Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

इस लोकतंत्र में क्रांति के लिए कोई गुंजाइश नहीं है

सुप्रसिद्ध रचनाकार काशीनाथ सिंह से बातचीत 

काशीनाथ सिंह सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील रचनाकार रहे हैं। बीसवीं सदी के अंतिम दशक से आज इक्कीसवीं सदी में सामाजिक सांस्कृतिक आकांक्षाएँ बदली हैं। इस बदलाव को काशीनाथ सिंह ने शिद्दत से महसूस किया है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में सोवियत संघ के पतन के साथ-साथ उदारवाद, निजीकरण का सिलसिला शरू हुआ और इससे किसी भी भाषा का साहित्य अछूता नहीं रहा। हिन्दी साहित्य पर भी इसका प्रभाव पढऩा लाजमी था। काशीनाथ सिंह के रचनाकर्म को सामाजिक बदलाव के हिसाब से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम सोवियत संघ के विघटन से पहले और द्वितीय सोवियत संघ के विघटन के बाद। विघटन के पहले जहाँ वे पूरे देश को झकझोर देने वाला आन्दोलन नक्सलबाड़ी आन्दोलन से प्रभावित थे, वहीं विघटन के बाद उन्हें मोहभंग की स्थिति का एहसास होता है । प्रस्तुत साक्षात्कार के अंतर्गत काशीनाथ सिंह ने वर्तमान साहित्य तथा साहित्यकारों के समक्ष उपस्थित चुनौतियों एवं उसकी स्थिति, साहित्यिक कर्म, वर्तमान शोध एवं शोधार्थी, नक्सलबाड़ी आन्दोलन की वर्तमान सन्दर्भ में प्रासंगिकता, मुस्लिम जीवन तथा बहुत से ऐसे विषय हैं जो अब तक क्यों उनके साहित्य में अभिव्यक्त नहीं हुए है, आदि पर चर्चा की है। उन्होंने फिल्म मोहल्ला अस्सी से सम्बंधित उनके अनुभव तथा उपसंहार उपन्यास की रचना प्रक्रिया पर भी खुलकर बात की है।
प्र. साठोत्तरी हिन्दी कहानी के बाद कथा साहित्य में आए अब तक के बदलावों को आप किस तरह देखते हैं?
उ. देखो, मैं जिस उम्र में हूँ उसमें अमूमन लोग कहते हैं कि बड़ा ह्रास हो रहा है। यानी अस्सी के दशक में जब हम लिखते थे तो एक उत्साह था, जोश था और लगता था साहित्य ही साहित्य लिखा जा रहा है। इन चीजों को देखते हैं तो आज के युग में ऐसा लगता है कि साहित्य हाशिए पर है। साहित्य लिखने वाले लोग बहुत कम हो रहे हैं। ज्यादातर लोग जो एक बदली हुई दुनिया है, जो अर्थकेन्द्रित दुनिया है, उसमें मसरुफ हैं। अब साहित्य वगैरह के बारे में सोचने के लिए किसी के पास वक्त नहीं है। अमूमन हमारे उम्र के लोग ऐसा सोचते हैं। लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता। मैं जब से लिख रहा हूँ तब से लेकर अब तक देखें तो जो बदलाव साहित्य लेखन में हो रहे हैं, वे पॉजिटिव हो रहे हैं । यानी हमारे समय में इतने पत्रिकाएँ नहीं थीं, इतने प्रकाशक नहीं थे, इतनी बड़ी तादाद में लेखक नहीं थे। वे अच्छा लिख रहे हैं, खराब लिख रहे हैं, महत्वपूर्ण यह नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि पत्रिकाएँ निकल रही हैं। कोई ऐसा शहर नहीं है जहाँ से पत्रिकाएँ न निकल रही हों। दिल्ली प्रकाशनों से भरा पड़ा है। पहले गिने-चुने प्रकाशन थे। जब पत्रिकाएँ निकल रही हैं तब बिक भी रही हैं। पत्रिकाओं के बिकने का मतलब है कि पाठक ज्यादा हो रहे हैं और पत्रिकाओं के निकलने का मतलब है कि उसमें लिखनेवाले लेखक भी ज्यादा हैं तभी इतनी पत्रिकाएँ निकल रही हैं। इन सारी चीजों को देखते हुए मुझे लगता है कि पहले से आज साहित्य विकास की स्थिति में है, पीछे नहीं गया है। अब इक्के-दुक्के बड़े लेखक अपने-अपने दौर में पैदा हो जाते हैं। यह अलग बात है कि अब तक दिखाई नहीं पड़ रहे हैं पर इन्हीं में से कल कोई बड़ा लेखक हो सकता है ।
प्र. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है कि संख्या में भले ही ज्यादा साहित्य लिखा जा रहा है, पत्रिकाएँ निकल रही हैं, प्रकाशकों की संख्या भी बढ़ रही है। परंतु जैसा कि आपने अभी ऊपर संकेत किया है कि ज्यादातर लोग बाजार की होड़ में शामिल होने के लिए लिख रहे हैं, और ऐसे में वे अपने मूल उद्देश्य से भटक भी रहे हैं। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
उ. ये तो देखो होता है। जब हम ही लिखते थे 1960 से लगभग 1975 तक, तब इन आरंभिक वर्षों में मेरी ही गणना चर्चित लेखकों में नहीं होती थी। हमने जो भी बेहतर लिखा वो अस्सी के बाद लिखा। यानी लगभग 20 वर्षों तक मैं एक तरह से वर्जिश करता रहा, मेहनत करता रहा लिखता रहा। लेकिन लिखने का अपना छंद मुझे बाद में मिला। कौन सी ऐसी विधा है जिसमें मैं अच्छा लिख सकता हूँ। मैं क्या अच्छा कर सकता हूँ? यानी कि अपनी तलाश मैंने निरंतर जारी रखी। मैं अपने को ढूँढता रहा कि मैं क्या अच्छे से अच्छा कर सकता हूँ। यह हर लेखक के साथ होता है और एक तरह से कहा जाए तो अधिकांश लेखकों के साथ होता है। इसमें दो राय नहीं है कि आज के लेखकों के लिए बाजार सबसे बड़ा प्रलोभन है। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि केवल लेखन के भरोसे जीवित नहीं रह सकते। कुछ ही लेखक रहे हैं जिनकी जीविका साहित्य रही है। बाकी कोई न कोई नौकरी करते हुए साहित्य रचना करते रहे हैं। कोई आईएएस रहा है, कोई आईपीएस रहा है, कोई प्रोफेसर रहा है तो कोई अन्य छोटी-मोटी नौकरी करता रहा है। साहित्यकारों में यह धारणा अब तक बनी हुई है कि जीविका के लिए साहित्य नहीं है।
प्र. अर्थात बाजार की चुनौतियों का सामना करते हुए साहित्यकारों को प्रयास करते रहना चाहिए?
उ. प्रयास करते रहना चाहिए, लेकिन आँखें मूँदकर नहीं, आत्मान्वेषण करते हुए, अपने को ढूँढते हुए कि हमारी सही विधा क्या हैं, हम कविता अच्छी लिख सकते हैं, उपन्यास अच्छा लिख सकते हैं, कहानियाँ अच्छी लिख सकते हैं या संस्मरण अच्छा लिख सकते हैं? क्योंकि इधर विधाओं का विस्तार हुआ है। पहले केवल कविता, कहानी, उपन्यास इन्हीं विधाओं को लोग जानते थे। अब ट्रैवेलाग लिखे जा रहे हैं, डायरियाँ छप रही हैं, रिपोतार्ज लिखे जा रहे हैं। उपन्यास भी अब पारंपरिक ढंग से नहीं लिखे जा रहे हैं। उनका भी रूप बदला है। हर लेखक अपने को ढूँढता रहे कि कहाँ वह सही ढंग से और किस विधा में अपने को व्यक्त कर पा रहा है, तब उसे लिखना चाहिए। कोई भी लेखक लिखने के लिए तो सब कुछ लिख सकता है लेकिन कौन सी ऐसी विधा है जिसमें वह समूचा व्यक्त हो सकता है, यह तलाश बराबर एक लेखक जीवन भर करता रहता है।
प्र. इस सन्दर्भ में आपके लेखन कर्म की बात की जाए तो आपने अपनी रचनाओं के माध्यम से निरंतर कुछ न कुछ नया एवं भिन्न तलाश करने की कोशिश की है। आपके उपन्यास उपसंहार की बात की जाए तो उसमें आप विषय-वस्तु और भाषाशिल्प की अपनी पूर्व छवि के स्थापित विधान को त्याग कर, अचानक नए रूप में सामने आए हैं। मेरा सवाल यह है कि फिलहाल आप क्या नया तलाश रहे हैं?
उ. हंसते हुए देखो! यह तो बड़ा मुश्किल सवाल है। हाँ, क्योंकि मेरी कमजोरी है कि मैं अगर बता देता हूँ तो मैं लिख नहीं पाता हूँ। मेरे भीतर जो चल रहा होता है उसके बारे में बोलता नहीं हूँ। ऐसे मोटे तौर पर मैं बताऊँ कि मैं आगे क्या करूँगा यह चिंता मेरी जरूर है कि जो कर चुका हूँ उससे भिन्न हो और बेहतर हो। अगर मैं अच्छा कर सकूँगा तभी लिखूँगा वरना नहीं लिखूँगा। यह मैंने बनारस के लेखकों से ही सीखा है। मुंशी प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद से सीखा है। प्रेमचंद ने अपने आखिरी दिनों में गोदान लिखा था और जयशंकर प्रसाद ने अपने आखिरी दिनों में कामायनी लिखीथी। प्रेमचंद ने अपने जीवन का सबसे अच्छा उपन्यास और प्रसाद ने अपने जीवन का सबसे अच्छा काव्य। मैं भी कोशिश यही करता हूँ कि जो मैं सबसे बाद में लिखूँ वह पहले से बेहतर हो।
प्र.सत्तर से अस्सी के दशक में नक्सलबाड़ी आन्दोलन का प्रभाव हिन्दी साहित्य पर रहा और आपकी रचनाओं पर भी, विशेष रूप से आदमीनामा संग्रह की लगभग सभी कहानियों पर। वर्तमान सन्दर्भ में यदि साहित्यकारों के यहाँ नक्सलबाड़ी आन्दोलन का प्रभाव देखा जाए तो इसे आप कितना प्रासंगिक मानेंगे?
उ.यह मुझे व्यर्थ लगता है, पता नहीं क्यों? इसका एहसास मुझे तभी हो गया था जब मैं खुद जुड़ा हुआ था। नक्सलबाड़ी आन्दोलन के कई ग्रुप हैं और हर ग्रुप अलग-अलग ढंग से इसके बारे में सोचता है। माक्र्सवाद, लेनिनवाद के बारे में सोचता है। सबकी अलग फिलॉसफी है। उनकी बुनियादी चिंता यह है कि क्रांति कैसे हो? हथियारबंद होना चाहिए या कैसे होना चाहिए? देश छोटा होता है तब तो क्रांति आप कर सकते हैं, हथियारबंद क्रांति कर सकते हैं। लेकिन इतना बड़ा देश और उसकी डेमोक्रेसी। सत्ता का परिवर्तन मतों से होता है और कई बार मैंने महसूस किया है कि जो मतदान है वह लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार है। उससे आप लोकतंत्र की सत्ता को बदलिए। इस मामले में बराबर बदलाव होता रहा है। यानी क्या वजह है कि सीपीआई और सीपीएम जो माक्र्सवादी सिद्धांतों में विश्वास करने वाली पार्टियाँ रही हैं, आज उनका कोई नामलेवा नहीं है और ये जो हथियारबंद क्रांति कर रहे हैं, वस्तुत: यह नक्सलवाद नहीं है। यह मूलत: उनकी बेरोजगारी है। उनकी अपनी समस्याएँ हैं, जल की, जंगल की, जमीन की, जीविका की, रोजगार की, गरीबी की। मेरे ख्याल से थोड़े से नक्सलाइट सोच के लोग हैं जो उन जनजातियों, आदिवासियों को बरगला करके यह करने के लिए बाध्य कर रहे हैं। वरना समस्याएँ उनकी दूसरी हैं। इसे उन्हें समझाना चाहिए। मेरे खयाल से इस आईने में नक्सलबाड़ी आन्दोलन को देखा जाना चाहिए। हमने जब छोड़ा तो मुझे खुद लगा कि इस लोकतंत्र में क्रांति के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। अनेक मुद्दे लडऩे के लिए हैं, जिसे इश्यू बना कर लड़ा जा सकता है। जैसे अभिव्यक्ति की आजादी का दमन किया जा रहा है। यह फिलहाल तुम्हारे हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में ही हुआ है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुआ है और हो रहा है। दूसरे विश्वविद्यालयों में जहाँ छात्रसंघ नहीं हैं, वहाँ हो रहा है। यह संविधान जो हिन्दू-मुस्लिम दोनों राष्ट्रों को स्वीकार करता है, धर्मनिरपेक्षता को स्वीकार करता है, इस पर आँच न आए। ये सारे मुद्दे हैं जिन पर लड़ा जा सकता है लेकिन वो भी हथियार के साथ नहीं लोकतांत्रिक तरीके से। हमारी इतनी बड़ी सीमा है, विकसित फौज है उसके आगे गिने-चुने लोग हथियारबंद क्रांति कर क्या कुछ कर पाएँगे? इस मायने में मुझे लगता है कि नक्सलबाड़ी आन्दोलन की एक ऐतिहासिक भूमिका थी। उस समय में नक्सलबाड़ी आन्दोलन ने तेलुगू, उडिय़ा, बंगला, हिन्दी, पंजाबी, मराठी, कन्नड़ इन सारे साहित्यों को प्रभावित किया था। मेरे ख्याल से इसकी वह भूमिका दस-पंद्रह वर्षों तक ही थी जो खत्म हो गई।
प्र. आपातकाल के बाद या अस्सी के दशक के शुरूआती वर्षों से हिन्दी साहित्य में समकालीन साहित्य का आरम्भ माना जाता है। समकालीनता से आपका क्या तात्पर्य है? और समकालीन साहित्य की वर्तमान चुनौतियाँ कौन-कौन सी हैं?
उ. देखो! समकालीन तो मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि हर युग में जो लिखा जाएगा उस दौर के लेखक के लिए वह समकालीन ही होगा। अस्सी के दशक के बाद के साहित्य को तुम समकालीन कहती हो जबकि समकालीन कहानी पर लेख साठ के दशक के आसपास ही लिखे गए थे। इस तरह से जो लिखने वाला था उसके समय का जो लेखन था वह उसका समकालीन है या हमारे समय का लेखन हमारे लिए समकालीन है। जो बाद के लोग लिख रहे हैं वे अपने लेखन को समकालीन कहेंगे। उनके बाद जो लिखेंगे वे भी अपने को समकालीन लेखक कहते रहेंगे। इस मायने में समकालीन बहुत व्यापक अर्थ रखता है। इसे तुम सीमित नहीं कर सकती। यानी ऐसे भी लेखक हैं जो कबीर को अपना समकालीन कहते हैं। क्योंकि कबीर ने लगभग वही मूल्य स्थापित किए हैं जो अपने यहाँ संविधान में हैं। इस तरह से जो सदियों पुराना लेखक है, वह भी हमारा समकालीन हो सकता है। ऐसा मुझे लगता है। अब यह है कि उसके भीतर वे क्षमताएँ होनी चाहिए, जो अपने समय में लिखते हुए भी सौ साल बाद के भारत को देख सके। अब रही बात इसकी चुनौतियों की तो इसकी चुनौतियाँ ग्लोबलाइजेशन, उदारीकरण, निजीकरण की हैं, जो पूंजीवादी देशों की खासियत रही है। पब्लिक सेक्टर का निरंतर सिकुड़ते जाना और निजी पूँजी का विस्तार होते जाना, ये जो समस्याएँ पैदा हुई हैं, यह ग्लोबलाईजेशन और उदारीकरण के कारण हुई हैं। इस पूरी दुनिया के बदले जाने का प्रमुख कारण रूसी समाजवाद का विघटन और वहाँ समाजवाद का असफल होना है जिससे पूरी दुनिया को धक्का लगा है। पहले देखो! तीन दुनिया मानते थे। एक रूस है, एक अमेरिका है, बाकी विकास करने वाली दुनिया है। अब एकमात्र अमेरिका रह गया है बाकी उसके पिछलग्गू हैं। हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम विकास की सारी बातें करते हैं, विकास करना चाहते हैं लेकिन हम, हम रह जाते हैं कि नहीं, यह देखने वाली बात है। हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता अपनी स्वायत्तता बनाए रखते हुए विकास करने की है। हमारे प्रधानमंत्री देश- देश में घूम रहे हैं। हर देश के पूँजीपतियों से वे मिल रहे हैं और कह रहे हैं हमारे देश में निवेश करो। अब स्थिति यह है कि जो आदमी निवेश करेगा वह मुफ्त में धर्मार्थ करने के लिए तो नहीं करेगा। यानी वो अपी भलाई के लिए आएगा। तात्कालिक तौर पर यह जनसाधारण को लगता है कि बड़ा फायदेमंद है। देखिए ! हमारे प्रधानमंत्री हमारे देश के लिए कितना कर रहे हैं। ऐसी ट्रेन चलाई जाएगी, ऐसा हवाई जहाज उड़ाया जाएगा, ये होगा, वो होगा। चुनौती सबसे बड़ी यह है कि विदेश की गति के साथ अपनी गति को हम बनाए रखें। लेकिन अपने को भी हम बनाए रखें, अपनी स्वायत्तता, निजी व्यक्तित्व, अहमियत और अस्मिता के साथ । इसीलिए जब वैश्वीकरण की बात आई तब साहित्य में आंचलिकता की बातें चलने लगीं। इसी वैश्वीकरण की देन है जनजातियों की चिंता, आदिवासियों की चिंता। हमारी भाषा मिट रही है हमारा खान-पान, कपड़े-लत्ते मिट रहे हैं। हमारे तीज-त्यौहार मिट रहे हैं। तुमने रेहन पर रग्घू पढ़ा होगा, उसमें यह सब है।
प्र. बतौर लेखक क्या आपकी सारी चिंताएँ अभिव्यक्त हो पाती हैं?
उ. जो कुछ मुझे कहना चाहिए वो सोचता हूँ कहने के लिए लेकिन नहीं कह पाता हूँ। इसके कुछ और कारण हैं। जैसे कायदे से बार-बार मेरे दिमाग में यह आ रहा है कि मुझे प्रेम को डिफाइन करना चाहिए। मेरी रचनाओं में कहीं सच्चे अर्थों में स्त्री नहीं है। मैं क्या सोचता हूँ एक स्त्री के बारे में, या स्त्री सम्बंधित अन्य सभी बातों के बारे में। यह लिखना चाहिए लेकिन नहीं लिख पाता हूँ। अभी तक मेरे पास वो भाषा नहीं आ पाई है।
प्र. आपकी रचना महुआ चरित की महुआ के चरित्र के माध्यम से स्त्री जीवन का ही उल्लेख हुआ है?
उ.कोशिश मैंने की है, लेकिन उसे पर्याप्त नहीं मानता ।
प्र. आपने गपोड़ी से गपशप पुस्तक में कहा है प्रेम पर मैं मैच्योर होकर लिखूँगा तो क्या अब मान लिया जाय कि वह समय आ गया जब आप प्रेम पर लिखेंगे?
उ. (हँसते हुए) मुझे ध्यान था कि टॉलस्टॉय ने बुढ़ापे में प्रेम पर लिखा था। मेरे मन में भी यही बात थी। लेकिन फिलहाल मैं नहीं लिख पा रहा हूँ। मेरे पास वो हिम्मत नहीं है। क्योंकि एक तो अपनी छवि खराब होने की आशंका है, दूसरे परिवार पर भी इसका असर पड़ता है। बच्चे-बच्चियाँ, नाती-पोता दुनिया भर के लोग हैं तो इन सब वजहों से संभव नहीं हो पा रहा है।
प्र. आपने हमेशा से वही किया है जो लीक से हटकर रहा है। वह विवादित भी रहा है। वह चाहे काशी का अस्सी हो या महुआ चरित हो, उपसंहार हो। ऐसे में आपको अपनी छवि खराब होने की चिंता है या कोई और बात है?
उ. मुझमें वो क्षमता नहीं है । देखो! आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बाणभट्ट की आत्मकथा लिखी। भट्टिनी को बहुत लोग आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी से जोड़कर देखते हैं। बात चाहे जो भी हो लेकिन द्विवेदी जी में वो साहस था कि शान्तिनिकेतन में रहते हुए उन्होंने वो उपन्यास लिखा। कहीं न कहीं मेरे भीतर वो हिम्मत नहीं है। जब तक मैं अकुंठ नहीं हो जाता हूँ तब तक नहीं लिख पाता हूँ। क्योंकि देखो! लेखक के बारे में एक चीज मैं तुम्हें बताता हूँ, लेखक जब यह भूल जाए कि वह परिवार में है। उसका कोई दोस्त है। उसका कोई दुश्मन है। यानी एक ऐसी स्थिति है जहाँ वो अपने को हर चीज से निरपेक्ष मान ले। वो साधू संत की तरह दुनिया को देखे। वो हर दुनियावी चीज से ऊपर उठ करके उसे देखे। मैंने काशी का अस्सी लिखने के बाद गालियाँ सुनीं, धमकियाँ सुनीं। उपसंहार के साथ भी ऐसा ही हुआ। उपसंहार जब छप के आया तो करीब तीन-चार महीने के बाद जब भाजपा की सरकार सत्ता में आई तब मेरे पास करीब सौ-डेढ़ सौ फोन आए कि तुम्हें लिखना है तो तुमने ईसा पर क्यों नहीं लिखा, मोहम्मद पर क्यों नहीं लिखा। उनका कहना था कि उनके ईश्वर को मैं साधारण आदमी बना रहा हूँ । इस तरह से लिखना जोखिम का भी काम है। इस मामले में मैं अब तक तो कायर रहा हूँ।
प्र. चूँकि आप बनारस से हैं। यह सामासिक संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे में मेरा सवाल यह है कि मुसलमान जीवन आपकी रचनाओं से क्यों उपेक्षित रहा?
प्र.देखो! दरअसल उस जीवन से मेरा कोई परिचय ही नहीं है । कोई ऐसा मुस्लिम परिवार नहीं मिला जिस परिवार में मेरा आना-जाना, घुलना-मिलना रहा हो। उनकी समस्याओं एवं मुश्किलों को जानने का मौका मिला हो। और लेखन में किसी भी विषयवस्तु को उतारने से पहले उससे केवल एक-दो बार रूबरू होने से नहीं होता है। हाँ, दोस्त हमारे मुसलमान जरूर हैं लेकिन मैं उस घर को, उस परिवार को, उसकी जिन्दगी को जान नहीं पाया । ऐसे में लिखता तो झूठ होता या कल्पित होता। यह मुझसे नहीं होता है।
प्र. आज जब सारे साहित्यकारों का रुख दिल्ली की ओर है, तब वह कौन सा मोह है जो आपको बनारस में घेरे हुए है?
उ. बनारस से बाहर जितने भी लेखक गए वो पलायन साठ के आसपास शुरू हुआ। साठ के बाद ही कवि केदारनाथ सिंह पडरौना गए। विष्णुचंद्र शर्मा एवं त्रिलोचन जी दिल्ली गए। नामवर जी सन् 65 में दिल्ली गए। विद्यासागर नौटियाल देहरादून में प्रैक्टिस करने लगे। ये सारे लोग काम की तलाश में गए, क्योंकि बनारस में संभावनाएँ नहीं थीं। पचास के आसपास के लेखक कलकता जाते थे क्योंकि तब रोजगार कलकत्ते में ही संभव था। आजादी के बाद जब दिल्ली का विकास शुरू हुआ तो संभावनाएँ दिल्ली की तरफ गईं। फिर सन् साठ के आसपास बम्बई का विकास दिखाई पड़ा तो लोग बम्बई के तरफ गए। वस्तुत: रोजी-रोटी की समस्याएँ लोगों को छोटे शहरों से बड़े शहरों के तरफ ले गईं। मैं भी गया होता लेकिन मुझे सन् 64-65 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में नौकरी मिल गई। दरअसल जब यहाँ नौकरी नहीं मिल रही थी और लगा कि संभावना यहाँ नहीं है तो मैं जाने वाला था। हमारे गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से निकाल दिए गए और चंडीगढ़ जा रहे थे तब उनके साथ उनके कुछ शिष्य भी जा रहे थे। मैंने द्विवेदी जी से कहा कि मैं भी आपके साथ चलना चाहता हूँ। द्विवेदी जी ने कुछ सोचते हुए कहा, देखो! नामवर को तो नौकरी मिलेगी नहीं क्योंकि वे बनारस से निकाले गए हैं, दूसरे, सागर से भी निकाले गए हैं। अब उन्हें आगे नौकरी मिलेगी या नहीं, मैं नहीं कह सकता। तब घर कौन देखेगा? उन्होंने कहा कि तुम यहीं रहो और स्ट्रगल करो। संयोग से मुझे सन 64 में ही नौकरी मिल गई।
प्र. मोहल्ला अस्सी से क्या अनुभव रहा?
उ.देखो! जब मैंने मोहल्ला अस्सी बनाने के लिए चंद्रप्रकाश जी को हाँ की थी तो उस समय मेरे मन में दो तीन बातें थी। एक तो जो गालिब की पंक्ति है न-जो तेरे बज्म से निकला वो परेशाँ निकला। मैंने उनसे कहा कि बंबई जो भी गया चाहे वो प्रेमचंद हों, भगवतीचरण वर्मा हों, अमृतलाल नागर हों, सब वहाँ से पिट-पिटाकर अपमानित होकर लौटे हैं। इस पर चंद्रप्रकाश जी का कहना था कि वे लोग गए थे और मैं यहाँ आया हूँ। बहरहाल! मैंने कहा कि एक बात का ध्यान रखिएगा कि लेखक का सम्मान बचा रहना चाहिए। क्योंकि और सभी लोगों के बड़े बुरे अनुभव रहे हैं। मैं वह अनुभव बर्दाश्त नहीं कर सकता। आप हमारे उपन्यास पर फिल्म बनाएँ और हम अपमानित भी होते रहें। उन्होंने कहा आप निश्चिन्त रहिए। मैं जब शूटिंग शुरू होने वाली थी तब बम्बई गया था। फिल्म सिटी में पूरे मोहल्ले का लोकेशन बनाया गया था। उस समय मैंने देखा कि चंद्रप्रकाश जी समेत अन्य सभी कलाकार वह चाहे साक्षी तंवर हों, रवि किशन हों, मल्लाहिन की एक्टिंग करने वाली आजमगढ़ की लड़की हो या बाकी के जितने कलाकार हों, इवेन सन्नी देओल भी यह जानने के बाद कि जिस उपन्यास की विषयवस्तु पर फिल्म बन रही है, उसका लेखक आया है, जितना सम्मान मिलना चाहिए एक लेखक को उतना उन्होंने मुझे दिया। मेरे जाने पर खड़े हो जाते थे। उठने पर उठ जाते थे। चंद्रप्रकाश जी स्वयं बहुत आदर करते थे। मैंने देखा ऐसी कोई भी चीज नहीं है जिससे अपमानित होने का भाव महसूस हो सके। इन कारणों में से एक कारण यह भी था कि चंद्रप्रकाश जी ने एमबीबीएस किया था। उन्होंने महीने भर का इंटर्नशिप भी किया था। इसके बाद भी वे उसे छोड़कर फिल्मों में आ गए। शुरू से ही उनका ध्यान फिल्मों की तरफ था। वे बहुत पढ़े-लिखे और इतिहास के, वेदों के, पुराणों के, नाट्यशास्त्र के पंडित आदमी हैं। उन्होंने चाणक्य सीरियल बनाया था जो बहुत पॉपुलर हुआ था। उन्होंने अमृता प्रीतम के उपन्यास पर पिंजर फिल्म भी बनाई थी। इसी को ध्यान में रखकर मैंने फिल्म बनाने के लिए उन्हें हाँ कहा था। फिल्म बनने के बाद दूसरी समस्या यह आई कि फिल्म का जो प्रोड्यूसर था वह दूसरे दिमाग का था। वह फिल्मी दुनिया का आदमी नहीं था। प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के बीच की वैचारिक टकराहट होने की वजह से फिल्म अटकी रही।
प्र. अब उपसंहार पर आते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में एक तरफ तो आप राधा को अत्यंत प्रासंगिक दिखाते हैं वहीं दूसरी तरफ रुक्मिणी को नंगा करवाकर उससे हल जुतावाते हैं, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
उ. वस्तुत: राधा के बारे में लिखने के दौरान मुझे लगा कि मुझे राधा के चरित्र को इस रूप में दिखाना है जैसा वह पहले किसी दूसरे की नजर में न आया हो। परंतु उपन्यास में राधा का चरित्र पूरी तरह से उभर नहीं पाया है। वह सिर्फ एक झलक भर है। मैं अपने से इसकी आलोचना करता हूँ। हमारे यहाँ जितने भी चित्र मिलते हैं वह राधा और कृष्ण के ही मिलते हैं। कृष्ण और रुक्मिणी के नहीं मिलते हैं। इन बातों से जाहिर होता है कि प्रेम को ज्यादा महत्त्व उस समय दिया गया था। मेरे दिमाग में तब सिर्फ यही था कि बरसाने के बाद राधा कृष्ण से मिली थीं या नहीं? पर कहीं उसका उल्लेख नहीं मिलता है। उद्धव शतक में ऐसा जिक्र आता है कि वृद्धावस्था में कृष्ण को मेले में राधा दिखाई दी थीं। वे दूर से देखते हुए कहते हैं कि देखो! राधा कितनी बूढ़ी हो गई है। और मथुरा बरसाने से दूर ही कितना था, आसपास ही हैं दोनों। ऐसे में यह कैसे हो सकता है कि इतने वर्षों तक कृष्ण मथुरा में रहे हों और वे दोनों न मिले हों। कृष्ण को भले ही मौका न मिला हो पर राधा तो मिल सकती थी। इस संभावना को ध्यान में रखते हुए मैंने कल्पना की थी कि वो मालिन के रूप में कृष्ण से मिलने आती हैं। जब कृष्ण राजा हो गए साधारण लोगों से उन्हें नहीं मिलने दिया जा रहा था तब तो वह नहीं जा सकीं। परन्तु जब कृष्ण संकट के दिनों में जेल में थे तो वह उनसे मिलने जाती है। उन्मुक्त प्रेम का यह रूप हमें याद हो आता है। वह कृष्ण से मिलने के दौरान यह कहती है कि अब जब तुम्हें मिलना होगा तो मैं तुम्हें यहाँ नहीं मिलूँगी। वह कृष्ण से जमुना के कछारों में मिलने के लिए कहती है, जहाँ उनका प्रेम फला-फूला था। यहाँ उसके भीतर का अहम् पैदा होता है कि चाहे भले ही कृष्ण राजा हो गए हों या भले जो कुछ भी हो गए हों पर है तो वह मेरा कन्हैया ही। वह कृष्ण के लिए दही लेकर जाती है। यहाँ मैंने यह दृश्य भर दिखाया है और इस दृश्य के माध्यम से मैंने राधा के पूरे व्यक्तित्व को प्रोजेक्ट करने की कोशिश की है कि असल में राधा है क्या? समग्र उपन्यास में वह एक ध्वनि की तरह आती है। ऐसी ध्वनि जो छा जाती है। दूसरे रुक्मिणी, द्वारका के जो द्वारिकाधीश कृष्ण हैं उनकी पत्नी है। इसलिए उसका जो रूप दिखाई देता है वह परंपरागत है। आज भी लोग पशु की तरह या मवेशी की तरह औरत को ट्रीट करते हैं। यह ट्रीट कोई और नहीं वर्णव्यवस्था करती है जिसने ब्राह्मणवादी व्यवस्था या मनुवादी सोच का निर्माण किया है। मनुस्मृति में स्त्री, पशु से या मवेशी से भिन्न नहीं है। इस व्यवस्था में औरत से जैसा चाहो वैसा करवा लो, वह करने के लिए मजबूर है। यहाँ राधा तो मुक्त है लेकिन जो पत्नी है समग्र राजमहल की रानी है, वह हल में जोती जाती है। यह प्रसंग मैंने ऐसे ही नहीं ले लिया है। यह महाभारत के अनुशासन पर्व में आता है। एक नारी की समाज में जो हैसियत है उसको दिखाने के लिए मैंने रुक्मिणी का चरित्र गढ़ा है। रुक्मिणी को जो जोतता है वह है ब्राह्मणवादी मानसिकता का परिचायक दुर्वासा है। इस पर लोगों ने काफी हो-हल्ला मचाया था । मेरे पास तो बाद में फोन आया परन्तु इसके प्रकाशक अशोक माहेश्वरी जी के पास पहले फोन आया था कि यह प्रसंग लेखक ने कहाँ से लिया है? इस प्रसंग को मैंने तो दूसरी जगह से लिया था। बाद में मथुरा के किसी महंत से इस प्रसंग के बारे में अशोक माहेश्वरी जी ने पूछा था। उसी ने बताया था कि महाभारत के अनुशासन पर्व में यह प्रसंग आता है। फिर मैंने उस किताब को पूरा पढ़ा तो देखा कि रुक्मिणी के साथ दुर्वासा ने यही किया था। कृष्ण से दुर्वासा ने कहा था कि तुम अपने शरीर पर खीर पोतो तो उन्होंने स्वयं खीर पोती थी। जबकि रुक्मिणी के शरीर पर दुर्वासा ऋषि ने अपने खुद के हाथों से खीर पोती थी। फिर उन्होंने छकड़ा मँगवाया और उस छकड़े में रुक्मिणी को जोता। वे स्वयं चाबुक लेकर छकड़े पर बैठे और बीच शहर से उसे घोड़े की तरह मारते हुए ले गए थे। जब वे द्वारका के बाहर जंगल में आ गए तब उन्होंने कहा था, कृष्ण की मृत्यु तो एक साधारण आदमी की तरह होगी। लेकिन तुम्हारा सौन्दर्य या तुम्हारा जो कुछ भी है वह अक्षुण्ण बना रहेगा। मैंने रुक्मिणी के चरित्र के माध्यम से नारी के ट्रेडिशनल फॉर्म को उतारा है। यानी जो एक नारी की परंपरागत छवि इस देश में रही है उस रूप में उतारा है। यहाँ राधा आधुनिक नारी है और रुक्मिणी परंपरागत नारी है।
प्र. उपसंहार के पात्र जरा के माध्यम से आपने आदिवासीविमर्श का उल्लेख करना चाहा है या कुछ और?
उ.जरा के चरित्र के माध्यम से मैंने एक नया काम किया है जो मुझे अध्ययन के दौरान पता चला कि जरा जिसने कृष्ण को मारा था वह बहेलिया था। मैं ढूँढता रहा कि कृष्ण को मारने वाला कोई साधारण व्यक्ति नहीं रहा होगा। महाभारत में केवल जरा नाम आता है जिसने कृष्ण को मारा था। मेरे दिमाग में गांधारी का कृष्ण को दिया गया वह शाप याद आ रहा था कि जिस तरह से तुमने कौरव वंश को आपस में लड़ाकर समाप्त किया उसी तरह से यादव वंश भी एक दिन आपस में लड़कर समाप्त हो जाएगा। तब मुझे लगा कि जब कृष्ण यादव थे तो उनको मारने वाला भी कोई यादव ही होगा। कृष्ण को कोई दूसरा क्यों मारे। पढऩे के दौरान मुझे पता चला कि वासुदेव की चार बीवियाँ थीं। इनमें से दो देवकी और रोहिणी का तो उल्लेख मिलता है। देवकी केपुत्र कृष्ण और रोहिणी के पुत्र बलराम थे। परन्तु बाकी की दो बीवियों का उल्लेख नहीं मिलता। इसका प्रसंग मुझे हित हरिवंश में मिला जिसमें यह बताया गया है कि वासुदेव की अन्य दो पत्नियों में से तीसरी का नाम सुतनु और चौथी का नाम सुतारा था। इनमे से एक जनजाति समुदाय से थी। जनजाति समुदाय की स्त्री, वासुदेव की पत्नी कैसे थी? यह मेरे दिमाग में घूम रहा था। तब मुझे लगा कि जब वासुदेव कृष्ण के साथ द्वारका गए थे तब वे आज की तरह केवल गद्दी पर बैठे नहीं रहे होंगे। वे जंगलों में शिकार के लिए जाया करते रहे होंगे। जब वे जगंलों में जाया करते होंगे तो वे वहीं खाते-पीते होंगे, ठहरते होंगे तो वही सुतनु या सुतारा जो भी उन्हें मिली होंगी। फिर संबंध हुआ होगा। उसके बाद फिर गर्भ रहा होगा और तब जरा पैदा हुआ होगा। यह उस समय के राजाओं की परंपरा में था। चूँकि यह मामला आदिवासी का था इसलिए वासुदेव उन्हें लेकर के द्वारका अपने राजभवन में नहीं गए होंगे। वह और उसका बच्चा दोनों जंगल में ही रह गए होंगे। इसीलिए वह अपने को वासुदेव का बेटा बताता है। ऐसा मैंने अनुमान लगाया है।
प्र. आप एक अच्छे विद्यार्थी, शोधार्थी एवं प्राध्यापक रहे हैं, हमारे जैसेशोधार्थियों के लिए आप क्या कहना चाहेंगे?
उ.देखो! मेरा एक अनुभव है । शोध के काम को बहुत महत्वपूर्ण मान लेना या यह मान लेना कि यह बहुत बड़ा काम होगा और इसी के सहारे मैं जीवित रहूँगी या हम जीवित रहेंगे या यह हमेशा याद रखा जाएगा, यह सारी बातें एक भ्रम है, मिथ्या है। शोध डिग्री के लिए की जाती हैं और शोधार्थी इसे डिग्री के लिए ही करें। सृजनात्मक लेखन इससे एकदम भिन्न चीज है। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना लिखना, यह एकदम अलग चीज है। इसमें शोध की कोई भूमिका नहीं होती। शोध तुम्हें केवल एक अच्छा काम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है। लेखक बनने में उसकी भूमिका खाद मिट्टी की तरह होती है। जैसे खाद काम करता है मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए, वैसे ही शोध जो है खाद की तरह है।
यह साक्षात्कार 23 जून, 2016 को बनारस स्थित काशीनाथ सिंह जी के निवास पर रिकॉर्ड किया गया।