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Thursday 23 Nov 2017

हिन्दी साहित्य में स्त्रीविमर्श बनाम स्त्रीअस्मिता

आधुनिक काल में पाश्चात्य और वैज्ञानिक विचारधारा के कारण आधी दुनिया पर चर्चा होने लगी, जिसे स्त्री-विमर्श कहा गया। स्त्रीविमर्श के संदर्भ में स्त्रीअस्मिता केन्द्रीय धुरी रही है ... जो स्त्री को समाज में पुरुष के समान एक व्यक्ति के रूप में पहचान दिलाने तथा उसे सोचने, विचारने एवं निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करने के लिए संघर्षरत है। इस बहस ने यह महत्वपूर्ण काम किया कि हाशिए पर पड़ी स्त्री को साहित्य के केन्द्र में ला दिया। स्त्री केंद्रित या स्त्री रचित साहित्य पर चर्चा के केन्द्र में यह विचार प्रमुख था कि स्त्री कोई वस्तु नहीं है, ना ही निष्क्रिय शरीर बल्कि उसका भी स्वतंत्र अस्तित्व है, वह भी बुद्धिसंपन्न और चेतना से युक्त है।

       पर सच यह है कि हर युग में स्त्री को अधीन करने के लिए आचार संहिताओं का निर्माण होता रहा है और यह भी सच है कि वह इस घुटन भरी सामाजिक व्यवस्था की जकडऩ से मुक्ति का प्रयास करती रही है। मुक्ति का यह प्रयास कहीं वैयक्तिक तो कहीं सामूहिक संघर्ष के रूप में होता रहा है। विनय कुमार पाठक ने नारी-मुक्ति का अभिप्राय स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ...जड़ता से मुक्ति, देह को वस्तु मानने की धारणा से मुक्ति तथा स्वयं को समाज से अलग करने से मुक्ति। मुक्ति की आवश्यकता और आकांक्षा से प्रेरित स्त्री के परिवार और परिवेश से टकराव ने उसके विद्रोह की भावना को तीव्र कर दिया। यह विद्रोह रचनात्मकता से युक्त होकर साहित्य के विविध रूपों में अभिव्यक्त हुआ, परंतु इसे स्त्री साहित्य या स्त्री विमर्श कहकर मुख्यधारा से अलगाने का प्रयास किया गया । विनय कुमार पाठक ने लिखा है कि ..स्त्री विमर्श लेखन के व्यापक संदर्भों और संघर्षों से टकराकर अभिव्यक्त हुई है। स्त्री लेखन में उसका कठोर यथार्थ पहले जीवन में फिर साहित्य में अभिव्यक्ति पाता है तदनुरूप वह परिवेश के जटिल यथार्थ और द्वंद्व को अनुभव के सांचे में ढालती है। स्त्रीविमर्श आत्मनिषेध व आत्मदया के आवृत्त से निकलकर स्वीकार और साहस के साहित्यसृजन में संलग्न है।

       यह तो तय है कि स्त्रीविमर्श के केन्द्र में वह संसार है, जिसे स्त्री स्वयं रचती है, जिसमें उसके संजोये सपने होते हैं, जहां उसकी कल्पना साकार होती है, जिसमें उसकी भावुकता के लिए स्थान होता है। अत: इसे मुख्यधारा से अलग करना उचित नहीं है । राजेन्द्र मिश्र ने लिखा भी है कि -स्त्रीविमर्श का अर्थ उसे पुरुष से अलग करना नहीं बल्कि पुरुष के समान उसके वर्चस्व की भी स्वतंत्र रूप से स्थापना करना है। जबकि डॉ विनय कुमार पाठक का मानना है कि - लिंग के आधार पर अनुभूति को अलगाने वाला विवेचन ही स्त्रीविमर्श है। इस संदर्भ में मृदुला गर्ग का कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है - दरअसल, स्त्रीविमर्श को, हमारे यहां स्त्रीवादी लेखन के अर्थ में लिया जाता है। मैं कहना चाहती हूं, आजकल स्त्रियां केवल स्त्रीवादी लेखन नहीं कर रही हैं। वे तीन तरह का लेखन कर रही हैं। स्त्रियोचित लेखन, जो स्त्री की पारंपरिक छवि के तिलस्म का प्रतिपादन कर रहा है। स्त्रीवादी लेखन, जो मुखर और गुस्सैल ढंग से, स्त्री के यौन उत्पीडऩ व यौनेच्छा को शब्द देते हुए, पुरुष से मुक्त होने का दंभ भर रहा है और स्त्री लेखन, जो स्त्री संबंधी नए रूपकों को आत्मसात करके, उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां वह समाज में जीनेवाले व्यक्ति या समूह की तरह अपनी बात कह रहा है। वे स्त्रीविमर्श को व्याख्यायित करने के परिप्रेक्ष्य में लिंगवादी अवधारणा को प्रमुखता देने के प्रयास का विरोध करती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि आज स्त्री लेखन उस लक्ष्य को हासिल कर चुका है कि उसे केवल स्त्रीवादी लेखन नहीं कहा जा सकता है ।

       स्त्रीविमर्श के संदर्भ में एक सच यह भी है कि भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में इसकी परंपरा अत्यन्त प्राचीन है। जैसे कि डॉ. राजेंद्र मिश्र ने इसका प्रारम्भ वैदिक ऋचाओं से माना है ... स्त्रीविमर्श को केवल आधुनिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि प्राचीन युग से ही स्त्री लेखन होता रहा है। मीरा इसका उदाहरण है। मीरा की विद्रोही चेतना ने सती होने से इंकार किया। सामंती ढांचे में इस विद्रोह का व्यापक महत्त्व है। मीरा ने पहली बार स्त्रियों के सीमित सामाजिक परिवेश, बंधनों के वर्चस्व और लिंगभेदीय वर्चस्व को चुनौती दी। मीरा ने नाचकर, सत्संग कर और प्रेम उद्विग्न अभिव्यक्ति कर सामाजिक संहिता को अस्वीकार किया। वैदिक ऋचाओं की रचना से लेकर उपनिषदों, भाष्यों, तर्कशास्त्रों और काव्य में स्त्रियों का जो लेखन मिलता है, उसमें स्त्रीविमर्श का सबसे उर्वर रूप उपलब्ध है। इस सच को मान भी लें कि भारतीय समाज में स्त्रीविमर्श मीरा के युग से भी पहले से विद्यमान है और यह भी कि पूर्ववैदिक युग में स्त्रियां अधिक स्वतंत्र थी, तो इस सच को भी स्वीकार करने में हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए कि यह विरोधाभास से युक्त रहा है। पूर्ववैदिक युग में स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करने और यज्ञोपवीत पहनने का तथा विधवा को पुनर्विवाह करने का अधिकार प्राप्त था, परंतु इसके साथ ही इस सच को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि वैदिक साहित्य में कहीं भी कन्या का पुत्र की तरह संस्कार करने का उल्लेख नहीं हुआ है। गुरुकुल के आचार्यों की प्रतिभाशाली पुत्रियों के अध्ययन और लेखन का उल्लेख मात्र है। अत: यह तो तय है कि उसे समानाधिकार प्राप्त नहीं था। सुमन राजे ने लिखा है कि ऋग्वेद में रोमशा, लोपामुद्रा, श्रद्धा, कामायनी, यमी, वैवेस्वती, उषा, इला, विश्वधारा, अपाला, घोषा, सूर्या, चर्मा, वाग्भणी, शाश्वती, ममता एवं उशिज आदि ऋषिकाओं के नाम मन्त्र द्रष्टा के रूप में प्राप्त होते हैं। गार्गी, मैत्रेयी आदि विदुषियों तथा उपरोक्त उल्लेेखित ऋषिकाएं गुरुकुलों से संबंध रखती थी, फिर भी उनके स्वतंत्र लेखन को महत्व प्राप्त नहीं हुआ। उन्हें और उनकी रचनाओं को कभी भी मुख्यधारा में शामिल नहीं किया गया। शायद इसलिए कि भारतीय समाज हमेशा से पितृसत्तात्मक रहा है। वैदिक काल से स्त्रियों को शूद्र के समान समझा जाने लगा। पंचतंत्र में पुत्री के जन्म को चिन्ता का जन्म कहा गया। यास्क ने निरुक्त में लिखा है कि दुहिता दुर्हिता दुरे हिता भवतीति अर्थात् कन्या को दूर देश में भेजने में ही भलाई है। पुरुष प्रधान समाज में भारतीय स्त्री अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत रही है अर्थात् यहां पितृसत्ता हर युग में और हर काल में अधिक जटिल ताने बाने के साथ उपस्थित रहा है। इसके अंतर्गत सम्पूर्ण जाति, धर्म, वर्ण और वर्ग समाहित हो गए। इसलिए स्त्री के अधिकार और महत्त्व से संबंधित जो कुछ भी लिखा गया, उसे पूरा सच मानकर स्वीकार नहीं किया जा सकता है। बहुत पहले एक नारीवादी ने कहा था कि अब तक औरत के बारे में जो कुछ भी लिखा गया उस पर पूरा शक किया जाना चाहिए, क्योंकि लिखनेवाला न्यायाधीश और अपराधी दोनों ही है।

       भारतीय समाज में यह विरोधाभास हर युग में अपने चरम सीमा में उपस्थित रहा है। वास्तविक संक्रमण मनु के युग में हुआ। एक ओर तो मनुस्मृति में कहा गया यत्र नार्यस्ते पूज्यते, तत्र देवता रमन्ते तो दूसरी ओर कन्याना संप्रदान व कुमाराणां च रक्षण अर्थात् कन्या दान करने के लिए एवं पुत्र रक्षण के लिए है, कहकर कन्याओं की स्थिति निम्नतर किया गया है। साथ ही अल्पायु में ही कन्याविवाह की बात एवं विधवा के पुनर्विवाह के निषेध का भी उल्लेख है। जैन साहित्य में तो मोक्ष प्राप्ति के लिए स्त्री को दोबारा पुरुष के रुप में जन्म लेने की बात भी कही गई है। यह विरोधाभास आज भी यहां उपस्थित है। एक ओर वह पूज्या है तो दूसरी ओर प्रताडि़ता। जहां एक ओर कन्या को रत्न और लक्ष्मी कहकर संबोधित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर उसके जन्म पर मातम मनाया जाता है। देवेन्द्र चौबे ने भारतीय समाज में स्त्रियों की इस विसंगतिपूर्ण स्थिति को उजागर करते हुए भयावह आधुनिक स्वरुप की ओर भी संकेत किया है ..यद्यपि पारम्परिक समाज में स्त्रियां श्रद्धा के रूप में मान्य थी, किन्तु मुख्यधारा में निर्णायक स्थिति में वे कभी नहीं रहीं, परंतु आधुनिक समाज में तो उनकी स्थिति और खराब होती गई तथा पूंजीवाद के विकास और बाजार के वर्चस्व के कारण धीरे-धीरे वे वस्तु में तब्दील होती गई। श्रद्धा से वस्तु के रूप में तब्दील होने की यह प्रक्रिया अत्यन्त भयावह, पीड़ादायक और अपमानजनक रही है।

       विडंबना यह है कि विज्ञान के विकास ने स्त्री जाति के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। प्रभा खेतान ने समसामयिक भारतीय परिवार की मानसिकता का यथार्थ चित्रण करते हुए लिखा है कि  आज के युग में तो बेटी के पैदा होने की जरूरत ही नहीं क्योंकि स्कैनिंग द्वारा भ्रूण के सेक्स का निर्धारण गर्भावस्था में ही हो जाता है। यदि लड़की है तो समाज की, परिवार की, पिता और बहुधा स्वयं गर्भ धारण करने वाली जननी की पहली प्रतिक्रिया है .. हटाओ इसे, खत्म करो। दूसरी हुई तब तो किसी भी हाल में नहीं चाहिए। और औरत बच्चा पैदा करने की मशीन के सिवा है ही क्या? क्या फर्क पड़ता है, फिर पेट रह जाएगा, तीसरी या चौथी बार कभी न कभी गर्भ में बेटा तो आएगा ही और यदि नहीं आया तो टेस्ट-ट्यूब में लड़का पैदा करेंगे।

       दोतरफा शोषण की शिकार नयी सदी की स्त्री मानवीय पहचान और गरिमा पाने के लिए संघर्षरत है। उसकी तुच्छ इच्छाएं है, जिसे वह पूरा करना चाहती है। बानीरा गिरी ने सम्पूर्ण भारतीय स्त्री की इच्छाओं को कुछ इस प्रकार से शब्दबद्ध किया है ...

मुझे रुलाई रोनी है

मुझे हंसी हंसनी है

मुझे जीवन बांचना है

मुझे भी तोडऩा है

शिव का धनुष।

विडंबना यह है कि शिव का धनुष तोङऩा और जीवन बांचना तो दूर की बात है, इस देश में उसे तो पुस्तक बांचने तथा बस्ता पकडऩे का भी अधिकार प्राप्त नहीं है। पितृसत्तात्मक समाज में अकेलापन महसूस करती स्त्रियों के दर्द को कवयित्री अनामिका बेजगह कविता में इस प्रकार से अभिव्यक्त करती हैं ...

अहा नया घर है !

राम, देख, यह तेरा कमरा है !

और मेरा?

ओ पगली,

लड़कियां हवा, धूप, मिट्टी होती हैं

उनका कोई घर नहीं होता !

विडंबना है कि नयी सदी में भी लड़कियों के लिए कोई घर नहीं होता है। आश्चर्य है कि आज भी बेटी का पिता के घर और संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता है। कानून में प्रावधान होते हुए भी यह समाज द्वारा स्वीकृत नहीं है। विशेषकर हिन्दी भाषी क्षेत्र में लड़कियों की स्थिति अत्यधिक त्रासद है । इस परिप्रेक्ष्य में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का अनुभव उल्लेखनीय है- मैंने मध्यवर्गीय घरों में देखा और महसूस किया है कि सात-आठ वर्ष की छोटी बच्चियों का मनोविज्ञान भी लड़कों से अलग होता है। लड़के घर को अपना समझते हैं, दंभ के साथ आपस में लड़ते-झगड़ते हैं, खाने-पहनने में हेकड़ी दिखाते हैं, अति उत्साह और निर्भयता का परिचय देते हैं। जबकि बच्चियों का व्यवहार ठीक इसका उल्टा होता है। वे उस कच्ची उम्र में ही समझ जाती हैं .. यह घर मेरा नहीं है। ये लोग मेरे कुछ दिनों के साथी हैं।

सच तो यह है कि बेटियों में समझ आने से पहले ही यह एहसास दिलाने का प्रयास किया जाता है कि वे अपने परिवार की एक अवांछित सदस्य है। इस दर्द को अभिव्यक्ति कवयित्री संवेदना ने इस तरह से किया है -

लड़कियां जो पुल होती हैं

पैदा की नहीं जाती

अक्सर पैदा हो जाती हैं

लड़का पैदा होने के धोखे में ।

आधुनिक शिक्षित नारी समाज तथा परिवार में समानाधिकार पाने की इच्छुक है। वह पुरुष को स्वामी के रूप में नहीं दोस्त या हमसफर के रूप में पाना चाहती है। आज की नारी की अपनी दुनिया है, उसका अपना दु:ख और पीड़ा है, उसके कत्र्तव्य और सीमाएं भी हैं, फिर भी वह अपना पंख पसारकर उडऩा चाहती है। वह मुक्ति के लिए तड़पती है, परंतु वह पितृसत्तात्मक समाज की चालों के आगे विवश हो जाती है। कात्यायनी दुर्ग द्वार पर दस्तक कविता में इस कल्पनालोक से बाहर आने का आग्रह करती हैं -

मुक्ति की चाहत को

सपनों की दुनिया से

बाहर लाना होगा।

आज की स्त्री परंपरा को तो स्वीकारती है, लेकिन उसे अपना अंतिम लक्ष्य मानकर उसमें अपने जीवन का विलय नहीं करना चाहती है। वह आधुनिकता का आग्रह स्वीकारती है, लेकिन भारतीय संस्कृति को विस्मृत किए बिना। वह स्वतंत्रता चाहती है, परंतु मातृत्व और वात्सल्य के विनिमय पर नहीं ..यह सच है कि भारतीय नारीवादी दृष्टिकोण पितृसत्तात्मक समाज द्वारा स्थापित कई मूल्यों को चुनौती देता है। लेकिन मातृत्व, वात्सल्य और पारिवारिक रिश्ते नातों के मूल्यों का आदर करता है। इसी बिंदु पर भारतीय नारीवादी चेतना की पाश्चात्य नारीवादी चेतना से भिन्नता है। महादेवी वर्मा ने श्रृंखला की कडिय़ां में भारतीय स्त्री के इस उच्च आदर्श की ओर संकेत किया है। स्त्री के विकास की चरम सीमा उसके मातृत्त्व में हो सकती है, परंतु यह कर्तव्य उसे अपनी मानसिक तथा शारीरिक शक्तियों को तोलकर स्वेच्छा से स्वीकार करना चाहिए, परवश होकर नहीं।

धूमिल की कविता पढि़ए गीता, बनिए सीता में अभिव्यक्त व्यंग्य भारतीय समाज पर करारा चोट करता है। यह कविता आज की स्त्री को इस बेतुके आदर्श से मुक्ति का रास्ता दिखलाता है। आधुनिक स्त्री अपने ऊपर से पुरुष के पहरे और अंकुश को झकझोर कर हटा देना चाहती है। वह तर्क का आधार लेकर तथ्यों को प्रस्तुत करती है। सुरेंद्र वर्मा के उपन्यास मुझे चांद चाहिए की नायिका वर्षा वशिष्ठ समाज में अपनी अस्मिता की पहचान के लिए संघर्ष करती है। उसका संघर्ष अपने परिवार एवं समाज से है। लहूलुहान उसकी आत्मा पराजय स्वीकार नहीं करता है। एक सशक्त नारी चरित्र की रचना एक पुरुष के द्वारा हुई है।

बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन तर्क के साथ धर्म और पुरुष के वर्चस्व को तोड़ती हैं। उन्होंने लिखा है कि- स्त्री दलित है। स्त्री की कोई जाति नहीं होती है, उसका कोई धर्म नहीं होता है। वह सिर्फ  इस्तेमाल की वस्तु है। चूंकि धर्म में उसके इस्तेमाल का प्रावधान है इसलिए मैं नास्तिक हूं, धर्म के खिलाफ  हूं। धर्म से मजबूत होता है पुरुषतंत्र। मैं पुरुषों के खिलाफ  नहीं हूं किन्तु धर्मअनुमोदित पुरुषतंत्र के खिलाफ  हूं। इसलिए तसलीमा अपने देश से निष्कासित है। दरअसल स्त्रियों का संघर्ष पुरुषों से नहीं है, बल्कि पुरुष केन्द्रित एवं निर्मित सत्ता या व्यवस्था से है। समाज के सभी अधिकार पुरुषों को प्राप्त है और सारे कर्तव्य स्त्रियों के लिए सुरक्षित हैं। तसलीमा नसरीन ने अपनी भावनाओं के माध्यम से सम्पूर्ण स्त्री जाति की भावनाओं को वाणी देने का प्रयास किया है ...   

जी करता है

आधी रात पूरी शहर में घूमूं

अकेले कहीं बैठकर रोऊं

ईश्वर पर भरोसा नहीं

घर-घर में है धर्मभीरु लोग

वे बहुत चुपके से करते हैं, वर्गविभाजन

मनुष्य से अलग

छांटकर रखते हैं स्त्री को

मैं भी होती हूं ।

अपनी पहचान तलाशती स्त्री शायद शारीरिक अशक्तता के कारण आज भी पुरुष वर्ग की अधीनता स्वीकार करने के लिए अभिशप्त है। वह जड़ता को तोडऩे के लिए जब उद्धृत होती है, तो उसे मर्यादाहीन और अनुशासनहीन कहकर दबाया जाता है । वह आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहती है, तो उसे भोगवादी संस्कृति से जोड़ दिया जाता है। मृदुला सिन्हा ने मात्र देह नहीं है औरत में समाज को सावधान करते हुए लिखा है कि - स्त्री की वर्तमान अधिकांश समस्या उसे देह मानकर ही है। यदि उसे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का सम्मुच्चय माना जाए, बातें बदल जाएंगी, स्त्री से संबंधित धारणाएं बदलनी ही हैं, वरना समाज का बहुत स्वरुप बिगड़ेगा।

स्वतंत्र सत्ता के साथ आज की स्त्री अपनी अस्मिता की तलाश में नए मूल्यों की स्थापना करने में संलग्न है। उसके पास कोई परिकल्पना भी नहीं है और न ही कोई उसका मसीहा है। इसलिए प्रभा खेतान प्रश्न उठाती हैं- आज हमें सोचना है कि हम अपनी अस्मिता को पुन: कैसे परिभाषित करें? कैसे अपनी और अपने समाज की रुपरेखा तैयार करें?् हमारे सामने पहले से कोई संयुक्त आदर्श मौजूद नहीं है। अत: आज स्त्री का मसीहा स्त्री खुद है। मृणाल पांडे ने अपनी पुस्तक स्त्री देह की राजनीति से देश की राजनीति तक में लिखा है -अपने अस्तित्व की यह तलाश, हम सब के लिए सबसे पहले समाज से अपने रिश्ते की तलाश है, क्योंकि उसी का छोर थाम कर हम अपने स्व की तलाश में भीतर को मुड़ते हैं।

नयी सदी में भी हमारे देश में जब बालविवाह और कन्या भ्रुणहत्या की समस्याएं सामने आ रही हैं, स्त्रियों के प्रति अपराधों में भी वृद्धि हो रही है, दहेज की बलिवेदी पर बेटियों की बलि दी जा रही है, कार्यक्षेत्र में भी स्त्री शोषण का शिकार हो रही है, उसका महत्व संतानोत्पत्ति और रसोईघर की सीमा तक ही सीमित रह गया है तो स्त्रीवादी लेखन एवं साहित्य इसके विरुद्ध अपना विरोध दर्ज करता है। वह पुरुष संदर्भ से बाहर निकल कर अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है। आज स्त्री का रूपक न लिंग है, न आधी दुनिया बल्कि व्यक्ति एवं व्यक्तित्व है। सतत् परिवर्तनशील समाज का वह एक अहम हिस्सा है। वह अपने साहित्य के माध्यम से परंपरावादी सोच से उबरकर मुक्ति के लिए नई जमीन तलाशने का संदेश देती है। वास्तव में हिंदी साहित्य में स्त्रीविमर्श भारतीय समाज में स्त्रीअस्मिता की तलाश तथा देवी और धरती का मिथक तोडऩे का संघर्ष है। उसका संघर्ष देवी से मानवी तथा सेविका से सहचरी बनने का है। यह लड़ाई आज भी जारी है और तब तक जारी रहेगी, जब तक कि उसके अस्तित्व को पहचान न मिल जाए।