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Sunday 18 Feb 2018

पत्र

'अक्षर पर्व’ का 'मुक्तिबोध विशेषांक’ मिला। हिन्दी साहित्य में मुक्तिबोध की अलग पहचान और स्थान है। उन्हें आलोचना-प्रशंसा दोनों भरपूर मिली। न रहने पर और अधिक चर्चित हैं। मैं भी उन्हें सरल सहज नहीं, जटिल भावों की श्रेणी रचनाकार मानता हूं। पद्य की फैंटसिया उलझन में डाल देती हैं। गद्य की सामान्य नहीं हंै। उसे समझने के लिए बौद्धिकता चाहिए। हो सकता है कि तुम मेरे विचारों से सहमत न हो। वैसे कई मुक्तिबोध-प्रशंसक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं। प्रभाकर चौबे का यह कथन निरर्थक नहीं है 'मुक्तिबोध को अकादमिक व्याख्या के अंदर ला देने पर मुक्तिबोध दुरुह हो जाएंगे और दुरुह ही नहीं होंगे, वे समाज से दूर कर दिए जाएंगे उस समाज से जिसमें धंसकर उन्होंने उनके लिए लिखा है। मुक्तिबोध की आशावादी आवाज भी ध्यान में रखनी चाहिए।‘

असल में समीक्षक-विवेचक विद्वान मुक्तिबोध की रचनाओं और व्यक्तित्व के विवेचन में जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, वह भाषा सरलीकरण में सहायक नहीं होती। उसमें समीक्षकों की विद्वता का आलोक अधिक होता है फिर भी मूल पुस्तकों की अपेक्षा इस प्रकार के विशेषांक रचनाकार को समझने में अपेक्षाकृत अधिक सहायक होते हैं जिनमें पत्रादि बहुत कुछ होता है। विशेषांक सार्थक है।

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