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Tuesday 17 Oct 2017

फत्तेहपुरी पुलाव

यों तो अमृतसरी कुल्चे, रिवाड़ी की बरफी, लखनऊ की रेवड़ी, पंछी का पेठा, गुडग़ाँव का ढोढा जैसे ज़ायकेदार पकवान देश के बहुतेरे गली. कूचों में बनने.बिकने लगे हैं..लेकिन एक समय उन्नाव रेलवे स्टेशन पर लालरंग के इश्तिहारी कागज़ से लपेटी गई मिट्टी की हांडियों में संडीले के स्वादिष्ट लड्डू और अजगैन के गरमागरम समोसे रेल गाड़ी रुकते ही मुसाफिरों के मुँह में बेतरह पानी भर दिया करते थे।

कुछ-कुछ उसी अंदाज में बाराबंकी के नौजवान परमेश्वरी दीक्षित ने हाल में ही फ़तेहपुरी पुलाव को अपनी मित्रमंडली के बीच ज़ायकेदार चर्चा का विषय बना दिया था। इसकी छोटी सी कहानी पाठकों के मनोरंजनार्थ प्रस्तुत की जा रही है।

लेकिन उससे पहले परमेश्वरी के साथी और लखनऊ विश्वविद्यालय में बीए फ़स्र्ट इयर की पढ़ाई के दौरान होस्टल के उसके रूममेट रायबरेली के जितेंद्र नारायन का किस्सा सुनाना ज़रूरी है। जितेन्द्र शराब पीकर झूमने वाले अभिनेताओं की ऐक्टिंग तो अच्छी-खासी कर लेता था लेकिन खुद कभी उसने शराब की घूँट नहीं चखी थी, जिसका उसे बहुत मलाल था। यह जानकर उनकी मंडली के एक साथी ने कहा, ये कौन मुश्किल काम है! चलो, आज शाम ही उसकी इच्छा पूरी किए देते हैं।

फिर उसने अपनी अटैची से वेनैला एसेन्स की छोटी सी शीशी निकाली और जितेन्द्र को थमाकर कहा, यह बड़े उंचे दरजे की शराब का अर्क है । लो, एक गिलास पानी में चार बूँद डालकर धीरे-धीरे आधे घंटे में पेग खत्म करो। फिर देखना, कैसा सरूर आता है। शर्त यह है कि दूसरे पेग की माँग न करना।

और सचमुच इस पेग का जितेन्द्र पर नाटकीय असर दिखाई दिया। पीने के दौरान वह जब दिल ही टूट गया तो जी के क्या करेंगे, जैसे दर्दभरे गाने गाता रहा फिर डगमगाते हुए वाशरूम तक जाए वहां से झूमते हुए लौट, सरेशाम ही बिस्तर पर पसर गया। पूरी रात वह गहरी नींद सोया। सुबह उठने पर पहली बात जो उसने परमेश्वरी से कही, यह थी सचमुच, यार शराब नायाब थी। अपने दोस्त से कहकर एक घूँट आज और लगवा दो न!

इसका उत्तर परमेश्वरी के पास पहले से तैयार था, ना बाबा, वह पहले ही मना कर चुका है। रोज़-रोज़ शराब पीकर तुम नाबदान में गिरते फिरो, यह ख़तरा वो नहीं उठा सकता।

कालान्तर में परमेश्वरी के सामने भी जब एक समस्या खड़ी हुई तो उसने जितेन्द्र को याद कर उससे निबटने का मन बनाया। समस्या यह थी कि परमेश्वरी के पिता ने दिन-रात मेहनत कर सदर चौराहे पर जो भव्य दोमंजिला दीक्षित वस्त्रालय खड़ा किया था, उसकी जिम्मेवारी परमेश्वरी पर छोड़ वे पत्नी सहित चारों धाम की यात्रा के बाद काशीवास करना चाहते थे लेकिन उचित समझते थे कि परमेश्वरी का घर बस जाने के बाद ही वे यह कदम उठाएँ, जबकि परमेश्वरी यह प्रसंग उठते ही कतरा कर निकल जाता था।

जल्दी से शादी करो का पारिवारिक दबाव जितना ही उस पर बढ़ता गया, उतनी ही टालमटोल उसने शुरू की। कभी कहता, अभी पिताजी की उम्र ही क्या है? हद से हद पचास साल। कभी कहता, मैनेजमेंट की डिग्री ले कारोबार को समझ तो लूं, फिर शादी भी हो जाएगी। ऐसे तर्कों ने कुछ समय तो माँ-बाप को खामोश रखा, फिर वे अधीर हो बेटे के दोस्तों की शरन में गए।

स्वाभाविक था कि दोस्तों ने परमेश्वरी को सीधा करने का बीड़ा उठाया गोकि उनमें से भी कई जब तक संभव हो आज़ाद बने रहना चाहते थे। यह रोग नई पीढ़ी में, यहाँ तक कि लड़कियों में भी फैलता नजऱ आने लगा था। नाबालिग़ उम्र में ब्याह दिए गए बाबा-दादी तो दूर, माता-पिता भी समझ न पाते थे कि इन दिनों के बच्चे बड़ी उम्र तक अनब्याहे क्यों रहना चाहते हैं?

परमेश्वरी  दीक्षित रईस सम्पन्न परिवार का होनहार सपूत था। बम्हन टोले में मौजूद तिमंज़िले मकान का एकमात्र उत्तराधिकारी। माता-पिता निचली मंजि़ल में रहते थे, वहीं उनकी रसोई भी थी जिसमें प्याज-लहसुन का प्रवेश नहीं संभव था। पर वे जानते थे, होस्टल में रहकर लौटे बेटे से इतनी सात्विकता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, इसलिए परमेश्वरी की रिहाइश दूसरी मंजि़ल पर और रसोई तीसरी मंजि़ल पर रखी गई थी ताकि प्याज-लहसुन की गन्ध से माता-पिता परेशान न हों ।

इस परिवार में कपड़े का व्यवसाय होता था। सदर चौराहे पर बड़ी सी दोमंजिली दूकान और बम्हनटोले में तिमंजिला मकान । 22-23 की उम्र वाले परमेश्वरी का चेहरा-मोहरा सजीला और तिजोरी भरी थी। कौन था, जो अपनी बेटी या बहन उससे ब्याहना न चाहता। लेकिन वह किसी की पकड़ाई में न आता था। एक तरफ  थी उसे घेर-घार कर काबू में लाने वालों की पेशकश, दूसरी तरफ  थे, उसके झांसे, बहाने, टालमटोल और तरह-तरह की शर्तें या मांगें ।

यह चूहा भाग, बिल्ली आई वाला खेल काफ़ी वक्त तक चलता रहा था। दूसरे मायनों में, वह बाकायदा एक जंग थी,जिसमें अभी तक तो परमेश्वरी का ही पल्ला भारी साबित हुआ था । लेकिन जब उसके कुछ जिगरी दोस्त मैदान में कूद पड़े और सैर-सपाटे पर उसे ले जाने, फिल्में दिखाने या दावतें देने के सिलसिले शुरू हुए तो परमेश्वरी ने उनको राज़ी किया कि सब दोस्त मिलकर ब्राह्मण सुधार सभा का गठन करें जो जातीय कुरीतियों-अन्धविश्वासों के खिलाफ़  ब्राह्मण-समाज को जागरूक करेगी। तय हुआ कि उसकी बैठकें हर मंगलवार परमेश्वरी के घर की तीसरी मंजिल पर हुआ करेंगी जहाँ वह अपनी खास ईजाद फतेहपुरी पुलाव सबको परोसा करेगा ।

परमेश्वरी करता यह था कि देर तक भिगोए हुए उम्दा बासमती चावल को धो-धाकर पहले तो लौंग-इलायची, नमक, हल्दी, काली-लाल मिर्च, तेजपात, जावित्री आदि खड़े मसाले डाल देशी घी में भलीभाँति भूनता, पकाता, फिर परोसने से पहले वह उसमें कायस्थाने के एक उम्दा होटल से गुपचुप लाया गया मांसाहारी शोरवा तनिक सा मिला देता, यह ध्यान रखते हुए कि बोटी का कोई हिस्सा उसमें न जाने पाए।

इस तरह उसके फतेहपुरी पुलाव में एक खास तरह की लज्जत और नफ़ासत आ जाती थी जो परमेश्वरी के तमाम दोस्तों को बेहद भाती थी। उसके दोस्त पुलाव खाने के बाद चटखारा लेते हुए अपनी ऊँगलियाँ चाटते रह जाते और समझ न पाते थे कि उनके अपने घरों में बना हुआ पुलाव इतना लज़ीज क्यों नहीं होता? फतेहपुरी पुलाव खाने के दौरान और बाद में भी वे उत्साहपूर्वक सामाजिक बुराइयों के खिलाफ़ अपना संघर्ष छेड़े रखते थे ।

संयोगवश परमेश्वरी के ये दोस्त मध्यवित्त पारंपरिक ब्राह्मण और वैश्य वर्गों के थे। वे सामान्यत: शाकाहारी खान-पान से परिचित थे और मांस, मछली, अंडा ही नहीं बीड़ी सिगरेट का भी प्रवेश इन घरों में नहीं हुआ था। वे कल्पना भी न कर सकते थे कि परमेश्वरी अपने  थरमस में स्थानीय होटल से मांसाहारी शोरवा पहले से ही लाकर रख लेता होगा और ऐन परोसने के समय केवल इतनी मात्रा में उसे अपने पुलाव में मिलाता होगा कि स्वाद विशेष हो जाय और किसी दोस्त को मिलावट का संदेह भी न हो।

बहरहाल एक न एक दिन तो यह राज़ खुलना ही था यद्यपि परमेश्वरी को पता न था कि उसका जिगरी दोस्त राधेलाल तिवारी यह भूमिका अदा करेगा। एक इतवार राधेलाल ने अकेले परमेश्वरी को अपने घर कन्नौजी पुलाव खाने का न्यौता दिया और मेज़ पर रोगऩजोश समेत चिकन बिरयानी मौजूद देख, परमेश्वरी की आरंभिक झिझक को ढोंग बताते हुए कहा, यह पाखंड छोड़ो। जितने प्यार से तुम हमें फतेहपुरी पुलाव खिला हम सबका धर्म भ्रष्ट करते रहे हो, उतने ही प्यार से मेरे घरवालों ने तुम्हारी खुशी के वास्ते यह भोजन बनवाया है जो हमारा लगभग रोज़मर्रा का भोजन भी है ।

राधेलाल की बहन कामिनी ने रोगऩजोश का डोंगा परमेश्वरी की प्लेट की ओर बढ़ाते हुए मधुरता से जोड़ा, नानवेज खाना कोई गुनाह तो नहीं। आधी दुनिया का यह दैनिक भोजन है ।

कामिनी से परमेश्वरी की यह पहली भेंट कुछ ऐसा रंग लाई कि वही परमेश्वरी जिसने मुख्यत: शादी के झंझटों से बचने के लिए यह प्रपंच रचा था, वह कामिनी से ब्याह को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरत समझने लगा। फिर भी उन तीनों के बीच यह समझौता कायम रहा कि फतेहपुरी पुलाव का राज़ उन्हीं तक सीमित रहेगा।

यह तो कई साल बाद ही जाहिर हो सका कि तकरीबन सारे दोस्त वर्षों से लुकछिपकर नानवेज खाते रहे थे और परमेश्वरी की हेरा-फेरी के बारे में कुछ न कुछ अंदाजा उन सभी को था । फिर भी अपनी और अपने परिवारों की सात्विक वैष्णव छवि बनाए रखने में वे सुरक्षा और शांति का अनुभव करते थे।

हमारे समाजों में कितने अधिक रूपों और स्तरों में इस तरह के छद्म चलते आ रहे हैं और वे कब तक चलते जाएंगे, जान सकना बेहद मुश्किल है । लेकिन यह कम संतोष की बात न थी कि परमेश्वरी और कामिनी ने अपनी खुद की गिरस्थी में इस तरह के कोई पर्दे नहीं रखे और खान-पान ही नहीं, रहन-सहन में भी खुलापन बरतने की नीति अपनाई ।