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Monday 20 Nov 2017

पत्र

जनवरी-17 के अक्षर पर्व में सर्वप्रथम मेरी दृष्टि ललित जी की 'प्रस्तावना’ और फिर सुश्री सर्वमित्रा के 'उपसंहार’ पर केन्द्रित हुई। जीवनी-साहित्य के प्रति ललित के विशेष लगाव को प्रो. प्रेमकुमार लिखित 'बातों-मुलाकातों में : काज़ी अब्दुल सत्तार’ शीर्षक जीवनी के लाक्षणिकताओं के स्पष्टीकरण में पढ़े-पढ़े महसूस किया जा सकता है। जीवनी के भाषागत सौष्ठव/अनूठेपन और उसकी औपन्यासिक सरसता का तज़्किरा हमें उसे पढऩे को प्रेरित करता है। यकीनन 'हिन्दी में उर्दू लेखक पर यह एक मुकम्मल किताब है।‘ 'सरलता का भण्डार अनुपम जी’ शीर्षक 'उपसंहार’स्तंभ के अंतर्गत हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठ प्रगतिशील कवि भवानीप्रसाद मिश्र के आत्मज स्व. अनुपम मिश्र के व्यक्तित्व के विषय में जानना नि:संदेह बड़ा रोचक रहा। उनकी जीवन शैली 'सादा जीवन उच्च विचार’ का ही प्रतिरूप है। 'प्रत्यालोचना’ स्तंभ के तहत डॉ. जयदेव तनेजा ने 'नयापथ’ के 'भीष्म साहनी जन्मशताब्दी विशेषांक’ में प्रकाशित सुल्तान अहमद के आलोचना लेख 'हानूश : करिश्मा बना ईजाद’ की तर्कबद्घ प्रत्यालोचना की है। डॉ. तनेजा ने विश्वसनीय तर्कों के प्रकाश में भीष्म के नाटक 'हानूश’के नायक हानूश की चरित्रगत उज्जवलता को बखूबी प्रस्थापित किया है। सुल्तान अहमद ने उन सारे तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनके आधार पर आलोचकों ने नाटककार और नायक के उजलपेन पर सवालिया निशान लगाया है। 'आधुनिक व्यंग्य की समस्याएं’ (राहुल देव) भी एक पठनीय आलेख है।ज़हीर  कुरैशी और किशोर तिवारी केशू की गजलें पुरअसर हैं। सुरेन्द्र प्रबुद्घ, बनाफरचंद्र की कविताएं तथा मोहन कुमार नागर की 'हुक्काम’ शीर्षक सभी लघु कविताएं सार्थक व सोद्देश्य है। याद आ गया अकबर इलाहाबादी का यह शेर-

'होटल में डिनर खाते हैं वे हुक्काम के साथ।

रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ।‘

अक्षर पर्व के 'युद्घ विरोधी कविता-विशेषांक’ में आपने इस बार देश-दुनिया की एक चिरंतन किन्तु सदाकाल प्रज्वलित एक ऐसी मानव-भक्षी व प्रकृति-संहारक समस्या 'युद्घ’ पर चिंतन-मनन 'अक्षर पर्व’ में प्रस्तुत किया है जो समाज के आमजन और प्रबुद्घ वर्ग दोनों को गंभीरता से सोचने पर बाध्य करती है। अक्षर पर्व के प्रस्तुत अंक में युद्घ-विरोधी कविताओं से रूबरू होने से पूर्व पाठक के लिए ललित जी की 'प्रस्तावना’ अनिवार्यत: पठनीय है। आपने युद्घों का मुख्त़सर पर्यवेक्षण युद्घ के परवर्ती दुष्परिणामों एवं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कवियों, साहित्यकारों द्वारा रचित कविताओं का बखूबी आलेखन किया है। यह जानना हम पाठकों के लिए विशेष सुखद रहा कि ललित जी पिछले 15-16  वर्षों से विदेशी भाषाओं की युद्घ-विरोधी कविताओं के भावानुवाद में दक्षचित्त हैं।

युद्घ-विरोधी कविताओं में आपने हिन्दी की अनेक कविताओं को संकलित किया है। जहां एक ओर हिन्दी के पुरोधा, कामायनीकार प्रसाद, कुरुक्षेत्र के रचयिता दिनकर, अंधायुग के रचयिता धर्मवीर भारती की कविताएं हैं, अरुण कमल, चंद्रकांत देवताले, नीरज, ललित सुरजन, मुक्तिबोध व शमशेर बहादुर सिंह की रचनाएं हैं तो कई देशी-विदेशी भाषाओं से अनुदित कविताएं भी हैं। सारी कविताएं निश्चय ही युद्घ की विभाषिका से विश्व को मुक्त करने की घोषणा है, बेहद प्रभावी हैं। युद्घ वस्तुत: मानव-मन की आसुरी वृत्ति की ही दुष्परिणति है। प्रसिद्घ शायर आनंद नारायण 'मुल्ला जी’ ने कहा है-

'अमन की जब कभी इन्सां ने कसम खाई है।

लबे इब्लीस पे हल्की सी हंसी आई है।‘

कहानी उसकी लड़ाई (वेदप्रकाश अमिताभ) में एक गरीब स्त्री नीरा की संघर्ष कथा है तो 'कवि सम्मेलन एक कस्बे का’ में मंचीय विदूषकों द्वारा सच्ची कविता को विलुप्त करने पर चुभता व्यंग्य है। 'व्यंग्य’ और 'उपसंहार’ लाजवाब है।

 'मुक्तिबोध विशेषांक’ को आद्यांत देखने-परखने के बाद लगा कि मुक्तिबोध के सर्वांगीण मूल्यांकन की दृष्टि अपेक्षा व आशा से कहीं अधिक स्तरीय उत्कृष्ट व समृद्घ है।

अंक खोलते ही सर्वप्रथम बन्धुवर यश मालवीय की कविता, नवगीत 'मुक्तिबोधों की नई पीढिय़ां होंगी’  ने ध्यान आकृष्ट किया। पूरे गीत में यश जी ने मुक्तिबोध के गहरे चिंतन को व्यक्त किया है। चुप्पी तोडऩे पर ही आमजन की पीड़ा खास होगी और तभी मुक्तिबोध के उत्तराधिकारियों की नई पीढ़ी उत्पन्न होगी। यह बात सर्वथा चिंतनीय है। मुक्तिबोध के घनीभूत किंवा जटिल मनोव्यापारों को समझने के लिए मैं समझता हूं पाठक को ललितजी की 'प्रस्तावना’ की मनोयोगपूर्वक अन्त:यात्रा करनी चाहिए। आपने यथोचित ही कहा है कि मुक्तिबोध बदलते समय की आहटों को सुन-समझ लेते थे। मुक्तिबोध की वैश्विक चेतना पर बतौरे खास फोकस करते हुए तथा मुक्तिबोध की कहानी 'क्लॉड ईथरली’ के मूल कथ्य के संदर्भ से आपने उसे तीसरे विश्वयुद्घ के कगार पर खड़ी आज की दुनिया के लिए चेतावनी के रूप में प्रासंगिक बताया है। क्लॉड ईथरली का विशेष विवेचन-स्पष्टीकरण रमाकांत श्रीवास्तव के आलेख में देखा जा सकता है। मुक्तिबोध के सामाजिक सरोकारों एवं आम आदमी की सुख-शांति के लिए उनके अन्तद्र्वंद्व किंवा आत्मसंघर्ष को सर्वमित्रा जी ने अपने 'उपसंहार’ में संक्षेप में बखूबी स्पष्ट किया है। पुनश्च जितना जो कुछ पढ़ पाया हूं, तद्नसार भगवानस्वरूप कटियार, दिवाकर मुक्तिबोध, महेशचंद्र पुनेठा, परशुराम बिरही, सत्यप्रकाश तिवारी आदि के आलेख मुक्तिबोध के व्यक्तित्व को समझने में विशेष उल्लेख्य है। प्रबुद्घ पाठकों के लिए अंक संग्रहणीय तथा अनुसंधित्सुओं के लिए तो वरदान ही है। इस श्रमसाध्य अंक के लिए आपको विशेष बधाई।

प्रो. भगवानदास जैन, अहमदाबाद-382445 (गुजरात)