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Sunday 19 Nov 2017

एक बूँद सहसा उछली

रेलवे स्टेशन के गर्भ से नाल की तरह निकल कर किसी सुंदरी की कमर की तरह छुई मुई सी स्टेशन सरणी शहर के बीचों बीच से गुजरने वाले अजगरनुमा शेर शाह सूरी मार्ग को जिस स्थान पर लम्बवत क्रॉस करती आगे बढ़ जाती है, वह जगह शहर के व्यस्ततम चौराहे में तब्दील हो गयी है। प्रेमचंद चौक की कलंगी लगाये इस चौराहे के बीच में फूल पौधों की क्यारियों से सजा छोटा सा वलयाकार उपवन है। उपवन के मध्य में छ: फुटिया बेदी पर ब्लैक स्टोन पर उकेरी मुंशी प्रेमचंद की स्कन्ध प्रतिमा !

    प्रेमचंद चौक की स्थिति एलओसी की मानिंद हो गयी है। चौड़े चिकने चमचमाते शेरशाह सूरी मार्ग के दोनों ओर बड़े बड़े शोरूम, मॉल, बैंक, सरकारी कार्यालय एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की लंबी श्रंृखला वाला इंडिया! इसके कंट्रास्ट स्टेशन रोड की पतली उबडख़ाबड़ सरणी के सहारे बसा ग्रामीण परिवेश से कदम ताल मिलाता सब्जियों, फल, जूस, सस्ते रेडीमेड वस्त्र, पुरानी पत्रिकाओं और मर्दानगी की जड़ीबूटी बेचते फुटकर विक्रेताओं की छोटी छोटी गुमटियों व ठेलों की कतारों वाला भारत ! दोनों के संधिस्थल पर किसी बिजूखे की तरह निरीह से खड़े प्रेमचंद समय और समाज की छाती पर बेआवाज किन्तु निरंतर पड़ रही वैश्वीकरण की थापों को टिमटिमाती आँखों से मसूसते रहते।

    झुमकी स्टेशन के उस पार लाइन के सामानांतर बसी कच्ची झुग्गी बस्ती में रहती थी। बाप बाजार में मुटियागिरी का काम करता और हमेशा एक अनजानी हड़बड़ी में रहता। इसी हड़बडिय़ा स्वाभाव के चलते झुमकी के बाद ताबड़तोड़ तीन और कन्याएं औरत की गोद में ला पटका और फिर चौथे साल बोरिया बिस्तर समेट कर बिना किसी से अनुमति लिए अंतिम यात्रा पर निकल गया। बाप की विदाई के बाद सब कुछ अस्तव्यस्त हो गया। माँ ने बड़ी मुश्किल से दो घरों में चौक बासन का काम जुगाड़ा। झुमकी के लिए तीसरे घर की तलाश में बहुत हाथ-पाँव मारे, पर सफलता नहीं मिली तो नहीं ही मिली। हार कर झुमकी ने भीख मांगने का आसान काम अपना लिया।

    झुमकी सुबह घर से निकलती तो रास्ते में संन्यासी मोड़ के पास बच्चों का स्कूल पड़ता। स्कूल में बच्चों को खेलते कूदते और पढ़ते देखती तो हसरत से उसकी आह निकल जाती। कुछ देर के लिए पाँव अनायास ही थम जाते। बच्चों को टकटकी लगाये देखते हुए कल्पना में वह भीतर जाकर उनमें शामिल हो जाती।

     स्कूल के बाहर गेट के पास एक पीपल का पेड़ था। तने पर ऊपर की ओर विज्ञापन वाला बोर्ड टंगा था सर्व शिक्षा अभियान। उसकी नजरें बोर्ड की ओर उठ जातीं। बोर्ड पर दो नन्हे बच्चे सवार थे। मासूम चेहरों पर चटख धूप सी खिली मुस्कुराहटें! कन्धों पर स्कूल बैग ! हाथ हवा में फैले हुए चलो स्कूल चले हम। मन तो उसका भी बहुत कर रहा है स्कूल जाने का। पर घर के हालात उसे रोक रहे हैं। एक मु_ी खिचड़ी से पांच जन के पेट का कुंआ नहीं न भरने वाला। माँ की आमदनी इतनी नहीं की पूरा पड़ जाये। उसका चेहरा विद्रूप होकर रह जाता। तब वह खुद को तसल्ली देने लगती कि बोर्ड पर चित्रित उन बच्चों का आमंत्रण एक ढोंग है। खूबसूरत सरकारी ढोंग ! स्कूल जाना उन जैसियों की तकदीर में नहीं है। बाजार में आने के बाद सबसे पहले झुमकी प्रेमचंद की बेदी के पास आती। पूरी श्रद्धा से उन्हें प्रणाम करती। उनकी नजर में प्रेमचंद एक सिद्ध महात्मा थे और इन महात्माजी के आशीर्वाद के बिना सफलता नहीं मिलाने वाली।

   झुमकी ने स्टेशन के कंगूरे पर टंगी घड़ी की ओर तिरछी नजऱों से देखा। ढाई बज रहे थे। अयं ए ढाई बज गए! इतनी जल्दी ! समय जानते ही पेट के भीतर बैठे चूहे थूथुन ऊपर कर के पंचम सुर में चीं चीं करने लगे। उसने बस्ती की ओर कदम बढ़ा दिए। चलते हुए फ्रॉक की जेब में हाथ डाल कर सिक्कों को टटोला। चेहरे पर आश्वस्ति की चमक बिखर गयी। बेदी की ओर मुंह करके बड़बड़ाई  सब आप ही के प्रताप से हुआ है महराज!

     तभी पांडेयजी के ठेले पर एक ग्राहक दिख गया। आम का सीजन था। पांडेयजी के ठेले पर आम सजे हुए थे। रस से सराबोर पके लंगड़ा आम। मीठी महक से पूरा परिवेश महका हुआ था। झुमकी की आँखों में फुर्ती ठुंस गयी। आम का खरीदार! संभ्रांत वेशभूषा ! तेज तेज चल कर ठेले तक आ गयी और एक दूरी बना कर उस पल का इंतजार करने लगी जब ग्राहक आम ले चुकने के बाद भुगतान के लिए जेब से पर्स निकालेगा। इन्तजार के उन्हीं कुछ बैचेन क्षणों के दौरान नजरें ठेले पर रखे आमों की ढेरी का मुआयना करने लगीं। जैसे हरे रंग में केशरिया तड़का डाल दिया गया हो, वैसी ही रंगत लिए एक पर एक धरे लंगड़ा आम! ढेरी से दूर ठेले के कोने में दो तीन पिलपिले आम पड़े थे। इनका रंग काला पड़ चुका था। त्वचा पर झुर्रियां पड़ गयीं थीं। ये भद्र लोगों के खाने लायक नहीं रह गए थे।

      झुमकी की नजरें इन पिलपिले आमों पर ठहर गयीं। पहले ऐसा हो चुका है कि जब ऐसे बहिष्कृत आमों के खरीदार नहीं मिलते तो पाण्डेयजी इन्हें झुमकी को दे देते थे। अब इन्हें कोई नहीं खरीदेगा। न हो तो ग्राहक के विदा हो जाने के बाद वह खुद ही पांडेय बाबा से इन आमों को मांग लेगी। आम पा लेने की क्षणिक सी उम्मीद जगते ही आंखों में लालसा की एक मुश्त चमक ठुंस गयी।

       तभी झुमकी ने देखा कि ग्राहक भुगतान करने के लिए पर्स निकाल रहा है। झुमकी लपक कर ग्राहक के पास जा पहुंची और हथेली आगे फैला दी।

क्या है रे? ग्राहक ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारा। निहार में दुत्कार नहीं सहानुभूति का पुट घुला हुआ था। भीख चाहिए?

झुमकी ने हाँ में सर हिला दिया। हथेली फैलाने का मतलब नहीं समझ में आ रहा हुजूर को!

ठीक है, ग्राहक भी संभवत:फुर्सत में था। चुहल करते हुए बोला- बोल, भीख में पैसे चाहिए या आम?

      आम की बात सुनकर झुमकी के मन में लालसा फुफकार उठी। दिल जोर जोर से धड़कने लगा। कल्पना में आम का रसीला स्वाद उतर आया। उसने डरते हुए तर्जनी उठा कर ठेले के कोने में पड़े परित्यक्त आमों की ओर संकेत कर दिया।

मुंह से बोल ना रे छोरी! ग्राहक हंसा- क्या गूंगी की तरह इशारे में बतिया रही है। झुमकी चुप रही।

अरे बोल ना, क्या लेगी, आम या पैसे?

झुमकी ने फिर भी मौन साधे रखा और डरते हुए पहले की ही तरह उन आमों की ओर संकेत कर दिया।

जब तक मुंह से नहीं बोलेगी, कुछ नहीं देंगें। ग्राहक झुंझला उठा। झुमकी सहम गयी। चाह कर भी मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे। अत: फिर से मौनी बाबा की तरह वही संकेत !

धत्त तेरे की। ग्राहक फनफनाते हुए बमक पड़ा। सरकार ससुर गरीबों और अन्त्यजों की पूजा आरती उतारने में बावली हुई जा रही है। उन्हें हक और जमीर के लिए लडऩे को उकसा रही है। इ छोरी है कि सरकार बहादुर की नाक ही कटवाने पर तुली हुई है, हंह ! अरे अब तो रिरियाना छोड़ कर हक से माँगना सीखो।

हाँ रे झुमकी। साहब ठीके तो कह रहे हैं। मुंह से बोल दे ना, आम चाहिए कि पैसा। पांडेयजी उसे प्रोत्साहित करते हिनहिना दिए।

हम तो चले पांडेयजी। ग्राहक खीजता हुआ आम वाला कैरी बैग उठा कर चलने को मुड़ गया। झुमकी धक् से रह गयी और तभी उसके कंठ की छोटी सी फांक से एक महीन किंकियाहट गुगली की तरह उछल कर बाहर आयी- आम। अधमरी बेजान सी आवाज! पर ग्राहक के होंठों पर विजयी मुस्कान चस्पा हो गयी। वह वापस दुकान पर आ गया- इ हुई ना बात।

दोष इन लोगों का भी नय है साहेब, पांडेयजी मुस्कुराये। सदियों से चली आ रही स्थिति को बदलने में वक्त तो लगेगा ही।

ग्राहक ने अपने कैरी बैग से एक आम निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया- ले रख ले।

ग्राहक के बढ़े हाथ को देख कर झुमकी स्तब्ध रह गयी। ताजा और पका नया आम दे रहा है ग्राहक बाबू ! मजाक तो नहीं कर रहा? एक पल के लिए मौन रखने के बाद इंकार में सर हिलाते हुए उसने तर्जनी से उन परित्यक्त आमों की ओर संकेत कर दिया।

छी:,ग्राहक खिलखिलाकर हंस पड़ा। अरे, समकालीन साहित्य के स्त्री और दलित विमर्श की नायिका है तू। बदबूदार आम तुझे शोभा देंगें? इसे रख।

झुमकी ने फिर भी इंकार में सर हिल दिया। तर्जनी उन्हीं आमों की तरफ उठी रही। मुंह से बोल नहीं फूटे।

अजीब खब्दी है रे तू। ग्राहक झुंझला उठा। झुमकी का रिरियाना और माइम शैली में बतियाना ग्राहक की खीझ को बढ़ा रहा था। झिड़की में पुचकार का छौंक डालते हुए वह फनफनाया- हम अपनी मर्जी से न दे रहे हैं ई आम। इतनी इतनी सरकारी योजनायें, इतने इतने फण्ड, इतने इतने अनुदान! सारी कवायदें तू लोगों को ऊपर उठाने के लिए ही न हो रही हैं? इन सरकारी कवायदों में एक छोटा सा सहयोग हमरा भी, बस!

   झुमकी कभी आम को और कभी ग्राहक के चेहरे को टुकुर टुकुर ताकती रही। आँखों में भय सिमटा हुआ था। भीतर के बिखरे दरके साहस को केन्द्रीभूत करती अन्तत: मिमियाई- नई सर, ई आम नई, ऊ वाला आम दे दो।

क्यों? जब हम खुद दे रहे हैं तो लेने में क्या हर्ज है रे, अयं?

हम भिखारी हैं सर। अच्छा आम हमरी तकदीर में नहीं लिखा। ऊहे आम निक रहेगा।

देखा पांडेयजी!

एक बात है सर, हथेली पर खैनी मलते हुए पांडेयजी बोले- दलितों के लिए सारे सरकारी अनुदान, योजना और फण्ड के पैसे राजधानी से ऐसे कार्टून में भर कर लदान किये जाते हैं जिसके तल में बड़ा सा छेद बना होता है। सारा कुछ रस्ते में ही रिस जाता है और कार्टून जब इन लोगों के दरवाजे आकर लगता तो पूरा का पूरा छूछा! हा हा हा!

कुछ हद तक ठीक है आपकी बात पांडेयजी। ग्राहक भी हँसे बिना नहीं रह सका। पर इसमें सारा दोष सरकार को देना भी ठीक नहीं। दोष इन लोगों का भी है। इन लोगों को भी तो अपना हक बूझना होगा, उसको पाने के लिए हाथ पाँव चलाना होगा। मतलब हक बचाने की पहल तो इन लोगों को ही न करनी है। एक बार तन कर देखें तो, सारे हक मिलते चले जाते हैं कि नहीं?

एकदम सही कह रहे हैं आप। फिर झुमकी की ओर मुंह करके बोले- ले ले रे, ले ले। साहब और तेरे बीच कोई बिचौलिया नहीं है। साहब के हाथ से सीधे तेरे हाथ में आ रहा है ई अनुदान।

     ग्राहक आगे बढ़ा और आम को झुमकी की हथेली में ठूंसते हुए हिनहिनाया- तकदीर, मुकद्दर, भाग्य, सब बेकार बातें हैं रे। जरूरी है हक को बचाने के लिए लड़ाई की पहल। देख, अब इस आम की मालकिन तू हुई। यह पूरी तरह तेरा है। अब इस पर तेरा हक है। तकदीर तेरी मु_ी में कैद हो गया कि नहीं?

      आम थामी झुमकी की हथेली थरथरा रही थी। आम की साफ पुखराजी रंगत और उसका खरगोश सा मुलायम स्पर्श रोमांचित भी कर रहा था। पर आंखों में अविश्वास और भय दुबका हुआ था।

ग्राहक अपनी राह चला गया। झुमकी चुपचाप गुमटी से उतर आयी और धीरे धीरे घर को जानेवाली राह पर बढऩे लगी। उसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि हथेली में ताजा लंगड़ा दुबका हुआ है। चलते चलते अचानक रुकी और एक ओर खड़ी होकर आम को भरपूर नजरों से निहारने लगी। निहार में एक साथ आश्वस्ति, प्यार और तृप्ति के कई कई शेड्स घुले हुए थे। ताजा पका आम पहली बार झोली में आया है, मानो दलितों के लिए घोषित कोई अनुदान मूर्त होकर उसकी झोपड़ी में आ टपका हो। कदम तेजी से बस्ती की ओर बढऩे लगे।

स्टेशन लाँघ कर कदम कब लाइन पार आ गए और देखते देखते संन्यासी मोड़ का स्कूल कब आ पहुंचाए झुमकी को पता ही नहीं चला। स्कूल से कुछ आगे बायीं ओर की पतली गली में मुड़ी ही थी कि सामने इंस्पेक्टर निमाई बाबू जिन्न की तरह प्रकट हो गए। खाकी वर्दी ! हाथ में रुल! आँखों में लोमड़ी सी चमक! खाकी वर्दी देख कर न जाने क्यों झुमकी की जान सूखने लगती थी। इस बार भी वही हुआ। भीतर ही भीतर कलेजा धक् धक् करने लगा।

का रे झुमकी। निमाई बाबू ने खींसे निपोर दिए- धंधा से लौट रही?

हाँ सर, एही वखत तो लौटते हैं रोज, झुमकी मन ही मन फनफना उठी। हमारे काम को धंधा कहते हैं। खुद बाजार की गुमटियों से और बस्ती वालों से वसूली करते हैं वह धंधा नहीं है?

     झुमकी एहतियात बरतते हुए आम थामी हथेली को पीछे ले जाकर फ्रॉक तले छुपाने का प्रयास कर रही थी कि निमाई बाबू की गिद्ध नजऱों ने ताड़ लिया।

क्या छुपा रहा रे? निमाई बाबू ने झपट कर उसके हाथ को आगे किया। आम देखते ही उनकी आँखे विस्मय से फैल गयीं- ऊरी बाबाए  लंगड़ा आम! वो भी एक दम ताजा!

आम को अपने कब्जे में करने में निमाई बाबू को एक पल भी नहीं लगा।

कहाँ से मिला रे?

एगो साहेब ने भीख में दिया सर। सफाई देते हुए झुमकी की जुबान लडख़ड़ा गयी। निमाई बाबू की आँखों में अविश्वास सिमट आया। फिर हो हो करके हंस पड़ा-इतना सुन्दर और ताजा आम भीख में! असंभव ! सच सच बता, किसी दुकान से पार किया न?

नहीं सर, झुमकी की सांसे रुकने रुकने को हो रहीं थीं। पाण्डेय बाबा की गुमटी पर एक ग्राहक ने दिया। उनसे पूछ लें।

निमाई बाबू ने आम का एकदम करीब से अवलोकन किया। नाक के पास लाकर भरपूर सांस खिंची तो नथुनों के भीतर रसीली महक के साथ साथ लोलुप चमक भी रेंग गयी।

एई, निर्णय लेने में एक पल ही लगा, हर चोर चोरी पकड़े जाने पर यही बोलता। यह आम भीख का नहीं चोरी का माल है।

हम झूठ नई बोल रहे सर, सच बोल रहे। आप पांडेयजी से पूंछ लें।

पूछने का कोई दरकार नेई। ये चोरी का माल है। थाना में जमा होगा। निमाई बाबू कुटिलता से मुस्कुराये।

हम चोरी नहीं किये। झुमकी के हौसले पस्त होते जा रहे थे।

चोप्प ! जबान लड़ा रहा? जब हम बोल रहे कि चोरी का माल है तो बस है।

हमारा यकीन करे सर।

बोला न चोप्प! एक भी शब्द बोला तो लॉकअप में बंद कर देगा, बूझा? प्रमाण लाने होगा। प्रमाण लेके आओ, तब मिलेगा।

झुमकी स्तब्ध खड़ी रही। प्रमाण हंह ! भीख का प्रमाण मांग रहे। बाजार की दुकानों से और बस्ती से दैनिक वसूली करते हैं, उसका प्रमाण माँगा जाय तो? तो दे सकेंगे? ग्राहक बाबू से कितना बोली थी ऐसे सुन्दर आम उन जैसों की तकदीर में नहीं होते। उन्होंने नहीं माना। सरकारी योजनाओं के हवाले दे डाले। अरे, कोई भी सरकारी योजना या अनुदान सही सलामत उन लोगों तक पहुंचा भी है? हंह ! सब फुस्स हो गया न? उसके चेहरे पर स्याह मायूसी पुत गयी।

तभी उसकी आँखें धुंआने लगीं। क्या वाकई सब कुछ इतनी आसानी से फुस्स हो जाने दे? ग्राहक बाबू ने कहा था न कि हक को पाने और बचाने के लिए चौकन्ना रहने के साथ साथ हाथ-पाँव चलाते हुए संघर्ष की पहल करना जरूरी है। पहल! इस मौजूदा स्थिति में पहल के क्या विकल्प हैं भला? वह नन्ही जान! लम्बे तगड़े गुलिवरी कद के निमाई बाबू से हाथापाई करके जीत सकती है? आम छीन कर दौड़ भी पड़े तो निमाई बाबू लपक कर पकड़ लेंगें। आम तो जायेगा ही, भरपूर पिटाई भी हो जाएगी।

तब?

उसके छोटे से दिमाग में कई अजब गजब युक्तियाँ बिजली सी कौंध रही थीं। कोई तो पहल करनी ही होगी हक को बचाने के लिए। एक दम आसानी से सबकुछ फुस्स नहीं होने देगी वह।

अचानक उसके भीतर एक कौंध हुई। आँखों में बिल्ली की सी चमक ठूँस आयी। कलेजा धक् धक् करने लगा। निमाई बाबू आम पा जाने की खुशी में बौराए से तनिक असावधान तो थे ही। झुमकी ने चीते की तरह लपक कर उनके हाथों से आम को कब्जे में लिया और पूरी ताकत से आम पर दांत गड़ा दिए।