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Thursday 23 Nov 2017

पत्र

अक्षर पर्व मार्च-2017 का अंक मिला। बसंत की मनभावन झलक को आवरण पृष्ठ पर संयोजित किए हुए इस अंक में ललित सुरजन ने 'प्रस्तावना’ में एक अलग हटकर विषय पर पाठकों का ज्ञानवर्धन किया है। ललित जी की विश्व राजनीति और आर्थिक-सामाजिक बदलाव की गति पर कितनी मजबूत पकड़ है, यह इस आलेख ने साबित कर दिया है। ट्रंप पर उनकी टिप्पणी भविष्य की ओर संकेत करती है।  'अपनी बात’ के अंतर्गत सुनील बागवान वह कह गए हैं, जिसको जानते सब हैं, लेकिन अभिव्यक्त नहीं करते। लेखक ने उस ताकत को रेखांकित किया है जो हिन्दुस्तान की हस्ती को कायम रखे हुए हैं। इस हकीकत को ठीक-ठीक समझने की जरूरत है। इलाहाबादवासी साहित्यकार यश मालवीय की पीड़ा सही है। इलाहाबाद जिन विशेषताओं के कारण प्रणम्य था वे शनै: शनै: समाप्त हो रही हैं। अंक की कविताएं अपनी गंभीरता और मुखरता के लिए प्रभावित करती हैं। बिम्बों में ताजगी है।  अंक की कहानियों के क्या कहने। एक से बढ़कर एक हैं। 'गूलर का फूल’ में नारी के ममत्व की एक द्रवित कर देने वाली छवि उकेरी गई है। 21वीं सदी में देश के शिक्षक समुदाय में पैठे बाजारवाद को उसके असली रूप में कथाकार गोविन्द उपाध्याय ने कहानी 'तस्मै श्री गुरुवे नम:’ में प्रस्तुत किया है। डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया की एकांकी  'परिवर्तन’ में बात की बात में बड़ी-बड़ी हकीकतें बयान कर दी गई हैं। कुन्दनसिंह परिहार की लघु हास्य रचना ने मीठी चुभन पैदा की है। रचना के छोटे आकार में बड़ी बात कह दी गई है। शोधपरक आलेखों में लेखकों की मेहनत का अच्छा परिचय मिला। समीक्षाओं में कृतियों के साथ अधिकतम न्याय समीक्षकों ने किया है। ये कृति आधारित समीक्षाएं लगीं। कृतिकार आधारित नहीं। पुर्नपाठ के अंतर्गत कथाकार उदयप्रकाश की चर्चित कहानी 'टेपचू’ फिर पढऩे का अवसर मिला। टेपचू जैसे असाधारण चरित्र हमारे समाज में अब भी हैं, बशर्ते हम उनको खुली आंखों और खुले दिल से तलाशने की कोशिश करें। पल्लव की टिप्पणी ने कहानी की परतों को खोलने का काम किया है। नक्सलवाद के भीतर झांकने और सच को जानने का आह्वान यह कहानी करती है।  'उपसंहार’ के अंतर्गत संपादकीय आलेख में पत्रकारिता धर्म को एक बार अपना मस्तक गर्व से ऊंचा करने का अवसर दिया है। संपादकीय में एक सवाल किया है कि चुनाव के समय विकास के मूल मुद्दे को हाशिये पर धकेलकर जीत हासिल करना कहां तक प्रदेश और देश के हित में है? क्या हमारे चुनाव अब बेतुकी बहसों और विवादों में खो जाया करेंगे? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज की राजनीति के कुशल कारीगर हो सकते हैं। लेकिन उनकी इस कारीगरी में आपके निष्कर्ष के अनुसार उनके भीतर एक दंभ झांकता दिख रहा है। शिखर पद पर बैठे व्यक्ति का दंभ चाहे पार्टी का विशेष का अधिक नुकसान न करे लेकिन देश के लिए कालांतर में नुकसानदायक साबित होता है। पठनीय और सार्थक अंक के लिए बधाई।

युगेश शर्मा, 'व्यंकटेश कीर्ति’, 11 सौम्या एन्क्लेव एक्सटेंशन, सियाराम कॉलोनी, चूनाभट्ठी, भोपाल-462016, मो. 9407278965