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Thursday 23 Nov 2017

पत्र

अक्षर पर्व जनवरी-17 के अंक में कुछ लेख महत्वपूर्ण लगे। मीनाक्षी जोशी का लेख इन दिनों सोशल मीडिया में हद से ज्यादा छा चुके और विद्वेष जगाते साम्प्रदायिक विचारों की कड़ी छानबीन करने वाला और दो टूक राय देने वाला है। सत्ता ने भगवावाद को जो संरक्षण दिया और जो इस देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता को समाप्त कर देने के हिडन एजेंडा पर कायम है, वह यहां मौजूद रही, सामाजिक समरसता के लिए बेहद भयावह और खतरनाक है। अक्षर पर्व ने इसे छापा- तो लेखिका व संपादक दोनों को बहुत बधाई। कृष्णवीर सिंह सिकरवार का लेख हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य साहित्य की वास्तविक चिंता करता हुआ लेख है। आज यह विडम्बना अधिकाधिक दिखाई पड़ रही है। ढेर सारे लेखन के बीच वास्तविक, सच्चा लेखन मौजूदा बाजार और विज्ञापन तंत्र या आत्मविज्ञापन तंत्र का शिकार हो हाशिये में पड़ा रह जाता है। सही और छद्म लेखन के गैप या भ्रम को अधिकाधिक पाठकों के पढ़े जाने से ही तोड़ा जा सकता है। इस भीड़ में पाठक को अपनी निगाह पैनी करनी होगी। यह इस दौर में लेखकों की स्थायी चिंता बन चुकी है और पाठक ही हैं जो साहित्य को जिंदा रखते हैं। लेखक को साधुवाद।

कैलाश बनवासी, दुर्ग, 9827993920