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Saturday 18 Nov 2017

समकालीन सांप्रदायिकता के परिप्रेक्ष्य में \'तमस’ उपन्यास

समकालीन समय में सांप्रदायिकता की विभीषिका और त्रासदी ने भारतीय एकता और अखण्डता को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कृत्रिम रूप से फैलाई गई सांप्रदायिकता एक चिंगारी से शुरू होकर भीषण आग का रूप ले लेती है जो इतनी भयावह हो जाती है कि उसके सम्मुख शांति के छिटपुट प्रयास प्रभावहीन और व्यर्थ लगने लगते हैं। 19वीं सदी से अंग्रेज़ों द्वारा चलाई गई सांप्रदायिक भेद-भाव की नीति ने अब तक कई करवटें ली हैं जिससे जूझते हुए हमें भीष्म साहनी का 'तमस’उपन्यास बरबस याद आता है।

देश विभाजन को आधार बनाकर रचे गए इस उपन्यास में जिन सांप्रदायिक दंगों का अंकन भीष्म जी ने किया है वे ताकतें आज भी समाज में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में विद्यमान हैं जो समय मिलते ही वैमनस्यता की आग भड़काकर देश को अशांत एवं अस्थिर बनाती रही हैं। देश में विभाजन की त्रासदी और महात्मा गाँधी की हत्या के बाद लगभग दो दशकों तक सांप्रदायिक ताकतें किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक तनाव अथवा हिंसा फैलाने में असफल रहीं। 1969 में गुजरात में दंगे भड़कने के बाद यह सिलसिला फिर से प्रारंभ हो गया। इसके बाद हर दंगा पहले से अधिक भीषण होता गया।

वर्तमान सांप्रदायिक ताकतों के बढ़ते प्रभावों के मद्देनजऱ तमस उपन्यास अत्यंत प्रासंगिक जान पड़ता है। 'तमस’ उपन्यास आजादी के ठीक पहले 1947 में पंजाब में हुए सांप्रदायिक दंगे को आधार बनाकर लिखा गया है। देश विभाजन के लगभग सात दशक बाद भी आज हमें लगता है कि 'तमस’ उपन्यास का वह 'सूअर’ मरा नहीं है, बल्कि विभिन्न रूप धारण कर समय-असमय अपनी मौजूदगी का एहसास कराता रहता है। कहना न होगा कि हर सांप्रदायिक दंगे के साथ वह सूअर एक प्रतीक बनकर पुनर्जीवित हो उठता है और कभी वह गो-हत्या का रूप लेता है, तो कभी मंदिर-मस्जिद का मसला बन जाता है। वह हमें हर तरह से उन्मादी बनाकर आपस में लड़ाता है।

विपिन चन्द्रा के अनुसार, ''भारतीय राष्ट्र राज्य और भारतीयों के लिए आज सांप्रदायिकता से विकट और कोई समस्या नहीं है। सांप्रदायिकता हमारी उस एकजुटता और एकता को खंडित करने की हालत में आती जा रही है, जो हमने बहुत धीरज और मेहनत से अर्जित की है।‘’ इसके उदाहरण हमें गुजरात, मुम्बई, जबलपुर, भागलपुर, मेरठ, मुरादाबाद, पंजाब, मुजफ्फर नगर, दादरी, मालदा टाउन में मिल जाते हैं।

'तमस’ उपन्यास सांप्रदायिकता के पूरे वातावरण को व्यापक परिप्रेक्ष्य में दिखाता है। देश-विभाजन की त्रासदी को पृष्ठभूमि बनाकर रचे गए इस उपन्यास में सांप्रदायिकता का भीषणतम रूप उपस्थित है। सांप्रदायिकता की आग आज भी बुझी नहीं है, बल्कि उसका स्वरूप जटिलतर हो गया है। समय के लंबे अंतराल के बाद विभाजन का घाव बाहर से तो भर गया है, पर भीतर अब भी रिस रहा है।

सांप्रदायिक वैमनस्य की जड़ें जनमानस में इतनी गहरी पैठी हैं कि आज भी जगह-जगह उनका विस्फोट दिखाई देता है। धर्म, भाषा और क्षेत्रीयता के आधार पर भारतीय समाज को बाँटने का सिलसिला जो ब्रिटिश हुकूमत ने शुरू किया था। आजादी के बाद भी कायम है। स्थितियाँ बदली नहीं है। हमारी सामाजिक व्यवस्था में आज भी ऐसी खामियाँ मौजूद हैं जिन्होंने सांप्रदायिकता के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

दरअसल, आम जनता हमेशा एक-दूसरे के साथ हिल-मिलकर रहती आई है, किंतु सत्ताकेन्द्रित अथवा सत्ताकांक्षी शक्तियां हमेशा अपने स्वार्थ के लिए आम जन को एक-दूसरे से तोड़कर अलग करती रही हैं। विपिन चन्द्रा इस 'सांप्रदायिकताÓ को एक विचारधारा मानते हैं। उनके अनुसार यह विचारधारा हर धर्म में अलग-अलग तरह से मौजूद है। अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों का भय दिखाकर उन्हें बहुसंख्यक के खिलाफ भड़काया जाता है। फलस्वरूप अस्तित्व रक्षा और धर्म के खतरे को भांपकर वे आक्रामक रूप धारण करने लगते हैं। इसके लिए सूअर मारने तथा मस्जिद के बाहर उसे रखने जैसी घटनाएँ उत्प्रेरक का काम करती हैं। बहुसंख्यक हिन्दुओं को सांप्रदायिकता के प्रति भड़काने के लिए थोड़ा-सा अलग रुख अपनाया जाता है क्योंकि इनकी स्थिति अल्पसंख्यकों जैसी नहीं है। अत: उन्हें सांप्रदायिक बनाने के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़कर मुसलमानों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और दिखाया जाता है कि तुम्हारी संस्कृति खतरे में है। उसकी रक्षा की जानी चाहिए। इसके परिणामस्वरूप अयोध्या मंदिर और बाबरी मस्जिद जैसे विवाद पैदा होते हैं, जिससे सत्ताधारी और सत्ताकांक्षी राजनीतिक पार्टियों को लाभ पहुँचता है।

धार्मिक उन्माद की इस आंधी में 'तर्क’ और 'विवेक’ की बातें बेअसर हैं। सांप्रदायिकता की ये बातें कितनी तुच्छ हैं और हिन्दू-मुसलमान का यह झगड़ा कितना फालतू है, यह दिखाने के लिए लेखक जिले के डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड और उसकी पत्नी लीजा की बातचीत के माध्यम से बताता है कि हिन्दू-मुसलमान सिख ईसाई सब मनुष्य हैं, मजहबी फर्क ऊपरी है, जो नाम वेश-भूषा, रहन-सहन, धार्मिक कृत्यों और खान-पान के तरीकों में दिखाई देते हैं। रिचर्ड और लीजा तक आते-आते लेखक का दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई आदि सबको इंसान मानते है और ऊपरी भेदों को निरर्थक समझते है, उनके विचार से मनुष्य अपनी व्यक्तिगत हैसियत में निर्दोष है, उसे दोषी बनानेवाली सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था है।

वस्तुत: सांप्रदायिक विचारधारा से प्रेरित दंगे-फसाद अपने उन्माद में विवेकहीन और अमानवीय होकर विनाशकारी हो जाते हैं। शासक वर्ग अवाम की धार्मिक विभिन्नता को राजनीतिक फायदे के लिए प्रयोग कर उनके बीच घृणा फैलाने का प्रयास करता रहा है। अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए या सत्ता में आने के लिए इसे उन्माद की सीमा तक पहुँचाकर अपना उल्लू सीधा करता है। इस सच्चाई को बेनकाब करते हुए साहनी जी ने उपन्यास में डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड और उसकी पत्नी लीजा के आपसी संवाद का सहारा लिया है। रिचर्ड द्वारा पत्नी से यह कहने पर कि - ''ये लोग धर्म के नाम पर आपस में लड़ते है और देश के नाम पर हमारे साथ लड़ते है उसे लीजा का उत्तर मिलता है - बहुत चालाक मत बनो रिचर्ड! मैं सब जानती हूँ देश के नाम पर ये लोग तुम्हारे साथ लड़ते हैं और धर्म के नाम पर तुम इन्हें आपस में लड़ाते हो।‘’ सत्ताधारी वर्ग आम जनता के आपसी भाईचारे एवं मानव के सामूहिक क्रियाकलापों में अवरोध उत्पन्न करता है। 'तमस’ उपन्यास में रिचर्ड की यह उक्ति इस संदर्भ की पुष्टि करती है-

''...हुकूमत करने वाले यह नहीं देखते कि प्रजा में कौन-सी समानता पाई जाती है, उनकी दिलचस्पी तो यह देखने में होती है, कि वे किन-किन बातों में एक-दूसरे से अलग हैं।‘’

जब 'तमस’ को टी.वी. सीरियल के रूप में फिल्माया गया तब सीरियल की भूमिका में अपने वक्तव्य में तमस का मकसद बताते हुए भीष्म साहनी ने कहा था - ''तमस का मकसद गरीब घरों को उजाडऩा नहीं है, तमस का मकसद पुरानी यादों को बेमतलब ताजा करने का भी नहीं है, इतने साल बाद भी हम अपने समाज से सांप्रदायिक तत्त्वों को खत्म नहीं कर पाये हैं। आज भी धार्मिक और जातीय दुर्भावना फैलाने वाले तत्त्व हमारे बीच सक्रिय हैं। 'तमस’ का मकसद इन संकीर्ण सांप्रदायिक तत्त्वों को समझना और इन्हें बेनकाब करना है।‘’

शहर में हिन्दू-मुस्लिमों के बीच दंगा हो गया है, जब यह बात उपन्यास के पात्र डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड की पत्नी लीजा को पता चलती है, तो अफसोस के साथ कहती है - ''तुम्हारे रहते फसाद हो गया रिचर्ड?’’

लीजा को यह बात नागवार गुजरती है, वह फिर प्रश्न करती है, कि ये लोग आपस में लड़ें क्या यह अच्छी बात है? रिचर्ड उत्तर देता है - ''क्या यह अच्छी बात होगी, कि ये लोग मिलकर हमारे खिलाफ  लडं़े, हमारा खून करें?’’

कहना न होगा कि प्रशासन का सांप्रदायिक दंगों के प्रति रवैया तटस्थता का रहा है और बाद में यही प्रशासन रिचर्ड की तरह दिखावटी ढंग से कफ्र्यू लगाकर शांति की अपील भी करता है। इस तरह ब्रिटिश साम्राज्य से आजाद भारत तक इन सियासी चोंचलों में कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। सत्ता हस्तांतरण के बावजूद जनता को भावनात्मक रूप से भड़काने का सियासी खेल आज भी जारी है।

सांप्रदायिक हिंसा की तह में जायें तो हम पाते हैं कि यह सांप्रदायिक विचारधारा से प्रेरित होती है और इससे सबसे ज्यादा प्रभावित आम जन ही होते हैं। बात 'तमस’ उपन्यास की हो या हमारे समकालीन जीवन की। इस सांप्रदायिक दंगे में सबसे ज्यादा नुकसान आम जन को होता है। इसमें नत्थु, मिल्खी, जरनैल, करीमबख्त और इत्रफ़रोश जैसे निम्नवर्गीय लोग ही मारे जाते हैं, उसमें शाहनवाज, रघुनाथ और तेजासिंह जैसे उच्च वर्ग के लोगों का कोई नुकसान नहीं होता। इससे साफ  पता चलता है कि सांप्रदायिकता उठती तो है धार्मिक उन्माद से, किन्तु इसका चरित्र हमेशा आर्थिक और वर्गीय होता है, न कि धार्मिक।

सांप्रदायिक दंगों के दौरान अनेक समस्याएँ अपने विकराल रूप में उपस्थित होकर जनता के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं, जिनमें विस्थापन की समस्या अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपन्यास में साहनी जी ने हरनाम और बन्तो द्वारा अपने घर को छोडऩे के लिए विवश होने की घटना को अत्यंत कारुणिक रूप में प्रस्तुत किया है। इसी प्रकार इकबाल का जबरन धर्मांतरण, हज़ारों की संख्या में सिख स्त्रियों द्वारा कुएँ में गिरकर आत्महत्या करना, मृत लड़की के साथ मुसलमानों द्वारा बलात्कार करना आदि ऐसी घटनाएँ है जो तमस उपन्यास में तो मौजूद हंै ही, समकालीन साम्प्रदायिक दंगों के वातावरण में भी इनका कम या अधिक विकृत रूप देखने को मिल जाता है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में देखें तो 'तमस’ अपनी समस्या में लगातार प्रासंगिक होता जा रहा है। दरअसल, 'तमस’ उपन्यास और समकालीन सांप्रदायिक स्थितियाँ बदली नहीं हैं। देखा जाए तो आजादी की मुहर के साथ सत्ता हस्तांतरित भर हुई है। स्थितियाँ आज भी थोड़े हेर-फेर के साथ बिल्कुल वैसी ही मौजूद हैं।

आज भी सत्तासीन और सत्ताकांक्षी राजनीतिक प्रतिनिधि अपने राजनीतिक लाभ के लिए उन्हीं हथकंडों का उपयोग करते हैं, जो हथकंडे आजादी के पहले ब्रिटिश साम्राज्यवादी अपनाते थे। इस प्रकार 'तमस’ उपन्यास सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि में मौजूद निरंतर सक्रिय तत्त्वों की गहन पड़ताल करता है और पाठकों को आगाह करता है कि जब तक इस दिशा में इस तरह की विघटनकारी शक्तियाँ मौजूद रहेंगी, देश की एकता और अखंडता को हमेशा खतरा बना रहेगा।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची

 1. समकालीन इतिहास - विपिन चन्द्रा

2. भीष्म साहनी: साहित्य और जीवन दर्शन - डॉ. सुभाष चन्द्र

3. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास - बच्चन सिंह

4. आलोचना (पत्रिका) - अंक 17, 18 (भीष्म साहनी स्मृति अंक)

5. आजकल (पत्रिका) - अगस्त, 2015

6. अठारह उपन्यास - राजेन्द्र यादव

7. हिन्दी उपन्यास - सं. भीष्म साहनी

8. साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका - मैनेजर पाण्डेय

9. उपन्यास का लोकतंत्र - मैनेजर पाण्डेय

10. साहित्य का समाजशास्त्र - सं. निर्मला जैन

11. भीष्म साहनी साहित्य के सरोकार - डॉ. राम विनय शर्मा

12. सांप्रदायिकता: एक प्रवेशिका - विपिन चन्द्रा