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Wednesday 22 Nov 2017

कथा कही गई

कहानी मूलत: समय की या मानव संबंधों की होती है। यह सूत्र किसी भी काल में नहीं नकारा जा सकता। रचना के कथ्य का देश काल कोई भी हो किन्तु उसकी पृष्ठभूमि से रचनाकार के समय का सत्य झिलमिलाता है। समय को निरखे-परखे बिना सामाजिक यथार्थ को समझना संभव नहीं है। इस दृष्टि से देखें तो हमारा वर्तमान समय संश्लिष्ट ही नहीं बहुत उलझा हुआ है। संश्लिष्टता तो समय के बहुआयामी पक्षों से जुड़ी होती है लेकिन आज के दौर में जो कुछ है वह धोखेधड़ी और बेइमानी की गुत्थी है। आज के रचनाकार को सत्य को रेखांकित करने के लिए जागरुक मन और ईमानदार नजर की आवश्यकता है। समकालीन समय तो वंचनाओं की ऐसी उलझी भूलभुलैया है जिसके रास्ते के नक्शे उन स्वार्थी और बेईमान ताकतों के हाथ में है जिन्होंने इस तिलस्म को रचा है। आधुनिक काल के रचनाकारों को वे सीधी सादी जीवन स्थितियां नहीं मिली है जहां सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा, ईमानदारी-बेईमानी साफ-साफ दृष्टिगोचर होती हो।  आज की सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों ने मनुष्य और समाज के रिश्ते को बदल दिया है। मुक्तिबोध ने इस स्थिति की ओर संकेत किया था कि मारो, खाओ और हाथ मत आओ जीवन की शैली है। विषमता, शोषण और चालाकियां  पहले कम नहीं थीं पर उनके स्वरूप स्पष्ट दिखलाई देते थे। आज जिन स्थितियों ने आदमी का चरित्र गढ़ा है वहां विकास शब्द बेवकूफ बनाने का जरिया है और लुटेरों का सुंदर मुखौटा है। मुखौटे पहनने से इंकार करके मानवीय चेहरे को बचाए रखने के प्रयत्न कठिन होते जा रहे हैं।

कथाकार मुकेश वर्मा के नए कहानी संकलन 'सत्कथा कही नहीं जाती’ की कहानियां पात्रों का एक ऐसा संसार है जहां आदमी के विभिन्न चेहरे और मुखौटे परिस्थितियों के पटल पर अंकित हैं। उनकी कहानियां कैनवास की तरह फैलकर विभिन्न रंगों की जीवन स्थितियों के बीच उभरते चेहरों को चित्रित करने की कोशिश है। मुकेश अपनी चुटीली भाषा में, जिस पर हम आगे चर्चा करेंगे, उन्हें प्रस्तुत करते हैं। उनके अधिकांश पात्र मध्य वर्ग से आते हैं जो परिस्थितियों के जालों में उलझे हुए हैं। कुछ उन जालों के तारों को बुनकर औरों को फंसाने वाले हैं और कुछ उनमें उलझकर छटपटा रहे हैं। बदलते हुए समय और उसमें अपनी मौलिकता को खोकर, अपने अस्तित्व को तलाशने का प्रयास करते हुए मनुष्य को अपनी खट्टी-मीठी भाषा में प्रस्तुत करने का कौशल भी मुकेश वर्मा की विशेषता है। कई बार वे अपने आप को पात्र की तरह कहानी में जड़कर पिछली पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच ठहरकर जग का मुजरा देखते हैं। वे लोग और ये लोग कहानी गुजरते हुए समय में बदलते हुए हालात में भांैचक्की पीढ़ी की कहानी है। नैरेटर की अस्मिता पूरी एक पीढ़ी की है। कहानी को दो खंडों वे लोग और ये लोग उपशीर्षकों में बांटकर वे इसे जुड़वां कहानी का खिताब देते हैं। कथा का मुख्य पात्र एक पकती हुई उम्र का आदमी है जो महसूस करता है कि वह उस पीढ़ी के लोगों से है 'जो ठहरे हुए क्षण के साथ हमेशा के लिए ठहर गए और शाम और सुबह में फर्क नहीं कर सके। कुछ लोग जो हमें पहले मिले सुबह के साथी थे, वे सुबह के होकर गये। जो बाद में हमारे संग हुए, शाम के मुसाफिर थे, वे शाम के साथ चले गये।‘

कथा का मुख्य पात्र अपने पिता के माध्यम से गुजरे हुए समय को चित्रित करता है। पचड़े तो सब वही थे जो उसके अपने कालखण्ड में थे लेकिन तब सीधी सरल जिन्दगी थी जिसकी लय धीमी थी। आदमी के पास अपने को परखने और संबंधों को जीने का अवकाश था। घर में बस जीने लायक साधन थे लेकिन सीधी सरल जिन्दगी जीने वाले पिता का घर लौटना उनका अनोखा आनंद था- ''हांफते-हूंफते, मन मुदित घर लौटते, मोहल्ले दर मोहल्ले हाल-चाल पूछते, सलाह-मशवरे, खबरें बांटते। घर के दरवाजे पर हुलसकर आवाज देते, बाई, लो मैं आ गया। खाते हुए भोजन का आनंद याने रस लेते हुए उनकी आंखें मुंद-मुंद जाती और रस-विभोर हो रह-रह कहते। बाई, कैसी उम्दा दाल पकाई।‘’ जब ये दाल की तारीफ करते तो पत्नी को ऐसा गर्व होता जो रानी-महारानी को भी नसीब नहीं होता। जीवन के रस को ग्रहण करने का ऐसा सुंदर वर्णन भाषा का कुशल कलाकार ही कर सकता है। उस दौर में छोटे आदमी की भी एक पहचान थी- 'लोग उनके बारे में किस्से सुनाते रहते, उनके पास एक बड़ा मन था, उसके सिवाय कुछ नहीं था।‘ कहानी में 'ये लोग’ का प्रतिनिधि नैरेटर का बेटा है। जो कारपोरेट की दुनिया में किसी कंपनी का अधिकारी है। 'उसका पदनाम एक सूली है जिस पर उसे लटका दिया गया है और तमाम व्यावसायिक लक्ष्यों की कीलों से हाथ-पैरों और दिल-दिमाग को बींध दिया गया है।‘ यह देश का सुविधा सम्पन्न, उच्च मध्य वर्ग है जिसके जीवन में तमाम भौतिक आराम हैं लेकिन जो कोल्हू की बैल की तरह जोत दिया गया है। उसके जीवन में किसी तरह के रस को ग्रहण करने का अवकाश नहीं है लेकिन वह समझता है कि वह सफलता के घोड़े पर सवार है। यहां तक उसका चिंतक भी क्रोनी कैपिटलिस्टिक दुनिया की तर्ज पर आदर्शविहीन ही नहीं अमानवीय भी हो गया है। कारपोरेट जगत की रणनीति उसकी बेशर्मी है। नैरेटर का बेटा अपने समय की रीति को इन शब्दों में व्यक्त करता है- अब जिसे तैरना आता है और पड़ोसी को डुबाना आता है, राज तो वही करेगा।‘वह स्वयं इस बात को भूल रहा है कि जिन धनपतियों ने उन्हें खरीद लिया है वे उन्हें जोतकर खुद ऊंचे आसनों पर बैठकर जीवन का मजा ले रहे हैं। मजा 'आनंद’नहीं। कथाकार स्वयं प्रकाश ने अपने उपन्यास 'ईंधन’में इस पीढ़ी को मल्टीनेशनल कंपनियों की विराट भट्टी में झोंक दिये ईंधन के रूप में चित्रित किया है।

दरअसल मुकेश वर्मा हमारी असंतुलित सामाजिक संरचना पर उंगली रखते हैं। विषमता के गंधाते कीचड़ में धंसते हुए समाज के विद्रूप को अपनी व्यंग्य-भाषा में परखते हैं। 'वे’ लोग और 'ये’ लोग अपनी चारित्रित विशेषताओं और कमजोरियों के साथ उनकी रचनाओं में उपस्थित हैं। 'ये लोग’ केवल नई पीढ़ी के स्वभाव को रेखांकित करने वाले पात्र नहीं है। नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा तो बेरोजगारी और संघर्ष में जी रहा है। दरअसल उपभोक्तावादी संस्कृति की उपज ऐसे व्यक्ति आत्मकेन्द्रित वर्ग के हैं जिनमें हर उम्र के स्त्री-पुरुष हैं जिनकी चेतना को धन की चमक ने अंधा कर दिया है। इस वर्ग में उनकी कहानी के चार चतुर, नैकलेस की मां-बेटी और सौदागर के कथानायक जैसे लोग शामिल हैं। ऐसे सभी लोग जीवन की सहजता और मूल्यों को तिलांजलि देकर एक आभासी तिलिस्म में निवास करने वाले हैं। अन्यों की बात तो दूर, ऐसे लोग स्वयं अपना चेहरा पहचानना भूल चुके हैं। कुछ को विवशता में इस जाल में फंसना पड़ा है और कुछ समय की गति को देखकर स्वेच्छा से उसे अपनाकर वहां राजी-खुशी हैं। संवेदना के साथ लिखी गई चार बेकार चतुरों की सफलता की कहानी लोकगाथा की तरह रची गई है। अपनी जवानी के दौर में उनमें से कोई चित्रकार बनने की लालसा रखता है तो कोई साहित्यकार। किसी की इच्छा संगीतकार बनने की थी किसी का लगाव नृत्यकला में था। लेकिन बेरोजगारी के चलते उनके स्वप्न ध्वस्त हुए और व्यवस्था के हिस्से बन जाने के लिए वे विवश हुए। लेखक उन्हें यूं पेश करता है कि एक बेकार चतुर किसी के चमकदार जूते में छेद करके घुस गया, दूसरा किसी कलफ लगी कड़क वर्दी के आसपास मंडराने लगा। तीसरा गोलियों की बौछार से उठे जलजले में शामिल हो गया। तो चौथा एक जुलूस का हिस्सा बन गया। फिर अपनी तिकड़म से, जिसे आज की भाषा में योग्यता कहा जाता है, वे खासे सफल व्यक्ति बन गए। रहीम के शब्दों में कहे तो वे स्वर्ण की मादकता में 'बौरा’ गए लोगों के वर्ग में शामिल हो गये। क्या से क्या हो जाने का पछतावा उन्हें क्षणभर होता है फिर वे अपनी रौ में बह जाते हैं। स्वर्ण की मादकता को नैकलेस कहानी की मां-बेटी जीवन की सार्थकता मानती हैं। पति के असंयमित व्यवहार से नाराज श्रीमती पाल की धनाढ्य माताजी की फोन पर प्रतिक्रिया है कि लड़की ने सड़ी किताबों को पढ़कर अपना दिमाग खराब कर लिया है इसलिए सुबह-सुबह फालतू पुराण ले बैठी है। वास्तविक जिन्दगी तो जिल्द से बाहर है। लेकिन उनकी धारणा शायर के जीवन दर्शन 'जिंदगी क्या है किताबों को हटाकर देखोÓ से भिन्न है। वे बेटी से कहती हैं- 'बेवकूफी की बातें मत करो, अरे सुन, तुझे बताने के लिए कब से उतावली थी तनिष्क ने हीरों के हार की नई डिजाइन पेश की है... आजादी की स्वर्ण जयंती पर भारतीय नारियों को अनुपम सौगात...।‘ मम्मी की व्यावहारिक सलाह को शिरोधार्य करके पति से पांच लाख चौंसठ हजार का हीरों का हार लेकर श्रीमती पाल यह मान लेती हैं कि वैश्वीकरण की उदारता में पति की थोड़ी सी बेवफाई का कोई प्रभाव दाम्पत्य जीवन पर नहीं पडऩा चाहिए। लेखक का व्यंग्य है 'श्रीमती अरुणा पाल समझदार महिला हैं।‘ यही कैफियत 'सौदागर’ कहानी के कथा नायक की है जो कैरियर बनाने के लिए अपने मूल स्वभाव को त्याग कर बहुत दूर चला जाता है। चमकीली दुनिया में बैकडोर से घुसने के लिए उसने प्रभावशाली राजनीतिज्ञ की बेटी से शादी की जो बला की बदतमीज, फूहड़ और बददिमाग थी। इसका उपाय उसे उन्नति का मार्ग बतलाने वाले चाचा ने यह बतलाया कि 'जो गुड़ से मर जाए उसे जहर देना बेवकूफी है।‘ वह अपनी पत्नी को ड्रग्स की आदत लगा देता है- 'मुझे तराजू को हर हाल में अपनी तरफ झुकाना आने लगा था। सच्चे सौदे के लिए ऐसे झूठ की जरूरत होती है जो सच्चा लगे।‘

'सत्कथा कही नहीं जाती’ संकलन की कहानियों के दो बिन्दु ध्यातव्य है। पहला यह कि मुकेश अपने अनुभव संसार से कहानियां रचते हैं और मध्यवर्गीय जीवन स्थितियों को अपने  रचनाकर्म का आधार बनाते हैं। मध्य वर्ग के विरोधाभासों का मखौल उड़ाते हैं लेकिन निम्न वर्ग के प्रति गहरी संवेदना उनकी रचनाओं में उपस्थित है। समय आम आदमी के अनुकूल नहीं है। वह परिस्थितियों में पिस रहा है अत: कथा साहित्य (और कविता भी) में मनुष्य की पीड़ा, छटपटाहट मुख्य रूप से चित्रित होती है। किन्तु इस भीषण समय में (सत्ता के चश्मे से देखिए तो स्वर्ण युग और कागजी आंकड़ों में लगभग न्याय-संगत रामराज्य) भी आदमी का हौसला, उसकी जिजीविषा और मानवीयता बची है जिसकी स्वाभाविक और तर्कसंगत पक्षधरता हमारे साहित्य का महत्वपूर्ण आयाम है। 'बिलैडी फूल’ कहानी के तीन कोने हैं। एक पर साहब की तरह साहब है- घमंडी और दूसरों का अपमान करने वाला। दूसरे कोण पर है दब्बू और मजबूर क्लर्क और तीसरे कोण पर है दुर्जन सिंह चपरासी जिसे ऑफिस के लोग साहब का चौकन्ना खास आदमी मानते हैं। साहब के द्वारा अपमानित किए जाने पर, स्वाभिमान पर ठेस लगने से वह त्यागपत्र दे देता है। अन्य मुलाजिमों की नजरों में वह बेवकूफ है लेकिन वही दुर्जन सिंह अपनी जिजीविषा के दम  पर अपने बेटे के साथ मिलकर स्वयं का दूध दही का व्यवसाय शुरू कर देता है। दब्बू और व्यक्तित्वविहीन क्लर्क उसे देखता  है तो महसूस करता है कि उसने कई आदमी देखे हैं लेकिन 'उन सबके बीच इन सबसे ऊपर ऊंचे आसमान तक फैलता दुर्जन सिंह दिखा और दूर ठहर गया। बुलाता हुआ मैं उसकी तरफ बढऩा चाहता हूं लेकिन जिस्म जैसे ठस्स हो गया है। यह कहानी एक साथ टिर्रू अधिकारी, दब्बू क्लर्क और दुर्जन सिंह के माध्यम से समाज में मानव संबंधों का एक नक्शा पेश करती है। ये स्वभाव व्यवस्था एक बेईमान व्यवस्था गढ़ती है।

'रिश्तेÓ कहानी भी इस उम्मीद को रेखांकित करती है कि यदि प्रवासी बेटे-बहू वृद्घ माता-पिता को भुला चुके हैं तो निश्छल प्रेम और आदर भाव से मनोज और पूनम जैसे पड़ोसी भी हैं जो संबंधों का निर्वाह करते हैं। संबंधों की लौ मंदी पड़ गई है लेकिन किसी अप्रत्याशित शुभ समाचार की तरह अभी भी उसमें रोशनी शेष है। 'सौदागर’ कहानी का नायक एक संवेदनशील प्रेमी से रूपांतरित होकर आत्मकेन्द्रित, स्वार्थी और घमंडी व्यक्ति बन चुका है। वर्षों के बाद संकटों से घिरी अपनी प्रेमिका से मिलता है तो पहले तो उसका सौदागर मन इसे भोग कर प्रेम में अपनी पराजय की कुंठा को तृप्त करने का इरादा रखता है लेकिन ऐन वक्त पर उसके अंदर सात्विक प्रेम का झरना फूटता है और उसे लगता है- 'इन आंखों में अब तक अदेखा ऐसा नूर है जिसे अपनी आंखों में समेटने की मेरी ताब नहीं थी। इसका सौदा नहीं हो सकता। दुनिया की तमाम तराजुएं टूट चुकी हैं।‘ स्वार्थ की राख की मोटी परत के नीचे कहीं आग की चिंगारी शेष है। यह आकस्मिक नहीं है क्योंकि कथा नायक का युवावस्था का गहरा प्रेम हृदय के किसी कोने में मौजूद था। इसे विस्तार करके देखें तो समाज की संवेदना अभी पूरी तरह नष्ट नहीं हुई है।

वस्तुत: मानव जीवन संभावनाओं से युक्त है। कुरुपता और वैमनस्य है तो सौन्दर्य चेतना और मैत्री की लालसा भी है। जीवन की परिस्थितियां और समाज व्यवस्था में होने वाले परिवर्तन मनुष्य के अंतर्मन को प्रभावित करते हैं। आज के हालात में छद्म और दुर्गुण छिपाकर रखने की चीज नहीं बल्कि कभी-कभी इन्हें गौरवान्वित भी करने में आदमी हिचकता नहीं है। लेकिन संवेदनाएं शेष हैं और संघर्ष की क्षमता अभी भी समाप्त नहीं हुई हैं। संघर्ष पेचीदा है परिस्थितियों की ही तरह लेकिन उससे भिडऩे की तैयारी  भी जारी है। सफल हो या न  हो। संकलन की एक कहानी है प्रशिक्षण। कथानायक महाविद्यालय में पढऩे वाला युवा है। घर में गरीबी है। एक दिन भोजन प्राप्ति की उसकी सारी संभावननाएं चुक जाती हैं। दुर्भाग्य यह कि घर लौटने पर पता चलता है कि रोटियां खत्म हो गई हैं। उसका भाई इस स्थिति से उद्वेलित है किन्तु कथानायक उसे भविष्य में संघर्ष करने का प्रशिक्षण मानते हुए कहता है 'यह अभ्यास है। सपने सिर्फ देखे नहीं जाते, उन तक पहुंचा जाता है, नींद से नहीं संघर्ष से। यह उसी संघर्ष का अभ्यास है।‘ यूं उसकी यह संघर्ष चेतना कहानी में स्वाभाविक नहीं लगती। कथानायक के दिनभर के क्रियाकलाप उसकी आर्थिक स्थिति को प्रतिबिंबित करते  हैं, उसकी भूख की गहराई को भी नापते हैं किन्तु उसमें ऐसी बौद्घिक चेतना का आभास नहीं है जो संघर्ष के लिए जरूरी है। हां,  भूखे  रहने का प्रशिक्षण वह अवश्य है। इसके बरक्स गहरी संवेदना से युक्त उनकी कहानी 'जूते’ है। शहर में हुए साम्प्रदायिक तनाव के बीच सौहाद्र्र और भाईचारे का निर्वाह करने वाले लोग हैं, वहीं यह करुण संयोग है कि लूटपाट करता लड़का अपने ही घर में आश्रय लिए पिता के मित्र इस्माइल चाचा की जूते की लुटती हुई दुकान से जूते की जोड़ी चुरा लाता है। यह लड़का वर्षों तक अपने इस अपराधबोध से ग्रस्त रहता है। उसे याद आता है कि जूतों की जोड़ी को देखकर, 'नैरेटर को बेहद प्यार करने वाले इस्माइल चाचू अपनी पत्नी से कहते हैं- 'आठ नंबर का जूता उठा लाया कमबख़्त। इसके बाप तक को नहीं आएगा। भले आदमी तरीके से लूटना तो सीख। मेरी दुकान का ही है, अब की बदल कर ले आऊंगा।‘’जब लूटने वाला बच्चा यह सुनकर रोने लगता है तो चाचू का कथन...'देखो, मियां, बड़ा हो गया न मेरा राजा बेटा।... मेरा मिट्ठा...’ कहानी को ऐसी ऊंचाई देता है जो बहुत शब्दों के अपव्यय के बावजूद नहीं मिल सकती। भाषा की यह व्यंजना पाठक को लेखकीय कुशलता के प्रति आश्वस्त करती है और उसे अपने प्रभाव में ले लेती है। यह कहना जरूरी है कि पठनीयता एक ऐसा गुण है जो कहानी के मंतव्य तक पाठक को ले जाती है।

मुकेश की भाषा उनके रचना संसार का महत्वपूर्ण अंग है। उनकी कहन का कैनवास विस्तृत और बहुरंगी है। वक्रता उनकी भाषा का प्राण तत्व है जिसमें एक प्रसन्न व्यंग्य बोध है जिसे साधने की कला में वे प्रवीण हैं। संकलन की शीर्षक कथा 'सत्कथा कहीं नहीं जाती’ इसका प्रमाण है। इस कहानी की चुटीली भाषा के कई वाक्य व्यंग्य के श्रेष्ठ उदाहरण हैं- शानदार उद्घरणों की तरह। मुकेश उवाच के मौलिक खिलदंड़पन की बानगी के कुछ उदाहरण देखिए-

-ऐसा नहीं है कि मूर्खता का उम्र से कोई ताल्लुक नहीं है। देखा गया है कि दोनों समानांतर गति से बढ़ती रहती है, छायावादी काल में नदी के किनारों की तरह और उत्तर आधुनिक काल में रेल की  पटरियों की तरह।

- अगर कोई कविता लिखता है तो दूसरे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। संविधान में चाहे कुछ होने दिया हो लेकिन यह तो निश्चित रूप से नहीं होने दिया है कि इस विशेषाधिकार का कोई हनन कर सके।

- वे गांव गये। पिता से मिले। इतने बड़े आदमी को अपने घर के दुआरे पाकर पिता जिनने खुश हुए, उससे ज्यादा विनीत हुए।

किन्तु क्या कारण है कि जानदार, दिलचस्प भाषा के बावजूद यह संकलन की अन्य रचनाओं की तुलना में कमजोर रचना लगती है। दरअसल भाषा-प्रवीण रचनाकार जब स्वयं ही अपनी  भाषा का मजा लेता हुआ सा प्रतीत होता है तो विषय वस्तु से अधिक भाषा ध्यान आकृष्ट करती है। शब्दों का अतिरेक मंतव्य को तरल बनाता है। एक मध्यवर्गीय कैरियरिस्ट व्यक्ति तिकड़म और बैसाखियों के सहारे बड़ा आदमी बनता है कि बाप भी उसके घर आने पर प्रसन्न से कहीं अधिक विनम्र होता है। अपने रचनाकर्म में वे जहां  भी भाषा की नक्काशी पर थम जाते हैं वहां झोल पैदा होता है। शिल्प के साथ ही वस्तु को जब साधते हैं तो शिल्प का कसाव ध्यान आकृष्ट करता है। दिलों की एक आवाज ऊपर उठती कहानी में तीन सौ अड़तासवीं मंजिल से नीचे गिरते आदमी का काल्पनिक शिल्प व्यवस्था से निर्मित मनुष्य के चरित्र और नजरिये की ओर इँगित करते हुए सामाजिक यथार्थ तक पहुंचाता है। गिरते हुए आदमी को हर मंजिल पर जो दिखलाई-सुनाई देता है वह समाज की जड़ होती संवेदना का रेखांकन है। आकार में छोटी यह कहानी पात्रों की प्रतिक्रियाओं का दिलचस्प चित्रण है। गिरता हुआ आदमी औरों के लिए मात्र एक दृश्य है जिसे देखकर कोई कहता है- 'भूख मांगने का नया तरीका निकाला है।Ó किसी जरूरतमंद की जिज्ञासा है- 'भाई साहब कहां नौकरी करते थे।‘ बच्चों को लगता है- यह सुपरमैन है पर लाल चड्डी के बिना और किसी का सवाल है- कैसे गिरे।

डिटेल्स देने में मुकेश प्रवीण हैं और मध्यवर्गीय समाज के कोने-अंतरे में झांककर विषय वस्तु का चयन कर लेना उनकी विशेषता है। उनके व्यक्तित्व की छाप उनकी रचनाओं में स्पष्ट देखी जा सकती है। उनकी कहानियों का एक उज्ज्वल पहलू यह है कि उनकी रचनाओं में वक्रता की अंतर्धारा मानव मूल्यों का दामन नहीं छोड़ती।  ठ्ठ

कहानी संग्रह- सत्कथा कही नहीं जाती

लेखक- मुकेश वर्मा

प्रकाशक- वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली

मूल्य- 395 रू.