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Tuesday 17 Oct 2017

धौंसपट्टी

वैसे तो यह कहानी एक प्राइवेट स्कूल मास्टर से संबंधित है और आप ने ऐसी कई कहानियां पढ़ रखी होंगी। ऐसी कहानियों में ज्यादातर तो बातें यही होती हंै कि स्कूल प्रबन्धक उन्हें पूरी तनख्वाह नहीं देते। छुट्टियों की तनख्वाह काट लेते हैं इत्यादि। परन्तु इस कहानी के कई पहलू नये-नकौर और दिल को तिलमिला देने वाले हैं। सो इसीलिए मैं यह कहानी लिख रहा हूं।

कहानी के नायक का पहले-पहल मुझे मिलने का कारण था, उसका कविताएं लिखना। उसने मुझे अपनी कविताएं दिखाईं। किसी नौसिखिए कवि की तरह उसकी कविताएं कोई खास नहीं थीं। परन्तु पढ़ाई-लिखाई और जुझारूपन की दृष्टि से वह काफी दिलचस्प था। पहले दिन वह मुझ से कई सुझाव और कुछ किताबें लेकर चला गया।

दूसरी बार जब वह आया तो कुछ व्यक्तिगत बातें हुई। बच्चों के बारे में पूछा तो उसने कहा - बच्चों की क्या पूछते हो? इतनी तनख्वाह में हम दो का गुजारा ही काफी मुश्किल से होता है। फिर बच्चे पैदा करके क्या करते? दोनों समझ रखते हैं इसलिए टाल रहे हैं। आगे भी यही हाल रहे तो बच्चों की क्या जरूरत है? परन्तु आस-पड़ोस वाले और घर वाले हमें इसके लिए बहुत कहते हैं। पर क्या करें?

उसकी इन बातों से उसमें मेरी रूचि और भी ज्यादा हो गई। मुझे वे उन लोगों के प्रतिरूप लगे जो मुसीबतों में अपने बच्चों को मार कर खुद आत्महत्या कर लेते हैं। इस तरह के मास्टर ट्यूशन से कुछ कमा लिया करते हैं इसलिए मैंने उससे ट्यूशन के बारे में पूछा। उसने बताया कि कोई खास नहीं, एक-दो हैं।

हमारे सरकारी हायर सेकेण्डरी स्कूल में बोर्ड की परीक्षा शुरू होने वाली थी। उसने मुझ से कहा कि हो सके तो आपके स्कूल में मेरी वीक्षक ड्यूटी के आर्डर करवा देना। मैंने उसे आश्वासन दिया कि प्रिंसीपल से कहूंगा।

तीसरी बार जब वह आया तो मैंने उसे कहा कि आपका वह काम तो हो जाएगा। मेरी बात सुन कर वह बोला कि मैंने वह स्कूल छोड़ दिया।

'' क्यों क्या बात हुई ? ''

प्राइवेट स्कूलों में काहे की बातें हैं? आप जानते हो इन दिनों मेें आकर दसवीं - बारहवीं क्लासों की छुट्टी हो जाती है। इसलिए प्राइवेट स्कूलों वाले आधे मास्टरों की छुट्टी कर देते हैं, और नहीं तो कोई न कोई बहाना तलाश लेते हैं। कल-परसों मैं एकाध मिनिट लेट हो गया। स्कूल प्रिंसीपल जो कि मालिक भी है, ने मेरी छुट्टी लगा दी। थोड़ी सी देर के लिए यूं करने का कारण पूछा तो कहा कि नियम तो नियम ही है, आप लेट होते ही क्यूं हो?

 सुन कर मैंने कहा - फिर मैं तो घर जाऊंगा। घर का कोई काम निपटाऊंगा।

'' घर जाओगे तो दो दिन की तनख्वाह कटेगी। ''

'' दो दिन की क्यूं? लेट तो एक दिन हुआ हूं। ''

'' यहां तो ऐसे ही होगा। ''

'' यह तो अन्याय है। ''

'' कुछ ही समझ लो भले । ''

'' फिर मेरा हिसाब कर दो। मैं ऐसे स्कूल में नहीं रहना चाहता। ''

      '' और क्या करोगे? ''

'' कुछ भी कर लूंगा। रेहड़ी लगा लूंगा परन्तु अब यहां न रहूंगा। ''

  उन्होंने हिसाब कर दिया और रजिस्टर पर हस्ताक्षर करवा लिए। परन्तु हिसाब के पैसे नहीं दिए। कहा - शाम को घर आकर ले जाना। यहां पैसे नहीं हैं। शाम को घर गया तो फिर बहाना बना लिया।

बीच में मैं बोल पड़ा कि जब वे आपकी छुट्टी लगा रहे थे तब क्या अन्य अध्यापक कुछ भी नहीं बोले ?

  '' नहीं! जी, सब का राम निकला पड़ा है। मेरे बाद तो दो दिनों में तीन और निकाल दिये। ''

  '' आप मिल कर कोर्ट में जाओ। कोर्ट आपको पैसा दिलाएगी। इनके स्कूल की मान्यता और रद्द होगी।''

'' मिल-जुल कर कोर्ट जाने वाली बातें आप जाने दें। समर्थ का कान्ना (सरकण्डा) लाठी को तोड़ देता है। प्रिंसीपल अपने गुण्डे भांजे का डर सबको दिखाए रखता है। सरेआम कहता है -कुछ करने कराने की सोची तो देख लेना दुलिया बड़ा खतरनाक है। उसके भांजे का नाम दुल्लीचंद है। लेकिन सम्बोधन में भी गुण्डई लाने के लिए उसे सब दुलिया कहते हैं। वैसे मुझे मेरे गांव के एक चौधरी ने कहा है कि तेरे पैसे मैं दिलवा दूंगा। उसके उस स्कूल में कई बच्चे पढ़ते हैं। ''

    उसने कुछ बातें और बताई। जैसे कि प्राइवेट स्कूलों में मास्टरों का सम्मान विद्यार्थी भी नहीं करते। हमें क्लास में खड़े रहने का हुक्म है जबकि बच्चों के लिए बैठने को बेंच होते हैं। बच्चे सोचते हैं - ये काहे के मास्टर हैं? इनके लिए तो बैठने को कुर्सी भी नहीं। ये तो नौकर हैं।

         कुछ दिन पहले हमारी स्कूल के सीनियर क्लास के लफंगे लड़के हमारी गली की लड़कियों के साथ छेडख़ानी कर रहे थे। मैंने उन्हें टोका। उन्होंने जा कर एक और मास्टर से मेरी शिकायत की। उस मास्टर ने मुझ से कहा - मास्टर जी, आप क्यों पचड़ा मोल लेते हो? वे लड़कियां आपके कोन सी बहिन लगती है? सुन कर मुझे बड़ा गुस्सा आया। मैंने कहा -अध्यापक होते हुए आपके ऐसे विचार हैं? आप को तो मेरा साथ देना चाहिए था। उन्हें धमकाना चाहिए था। हम सब एक हो जाएं तो उन लफंगों की क्या बिसात? परन्तु वे न माने।

इन स्कूलों में पढ़ाना भी पूरी तैयारी के साथ होता है। यदि कभी अध्यापक थोड़ा अटक जाए तो प्रिंसिपल तो दूर होता है, बच्चे ही बेइज्जती कर देते हैं । कहते हैं - मास्टर जी, अटके कैसे? आगे पढ़ाओ! कुछ बताओ। दुलिये जैसे जासूस भी लगे रहते हैं।

उसकी कहानी सुनते हुए मुझे बड़ा क्रोध आ रहा था। कभी सोचता था कि जाकर पिं्रसिपल से मिलूं और बुरा-भला कहूं। परन्तु जब उसकी गुण्डागर्दी वाली बातें ध्यान में आई तो मेरे भीतर का शेर गीदड़ बनता नजर आया। गीदड़ ने शेर को समझाया -ऐसे किस-किस के लिए लड़ोगे?

अब वह हमारे सरकारी स्कूल में वीक्षक की ड्यूटी के काबिल भी नहीं रहा था। क्योंकि वीक्षक की ड्यूटी के लिए किसी मान्यता प्राप्त स्कूल का अध्यापक होना जरूरी था जो कि अब वह नहीं रहा था। 

मैं उसकी कोई मदद नहीं कर सका। उल्टा यह कहानी लिख कर उसे दुह और लिया। अगर वह यह कहानी पढ़ेगा तो क्या सोचेगा? वैसे इस कहानी में उसके शोषकों की बुराई हुई है। परन्तु शोषक कहां कहानियां पढ़ते हैं?

 

                                                       लघु कथा

राहत का बंटवारा

2  अंकुश्री

''मैंने बाढग़्रस्त क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण कर लिया है। काफी गरीब लोग हैं। भूख से लडऩे की उनकी आदत है। उन्हें विशेष राहत की जरूरत नहीं है।'' मंत्री ने कहा, ''मैंने पत्रकारों को बाढ़ की स्थिति गंभीर बता दी है; ताकि लोग स्थिति को भयावह समझ सकें और केन्द्र से राहत भी समुचित ढंग से प्राप्त हो सके।

''इस कार्य के लिये केंद्र से राहत सहायता मिल चुकी है और स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी आर्थिक सहायता दी है।''

''हां, मैं उसी के बारे में कह रहा हूं।'' मंत्री ने कहा, ''30 प्रतिशत खर्च कर देने से बाढग़्रस्तों को पूरी राहत मिल जायेगी।''

''जी हां !'' पदाधिकारी को मंत्री जी के बारे में पता था कि उनकी बातों में 'ना' कहने की गुंजाइश नहीं रहती।''

''बाढग़्रस्त गरीब तबके वालों के लिये 30 प्रतिशत खर्च होगा। आप तो उनसे काफी श्रेष्ठ हैं। साली मंहगाई भी बहुत बढ़ी हुई है। 25 प्रतिशत से कम में आप जैसे ऊंचे पदाधिकारी का काम नहीं चलेगा।'' मंत्री ने कहा, ''मुझे अपने गांव में कुछ गरीबों की सहायता करनी है. 35 प्रतिशत में यह काम हो जायेगा।''

''- - - -''

''बचे हुए 10 प्रतिशत की चिंता छोडिय़े, विभाग के बाकी लोगों के काम आ जायेगा।'' मंत्री ने एक आंख दबा कर कहा, ''आप राहत की कुल राशि के खर्च का विवरण बनवा लें। मैं कल प्रेस वालों को खर्च का विवरण दे दूंगा।''

पदाधिकारी आज्ञाकारी नौकर की तरह कार्य में लग गये।