Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

कानों सुनी आंखों देखी

'बी'सवीं सदी के सम्पादक 'खु़श्तर’ गिरामी ने प्रसिद्घ गीतकार राजा महदी अली खां को पत्र लिखकर अपने वार्षिक अंक के लिए एक कविता की मांग की। राजा महदी अली खां ने उत्तर भेजा, ''तुमने मुझे कविता भेजने के लिए लिखा है। लेकिन क्यों? मैं कोई शायर हूं? शायर होगा तुम्हारा बाप, मैं तो शरीफ आदमी हूं।‘’
                                                                                           ***
प्रसिद्घ व्यंग्यकार कन्हैयालाल कपूर डी.एम. कॉलेज, मोगा में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे। अत्यंत विनम्र, सौम्य, शिष्ट व्यक्ति थे। एक दिन कॉलेज में हुई किसी घटना के संबंध में प्रिंसिपल ने उनको अपने दफ़्तर में बुलाया। प्रबंधक कमेटी के तीन-चार सदस्य भी वहां पर उपस्थित थे। प्रिंसिपल किसी कारणवश ताव खाए बैठा था। उसने कपूर साहिब को खासा बुरा-भला कहा। कपूर साहिब खामोश बैठे सुनते रहे। आिखर उन्होंने एक काग•ा उठाकर उस पर एक शेर झरीठा कागज़ प्रिंसिपल को थमाकर चले आए। शे’र था-
चुप रहे हम अदब से महिफल में,
वर्ना किस बात का जवाब न था।
                                                                                           ***
कोई पचास वर्ष पूर्व दिल्ली की जामा मस्जिद के सामने मौलवी की दुकान के ऊपरी चौबारे में प्रत्येक रविवार को काव्य गोष्ठी होती थी। प्राय: 'गुलज़ार'देहलवी गोष्ठी का संचालन करते थे। इन गोष्ठियों में कविगण ही श्रोता होते थे। 'गुलज़ार' को कई लोगों के नाम भी मालूम नहीं होते थे, इसलिए वे किसी भी अपरिचित कवि से प्रार्थना करते थे कि अपना परिचय देकर काव्य-पाठ करें। उन्होंने एक अधेड़ आयु के व्यक्ति से यही प्रार्थना की। उसने क्षमा याचना करते हुए कहा कि मैं शायर नहीं हूं, केवल शायरी सुनने का शौ$क है मुझे। 'गुलज़ार' ने कई बार आग्रह किया लेकिन उसका यही जवाब रहा।
गोष्ठी में उपस्थित देवेन्द्र सत्यार्थी अपने स्थान पर से उठे और लगभग टहलते हुए उस व्यक्ति के सामने जा खड़े हुए। बोले, ''ज़रा उठिए मियां।''वह व्यक्ति सत्यार्थी जी को पहचानता था। आदाब करते हुए उठ खड़ा हुआ। सत्यार्थी जी ने दोनों बाहें फैलाकर कहा, ''आ गले मिल यार। अगर वा$कई, तुम्हें शे'र सुनने का शौक है तो तुम आज तक कहां थे? मैं तो रिक्शे वालों को पैसे देकर शे'र सुनाता रहा हूं।''
                                                                                          ***
पानीपत में ऑल इंडिया मुशायरा था। तब पानीपत जिला नहीं बना था, करनाल जिले का एक सब-डिवीज़न था। करनाल के ज़िलाधीश सुखदेव प्रसाद ने बड़े उत्साह के साथ इस मुशायरे का आयोजना किया था। उसी दिन पानीपत के पब्लिक पार्क को 'हाली पार्क' नाम दिया जाना था। सुखदेव प्रसाद ने तय किया कि सभी आमंत्रित कवि हाली के मज़ार पर जाकर फातिहा पढ़ेंगे।
हम लोग होटल से चलने लगे तो 'साहिर' लुधियानवी की दशा देखने लायक थी। उनको बहुत घबराहट हो रही थी। मुझे एक ओर ले जाकर बोले, ''यार, मैं वहां नहीं जाऊं तो कुछ फर्क पड़ेगा?'' मैंने कहा, ''देख लो, प्रेस वाले तुम्हारी अनुपस्थिति को हाली के प्रति तुम्हारी बगावत करार न दे दें।'' वे और अधिक परेशान हो गए। मैंने पूछा, ''प्राब्लम क्या है?'' बोले- ''यार, मैंने कभी फातिहा ही नहीं पढ़ी। मुझे तो ये भी मालूम नहीं कि ऐसे मौके पर करना क्या होता है।'' मैंने कहा, ''तुम हमारे साथ चलो, वहां जाकर फातिहा मत पढऩा।''बोले, ''लोगों को पता चल जाएगा कि मैं नाममात्र का ही मुसलमान हूं।''
उनको आश्वस्त करते हुए मैंने बताया कि हम तो केवल दुआ के लिए हाथ उठाएंगे, फातिहा तो लुधियाना से विशेष तौर पर आमंत्रित मौलाना पढ़ेंगे, उतनी देर तुम हाली की रूह को यह विश्वास दिलाते रहना कि तुम उनसे बागी नहीं हो।
साहिर की जान में जान आई लेकिन मज़ार पर पहुंचकर भी उनको यह चिंता सताती रही कि कहीं साहिर के इस्लामी कर्मकाण्ड से अनभिज्ञ होने का भण्डाफोड़ न हो जाए।
                                                                                                          ***
शायर 'जिगर' मुरादाबादी और कहानीकार सआदत हसन मंटों ने जब लाहौर में पहली बार एक-दूसरे को देखा तो किसी ने उनका परिचय कराते हुए कहा, ''जी, मैं लाहौर का गुर्दा हूं।''
                                                                                                           ***
एक शायर तहसीलदार थे और कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी उनके जिले के डिप्टी कमिश्नर। एक मुशायरा हुआ। कुंवर साहिब संचालन कर रहे थे। वे अपने डिप्टी कमिश्नर से सीधे-सीधे कुछ नहीं कह सकते थे, इसलिए उन्होंने दो-चार लोगों से चिटें भिजवाईं कि अमुक साहिब को पढ़वाइए। कुंवर साहिब ने इशारे से उनको अपने पास बुलाया और पूछा- ''स्टेशन लीव लेकर आए हो या बिना लीव के ही हेडक्वाटर छोड़ आए हो?'' ''सर...'' तहसीलदार हकलाने लगे। कुंवर साहिब ने कहा, ''चलो अपनी तहसील पहुंचो, हम वहीं आकर तुमसे शे'र सुनेंगे।''
शायर तहसीलदार दुम दबाकर मंच पर से उतरे और गधे के सिर से गायब होने वाले सीगों की तरह गायब हो गए।
                                                                                                                ***
एक शायर ने अपने किसी मित्र शायर की गज़ल मुशायरे में पढ़ दी। मित्र को पता चला तो उसे बहुत क्रोध हुआ। वह वर्षों पूर्व एक पत्रिका में प्रकाशित अपनी वही गज़ल लेकर प्रबंधकों के पास गया और शिकायत की। प्रबंधकों में से एक व्यक्ति ने शायर से पूछा कि आपने चोरी की गज़ल मुशायरे में क्यों पढ़ी? क्या आप खुद शे'र नहीं कहते? शायर ने संपत भाव से कहा, ''साहिब, चोरी कैसी? अगर आपके पास धुली हुई कमी न हो और आपको कहीं जाना पड़ जाए तो क्या आप मित्र की कमी•ा पहनकर नहीं चले जाते? अगर आपका जूता फट रहा हो तो क्या आप मित्र का जूता पहनकर नहीं चले जाते? इसे चोरी कहेंगे आप?''
                                                                                                                 ***
हमारे मामा स्वर्गीय रत्नदेव भण्डारी स्वतंत्रता सेनानी एवं कांग्रेस के नेता थे। लाहौर में रहते थे। चारों ओर शे'रों-शायरी का माहौल था। उनके मन में भी शायरी करने की इच्छा पैदा हुई। उन्होंने एक गज़ल कही और किसी उस्ताद शायर को दिखाने ले गए। उस्ताद ने कहा, ''पढि़ए।'' मामा ने गज़ल पढ़कर सुना दी। उसका एक शे'र था-
हम मिठाई बांटते फिरते हैं आज,
है हमारी भैंस ने कटड़ा दिया।
गज़ल सुनकर उस्ताद ने कहा, ''मिसरे तो बह्र में हैं, ख्याल की तुम जानो। वैसे हमारा मशवरा ये है कि तुम शायरी के पचड़े में न ही पड़ो तो अच्छा है।''
                                                                                                                 ***
पटियाला में एक बहुत बड़ा मुशायरा हुआ। इसमें 'फ़िराक़' गोरखपुरी भी शरीक हुए। मुशायरे का आयोजन एक सरकारी अफसर ने किया था। बावजूद इसके कि उन्होंने शायरों के ठहरने की व्यवस्था सर्किट हाउस में कर रखी थी, मुझे और 'फ़िराक़' साहिब को उन्होंने अपने घर पर ठहराया।
लगभग डेढ़ बजे रात को मुशायरा खत्म हुआ। खाना खाते-खाते अढ़ाई बज गए। लगभग तीन बजे हम उनके घर पहुंचे। अभी बिस्तर में घुसे ही थे कि वे अपनी पुस्तक की पाण्डुलिपि लेकर हमारे कमरे में आए। बोले, ''फ़िराक़'साहिब, मैंने 'शाहनामा हिन्द' लिखा है, कुछ बंद सुनाने की इजाज़त चाहता हूं। 'फ़िराक़'साहिब ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें उघाड़कर कहा, ''छपने दीजिए, पढ़ेंगे।'' मेज़बान ने विनम्रतापूर्वक कहा, ''जी, मैं चाहता था, इसकी तम्हीद आप लिखें।'''फ़िराक़' साहिब मुस्कराए। बोले, ''आपने इतना बड़ा शाहनामा लिख लिया तो तम्हीद का एक सफा भी लिख लिया होता।'' मेज़बान ने कहा, ''जी , लिख तो रखा है, आप मुनासिब समझें तो अर्ज़ करू ।'' 'फ़िराक़' साहिब उठकर बैठ गए। बोले, ''लाइए, दिखाइए।''मेज़बान ने कागज़ पेश कर दिया। ''कलम दीजिए,'' ''फ़िराक़'साहिब ने कहा। मेज़बान ने अपनी जेब में से निकालकर कलम पेश कर दी। 'फ़िराक़'साहिब ने हस्ताक्षर किए और कागज उनको थमाते हुए कहा, ''जरा बत्ती भी बुझा दीजिए। अब सोने को रात कहां बाकी है।''
मेज़बान धन्यवाद देकर विदा हुए तो मैंने कहा, ''फ़िराक़' साहिब, एक नज़र पढ़ तो लिया होता। क्या मालूम क्या लिखा होगा। आखिर तम्हीद तो आपके नाम से ही छपेगी।'''फ़िराक़' बोले, ''तुम क्या चाहते हो मैं ज़िब्ह जाता उनके हाथों? सारी रात आंखों में गुज़र गई। अब जो भी लिखा हो, वो जानें। सो जाओ और मुझे भी सोने दो।''