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Thursday 23 Nov 2017

ग्रामीण समाज पर आधारित हिंदी उपन्यासों पर हुए शोध का इतिहास और वर्तमान स्थिति

भारतीय समाज, साहित्य और गांव

जनगणना 2011 के अनुसार भारत की कुल आबादी तकरीबन 1 अरब, 21 करोड़ है, इसमें 68.8 प्रतिशत यानी करीब 83 करोड़ आबादी ग्रामीण है, वहीं शहरी आबादी 31.2 प्रतिशत है। भारत में गांवों की संख्या 6 लाख 40 हजार 932 है और शहरों की सिर्फ  7 हजार 933। इनके मुकाबले हम भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद देखें तो पहली जनगणना 1951 में 82.7 प्रतिशत आबादी ग्रामीण थी। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले 1901 की जनगणना में ग्रामीण आबादी 89.2 प्रतिशत थी। इन आंकड़ों से साफ  है कि भारत मुख्य तौर पर गांवों को देश रहा है। आज शहरीकरण के चकाचौंध में हम मदहोश हैं लेकिन तथ्य यही है कि भारत की बहुसंख्यक आबादी गांवों में है। इस लिहाज से चाहे कोई भी विधा हो, गांवों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए अगर हम साहित्य की भी बात करें तो उसमें गांवों को नजरअंदाज करना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। हिंदी साहित्य के उपन्यासों की बात भी गांवों के बगैर पूरा नहीं कर सकते। हिंदी उपन्यासों में गांवों की बात करें तो इसमें मुख्य तौर पर किसान या कृषि, वहां का जीवन, रुढिय़ां-परंपराएं, संस्कृति और संघर्ष आएगा। इस तरह अगर हम हिंदी उपन्यासों पर शोध को देखना चाहते हैं तो ग्रामीण पृष्ठभूमि के उपन्यासों पर शोध की बात करनी चाहिए क्योंकि भारत की बड़ी आबादी ग्रामीण ही है।

गांव शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से ग्राम शब्द से हुई है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के वर्धा हिंदी शब्दकोश के मुताबिक गांव का अर्थ है- शहर से दूर खेतीबारी पर अवलंबित किसानों-खेतिहरों का निवास। इसी तरह विश्व हिंदी शब्दकोश या मानक हिंदी शब्दकोश में भी गांव के ऐसे ही अर्थ दिए गए हैं। इस तरह से हम देखते हैं कि गांव के समाज से कृषि, खेतीबाड़ी या मजदूरी आदि चीजें जुड़ी हुई है। ग्रामीण समाजशास्त्र किताब में सुनील गोयल गांवों के तीन प्रकार बताते हैं-एक जो खेती-मजदूरी पर निर्भर है, दूसरा कुटीर उद्योगों पर और तीसरा जो दोनों पर आधारित है। गांवों के बदलते परिवेश पर बात करें तो गोयल का वर्गीकरण उचित नजर आता है। इस तरह अगर हम हिंदी उपन्यासों पर शोध की बात करेंगे तो कृषि और किसान इसमें अवश्य आएंगे, हम यह भी कह सकते हैं कि किसान और उससे संबंधित वर्गों या चीजों की बात करना बुनियादी तौर पर गांव की झलक दे देता है।

शुरुआती साहित्यिक उपन्यास

भारतीय साहित्य की बात करें तो ओडिय़ा उपन्यासकार फकीर मोहन सेनापति (1843 से 1918) का छह माण आठ गुण्ठ भारतीय भाषाओं का प्रथम ग्राम केंद्रित उपन्यास है। 1897 से उत्कल पत्रिका में इसका धारावाहिक प्रकाशन होता रहा था। 1902 में यह उपन्यास पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। मशहूर आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने इस उपन्यास को राष्ट्रीय रूपक कहा है क्योंकि उनके कथानुसार किसी एक व्यक्ति की व्यथा-कथा ही नहीं है बल्कि जैसे पूरे समूह की देश की आत्मा का चीत्कार है। छह माण आठ गुण्ठ पूरा भारत है। इसकी कथा के केंद्र में खेत, गाय और ग्रामीण वर्ग है। नामवर सिंह ने कहा है कि भारत में उपन्यास का उदय मध्यवर्ग की महागाथा के रूप में नहीं बल्कि किसान जीवन की महागाथा के रूप में हुआ और विकास की कड़ी वहां से शुरू होती है। नामवर सिंह ने तो यहां तक कहा है, मेरी दृष्टि से सच्चा सही अर्थों में पहला भारतीय उपन्यास छ: माण आठ गुण्ठ है।

सेनापति के ग्रामीण उपन्यास की यह परंपरा बांग्ला में शरतचंद्र के पल्ली समाज (1966) और बाद में गंभीर रूप से हिंदी साहित्य में कथासम्राट प्रेमचंद में पुष्ट होती है। इसमें फणीश्वर नाथ रेणु के मैला आंचल का भी पूर्वाभास देखा जा सकता है। हिंदी में भारतेंदु काल से उपन्यास लिखने का कार्य शुरु हुआ। हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों में ग्रामीण जीवन का चित्रण होता रहा है, लेकिन हिंदी उपन्यासों में भारतीय ग्रामीण जीवन से सभी पहलुओं का यथार्थ चित्रण प्रेमचंद के उपन्यासों में सशक्त रूप से उभर कर सामने आता है। प्रेमचंद के उपन्यासों में ग्रामीण जीवन का विशद चित्रण है। प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, कर्मभूमि और गोदान में ग्रामीण जीवन की विस्तृत और महत्वपूर्ण प्रस्तुति है। प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में किसान जीवन की त्रासदी, पूंजीवाद तथा जमींदारी प्रथा के शोषण के साथ-साथ समाज में उपस्थित वर्ण व्यवस्था और पुरुष सत्ता की गुलामी के शिकार स्त्री, दलितों की कथा यथार्थपरक चित्रण किया है। 1935 के एक साक्षात्कार में प्रेमचंद ने कहा था- मेरा बचपन गांव में ही बीता और 1907 से 1914 के सात वर्षों में मैं गांव-गांव घूमता रहा। इसलिए मुझे किसानों के प्रति आत्मीयता का अनुभव होता है। इसी युग में ही रेणु मैला आंचल और परती परिकथा उपन्यासों के जरिए आंचलिक उपन्यासों की अवधारणा देते हैं और उसे पुष्ट करते हैं। इन उपन्यासों में भी स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान गांव के बदलते स्वरूप और संघर्ष का चित्रण है। इस तरह हम कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य में उपन्यासों का शुरूआती उभार किसान और गांव की धुरी में ही होता है और विकास भी उसी के साथ-साथ। कहना न होगा कि इसका कारण उस दौर में देश के कुछ हिस्सों को छोड़कर अधिकांश क्षेत्रफल का ग्रामीण होना है।

ऐसे उपन्यासों पर शोध का इतिहास और स्थिति

यदि हम भारतीय ग्रामीण जीवन पर  केंद्रित उपन्यासों पर हुए अकादमिक शोध की स्थिति का अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि भारतीय जीवन को लेकर शोध कार्य भारत के अग्रणी विश्वविद्यालयों में समय-समय पर होते रहे हैं। इस संबंध में मैं कुछ शोधों का जिक्र कर रहीं हूं जो मुझे उपलब्ध हुए हैं। इस तरह के शुरूआती शोधों पर नजर डालें तो जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में सन् 1975-76 सत्र के शोध छात्र रामवक्ष जाट ने प्रोफेसर नामवर सिंह ने निर्देशन में प्रेमचंद और भारतीय किसान विषय पर शोध कार्य किया है। अपने शोध कार्य में उन्होंने भारतीय समाज और साहित्य में किसानों के महत्व को पहचानने के साथ-साथ उसके वर्ग संबंधों के उद्घाटन का प्रयास करते हैं। उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन में किसानों की भूमिका के साथ ही प्रेमचंद के साहित्य में किसानों के आर्थिक शोषण की प्रक्रिया का विस्तार पूर्वक विवेचन प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपने शोध के जरिए उस उपन्यासों में वर्णित उस व्यवस्था, प्रक्रिया और वर्ग संबंधों को उद्घाटित करने की कोशिश की है, जिसकी वजह से किसान पीडि़त हंै और गांव उनसे प्रभावित हैं। अपने इस शोध कार्य में उन्होंने उन तमाम कारणों की पड़ताल की है जो किसानों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक त्रासदी का कारण हैं। उन्होंने अपने शोध में दिखाया है कि प्रेमचंद मानते हैं कि किसान समाज का आधार होता है। समाज का उत्पादक वर्ग किसान है। उसी की उन्नति से देश की उन्नति संभव है। उसकी बदहाली देश की बदहाली है। रामबक्ष जी ने अपने शोध में किसानों के महत्व के अतिरिक्त किसान के वर्गीय संबंधों, उसके जीवन की जटिलता, उसके आर्थिक शोषण की प्रक्रिया, गांव या किसान का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन जैसे सवालों की पड़ताल करने का प्रयास किया है। प्रेमचंद के प्रेमाश्रम उपन्यास के बारे में रामबक्ष बताते हैं कि इसका मुख्य विषय किसान और जमींदार का संबंध है। उनके मुताबिक इस उपन्यास में किसानों के जीवन का वर्णन कम और दूसरे वर्ग के लोगों के साथ उनके संबंध कैसा है, इसका वर्णन ज्यादा है। इस उपन्यास में जमींदार के बाद किसानों का शोषण ब्रिटिश नौकरशाही करती है। वहीं प्रेमचंद ने किसानों की परेशानियों से निकलने का तरीका प्रेमाशंकर पात्र के प्रेमाश्रम को बताया है। यानी मानवतावादी लोग एकत्र हों उनमें धर्मबुद्धि जागे और वे किसानों के बीच मिशनरी कार्य करें। रामबक्ष के मुताबिक यह उपाय दरअसल तात्कालीन समाज और प्रेमचंद की सीमा है। गांधी जी ने साबरमती आश्रम खोला था, अरविंद पांडिचेरी चले गए थे और रविंद्रनाथ टैगोर ने शांतिनेकतन खोला था।

वहीं रामबक्ष रंगभूमि उपन्यास के बारे में कहते हैं कि इसमें शहर और गांव के आपसी रिश्तों की पहचान, औद्योगीकरण और शहरी जीवन के दुष्प्रभाव के साथ देहात को उजड़ते हुए दिखाया गया है। बढ़ते हुए पूंजीवाद के सामने सामन्तयुग की पुरानी व्यवस्था नहीं ठहर सकती। यानि कि औद्योगिकरण और पूंजीवाद की आहट तो उसी समय पहचान ली गई थी। इस उपन्यास के केंद्रीय पात्र पाण्ड़ेपुर के निवासी किसान नहीं हैं बल्कि विभिन्न तरह के देहाती काम करने वाले ग्रामीण हैं। रामबक्ष मानते हैं कि कुल मिलाकर उपन्यास के अंत में अंग्रेजी साम्राज्यवादी क्लार्क यानी कि शहर यानी साम्राज्यवाद की जीत होती है और सूरदास, विनय यानी देहात की हार।

रामबक्ष अपने शोध में उद्घाटित करते हैं कि बाद में प्रेमचंद कर्मभूमि उपन्यास में गांव के धार्मिक शोषण और जाति व्यवस्था को भी चित्रित करते हैं। इसमें जमींदार महंतजी हैं जो धर्म का दुहरा शोषण करते हैं। लेकिन लगानबंदी में जमींदार, कारिन्दा, पुलिस आदि की श्रृंखला को सीधे अंग्रेज सरकार से जोड़ दिया है। वहीं गांव में किसान आंदोलन भी छिड़ा हुआ है। वहीं गोदान में उपर्युक्त समस्याओं के साथ-साथ शहरीकरण और उसके प्रभाव, बिरादरी, संयुक्त परिवारों का जुटना जैसे सामाजिक परिवर्तन को भी स्वर देते हैं। जमींदार, महाजन, धर्म के अलावा होरी बिरादरी से भी पीडि़त होता है। आधुनिकीकरण और नगरीकरण के प्रभाव में गोबर शहर से आकर बदल गया है। होरी संयुक्त परिवार की चेतना का व्यक्ति है जबकि गोबर के जीवन में व्यक्तिवाद का प्रवेश होने लगता है। वहीं गोदान में किसान के शोषकों की कतार में खन्ना जैसा बैंकर भी शामिल है।

वहीं प्रेमचंद का समय औपनिवेशिक शासन का समय है। प्रेमचंद उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में किसानों की भूमिका को निर्णायक मानते हैं। उपनिवेशवाद के विरोध में किसानों की भूमि के संदर्भ में फ्रेंज फेनन का मत है कि औपनिवेशिक देशों में मात्र किसान ही क्रांतिकारी होते हैं क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, जबकि पाने के लिए सब कुछ होता है। इस तरह हम देखते हैं कि रामबक्ष जाट ने अपने शोध कार्य में बताया है कि उन तमाम समस्याओं से जूझता हुआ किसान परिस्थितियों को तोड़ता हुआ और नई परिस्थितियों का निर्माण करता हुआ उभरकर सामने आता है। रामबक्ष जाट ने अपने शोध में ग्रामीण समाज और किसान से जुड़ी उपर्युक्त चीजों को उद्घाटित किया है। इसमें उपनिवेशवाद है, जमींदारी है, जाति व्यवस्था है, गांव की सरलता है, तो धीरे-धीरे नगरीकरण का प्रभाव भी प्रवेश कर रहे हैं।

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में 1975-76 सत्र के छात्र नगेंद्र प्रताप सिंह ने भी मैनेजर पांडेय के निर्देशन में प्रेमचंद और यथार्थवाद (उपन्यासों के संदर्भ में) विषय पर शोध किया। रामनाथ मेहता ने डॉ.एस पी सुदेश और डॉ. बी.एम. चिंतामणि के शोध निर्देशन में 1978.79 में प्रेमचंद के साहित्य में सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति विषय पर शोध कार्य किया। इस शोध कार्य में उन्होंने प्रेमचंदयुगीन सामाजिक समस्याओं का विवेचन किया है। वे दिखाते हैं कि प्रेमचंद ने अपने उपन्यास में विधवा विवाह, वेश्या, बेमेल विवाह, दहेज, जमींदार वर्ग के शोषण आदि तात्कालिक समस्याओं का चित्रण किया है। अपने शोध कार्य में उन्होंने दिखाया है कि प्रेमचंद के रचनात्मक लेखन के दो स्वर हैं, पहला अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरोध में स्वाधीनता आंदोलन, दूसरा किसानों की बदहाली के साथ सामंतवाद का विरोध, तीसरा प्रेमचंद मूलत: सामाजिक जीवन के लेखक हैं, उन्होंने वैयक्तिवादी जीवन का चित्रण बहुत कम किया है।

इसके अतिरिक्त ग्रामीण जीवन को केंद्र में रखकर किए गए शोध में रुहेलखंड विश्वविद्यालय की छात्रा शमां ने डॉ कुंदनलाल जैन के निर्देशन में सन् 1982 में हिंदी उपन्यासों में ग्रामीण संस्कृति विषय पर शोधकार्य किया। अपने शोधकार्य में उन्होंने भारतीय ग्रामीण संस्कृति, रीतिरिवाज, जीवनशैली की पड़ताल की है। इसके अलावा सन 1982 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रा किरण श्रीवास्तव ने हिंदी उपन्यास में गांव, नगर एवं महानगर का चित्रण विषय पर शोधकार्य किया है। श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय के छात्र हुसैन वली ने डॉ. दस्तगोर के निर्देशन में 1989 में प्रेमचंद के उपन्यासों में ग्राम जीवन विषय पर शोध कार्य किया। अपने शोधकार्य में उन्होंने प्रेमचंदयुगीन ग्रामीण समाज की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक समस्याओं का यथार्थ चित्रण किया है।

सन् 1986 में वी. एन. हेगडे ने कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, सिर्सी (उत्तर कन्नड़ जिला) के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ आर.एन. हेगड़े के निर्देशन में फणीश्वरनाथ रेणु पर शोध किया। उन्होंने रेणु के आंचलिक उपन्यासों जैसे मैला आंचल और परती परिकथा को शोध का आधार बनाया है। उन्होंने विवेचना की है कि मैला आंचल का मेरीगंज गांव अपने अंचल के पिछड़े गांवों का प्रतीक है। मैला आंचल की आधी कथा स्वतंत्रता से पहले की है तो आधी कथा स्वतंत्रता के बाद की है।  मैला आंचल में उभरकर आता है कि किस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी पिछड़े इलाकों. गांवों में सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है और जातिवाद, क्षेत्रवाद, सामंतवाद का वर्चस्व है। इसी तरह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में 1986-87 बैच के छात्र उमेश प्रसाद शर्मा ने प्रो. एस. चंद्र के निर्देशन में नागार्जुन और रेणु के उपन्यासों में अभिव्यक्त जनजीवन का तुलनात्मक अध्ययन विषय पर शोध कार्य किया। वहीं इसी विश्वविद्यालय में एमफिल 1985-86 बैच में प्रेम कुमारी सिंह ने डॉ.मैनेजर पांडेय के निर्देशन में शैलेश मटियानी के आंचलिक उपन्यास पर शोध कार्य के लिए दाखिला लिया।

शोध की वर्तमान स्थिति, बदलाव और दिशा

सन् 1991 में भारत ने मुक्त बाजार की अर्थ नीति को अपनाया। इसके साथ ही संचार क्रांति का सूत्रपात हुआ। इसने भारतीय जीवन को अनेक कोणों से प्रभावित किया। वैश्वीकरण ने समाज साहित्य और संस्कृति में लगातार अंतर्विरोधों को उकसाया है। फलत: उपन्यास में जितनी विविधता आज है उतना पहले कभी नहीं थी। वरिष्ठ कथाकार संजीव का ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित 2015 में प्रकाशित उपन्यास फांस इसका ताजातरीन उदाहरण है। संजीव के उपन्यास में वर्णित गांव प्रेमचंद और रेणु के कथासाहित्य में वर्णित गांव से भिन्न हैं। प्रेमचंद का समय उपनिवेशवाद का समय था। वहीं समाज में सामंत और जमींदार वर्ग का वर्चस्व था। इसी कारण प्रेमचंद का किसान जाति व्यवस्था से पीडि़त है तो वहीं फांस की पृष्ठभूमि में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है और यह किसान भूमंडलीकरण की वजह से बहदाल है। इसी बदलाव को ग्रामीण जीवन के उपन्यासों पर हुए शोधों में पहचाना जा सकता है। 1990 के बाद भारतीय ग्रामीण जीवन पर हुए शोध को देखें तो दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र शुभ नारायण सिंह ने डॉ. तेज सिंह के निर्देशन में 2008 में स्वातंत्रोत्तर भारत में ग्रामीण समाज में बदलते मानव संबंधों और रेणु का उपन्यास विषय पर शोधकार्य किया है। अपने शोध में उन्होंने दिखाया है कि किस प्रकार गांवों के बदलते स्वरूप में ग्रामीणों की पारिवारिक और सामाजिक संरचना ने नया रूप ले लिया है। संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवारों का वर्चस्व हो गया है। एकल परिवार में भी अलगाव, अविश्वास की स्थिति ने पारिवारिक संबंधों में भयानक दूरियां बना दी है। घर-जमीन का बंटवारा अदालत तक पहुंच गया है। वहीं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में 2004-5 बैच के छात्र अरुण कुमार ने डॉ. ज्योतिसर शर्मा के निर्देशन में हिन्दी उपन्यासों में अभिव्यक्त ग्रामीण यथार्थ विषय पर शोध के लिए दाखिला लिया था, यहींएमफिल 2000.01 बैच में विवेकानंद उपाध्याय ने प्रेमचंद की उपन्यासों की कथा, भाषा (सेवासदन, कर्मभूमि और गोदान के संदर्भ में) विषय पर शोध के लिए दाखिला लिया था।

 2009 में दिल्ली विश्वविद्यालय की शोधछात्रा पूनम रानी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद के निर्देशन में फणीश्वरनाथ रेणु के कथा साहित्य में सामाजिक विकास का प्रश्न विषय पर शोधकार्य किया है। इसी तरह रीता सिंह ने वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर की प्रोफेसर डॉ. कंचन राय के निर्देशन 2011 में फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों में यथार्थवादी परिदृश्य विषय पर शोध किया। शोध के उपसंहार में रीता सिंह लिखती है कि परती परिकथा में भूमि संबंधित सरकारी सुधार नीतियों तथा जमींदारी उन्मूलन आदि की विफलताओं से उत्पन्न प्रश्नों को औपन्यासिक ढंग से विचार किया गया है।

इस तरह हम देखते हैं कि हालिया दो दशकों में भी ग्रामीण समाज पर केंद्रित उपन्यासों के शोध के संबंध में प्रेमचंद और रेणु जैसे उपन्यासकार प्रासंगिक या सर्वथा महत्वपूर्ण बने हुए हैं। हालांकि वैश्वीकरण और उदारीकरण के बाद की पृष्ठभूमि की पहचान भी शोध में की जाने लगी है।

हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र गजुला राजू ने 2010 में संजीव के उपन्यासों में लोक जीवन विषय पर शोध किया है। उन्होंने अपने शोध में भूमंडलीकरण और आधुनिकता बनाम लोक जीवन की विवेचना की है। गांव और किसानों, मजदूरों औऱ वंचितों के शोषण में लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ-साथ भूमंडलीकरण अहम हो गए हैं। इसके साथ ही लोकतांत्रिक समाज में व्यवस्था किस तरह ग्रामीण और वंचितों का शोषण कर रही है, इसका चित्रण है। भूमंडलीकरण इस शोषण को और तीव्र कर देता है। संजीव की भाषा के जरिए शोधकर्ता ने यह भी उल्लेखित किया है कि उनके उपन्यासों में उसकी पृष्ठभूमि वाले जगहों की लोकभाषाएं बोली और उक्तियों का खूब इस्तेमाल है। हिन्दी उपन्यासों में गांवों के बदलते स्वरूप में गांवो की बदलती भाषा भी शामिल है। भाषिक स्तर पर एक ओर ग्रामीणों की भाषा पर स्थानीय बोली-बानी का असर है तो दूसरी ओर हिन्दीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति और अंग्रेजीकरण का भी प्रभाव है। नई सामाजिक चेतना प्रदत्त भाषा ने ग्रामीणों के भाषिक वैभव को व्यापकता दी है और स्थानीय भाषिक प्रयोग ने स्थानीयता को संपुष्ट किया है। जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय की छात्रा नीलम रानी ने 2012 में अब्दुल बिस्मिल्ला के निर्देशन में हिंदी उपन्यासों में गांवों का बदलता स्वरूप (1991 से अद्यतन) विषय पर शोधकार्य किया। अपने शोधकार्य में उन्होंने हिन्दी उपन्यासों में गांवों की अवधारणा और उसके बदलते स्वरूप को उद्घाटित करने की कोशिश की है। भारतीय गांव अपने प्रारंभिक स्वरूप से आज तक कि एक सुदीर्घ यात्रा में काफी बदल चुका है। ब्रिटिश काल की बजाए स्वतंत्र भारत में गांवों में परिवर्तन तीव्र गति से हुआ है। परिवर्तन के फलस्वरूप गांव में पहले से चली आ रही व्यवस्था, जीवन पद्धति, जीवन मूल्य, जाति-धर्म-संस्कृति, वेशभूषा, खानपान, रीतिरिवाज, राजनीतिक विचारधारा, उत्पादन पद्धति में बदलाव नजर आने लगा है। अपने शोध कार्य में उन्होंने बदलाव के कारणों का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि गांव के बदलते स्वरूप के पीछे प्राकृतिक शक्तियां, शिक्षा, संस्कृतिकरण, पश्चिमीकरण, वैश्वीकरण, प्रौद्योगिकी, औद्योगिकरण, शहरीकरण आदि प्रमुख कारक सक्रिय हैं। जैसे-जैसे गांवों का स्वरूप बदला जीवन मूल्यों में भी बदलाव आया है। परंपरागत परिवार, विवाह, नातेदारी जाति व्यवस्था आदि ग्रामीण सामाजिक संस्थाओं का स्वरूप आधुनिक हो चुका है। अपने शोध कार्य में उन्होंने प्रारंभिक हिंदी उपन्यासों में ग्रामीण जीवन का चित्रण, स्वतंत्रता पूर्व और स्वातंत्रोत्तर हिंदी उपन्यास और गांव में परिवर्तन का स्वरूप, आंचलिक उपन्यासों में गांव की केंद्रीय भूमिका तथा समकालीन हिंदी उपन्यासों में गांव की स्थिति और परिवर्तन की विवेचना की है। नीलम रानी अपने शोध में प्रेमचंद, रेणु से लेकर श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी, राही मासूम रजा के आधा गांव, कृष्णा सोबती का जिंदगीनामा, अब्दुल बिस्मिल्ला का झीनी झीनी बीनी चदरिया, जगदंबा प्रसाद दीक्षित का इतिवृत्त, शिवप्रसाद सिंह का सैलूष, विवेकी राय का सोनामाटी आदि उपन्यासों का जिक्र करती हैं।

नीलम रानी अपने शोधकार्य में वर्तमान समय में गांवों की आर्थिक संरचना में बदलाव पर लिखती हैं कि गांवों के परंपरागत पेशे बदल गए हैं और जाति आधारित परंपरागत पेशों की बजाए मुद्रा की प्राप्ति अहम हो गया है। ग्रामीण समाज शहरी बाजार के लिए उत्पादन करने लगा है। यहां तक कि ग्रामीण समाज खेतीबाड़ी में अपनी संतानों को नहीं लगाना चाहता। शोध में उद्घाटित किया गया है कि गांवों की दलित या दीनहीन जातियों में असुरक्षा की भावना तीव्र हुई है, इसलिए वह रोजगार की तलाश में शहरों की ओर रूख कर रहा है। असुरक्षा की भावना का कारण उच्च जातियों के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा की भावना भी है। शिक्षा के प्रसार ने भी ग्रामीणों को शहरों की ओर रूख कराया है। आर्थिक संबंधों का पारस्परिक संबंध मशीनों के साथ नहीं टिक सका है और कुशलता और नकद भुगतान को प्रोत्साहित किया गया है। वहीं सांस्कृतिक तौर पर धर्म, विवाह, खेल, पर्व-त्योहार, खानपान, लोककला और लोकभाषा आदि में उपभोग की प्रवृत्ति, आधुनिकता, व्यावसायिकता का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।  हाल ही में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में 2014-15 एमफिल के बैच में उरीभान राय ने डॉ. ओमप्रकाश सिंह के निर्देशन में सोनामाटी उपन्यास और ग्रामीण जीवन मूल्य विषय पर शोध कार्य के लिए दाखिला लिया है।

इस तरह से हम देखते हैं कि ग्रामीण समाज और किसान पर आधारित उपन्यासों पर शोध में प्रेमचंद और रेणु जैसे उपन्यासकार शुरुआत में केंद्र में हैं और इस संबंध में उन पर ही शोध की भरमार है। वर्तमान में भी वे शोध की दृष्टि से भी उतने ही अहम हैं। लेकिन इसके साथ-साथ संजीव जैसे महत्वपूर्ण उपन्यासकार भी वर्तमान में हैं, जो गांवों के बदले या बदलते हुए स्वरूप, लोकतांत्रिक व्यवस्था में गांव और वहां के वंचित लोगों के शोषण, किसानों की आत्महत्याएं भूमंडलीकरण और उदारीकरण प्रभाव को उद्घाटित कर रहे हैं। इस लिहाज से इन जैसे उपन्यासकार भी इन शोधों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

हालांकि संख्यात्मक दृष्टि से देखें तो ग्रामीण समाज या किसानों पर शोध की संख्या कम ही है। उदाहरण के रूप में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में सन् 1975-76 सत्र से 2010-11 तक पीएचडी में कुल 575 शोध कार्य हुए हैं। इनमें किसान जीवन, प्रेमचंद, रेणु, गांव जैसे ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित हिंदी कथा पर आधारित शोध की संख्या सिर्फ  17 के आसपास ही है। वहीं भूमंडलीकरण के दौर में 1990-91 से 2011-12 तक कुल 417 पीएचडी शोधों में तकरीबन 10 ही हैं। यह उदाहरण ग्रामीण समाज और किसान पर आधारित शोधों की संख्यात्मक स्थिति स्पष्ट कर देता है। जाहिर है, जिस देश में अभी भी 68.8 फीसदी आबादी ग्रामीण हो, वहां उन पर केंद्रित साहित्य और शोध की जरूरत है तथा इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।

संदर्भ सूची

1      जनगणना 2011 रिपोर्ट, 1951 जनगणना रिपोर्ट

2      प्रेमचन्द और भारतीय किसान, प्रो. रामबक्ष, शोध, पुस्तक रूप में भी उपलब्ध, प्रथम संस्करण,1982, वाणी प्रकाशन

3      लिस्ट ऑफ टॉपिक पीएचडी (हिन्दी, सेंटर ऑफ इंडियन लेंगुएजेज, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय)

4      लिस्ट ऑफ  टॉपिक एमफिल (हिन्दी, सेंटर ऑफ इंडियन लेंगुएजेज, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय)

5      प्रेमचंद और भारतीय किसान, लेख, नामवर सिंह, पुस्तक। भारतीय उपन्यास की अवधारणा और स्वरूप, संपादक-आलोक गुप्त, राजपाल प्रकाशन

6      हिंदी उपन्यासों में गांवों का बदलता स्वरूप (1991 से अद्यतन) शोध कार्य,  नीलम रानी, 2012, शोध निर्देशक, अब्दुल बिस्मिल्ला, जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय

7      संजीव के उपन्यासों में लोक जीवन, शोध कार्य, गजुला राजू, 2010,  हैदराबाद विश्वविद्यालय, स्रोत शोधगंगा

8      फणीश्वरनाथ रेणु के कथा साहित्य में सामाजिक विकास का प्रश्न, शोध कार्य, पूनम रानी, 2009, शोध निर्देशक प्रो. अपूर्वानंद, दिल्ली विश्वविद्यालय, स्रोत दिल्ली विश्वविद्यालय का पुस्तकालय

9 स्वातंत्रोतर भारत में ग्रामीण समाज में बदलते मानव संबंधों और रेणु का उपन्यास,  2008, शुभ नारायण सिंह, शोध निर्देशक तेज सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय, स्रोत दिल्ली विश्वविद्यालय का पुस्तकालय

10 फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों में यथार्थवादी परिदृश्य, रीता सिंह, 2011 वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, शोध निर्देशिका, प्रो डॉ कंचन राय, स्रोत शोधगंगा

11 फणीश्वरनाथ रेणु. एक साहित्यकार, शोध कार्य, वी एन हेगडे 1986, कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, सिर्सी (उत्तर कन्नड़ जिला) शोध निर्देशक, डॉ. आरएन हेगडे

12 इक्कीसवीं सदी की लड़ाईयां - प्रेमचंद का होरी से पीपली लाइव के बिटर सीड्स तक, जितेंद्र भाटिया, पहल, जनवरी 2015

13 प्रेमचंद के किसान हमारे समय में, जनमत पत्रिका का विशेषांक, जनवरी 2006

14  जम़ीन: ग्रामीण समाज की जम़ीनी हकीकत का आख्यान, श्रीधरम, लमही पत्रिका, जनवरी-मार्च 2014

15 प्रेमचंद और उनका युग, डॉ रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन