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Tuesday 21 Nov 2017

कोह का कोहरा

आज की रात काफी लम्बी है, जैसे रात बीतेगी ही नहीं। भीमा रातभर सो नहीं पाया है। शहर अब शांत हो गया है। उसे भी अब नींद आ रही है। कभी-कभार गली के कुत्तों का दौडऩा-भौंकना, एकआध गाड़ी का आना-जाना इस शांत वातावरण को भंग कर रहा है और भीमा का सीना एक अजीब डर के कारण कांप रहा है। अपने घर-परिवार को गाँव में छोड़कर भीमा शहर आया था। वह मजदूर बनके कुछ पैसे कमायेगा फिर गाँव वापस चला जायेगा। गाँव में टूटे हुए घर को बनवाएगा,  दोनों बच्चों के लिए कपड़े खरीदेगा एवं बच्चों को पाठशाला को भी भेजेगा। शहर में आकर वह मजदूर बनकर ही रह गया और नये स्थान पर बन रहे घर के काम में मजदूरी का काम कर रहा है। वह उस आधे बने हुए बड़े से घर के एक कोने में चटाई और अपने कुछ पुराने कपड़े को समेट कर रात व्यतीत करता है। सारी रात गाडिय़ों का आना जाना एवं अनचाही आवाजों का कानों में पडऩा उसे अच्छा नहीं लगता है, लेकिन धीरे-धीरे इन सब की आदत भीमा को लग गई है।

       मजदूरी से वह जो भी कुछ पैसे कमाता है, उसमें कुछ अपने खर्च के लिए रखकर बाकी बच्चों के लिए संचित कर रहा है। धीरे-धीरे रात गहरी होने के साथ-साथ शहर शांत होने लगता है। भीमा भी चैन की साँस लेता है। हड्डी को तोडऩे वाली मेहनत के बीच में कब ठंडी हवाएं उसकी शरीर को छू जाती हैं, उसे मालूम ही नहीं पड़ता। जब आँखों की पलकें झपकती हैं तब धीरे-धीरे नींद भीमा पर हावी होने लगती है, किन्तु आज उसकी आँखों में बिलकुल भी नींद नहीं है। चटाई पर लेटकर बस शरीर को इस ओर-उस ओर कर रहा है। कब रात ढलेगी, सुबह होगी और वह गाँव के लिए बस पकड़ेगा। यह सब सोच-सोचकर कब उसकी पलकें लग गई उसे पता ही नहीं चला। कौवों की कांव-कांव ने नींद को भंग कर दिया और देखा कि सबेरा होने को है। हड़बड़ी में भीमा उठ गया। शीघ्रता से तैयार होकर बस स्टैंड की ओर निकल पड़ा। फूलवाणी को जानेवाली बस की टिकट लेकर भीमा बस में जा बैठा। गाड़ी में ज्यादा लोग चढऩे के कारण लोग गुस्से से कंडक्टर को खरी-खोटी सुना रहे हैं लेकिन भीमा का मन उसके गाँव के सोच में ही डूबा हुआ है। घर में बच्चे कैसे होंगे? क्या कर रहे होंगें? इन सब चिंता में उसका मन व्यथित हो रहा था।

       बस के पीछे वाली सीट पर बैठे दो शिक्षित बाबू आपस में बात कर रहे हैं- सुन रहे हो दाम! फूलवाणी नाम कितना सुन्दर था। उसको काट-छांट करके फूलवाणी और कंधमाल बना दिया गया। हम तो कंधमाल में रह गए। घने जंगल, फल-फूल से भरा-पूरा, हर समय पक्षियों की चहचहाहट और जंगल के फूल महक उठते थे। पता नहीं किस काल से कौन यह फूलवाणी नाम रखा था। फूल भी बात करते थे। अलग-अलग रंग एवं खुशबू से सारा अंचल महक रहा था। इसी कारण यह नाम भी खूब सही बैठ रहा था फूलवाणी, जैसे फूल बात कर रहें है। हम तो कंधमालवाले बनाकर खदेड़ दिए गये। तब दाम ने कहा कि श्याम बाबू! माफिया लोग तो जंगल को लूट लिए। ट्रकों में पेड़ों को काटकर लकडिय़ाँ शहर भेजी जाने लगी। भरापूरा जंगल अब उजड़ चुका है। चिडिय़ों की चहचहाहट और फूलों की खुशबू अब नहीं रही । फूल की वाणी कब खो गई पता ही नहीं चला। मगर कंधमाल नाम में कुछ खराबी नहीं है, कितने युगों का इतिहास इस नाम में छिपा है। केंदुझर का कंधमेली की बात क्या आप भूल गये हैं? बालेश्वर के वह रिंगमास्टर अगर न होते तो केंदुझर गढ़ को भी भुइंयामेली के लोग  अपना बना ही लेते। कुलार गढ़ का कंध गोष्ठी के बारे में तो आप जानते हैं। फिरंगियों के साथ भी कंध लोग लड़ गये। कंध जाति का एक इतिहास है, गौरव है, इसलिए तो कंधमाल नाम हमारे लिए प्रिय है। तब श्याम डोरा कहते हैं, हाँ आपने जो कहा सही बात है। हम इतिहास भूल गए हैं। कुई भाषा में तो अब पढ़ाया नहीं जा रहा है न। मातृभाषा के जरिए पढ़ाते तो शायद उनका आग्रह पढ़ाई में होता। मातृभाषा में अपने जाति के इतिहास के बारे में भी जान पाते।

बस तेजी से आगे बढ़ रही थी। यह सब आलोचना भीमा को सुनाई दे रही है। उसको यह सब बातें समझ तो नहीं आ रही है पर कुछ-कुछ उसके दिमाग में एक अलग प्रतिक्रिया पैदा कर रही हैं। लेकिन उसके दिमाग का ज्यादा हिस्सा उसके पत्नी और बच्चों की सोच में लगा हुआ है। बस वन-जंगल के हरे-भरे परिवेश में आगे का रास्ता नाप रही है। अब श्यामबाबू कहते हैं कि सुनो दाम जी! यह वन-पहाड़ बहुत सुन्दर और शांत थे। झरने का झर-झर शब्द, पक्षियों की चहचहाहट, जंगल के फूलों की महक आदि में हमारे शांत वन-पर्वत को सुन्दर और सजाकर रखा था, लेकिन पता नहीं एक अनजाने आतंक के आने के कारण सब कुछ उजड़ गया। फिर दाम कहता है कि हाँ, हाँ आप वह चकापाद आश्रम की बात कह रहे हो ना। बाबाजी की निर्मम हत्या के बाद आतंक बढ़ गया है। चारों ओर भय का वातावरण, कौन किस समय कहाँ क्या करेगा इसका कोई ठिकाना नहीं है। उस ओर जाने के लिए सोचने पर एक अनजाने भय से सीना काँपने लगता है। चारों ओर संदेह का वातावरण छाया हुआ है।

       श्याम कह रहा है, बाबा तो आश्रम में रहकर सेवा पूजा कर रहे थे। उन्होंने किसी का क्या बिगाड़ा था। आतंकवादी ने उन्हें मार दिया। उत्तर देते हुए दाम ने कहा कि अरे यह सब बात तो इसलिए हुई चूँकि चकापाद आश्रम में नेता लोगों की भीड़ लगी। विधानसभा से लेकर संसद भवन में भी तर्क-वितर्क चला। चकापाद आश्रम की बात राजनीति का मुख्य विषय बन गई। विरोधी भी इस बात को लेकर चुप बैठने वाले नहीं हैं। इसे मुद्दा बनाकर निर्वाचन जैसी कड़ी परीक्षा को पार करने के प्रयास में सब जुट गये। धर्म को लेकर राजनीति चली। दिन-रात पुलिस का आना-जाना, शांत वन-भूमि में मार्चिंग का भयंकर शब्द। पक्षी भी भय से कहीं दूर उड़ गये। विरोधियों ने इसे सरकार की विफलता का नाम दे दिया। चकापाद आश्रम में भारत के साधु-महात्माओं का आना-जाना लग गया। धर्म की सुरक्षा हो, साधु-संन्यासियों को सुरक्षा दी जाए इसी बात को लेकर सरकार पर नैतिक दबाव डाला गया। सरकार ने कमीशन बिठाए, इसके बदले अंजाम क्या हुआ यह तो आप देख रहे हैं।

       दाम ने कहा कि हाँ, अब इसके पीछे क्या वजह है यह भी स्पष्ट हो गया है। अपराधी भी पकड़े गये। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि जाति धर्म माया सृष्टि, अर्थात् जाति धर्म वह सृष्टि किए हैं। फिर कहते हैं कि स्व धर्म निधनं श्रेय, पर धर्म भयावह अर्थात् अपने धर्म को छोड़कर और कोई धर्म धारण करने की क्या जरुरत? धर्म तो उच्चारण को संयमित करता है और आचरण को परिमार्जित करता है। उसके अन्दर इतनी गन्दी सोच कैसे आती है? धर्म का मुखिया अगर अधर्म के रास्ते पर चलेगा तब इस तरह की दुर्घटना तो होगी ही। प्रचार-प्रसार की सारी बातें धर्म में हैं, पर और किसी धर्म के लोगों को जबरन धर्मान्तरित कराना कहाँ लिखा हुआ है। यह सब बस संकीर्णतावादी धार्मिक अंधों का खेल है। उनका खेल हमारे लिए काल बन गया है। बस जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है। चर्चा-परिचर्चा उतनी ही तीव्रता से चल रही है। भीमा यह सब सुनकर सिर को हिला दे रहा है। चकापाद वाली बात उसने सुनी है और वह जगह उसके गाँव से पचास कोस दूर है। इसलिए उस घटना का प्रभाव उसके गाँव पर नहीं पड़ेगा, यह उसने सोच लिया है।

       लेकिन एकल शहर में उनके गाँव के पास कोई घटना घटी है उसके बारे में लोगों को बात करते हुए सुनकर उसका मन अस्थिर हो रहा है। पत्नी और बच्चों का मुंह उसे दिखाई दे रहा है। शहर को आये हुए छह महीने हो गए हैं। इस बीच वह उनकी खबर नहीं ले पाया है। कैसे होगें? क्या कर रहे होगें? इसी चिंता में उसका सिर घूम रहा है। सूर्य पश्चिम की ओर ढल रहे हैं। बस तुमुड़ीबंध के आसपास आ गयी है। तुमुड़ीबंध उतरकर भीमा को पैदल चलकर गाँव पहुँचना है। वह तेजी से सोच रहा है। पता नहीं बच्चे क्या कर रहे होंगे? पत्नी चम्पा क्या कर रही होगी? श्याम और दाम की बातचीत भी शिथिल पड़ गयी है। उनका रास्ता भी समाप्त होने वाला है।

अब तुमुड़ीबंध में बस पहुँच गयी है। वहाँ भीमा बस से उतर जाता है। सूर्य डूबने लगा है, इस समय जंगल भूमि में पक्षियों की चहचहाहट नहीं है! चारों ओर यह कैसी नीरवता? उसके साथ और दो यात्री भी बस से उतरे। बस आगे की ओर चलने लगी। अब वनभूमि पूरी तरह शांत है। कहीं कोई शब्द सुनाई नहीं दे रहा है। शाम होने से पहले गाँव पहुँचना है। भीमा पक्का रास्ता छोड़कर, कच्चा रास्ता पकड़कर आगे कुछ चलने के बाद जंगल के अन्दर पैदल चलने वाले रास्ते तक पहुँच गया है। यह रास्ता उसके पहचान वाले गाँव की ओर है। इससे शीघ्र वह अपने गाँव पहुँच पाएगा। अपने बच्चों से मिलने के लिए उसका मन व्याकुल हो रहा है, पर जैसे-जैसे रास्ता बढ़ते जा रहा है, उसका गंतव्य स्थल लम्बा होते जा रहा है।

       कुछ दूर चलने के बाद भीमा को कुछ पुलिस वाले दिखे। पुलिस को देखकर उसके अन्दर भय पैदा हो गया। भीमा डर गया। भीमा ने सुना है कि जंगल के अन्दर पुलिस जिस किसी को देखती है उसे माओवादी होने के संदेह में पकड़कर ले जाती है। पूछताछ के नाम पर लोगों को सताती है। चारों ओर संदेह का वातावरण, जो जिसको देख रहा है, संदेह की नजर से देख रहा है। कोई पुलिस का जासूस समझ रहा है और कोई माओवादी का आदमी समझ रहा है। भीमा का दिमाग नहीं चल रहा है कि वह क्या करे? कुछ सोच नहीं पाया। पीछे तो नहीं लौट पायेगा जैसे भी हो गाँव पहुँचना है। नाटू का गाँव और कितने दूर है? वहाँ घूम रहे एक पुलिस की नजर भीमा पर पड़ी। भारी आवाज में संदेह से भीमा को बुलाया। भीमा डर से धीरे-धीरे आगे बढ़ा। पुलिस ने संदेह से कई सारे सवाल किये। भीमा का परिचय भी माँगा। भीमा ने अपना परिचय दे दिया। नाटू के गाँव में उसका घर है। उसका परिवार और बच्चे वहाँ है। वह छह महीने से मजदूरी करने के लिए शहर गया था और अब गाँव को लौटा है। फिर भी पुलिस का संदेह दूर नहीं हुआ। भीमा को आगे वाले कैंप के पास ले गये। वहाँ और भी कई पुलिसवाले थे। इतनी सारी पुलिस को देखकर भीमा और भी डर गया।

       चौकी में बैठे हुए बड़े पुलिस बाबू ने पूछा कि तू माओवादी तो नहीं? तेरे साथ और कौन है? कहाँ-कहाँ क्या किया है बोल दे नहीं तो तुझे बड़ी दर्दभरी मार पड़ेगी। भीमा ने भय से भरे कंठ में कहा, माओवादी कौन है? मैं नहीं जानता। मेरे साथ और कोई नहीं है। मैं एक गरीब आदिवासी कंध हूँ। दो पैसे कमाने के लिए शहर गया था। मेरा गाँव-घर सब यहाँ है। पुलिसबाबू ने पूछा कुछ अस्त्र-शस्त्र रखा है क्या? जलेसपटा दंगा में तेरी कोई भागीदारी है कि नहीं?

आदेश सुनकर दो पुलिसवालों ने भीमा की और उसके सामान की तलाशी ली। उसके बाद सिर हिलाकर बोला कि कुछ नहीं मिला है। उसके बाद बड़े पुलिस बाबू बोले हो गया तू जा सकता है। जलेसपटा आश्रम में साम्प्रदायिक दंगा हुआ है। कोई तुझे दंगाकारी समझकर संदेह कर सकता है। सावधानी से जाना। भीमा ने हाथ जोड़कर सब को नमस्ते किया और बड़े बाबू के पैर छूकर प्रणाम किया। उसके बाद धीरे-धीरे जंगल के रास्ते चलने लगा। साम्प्रदायिक दंगे की बात सुनकर उसका सीना काँपने लगा है। उसके बच्चों के साथ तो कुछ नहीं हुआ होगा न। पत्नी चम्पा क्या कर रही होगी? कई भयानक विचार उसके मन में पैदा हो रहे हैं।

       कुछ दूर जाने के बाद गाँव के पहले सनिया दिख गया। सनिया तो उसके गाँव का आदमी है। पूछा कि कहाँ गया था भीमा और कहाँ चला आ रहा है? भीमा ने कहा कि वह शहर मजदूरी करने के लिए गया था, गाँव को लौट रहा हूँ, घर जाऊँगा। तब सनिया कहता है- घर हो तब ना तू घर जाएगा! सब जलाकर राख बना दिया है। रात-दिन पुलिस पहरा दे रही है। घर सब जल गया है। बस राख पड़ी हुई है। भीमा रोने-रोने होकर पूछने लगा- मेरे बच्चे? सनिया ने कहा तेरा घर तो जल गया है। बच्चों के बारे मैं नहीं जानता हूँ। कितने लोगों को सरकारी बाबू लोग लेकर कैंप में रखे हैं। वहाँ जाकर पूछो! भीमा का सीना जोर से धड़कने लगा, वह हड़बड़ी से गाँव की ओर भागने लगा। वहाँ भी पुलिस पहरा दे रही थी। उसे रोककर फिर से सब कुछ पूछा और जवाब से संतुष्ट होकर गाँव के अन्दर जाने दिया। भीमा ने गाँव में पहुँचकर देखा कि कई घर जल गये हैं और राख पड़ी हुई है। उसके घर की ओर जाने के लिए उसके पैर कांपने लगे। जाकर देखा तो कुछ अधजली काठ, और राख पड़ी हुई है। यह सब देखकर उसका शरीर काँपने लगा। इस कुटिया को कितने जतन से बनाया था। चम्पा उसे लीपापोती कर साफ करके रखी थी। घर के दीवार पर कितने तरह के चित्र बनायी थी। इसी घर में उसका ब्याह हुआ था। सारे कंध भाईयों को भीमा ने बुलाया था। कुटिया कंध के साथ झरिआ कंध, डंगरिया कंध सब आये थे। कंध युवतियाँ सज-संवरकर कमर में हाथ रखकर कितना नाची थी एवं कुई गीत भी गाई थी। उनके पायलों की झंकार से पूरा जंगल झूम रहा था। नाच-गान के बाद अंत में बकरी की बली चढ़ाई गई। मांस पकाया गया। सारे गाँव के लोग भोज खाए। आज वही घर एक मुट्ठी राख बनकर पड़ा है।

       भीमा को देख कर उसके पास गाँव के कुछ लोग आए और सारी घटनाओं के बारे में बताया। तब भीमा ने अपने बच्चों के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि वे सरकारी कैंप में है। भीमा समय नष्ट न करते हुए कैंप की ओर तेजी से चलने लगा। कैंप में पहुँचकर बच्चों के बारे में पूछताछ की। भीमा की आने की खबर सुनकर उसकी पत्नी चम्पा बच्चों को लेकर दौड़कर उसके पास आई। भीमा को देखकर जोर-जोर से रोने लगी। बच्चे भी चिल्लाकर रोने लगे। भीमा भी खुद को संभाल नहीं पाया। वनभूमि में चारों ओर रोने की आवाज गूंज गयी। अब कंधमाल के घने जंगल में कोह की ओस है, पक्षियों की गूंज खो गयी है। पेड़ों के हरे पत्तों पर अब भी सूखे हुए खून के दाग हैं। आतंक ने अपना शरीर घने जंगल में छुपाया है। सरकारी गाडिय़ों का आना-जाना लगा हुआ है। पुलिस की मार्चिंग से पेड़ पौधे कांप रहे हंै। एक दल के बाद दूसरे दल ऐसे कई राजनैतिक नेता कंधमाल को आ रहे हैं। सरकार के विरोधियों के बीच जलेसपटा घटना को लेकर तर्क-वितर्क चल रहा है।

बात सिर्फ विधानसभा में ही नहीं बल्कि संसद भवन में भी जा पहुंची है। पता नहीं राजनीति के समुद्र मंथन में किसे अमृत मिलेगा और किसे विष? लेकिन कब भीमा जैसे गरीब आदिवासी के आँसू सूखेंगे, कोह के कोहरे में कब सुबह की सूरज की किरण पहुँचेगी, यह किसी को पता है?  

 

अनुवादक स्मृतिरेखा नायक          

ग्राम भीमपुर, पोस्ट काऊपुर, व्हाया बरपदा,

जिला.भद्रक 756113, ओडिशा

मो. 8984794066