेरे जैसा ही था, हा-हा...। लेकिन उसके हाथ सुनहरे थे।

\'\'पिता ने उसे शिक्षक बनाना चाहा, लेकिन उसका सर्वाधिक रुझान काष्ठकारी की ओर था। जब कभी कोई मेज, या कुर्सी, या बेंच टूटती तो वह उसे फौरन दुरस्त कर देता। एक बार दीवाल के कोने में निर्मित पाषाण सजावटी रूपंकरण ने किसी काष्ट अलमारी को फाड़ दिया। विदीर्ण अंश को विन्यस्त कर ठीक बिठाने नक्काश की दरकार होती लेकिन बेंडिट ने काट तराश उसे दुरुस्त कर ऐसा चमका दिया कि पता ही नहीं चला मरम्मत हुई हो। उसने स्वयं को कारपेंटर फइवल की मातहती में प्रशिक्षु बनना चाहा, लेकिन माँ ने कान बंद कर लिये। चिल्लायी, बेटे को कारीगर बना देखने की बनिस्बत मरना पसंद करेगी। सो, हम दोनों कुछ भी बनने की बजाय यूँ ही लटके रहे।

\'\'हृुबिशोव कुनबे में पल रहे कई एक निकम्मों में हम भी शुमार हो गये। अपना अधिकांश वक्त कलालियों में बिताते। शनिवार को यानेव रोड जाते जहाँ घूमती अनेक दरजिनें हमारे संग अठखेलियाँ करतीं। हमें कोई चिंता नहीं होती खाना कहाँ कैसे मिलेगा। और फिर, जब पेट भरा हो तो शैतान पास ही भटकता है। हम प्रार्थनाओं में नागा और सेबाथ (व्रत) के नियमों का उल्लंघन करते।

\'\'उन दिनों शेब्रेशिन में एक नास्तिक - येक्ल रीफमन, रहता था। ज़ामोस्क में बहुतेरे- क्या कहते हैं उन्हें - मस्किलिम भरे पड़े थे जो \'ज्ञानोदय\' (\'एनलाइटनमेंट\') का प्रचार करते। कहते कि संसार को या ऐसी अन्य सारी वस्तुओं को ईश्वर ने नहीं बनाया। सारे हफ्ते लीबुश की कलाली सूनी ही रहती क्योंकि सभी किसान सिर्फ हाट बाजार के, यानी, गुरूवारों के दिनों मदिरा पीने आते। हमारा गिरोह ही वहाँ वोडका गटकते यहाँ वहाँ की बकवासें करते जमा रहता। हम एक दूसरे से अकसर शर्ते बदते: तुम कितने उबले अंडे एक बार में खा लोगे; या; बीअर के कितने गिलास गटक सकते हो ?

\'\'थोड़े ही वर्षों पूर्व किसी एक शर्त पर बड़ी भयानक घटना घटी। गाड़ीवान योइनेह खलॉप ने किसी दाँव के अनंतर तीस अंडों का आमलेट खाने की बाजी स्वीकार ली। सारा खा चुकने बाद पूरी सुराही भर बीअर गले उँडेल गया। तत्क्षण उसकी अँतडिय़ाँ फट गयीं और वह चल बसा। तुम सोच रहे होगे कि ऐसे दर्दनाक हादसे के बाद सारे यारबाज हरकतें बंद कर देंगे, लेकिन नहीं! उनकी बकवास और शेखी जारी रही। हमने होड़ें रखी कौन किसका हाथ नीचे दबा सकता है। इस बाजी में मैं जीता। मेरे अंदर बड़ी ताकत थी। अगर इतना मजबूत नहीं होता तो अब तक सड़ गया होता।

\'\'बहरहाल, किसी जाड़े ज़ामोस्क से योसेले बरान नामक कोई वहशी नौजवान ठीक याद नहीं क्यों, या, जाने किसकी फिराक में - हमारे नगर, शायद यों ही, या शायद गेहूँ खरीदने, आया। वह अपने, गेहूँ खरीदी-बिक्री के दलाल रहे आये वालिद के धंधे में उसे सहारा देता। अगले दिन हम सब कलाली जा अपनी मटरगश्ती में रम गये। अपनी जेब से मसालेदार गोश्त की मठरी का एक टुकड़ा खींच योसेले उसे खाने लगा। हमने लीबुश से कोशर सॉसेज़ मँगवाया, लेकिन योसेले ने स्वयं को बड़ा तीरंदाज दर्शाया। विवाद हो गया, जिसके अनंतर योसेले ने दावा भरा ईश्वर नहीं है। कोई मुर्दा, वह बोला, मरी मछली भर समान ही है, ज्यादा कुछ नहीं। मोज़ेज़ स्वर्ग तक नहीं पहुँचा। ऐसा भी और वैसा भी सब एक जैसा।

\'\'हम लोगों बीच खासा गुंडा बदमाश तोवेले काशतान था; बोला, \'चाहे जो हो; कब्रगाह में किसी मुर्दे संग रात बिताने को कहा जाये तो टें बोल जाओगे।\' योसेले तत्क्षण ताव खा गया, \'मैं नहीं डरता\' वह बोल पड़ा, \'जि़ंदा हो कि मुर्दा, किसी से नहीं। लेकिन तुम अपनी कायरता दूसरे पर क्यों थोपना चाहते हो ?\' दोनों- योसेले और तोवेले, गुस्सैल आदमी थे।

\'\'आनन फानन बात बढ़ गयी, उन्होंने शर्त बदी: योसेले बारन पच्चीस रूबल की बोली लगा बोला उस झोपड़ी, कि जहाँ मृतकों की देहें साफ की जाती हैं, में वह किसी लाश संग पूरी रात बिताएगा। तोवेले काशतान ने भी चुनौती दे पच्चीस रूबल मेज पर रख दिये। उन दिनों इतनी रकम बड़ी भारी होती - विशेषकर हम लोगों के लिए - लेकिन दोनों पूरे ताव में एक दूसरे को चुनौती दे रहे थे। योसेले किसी काम से कहीं चला गया, हालाँकि हमने दोबारा वहीं मिलने का तय किया।

\'\'योसेले के गये बाद ही ध्यान आया कि नगर में तो कोई शव नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह कि हृुबिशोव में किसी की मृत्यु नहीं हुई है। फिर यों कि झोपड़ी में रात के दौरान कोई मृत आदमी नहीं रखा जाता; हाँ, अगर गाँव बाहर का अथवा अनाथालय में मरा कोई अजनबी हो तो बात दूसरी है। चर्चा के दौरान किसी को शरारत सूझी: हममें से कोई मृतक का छद्मरूप धर, सिर की बाजू मोमबत्तियाँ जलाये रख मेज पर ऐसा लेटे कि योसेले उसे शव समझे। यह योसेले के लिए ऐसी मजाक रहेगी कि जिंदगी भर याद रखेगा।

\'\'आज से पचास बरस पहले का हादसा होगा यह, लेकिन ऐसा लगता है मानो कल घटा हो। संयोगवश हमारे माता-पिता किसी विवाह के उपलक्ष्य इझबित्झा गये हुए थे। भाई बेंडिट ने शव की भूमिका अदा करने मुझे बाध्य किया। अन्यों ने उसको बल दिया; सबने आधी रकम देने का वचन दिया।

\'\'क्या बताऊँ ? सारे गोरखधंधे में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं होगी, लेकिन वे मेरा गिलास खत्म होते न होते फिर भरते गये। बोले, चादर तले अगर मैं कतिपय ऐसी वैसी हरकतों से योसेले को डरा दूँ तो वह हर हाल भाग खड़ा होगा, तब सारी रकम हमारी। मैं उनके बहकावे में आ गया। हमारा जीवन बेहद सीधा सपाट था; हम ही अपने ऊपर मुसीबत बुलाते।

\'\'भाई बेंडिट और मैं घर आ गये। पिता की खूब लंबी चौड़ी ढीली ढाली निकर और शर्ट क्या पहनी कि लगा कफन में लिपटा हूँ। पिता न केवल अतिशय मोटे, तगड़े बल्कि इतना लंबे भी थे कि मैं उनके कंधे तक ही लगता। कब्रिस्तान तक जाता रास्ता - आज ही की तरह - बर्फ से पटा था। हमने इधर उधर भटकती राह चुनी ताकि चीन्हें न जा पायें। नगर की सेवा में तत्पर रेब ज़ालमाँ बेर नाम का शख्स-कब्र खोदने के लिए नियुक्त था, हालाँकि वह कब्रगाह से दूर कहीं रहता था। वह पानी की टंकियाँ भी ढोता था। झोपड़ी में कोई शव नहीं होने की वजह, कब्रगाह में उसके पास कोई काम नहीं था।

\'\'दो मोमबत्तियाँ जला हम बाट जोहने लगे। तोवेले, योसेले और अन्य लोगों के दूर से नजर आते ही मैं मरा सा लेटने लगा। अवांतर हमने सूरजमुखी के बीजे तोड़ तोड़ छिलके जेबों में भर लिये। सब कुछ मजाक सा लगा। किसी को जरा अंदाज नहीं होगा इस जरा सी बात का कोई भयानक अंजाम होगा !

\'\'कुछ वक्त बीते वे साफ नजर आये; दिन पूरा ढल चुका होगा हालांकि क्षितिज से नीचे उतरे सूरज ने आकाश को हलका लाल रंगा हुआ था। वे राह पर बिछी बर्फ पर पैर घिसटते आ रहे थे। जूते और जैकेट उतार मैं बेंच पर जा लेटा। भाई ने ऊपर चादर डाल दी। बेंच तले मेरे वस्त्र छिपा, सिरहाने निकट दो मोमबत्तियाँ जला वह बाहर खिसक गया।

\'\'अब क्या छिपाना? मुझे बेतुका लगा, हालांकि खूब भान था कि पूरी टोली धड़धड़ाती भीतर आ धमकेगी और बाजी शुरू हो जायेगी। और फिर, साढ़े बारह रूबल, अन्यथा, किसी पेड़ तले पड़े मिल जायें ऐसी मुझे कोई उम्मीद नहीं थी।

\'\'पल बीते सारा झुंड आ घुसा, उनके बीच भाई की आवाज मैंने चीन्ह ली। सभी दबी जबान बोल रहे थे, जैसा कि मृतक के निकट आ होना स्वाभाविक है। योसेले बारान ने मरहूम शख्स बाबत जिज्ञासा दर्शायी; उसे बताया गया: किसी दर्जी के पास काम सीख रहे इस तनहा अनाथ ने यतीमखाने में दम तोड़ दिया।

\'\'तत्क्षण योसेले ने नज़दीक पहुँच मेरा चेहरा उघाड़ दिया। मैंने सोचा सारा खेल चौपट लेकिन मेरा बदन शायद शव सा श्वेत होगा क्योंकि उसने फौरन चादर ऊपर खींच दी। मैं साँसें थाम, हिलना डुलना रोके रख सुन्न पड़ा रहा। हमें शर्त जीतना जो थी। थोड़ी देर बाद बाकी सब चल दिये। दरवाजे पर कोई ताला नहीं होगा, इसीलिए जैसा कि मुझे सुनाई पड़ा, उन्होंने अपने पैरों से खिसका-खिसका पटों के आगे बर्फ का ढेर सटा दिया ताकि अगर साहस खो बैठे तो योसेले बाहर आने का जतन न कर पाये। कब्रिस्तान के शवघर से सटी सड़क की परली ओर, उजड़ी-उजड़ी किसी इमारत में, जोकरों का दल, ताशपत्ते खेल-खेल पूरी रात बिताने जा जमा। ऐसा तय हुआ कि अगर योसेले डर जाये तो जोरों से चिल्ला पड़े ताकि वे लोग मदद को दौड़ आयें। लेकिन योसेले ब्रान जरा भी डरपोक नहीं होगा, चादर के छेद में से मैंने उसे कोई सिगरेट जला ताश के पत्ते जमाते देखा।

\'\'चाहे मज़ाक ही क्यों न हो, लेकिन अगर कब्रिस्तान की उस झोपड़ी में, कि जहाँ की बेंच पर शवों को धोया जाता हो वहाँ, सिरहाने निकट दो मोमबत्तियाँ जला आप लेटे हों तो किसी विचित्र अनुभूति से जा घिरना स्वाभाविक है।

\'\'जनाब, आगे कुछ न बताइये,\'\' मकान मालकिन ने याचना की। \'\'यह बड़ी भयावनी कहानी है....। मुझे रात भर नींद नहीं आयेगी....।\'\'

\'\'मूर्ख हो क्या; वह कोई सच्चा शव नहीं था,\'\' उसके खाविंद ने उसे आश्वस्त किया।

\'\'फिर भी, मुझे डर लगता है।\'\'

\'\'अगर वाकई डर रही हो, तो, कोई प्रार्थना गा लो ताकि शैतान दूर रहे....।\'\'

\'\'यह कहानी कोई सैबाय के लिए थोड़ी है।\'\'

\'\'अगर नहीं चाहती हो तो, बंद कर देता हूँ\'\', अतिथि ने कहा। \'\'तुम नवजवान लोग हो...। अभी-अभी जीना शुरू कर रहे हो....।\'\'

\'\'दरअसल, रीज़ेले, तुम मुझे मेहमान के समक्ष शर्मिंदा कर रही हो,\'\' खाविंद ने कहा। \'\'इतनी कायर क्यों हुई जा रही हो। आखिर, हर कोई मरता है। हम भी किसी न किसी दिन मरेंगे।

\'\'नहीं-नहीं, बंद कर दो!\'\'

\'\'ठीक है, मैं सोने जाता हूँ\'\'अतिथि ने कहा।

\'\'नहीं, नहीं जनाब।\'\' घर का स्वामी मैं हूँ, वह नहीं, उसे न सुनना हो तो वह भीतर जा सकती है....।\'\'

\'\'लेकिन, मैं मियाँ बीवी के बीच कोई फसाद खड़ा करना नहीं चाहता,\'\' अतिथि ने कहा। \'\'तुम्हारे बीच तो बात बन जाएगी, लेकिन गुस्सा मुझ पर भड़केगा....।\'\'

\'\'नहीं-नहीं, अपनी कहानी चलने दो। अगर मेरा खाविंद चाहता ही है तो मैं भी सुन लूंगी।\'\'

\'\'तुम्हें भयावने सपने आएंगे।\'\'

\'\'चलने दो, चलने दो। मैं खुद भी जिज्ञासु हूँ।\'\'

\'\'हाँ तो मैं कहाँ था? ओह, हाँ, वहीं लेटा मैं योसेले बारान को चादर के छेदों में से देखता रहा; वह यदाकदा पत्ते फेंट उन्हें बिछाता, हालाँकि हर पल मेरी ओर नजर घुमाता। मुझे ठीक भान हो गया वह बेकल है, इधर मैं चिंतित था शगल कब खत्म हो। जब हिले डुले बिना लेटते हो, तो कंधे, सिर, या पीठ पर एकाएक खुजली उठती है। मुँह में थूक जम नीचे उतरे उसके पहले बाहर निकालना होता है। कोई शख्स पत्थर सा कितनी देर लेटा रहे?...

\'\'मैं जरा सा हिला; फिज़ा में इतना सन्नाटा था कि बेंच की चरमराहट उभर आई। योसेले ने सिर घुमाया, घुमाया कि पत्ते हाथ से नीचे जा गिरे। उसने मुझ पर आँखें गढ़ा दीं, मैंने देखा कि उसके दाँत किटकिटाने लगे हैं। मुझे छींक सी आई, मैंने पूरी ताकत लगा उसे रोका। मैं सोचूँ सोचूँ कि उठ बैठ चिल्लाऊँ, \'योसेले, सब लोग तुम्हारे साथ छेडख़ानी कर रहे हैं,\' लेकिन मैं उसका गुस्सा भी रोकना चाहता था। बहरहाल, मैं छींक पड़ा।

\'\'अब जो हुआ क्या बताऊँ; वह कूद पड़ा और इतनी जोरों से गुर्राया मानो किसी सांड का गला काटा जा रहा है। खड़ा हो उसे बताऊँ कि सब कुछ मज़ाक है लेकिन मैं चादर में जा फँसा और हड़बड़ी में मोमबत्तियाँ बुझ गईं। मुझे कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी और फिर सन्नाटा छा गया। मैंने सोचा योसेले मूर्छित हो गया होगा, मैंने उसमें दम भरना चाहा, लेकिन अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं दिया। मुझमें जरा भी अक्ल नहीं थी कि कोई माचिस साथ रखता। मैं किसी पागल सा चीखता हुआ नीचे क्या जा गिरा कि योसेले से जा टकराया। मैंने उसे छुआ, झकझोरा। ओह, वह मर चुका था-

\'\'हे भगवान, अभागा !\'\' स्त्री चिल्ला पड़ी।

\'\'अब मैं दरवाजे की ओर भागा और उसे खोलने लगा। लेकिन बाहर दोस्तों की खिसकाई तुषार जम कर बर्फ बन गई होगी। इस क्षण मैं किसी शव के साथ अकेला था, और चारों ओर घुप अंधेरा। मित्रो, सदमे के मारे सुध खो बैठा। आज तक याद नहीं मैं वह पल कैसे जी पाया।...

तत्क्षण सच्ची गड़बड़ शुरू हुई। खंडित इमारत में बैठे लोग ताशपत्तों में इस कदर मशगूल हो गए थे कि शर्त लगाए आदमी बाबत् उनका ध्यान पूरी तरह छूट गया। अचानक किसी को याद आते ही वे कब्रिस्तानी झोपड़ी की ओर देखने के लिए लपके। यह सब मुझे चालीस वर्ष बाद पता चला। निकट आ उन्होंने देखा भीतर अंधेरा है। बेशक खिड़कियाँ नहीं थीं, हालाँकि दीवारों में दरारें थीं; वे चिल्लाए: \'योसेले! एवरोम वुल्फ \' लेकिन जवाब क्या मिलता। उन्होंने तत्क्षण बर्फ खिसकाई, द्वार धकाया और सितारों की रोशनी में दो शव देखे। उनके पास कोई लालटेन नहीं था, लेकिन चाँद निकला हुआ था।

\'\'वे कुल तीन थे: मेरा भाई बेंडिट, तोवेले काश्तान, और कोई मोटा-तगड़ा बेरिश किजऱ्नर। लेकिन लड़के तो आखिर लड़के। हर कोई मृत्यु से डरता है, चाहे जितना शेखीबाज क्यों न हो। वे पागलों माफिक भागे। बेरिश गिरा क्या गिरा एक टांग तोड़ बैठा। तोवेल काश्तान दौड़ लगा रब्बी के घर की खिड़की खडख़ड़ाने लगा। देर रात तक जाग रहा रब्बी तोराह बाँच रहा था। पीछे तोवेले घुसा, बेहद थर्राता, काँपता, एकदम स्तब्ध।

\'\'रब्बी किसी कर्मचारी को बुलाए-बुलाए, कि कर्मचारी घरवालों को जगाए-जगाए, कि सभी जाग ठीक से कपड़े पहनें, कि वे कतिपय लालटेन जलाएँ, जलाएँ कि पौ फट चली। वे कब्रिस्तान की तरफ चले, राह में बेरिश किर्जनर पड़ा मिला, एकदम सुन्न। वह उठ ही नहीं पाया क्योंकि प्राय: शव सा जम गया था-

\'\'हे भगवान !....\'\'

\'\'इस बीच मेरी सुध लौट आयी, येन केन घर की दिशा लडख़ड़ाता चला। उम्मीद थी बेंडिट मिलेगा, लेकिन घर खाली था। बेंडिट के मन में ऐसा खयाल जा भरा कि भय के मारे वुल्फ  मर गया होगा। इसीलिए वह नगर छोड़ जा भागा। वह माता-पिता के सामने जाने का साहस खो बैठा था। यह सब मुझे अब मालूम पड़ा। लेकिन तब एक ही बात पता थी: बेंडिट वहाँ नहीं था।.....

\'\'सारा नगर भड़का हुआ था। रब्बी ने कर्मचारी भेज मुझे बुलवाया, लेकिन उसे दरवाजे तक आते देख मैं छत पर जा छिपा। बेरिश किजऱ्नर के कुनबे (वे सभी कसाई थे) ने तोवेले काश्तान को मार-मार उसकी सारी हड्डियाँ-पसलियाँ तोड़ दीं। मैं दो दिनों तक छिपा रहा; मुझे उम्मीद थीं बेंडिट लौटेगा। लेकिन तीसरे दिन, कि जब माता-पिता इझबित्ज़ा से लौटने वाले थे, मैं थैला कस नगर से भाग गया। उनसे नजरें मिलाने की और उनकी चिल्लाहट, गुर्राहट, फटकार सुनने की हिम्मत खो बैठा था। सारा नगर जान गया था मैंने ही मृतक का स्वांग भरा था, सारा दोष मुझ पर आ पड़ा था। योसेले बारान का खूब बड़ा परिवार था जिसमें कई एक मुस्टंडे जवान थे; वे पीट-पीट मेरे चिथड़े उड़ा देते।

\'\'मैं ल्यूबिलिन चला आया और किसी बेकरी में काम करने लगा।.......

\'\'लेकिन बड़ी-बड़ी तगारियों भरा आटा गूँथने में दम निकल गया; ऐसे कामों से भगवान सबको बचाए। और फिर अन्य नौकर मुझसे खार खाते क्योंकि अजनबी जो था, उनकी चोरी चालाकियों में शामिल नहीं था। जोड़ी बिठाने वाले प्रस्ताव लेकर आए, लेकिन मुझे कोई लड़की पसंद नहीं आई। अलावा इसके, हर कोई मेरा ब्योरा पूछता: कहाँ के हो, पिता कौन है। मैं कोई बात बनाता, वे समझते जारज है।

\'\'इस पूरे दौरान भाई का कुछ सुराग़ लगने की उम्मीद भी मन में घर की हुई थी। उसे कई जगह ढूंढ़ा: सायनागॉगों में, कलालियों में, हॉस्टलों में। ल्यूबिलिन में ड्यूडी नामक एक अंधा संगीतकार था जो प्राय: सभी शादियों में बजाता। जब ड्यूडी किसी बारात के आगे अथवा किसी स्वागत नृत्य के अनंतर गाता-बजाता, तब कई लड़कियाँ रोती भी हँसती भी। अन्य वादक उससे जलते और उसे नीचा दिखाने की सारी हरकतें करते। उसकी पत्नी नहीं थी, सो सड़क पर ही घूमता फिरता मैं उसे बीयर पीते-पीते मिला और उसका गाइड जा बना। शुरूआती दौर नज़दीकी नगरों ही तक गए। बाद में पोलैंड की सारी लंबाई चौड़ाई नापी।

\'\'मैंने हर जगह भाई को खोजा; जो भी मिला उससे पूछा ऐसा ऐसा कोई आदमी कहीं देखा? जितना अच्छी तरह सम्भव हो सका वैसा उसका हुलिया बताया। लेकिन उसे किसी ने नहीं देखा था। जब तक ड्यूडी बजाता रहा, सब कुछ बढिय़ा चला। विवाह समारोह तो आनंदमय उत्सव होते ही हैं। संबंधी और अन्य अतिथि दूर-दूर से आते हैं। जब लोग नाचते-गाते खेलते हैं हम अपनी तकलीफें भूल जाते हैं। मैंने विवाहोपलक्ष्य के अंतर्गत गाते अनेक गायकों-विदूषकों को सुन रखा था अत: स्वयं ही गीत गुनगुनाने लगा। जब कभी किसी छोटे नगर पहुँचते जहाँ कोई विदूषक नहीं होता, तब मैं ही मनोरंजन अपने जिम्मे ले लेता। उधर ड्यूडी दिन प्रतिदिन शिथिल पड़ता गया। उसके हाथ काँपने लगे, किसी एक विवाह के अवसर गिरा क्या गिरा कि फिर नहीं उठ पाया।

\'\'जो कुछ मेरे साथ हुआ पूरा बताऊँ, तो यहीं बैठे-बैठे साल गुजऱ जाएगा। लोगों ने मेरा विवाह तक कर दिया, लेकिन वह चल ही नहीं पाया। उन्होंने मुझे किसी वृद्धा नौकरानी संग बांध दिया, और उसने किसी भूखे भेडिय़े समान मुझे भुना गोश्त माना। कहते हुए शर्म आती है। वह यक्ष्मा रोगिणी थी, और तपेदिक की मरीज; इसीलिए उसमें जरा सब्र नहीं था।

\'\'मैं रस्सी गूँथने वाला जा बना। स्त्री के चाचा ने यह धंधा सिखाया। उसमें किसी ज्यादा बड़े कौशल की जरूरत नहीं थी, हालाँकि काम बाहर ही करना पड़ता जहाँ कुछ गर्मी हो। वहाँ खड़ा हो रस्सी बुनता लेकिन बीवी घड़ी-घड़ी बाहर आ चिल्लाती: \'ऐवरोम वुल्फ भीतर आओ।\' किसी न किसी बहाने ऐसा करती रहती। ऐसे लोगों को बीमार फेफड़ों से बुखार आता रहता है, और बुखार उन्हें उन्मादी बनाता है। इर्द-गिर्द खड़े लोग लोट पोट हो हँसते। बच्चे मसखरी करते: \'ऐवरोम वुल्फ भीतर आओ...।\' जब मैं उसकी भत्र्सना करता, उसे खाँसी का दौरा पड़ता, खून थूकती। उसे तलाक देना चाहा, लेकिन उसने कान बंद कर लिए। नगर किसी नदी निकट नहीं था; मुझे तलाक के लिए कहीं और जाने की बाध्यता थी।

\'\'मैंने पाँच वर्ष दुख पाया। आखिरी वर्ष वह पैरों खड़ी न रह सकी, अधिकांश वक्त खटिया ही पर पड़ी रही, लेकिन जब कभी आराम मिलता, पुराना रवैया फिर शुरू कर देती। ऐसी बातें कैसे बताऊँ? अंतिम दिन अचानक संभल गई। किसी स्वस्थ स्त्री माफिक बोली  बड़े नगर जा कोई अच्छा डॉक्टर तलाश करो। मैंने उसे एक गिलास दूध पिलाया। उस क्षण चेहरे पर आ उभरी अद्भुत चमक से वह विवाह के दिन रही जैसी से भी ज्यादा सुंदर और युवा मालूम दी; जब बाहर से भीतर आया लगा सोयी है। ज्यादा निकट जा देखा, क्या देखा कि उसकी साँसें सुनाई नहीं दीं। वह चल बसी थी।

\'\'उसकी मृत्यु पश्चात् एक के बाद एक कई प्रस्ताव आए, लेकिन मैंने विवाह के लिए कान बंद कर दिए। उस नगर और अधिक नहीं ठहर सका। मैंने घर कौड़ी के मोल बेच दिया, उसमें रखा सारा सामान: रस्सी गाड़ी और थोड़ा बहुत जूट भी; खुली धरती पर भटकने चल पड़ा। जब मन भारी हो तो किसी एक जगह पड़ा रहना जरा नहीं भाता। अपने पैर मन मर्जी चाहे जहाँ घूम पड़ते हैं। अकेले आदमी को कितना चाहिए? रोटी का एक टुकड़ा और सोने भर की जगह। लोग आपको भूलते नहीं। हर नगर में अनाथालय हैं। तुम जैसे भले आदमी अतिथि रखने को तैयार हो जाते हैं। अभी तक भी भाई की तलाश करता रहा, हालाँकि सारी उम्मीद खोया हुआ था।

\'\'किसी पोथी में लिखा बताया जाता है कि जब लोग उम्मीद छोड़ देते हैं तब मसीहा आता है। मेरे साथ ऐसा ही हुआ; किसी छोटे नगर -झाएचलिन- आया। जूते चिंदा-चिंदा हो गए थे। जेब में कतिपय ग्राश्चेन थे, किसी भले और सस्ते मोची को तलाशना चाहा। किसी ने किसी पहाड़ी के ऊपर जाने की सलाह दी; मैं आरोही गली पर चढ़ा, किसी बेंच पर बैठा कोई मोची फटे पुराने सोल छील रहा था। उस तक पहुँचा कि उसने सिर उठाया। मैंने देखा; क्या देखा: वह मेरा भाई बेंडिट था।

\'\'क्या बताऊँ? जब भी इस संयोग बाबत् बताता हूँ रो पड़ता हूँ; एकदम जोसेफ और उसके भाइयों समान। मैंने तो उसे पहचान लिया जबकि वह नहीं चीन्ह पाया। मुँह खोल बताऊँ एवरोम वुल्फ  हूँ, लेकिन पहले पुष्ट करना चाहा वह वो ही है। पूछा: \'कहाँ के हो?\'तत्क्षण बोला \'यहाँ चटरपटर करने आये हो या अपने जूते सिलवाने ?\' उसके उच्चारण ही से जान गया बेंडिट ही है। मैंने कहा: \'ल्यूबिलिन क्षेत्र से हो न?\' तत्काल बोला, \'हाँ, हाँ !\' मैंने फिर पूछा हृुबिशोव हो?\' एकदम चकराया वह पूछ बैठा, \'तुम कौन हो?\' मैंने कहा, \'तुम्हारे लिए तुम्हारे भाई का संदेश है।\'उसके हाथों जूता नीचे गिर पड़ा, \'कौन भाई?\' उसने हड़बड़़ाकर पूछा, तभी मैं बोला, \'तुम्हारा भाई एवरोम वुल्फ।\' आँखें फाड़ उसने पूछा, \'एवरोम वुल्फ जिंदा है?\'तब मैं बोला, \'मैं एवरोम वुल्फ हूँ।\'

\'\'बेंच से उसी क्षण नीचे कूदा वह यों बिफर पड़ा मानों योम किप्पर हो। उसकी पत्नी बाहर आयी, नंगे पैर और चिथड़े पहनी। उसके हाथों थमे मटमैला पानी भरे दो गिलास पैरों पर छलक गये। मैंने पूछा, \'माता-पिता का क्या हुआ ?\' वह रो पड़ा , \'अरसा पहले चल बसे; पिता तो उसी वर्ष। माँ कुछ दिनों और तकलीफ पायी।\' भाई ने बताया यह सब उसे कई बरस बाद पता चला-

\'\'क्या तुम्हारा भाई अभी जिंदा है?\'\' घर मालिक ने पूछा।

\'\'नहीं मालूम। शायद हो। वहाँ सिर्फ एक हफ्ता रुका। फिर अपना सामान उठाया। उसके खुद ही के पास अपने ही लिए पर्याप्त रोटी नहीं थी-

\'\'तुमने माता-पिता को क्यों नहीं बताया कि तुम जिंदा हो?\'\'

\'\'खूब डर गया था। बड़ा लज्जित भी था। क्यों, आज तक नहीं मालूम। उनके दो लड़के एक साथ खो गए थे-

\'\'चि_ी ही क्यों नहीं लिखी ?\'\'

\'\'क्या मालूम क्यों नहीं? बेशक नहीं लिखी-

\'\'सारी समझ कैसे खो जाती है?\'\'गृह स्वामी ने पूछा।

अतिथि ने कोई जवाब नहीं दिया।

गृहस्वामिनी ने रुमाल खींच आँखों पर लगाया, \'\'लोग कैसे-कैसे उन्मादी हो जाते हैं?\'\'

\'\'रिसेले, थोड़ी थोड़ी चाय पी जाये।\'\'

अतिथि ने सिर ऊपर उठाया। \'\'बेहतर होगा वोदका का एक गिलास दे दो।\'\'

\'\'सारी पी जाओ, बची है वो सारी पी जाओ।\'\'

\'\'पियक्कड़ नहीं हूँ, लेकिन कलेजे में खलिश हो तो दर्द भूलना चाहते हो।\'\'

अतिथि ने गिलास खाली किया। मुँह बिचकाया कंधे झकझोरे। बोतल परे खिसका बोला - अपनी कहानी फिर किसी को नहीं सुनाऊँगा।  

 

 

अनुवाद: इंदुप्रकाश कानूनगो