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Thursday 23 Nov 2017

मुरादों वाले दिन

गैजेट्स की तरह शायद मनुष्य के स्मृति कोष में भी इनबॉंक्स होता है। चूंकि इस इनबॉंक्स की निर्धारित सीमा नहीं है इसलिये मेमोरी न होने पर कुछ संदेशों को डिलीट नहीं करना पड़ता। लेकिन परवर्ती वक्त उन स्मृतियों को डिलीट करता चलता है जो जीवन का खाका बनाने में जरूरी भूमिका नहीं निभाती। जरूरी भूमिका निभाने वाली स्मृतियां, स्थितियां उम्र के किन्हीं मोड़ों पर सामने आती रहती हैं और पुराने होते गये जीवन से मुलाकात करा देती हैं।

पांचाली के दाम्पत्य के सत्ताइस वर्ष।

किशोरी ..............युवती ............ स्त्री ..............पत्नी .................गृहिणी............. विमाता............माता.........। क्या खोया और क्या पाया इसका मुकम्मल जवाब उसके पास नहीं है।  कितनी आकांक्षाएं .......... कितनी कल्पनाएं............।  सम्पन्न जीवन जीने की कल्पनाएं साकार हुईं जबकि अपने लिये बहुत कोमल लेकिन गहरे एहसास बुनने-चुनने की किशोर और युवा आकांक्षाएं अपूर्ण रह गईं।  वह सत्ताइस वर्षों का स्पर्श और स्मरण करती है तो ऐसी विस्मित होती है मानो यह सब पिछले जन्म का घटित है।  लगता है आयु और वक्त उतना नहीं बीता है जितनी उसकी विचारधारा बदल गई है। कितना अलग सोचती थी। कितना अलग सोचने लगी है।

स्कूल मास्टर पिता की सिफर गृहस्थी।

तीन बेटियों में सबसे छोटी पांचाली।

दोनों बड़ी बेटियां जब भी धारकुंडी (मायके) आतीं, अपने अभावग्रस्त विवाह का ब्योरा देकर घर के अभाव को बढ़ा देतीं।  मां का कलेजा कसकता -

''इतनी सुंदर, गुणी लड़कियां लेकिन सम्पन्न घर न मिले।‘’

अपनी अक्षमता पर बाबू के कंधे झुक जाते ''मेरे पास खूब धन होता तो मिल जाते। इन दोनों की शादी का कर्ज नहीं चुका पा रहा हूं।  पांचाली की शादी कैसे होगी ?’’

पांचाली ने विसंगति का सरलीकरण किया ''बाबू, मेरा पीजी होने दो। टीचर बन जाऊंगी। कहोगे तो एक सुपात्र ढूंढ लंूगी।  प्रेम विवाह में तुम्हें खर्च नहीं करना पड़ेगा।‘’

अम्मा की कसक बढ़ गई ''भली लड़कियां प्रेम-पियार नहीं करतीं।  विधाता सबका जोड़ा बनाता है।  तुम्हारा भी बनाया होगा।‘’

जोड़े बनाने वाले विधाता का फरेब देखो।

सिफर गृहस्थी का संचालन करते हुए अम्मा असहिष्णु हो गई थी लेकिन मतलब की बात करनी हो तो उनके मुख की तनी लकीरों में आग्रहभरी दीनता आ जाती है -

''पांचाली, एकनाथ (बड़े दामाद) सहाय हुए।  बहुत अच्छा रिस्ता बताये हैं।  शेष मणी डॉंक्टर हैं।  दइया-दहेज एक्कौ नहीं मांग रहे हैं।‘’

''बड़ा संतोषी डॉंक्टर है।‘’ पांचाली विस्मय में थी। 

''जमी-जमायी गृहस्थी है।  पांच साल का एक ठो लडि़का है।‘’

पांचाली की युवा आकांक्षा विधुर की पत्नी बनने को तत्पर नहीं थीं।

''अम्मा, तुम्हें जमी-जमाई गृहस्थी दिख रही है।  पांच साल का बच्चा नहीं दिख रहा ?’’

''पांचाली, दूसरी पत्नी एहसान की तरह रहती है।  पति दबा रहता है।  एकनाथ बता रहे हैं, डॉंक्टर की खूब आमदनी है।  तुम्हारी बड़ी बहनें किल्लत में रहती हैं।  जी ललकता है।  किसी बेटी को तो सुखी देखूं।‘’

एकनाथ ने शेष मणी के ऐश्वर्य की जिस तरह खुल कर इत्तिला दी सम्पन्न जीवन जीने की पांचाली की स्वाभाविक इच्छा हो आई या वह स्थिति पर गम्भीरता से विचार करना भली-भांति नहीं सीख पाई थी।  नहीं सोच रही थी अवास्तविक न सही लेकिन असाधारण स्थिति है, जिसके व्यापक असर से मुकाबला करना पड़ेगा।  आरंभिक विरोध के बाद वह सहमत हो गई।  सहमति पर एक नाथ पनचक्की की तरह आवाज करते हुए हंसे थे -

''खूब कमाते डॉंक्टर को मैं सस्ते में लपक लाया।‘’

खानापूर्ति के लिये किये गये विवाह में शेष मणी ने खूब सादगी दिखाई।  वांछित बचत से मॉं-बाबू प्रसन्न।  किसी ने नहीं सोचा शेष मणी का यह दूसरा विवाह है लेकिन पांचाली का पहला है।  वह इतना उत्सव जरूर चाहती है जब विवाह, विवाह जैसा लगे।  बूंदी (शेष मणी का गांव) में अवसर मंगल का था पर मातम का सा आभास मिल रहा था।  मधुयामिनी का कमरा, बिस्तर में बिछी नई चादर के अलावा श्रीविहीन था।  इस रात के लिये हर युवती की तरह पांचाली ने भी तमन्ना की थी। सुहाना, महकता एहसास उसकी चेतना में न जाने कब से मौजूद था जो कमरे की सादगी और पैंतीस वर्ष के शेष मणी की संजीदगी को देख कर आहत हुआ।  शेष मणी नहीं समझ पा रहे थे तेईस वर्षीय पांचाली से क्या बोलें।  आयु अंतर का संकोच, दूसरे विवाह की विवशता, उन्मेष (पुत्र) का भार पांचाली को सौंपने की झिझक, इसी कमरे में पहली पत्नी निधि के साथ हुए पहले मिलन का असर।  वे इतने असमंजस में थे कि नहीं समझ रहे थे उनकी संजीदगी किस परिस्थिति का निर्माण करेगी।  आखिर मंतव्य कहा -

''पांचाली, तुम कुछ सोच तो नहीं रही हो न ? ............. समझ रहा हंू तुम्हें अलग परिस्थिति मिली है ............. निधि के न रहनेे पर अम्मा ने उन्मेष को जिस तरह दुलार दिया, वह हठी हो गया है।  मेरे पिता जी नहीं रहे।  वे होते तो उन्मेष को अनुशासन सिखाते। बच्चा यदि तुम्हारे साथ जिद्दी होकर व्यवहार करे बुरा न मानना ............. धीरे-धीरे मिलनसार हो जायेगा।‘’

पांचाली चाहती थी दाम्पत्य का आरम्भ उन्मेष की फिक्र व्यक्त करते हुए नहीं बल्कि कुछ अच्छे संवाद से हो।  कुछ देर चुप रही फिर पूछा -

''उन्मेष आपके साथ सोहागपुर में नहीं रहता ?’’

''रहता था।  इधर सब अस्त-व्यस्त हो गया। मुझे अस्पताल और क्लीनिक से फुर्सत नहीं मिलती।  अम्मा, बूंदी छोड़कर सोहागपुर में कब तक रहें ? उन्मेष को बूंदी ले आई।  बेचारे का स्कूल छूट गया।  तुम आ गई हो।  उसे सोहागपुर ले चलना है।‘’

 

पांचाली, बूंदी में आठ दिन रही।

परिजन निधि की स्मृति, उन्मेष की चिंता, शेष मणी की लाचारी को प्रमुख मान रहे थे।  ख्याल नहीं था पांचाली क्या सोच रही है।  वह पछीती (घर के पीछे) बने स्नान गृह की ओर जा रही थी। संकरे-अंधेरे गलियारे में अम्मा और विवाह में आई विधि (निधि की बड़ी बहन) मद्धिम स्वर में अपना मर्म सुना रही थीं।  विधि का स्वर -

''निधि ने सुख न जाना।  ठाट उसे ही मिलता है, जिसके भाग्य में लिखा हो।‘’

पांचाली सदमे में - मैंने ऐसा ठाट पाने की चेष्टा तो क्या कामना तक नहीं की।

अम्मा का स्वर ''सेस, दूसर बियाह नहीं करत रहा पै घर - गिरस्ती औरत के बिगिर (बगैर) नहीं चलय।‘’

पांचाली सदमे में - डॉंक्टर साहब दूसरा विवाह नहीं करना चाहते थे तो बिना गर्भधारण किए मैं भी मॉं नहीं बन जाना चाहती थी।

''नुकती (विधि के मामा की बेटी) दुष्ट है।  इतना समझाया पर डॉक्टर साहब से शादी करने को तैयार नहीं हुई।  अरे, मौसी है।  उन्मेष से ममता रखती।  हम लोग भी ध्यान देते।‘’

पांचाली सदमे में - मुझे किसी का रिक्त स्थान मिला है बल्कि नुकती के द्वारा ठुकरा दिया गया स्थान मिला है। मैं दर्द में हॅू।  मेरी दयनीय स्थिति को समझने का प्रयास कीजिये। डॉंक्टर साहब का दूसरा विवाह है पर मेरा पहला है।  मैं अब इस घर की बहू हंू।  मंगल बेला है।  औरतों को मंगल गीत गाने को कहें पर आप दोनों पलकें भिगो रही हैं।

पांचाली अपना पक्ष रखना चाहती थी पर उसकी मीमांसा को कोई उचित न मानता।  नई बहू तर्क करने की अशिष्टता कभी नहीं करती फिर वह तो गहन स्थिति में यहां आई है। उसके प्रत्येक क्रिया-व्यवहार को संदेह से देखा जायेगा।  स्वाभाविक विरोध को षड्यंत्र माना जायेगा। कोई संदेह से देखेगा। कोई अत्यधिक औपचारिकता बरतेगा कि यह शेष मणी की दूसरी पत्नी है।  पहली पत्नी की तरह घर के हुक्मरानो का हुकुम नहीं मानेगी।

आठ दिवसीय प्रवास से लौटी पांचाली के मुख में नवपरिणीता वाली आभा नहीं थी।  मां और दोनों सहोदराओं को उसका मुख नहीं गहने दिख रहे थे।  मां ने आशीष दिया -

''पांचाली, तुम सोने-चांदी से लदी रहो।‘’

''निधि की उतारन से मां ?’’

मां ने दिलासा दिया ''सोना हमेशा शुद्ध और कीमती होता है।‘’

''उतारन? तुमने इतने गहने पहने तो क्या देखे नहीं हैं। मैं तो सात जनम में इतने गहने नहीं बनवा सकती।  सात जनम बड़ी बहन का तकिया कलाम है।

पांचाली को बड़ी बहन का लोभ अशोभन लगा ''बड़ी दीदी, लेकिन तुम्हें जो अधिकार मिला है, मुझे नहीं मिलेगा।‘’

''कैसे कह सकती हो ?’’

''आठ दिन के अनुभव से।‘’

मां ने पांचाली के सिर पर अजेय भाव में हाथ फेरा -

''पांचाली अब तुम ऐश करना सीखो।  बच्चे का ध्यान रखोगी तो डॉंक्टर साहब तुम्हारे सलाहकार बन कर रहेंगे।‘’

पांचाली दूसरी विदा पर बॅंूदी आई।

तीसरे दिन उसे शेष मणी के साथ सोहागपुर जाना था।  अम्मा से आग्रह किया -

''अम्मा, उन्मेष को अपने साथ ले जाना चाहती हूं।‘’

अम्मा ने अविश्वास दर्शाया ''दुलहिन तुम इसकी देख-रेख ठीक तरह नहीं कर पाओगी।  निधि के लिये यह बहुत रोता था।  हमने इसे बड़ी दिक्कत से सम्भाला।‘’

शेष मणी ने खुल कर नहीं लेकिन अविश्वास दर्शाया ''अम्मा, तुम भी चलो।  उन्मेष का मन लग जाये, लौट आना।‘’

''इस बार रहने दो।‘’

सोहागपुर।

सिफर गृहस्थी से आई पांचाली सर्व सुविधा युक्त घर देख कर दंग हुई।  कार, कालीन, क्राकरी, कुर्सियां। साडिय़ों से सम्पन्न कबर्ड।  यह वैभव नहीं, विपुल वैभव है।  उसने घर का कोना-कोना देख डाला।  घर संकेत कर रहा था - तुम प्रथम नहीं द्वितीया हो।  निधि का स्थानापन्न।  उसने यहां शासन किया है।  एक अदृश्य प्रतिद्वन्दी जीवन भर समानान्तर चलती रहेगी। कोई तुम्हें लेकर औपचारिकता करेगा, कोई संकोच, कोई विद्रोह, कोई संदेह। तुम्हारी कर्तव्यपरायणता को उपकार माना जाएगा, राय-मशविरे को स्वार्थ।  सधे भाव में काम करके भी अनिवार्य सा भरोसा शायद न बना सको।  हो सकता है मूल अधिकार की दावेदारी करने में तुम्हें संकोच हो।  तुम्हें असाधारण स्थिति मिली है।  ऐसी स्थिति में रिश्ते एक जैसे हों पर संबंध अलग होते हैं।  शेष मणी से तुम्हारा रिश्ता पति-पत्नी का है पर तुम उनकी पहली नहीं दूसरी पत्नी हो।  संबंध में विकृति या कृत्रिमता न आये इसके लिये तुम्हें तप करना होगा।

करूंगी - यह अनुबंध वह स्वयं से कर रही थी।  सप्तपदी का एतबार मजबूत होता है। आरम्भिक संकोच के बाद शेष मणी और वह नि:संकोच होने लगे।  पांचाली को लगा वह अच्छा संतुलन बना लेगी।  उन्मेष बच्चा है।  थोड़ा-बहुत उपद्रव कर समझदार हो जायेगा।  नहीं जानती थीं योद्धा बहुत छोटा हो तो लड़ाई जघन्य हो जाती है।  वह युद्ध का न औचित्य समझता है न परिणाम।

नये सत्र में अम्मा, उन्मेष को लेकर सोहगपुर आई।  उन्मेष की देख-रेख को लेकर वे पांचाली को इतने निर्देश देतीं जिन्हें न वे खुद पूरा कर सकती थीं, न निधि करती रही होगी।  उन्मेष का रोना, उन्मेष की जिद, उन्मेष का मन बहलाव .......।  उन्मेष को खिलौने, बिस्कुट, चित्रों वाली पुस्तकें दिलाते हुये पांचाली भूल गई नवविवाहितों की जो नई दुनिया होती है उसका नयापन खत्म होता जा रहा है।  बच्चे शीघ्र अनुकूलन बना लेते हैं या प्रकृति उन्हें ज्ञान देती है या वे पूर्वाग्रह मुक्त होते हैं।  उन्मेष, पांचाली को घर का सदस्य मानने लगता यदि रहनुमा बनी अम्मा माह-दो माह में टोह लेने न पहुंचती।  आते ही उन्मेष को अपनी सुपुर्दगी में ले लेतीं।  नहलाना-खिलाना ........ स्कूल भेजना, अपने साथ सुलाना ........।  पांचाली को लगता उसके अभ्यास में व्यतिक्रम आ रहा है -

''अम्मा, उन्मेष ने मेरे कमरे में सोने की आदत डाल ली है।  आप अपने साथ न .........

''जब तक यहां हंू अपने लाल को अपने साथ सुलाऊंगी।‘’

अपने पास सुलाते हुए अम्मा उन्मेष से भेद पूछतीं।  उन्मेष नहीं समझता था अम्मा की सहानुभूति पाने के लिये गतिविधियों को अतिरंजित रूप में बता कर कैसी विसंगति तैयार करेगा।  अम्मा सुबह गहन पूछ-ताछ करतीं -

''सेस, उन्मेष यहां नहीं रहना चाहता था तो बूंदी ले आते।‘’

''अम्मा, उसे स्कूल भेजना जरूरी है।‘’

''बता रहा है तुम पीटते हो।‘’

''स्कूल जाने में बहुत रोता था।  एक बार पीटा।  अब शांति से चला जाता है।‘’

''यह कहो,, दुलहिन आते ही बच्चे को पिटवाने लगी।  लोग ठीक कहते हैं मॉं दूसरी तो बाप तीसरा।‘’

''गलत सोचती हो।  बच्चों के साथ सख्ती करनी पड़ती है।  सब ठीक चल रहा है।‘’

''तुम्हें मरीजों से फुर्सत मिले तब जानोगे क्या चल रहा है।‘’

शेष मणी को फटकार कर अम्मा को तसल्ली नहीं हुई।  बूंदी लौटते हुए एक-दो पड़ोसी महिलाओं और दुलारी (काम वाली बाई) को सतर्क कर गईं ''बंूदी का काम छोड़ कर हम यहां नहीं रह सकते।  उन्मेष का ध्यान धरना।  बिना मां का बच्चा है ..........।‘’

पांचाली के भीतर तेज उबाल उठा।  लगा पूरी देह से वाष्प निकल रही है।  चीखने की इच्छा   हुई - उन्मेष बिना मां का बच्चा है तो मैं क्या हूं?  सौतेली ही सही, मां हंू।  इसी हैसियत से ब्याह कर लाई गई हंू।  जानती हंू। विमाता को खल पात्र की तरह परिभाषित किया जाता है।  कुछ स्वभावत: कुटिल होती होंगी, कुछ को परिस्थिति कुटिल बना देती होगी, जो कुटिल नहीं होतीं उन्हें भी कुटिल मान लिया जाता है।  अम्मा आपने मेरी कौन सी कुटिलता देखी जो अभियोग लगाना चाहती हैं ?  जानती हंूू सास-बहू के कुछ प्राइड एण्ड प्रिज्युडिस होते हैं लेकिन आप तो मुझे न स्वीकृति देना चाहती हैं न समर्थन।  मुझसे कह सकती हैं उन्मेष छोटा है, ध्यान रखना। लेकिन आपको पड़ोसिनें और दुलारी विश्वासपात्र लगती है।  डॉंक्टर साहब देख रहे हैं, मैं पूरी निष्ठा के साथ परिस्थिति से तादात्म्य बनाने की चेष्टा करती हंू। फिर भी मुझ पर वैसा विश्वास, नहीं करते जैसा निधि पर करते रहे होंगे।  मैंने क्या अपराध किया है जो आप लोग मुझे अधिकार, अपनत्व, एतबार सौंपने में इतना कष्ट पा रहे हैं ?  ............कुछ न कह सकी।  जानती थी उसकी प्रत्येक अभिव्यक्ति में अर्थ ढूंढे जाते हैं।

उन्मेष को निरंकुश बना कर अम्मा बंूदी खिसक लीं।

पांचाली स्कूल जाने के लिये उसे सुबह उठाती वह शत्रुता ठान लेता। होम वर्क कराती, उद्दण्डता करता।  जानती थी उन्मेष का दोष नहीं है।  बड़ों की भी एक जिद और जज्बा होता है। यह तो बच्चा है।  इसे वे कारक आकर्षित करते हैं जो बाल सुलभ लापरवाही को प्रश्रय देते हों।  लापरवाही से दूर रखने के लिये बच्चे के साथ सख्ती करनी पड़ती है लेकिन उसे सख्ती करने का हक नहीं है।  उसने शेष मणी को सूचित किया - उन्मेष गृह कार्य करने में सुस्ती करता है।  बात नहीं मानता।

उन्मेष को लेकर शेष मणी अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे थे -

''पांचाली, ऐसा माहौल बनाओ कि उन्मेष तुमसे लगाव-जुड़ाव बनाने की कोशिश करे।‘’

''मतलब ?’’

''निधि की इतनी साडिय़ां हैं। पहना करो। तुम्हें उन साडिय़ों में देख कर उन्मेष को अच्छा लगेगा।‘’

क्या कहे ?  उन्मेष साडिय़ों का महत्व समझने के लिये छोटा है। आप शायद निधि के मोह से बाहर नहीं आ पा रहे हैं।

''मैं ...........

''क्या तुम सोचती हो दिवंगत के कपड़े नहीं पहनना चाहिये ?’’

पांचाली की मां कहती थीं 'मृतक के कपड़े दान कर देना चाहिये। पहनने से दोष होता है।‘

पांचाली छोटे-छोटे तर्क देने में उस्ताद थी 'तब तो जला देना चाहिये। दान पाने वाला तो पहनेगा न।  अम्मा उस बेचारे को दोष क्यों लगे ?’

पर यहां तर्क कटुता उत्पन्न करेंगे।

''अच्छा कलेक्शन है।  मैं पहनंूगी।‘’

साडिय़ां कीमती थीं लेकिन पांचाली को उतरन का बोध होता। जबकि उसे उन साडिय़ों में देखकर शेष मणी की आंखों मेें खोज दिखाई देती।  जैसे निधि के चिन्ह ढूंढ रहे हैं। पांचाली एक किस्म की ईष्र्या से गुजरती।  कह न पाती अब आप मेरे पति हैं।  मैं आप पर पूरा अधिकार चाहती हूं।  इस तरह की दावेदारी, निधि का अधिकार समझी जाती थी, उसका स्वार्थ मानी जायेगी।  उन्हीें दिनों पांचाली की दोनों बहनें उसकी समृद्वि देखने आईं।  बड़ी बहन का तकिया कलाम -

''पांचाली, मैं तो सात जनम में घर की ऐसी सजावट नहीं बना पाऊंगी। अरे, तुम कितनी कीमती साडिय़ां पहनती हो।‘’

बहनों का कौतुक देख पांचाली ने अपने विवाह में मिली साडिय़ां बिस्तर पर फैला दीं -

''तुम दोनों तीन-तीन साडिय़ां चुन लो।  मैं कितनी पहनूं?  निधि दीदी की बहुत हैं।‘’

बहनों ने साडिय़ां ऐसे हस्तगत कीं मानों लम्बित पड़ी साध पूरी हो रही है। उपकृत मझली बहन बोलीं -

''साडिय़ां तो दे दीं।  सोहर (बधाई गीत) गाने कब आयें ?’’

''जब ईश्वर की मर्जी होगी।‘’

 

 

ईश्वर की मर्जी हो गई।

गर्भ धारण कर पांचाली प्रसन्न थी।

विमाता बनी।  अब माता बनेगी।

प्रसव के लिये पधारी अम्मा ने खूब प्रपंच किया -

''उन्मेष, घर में बच्चा आने वाला है।‘’

''हां आजी।  पापा कहते हैं मेरा छोटा सा दोस्त आयेगा।‘’

''दोस्त तुम्हारे खिलौने, स्कूल बैग, साइकिल छीन लेगा।‘’

भयभीत उन्मेष सुबह होते ही अम्मा के बिस्तर से उचट कर शेष मणी के पास पहुंचा -

''पापा, दोस्त मेरी साइकिल छीन लेगा।‘’

''किसने कहा ?’’

''आजी ने।  मैं उसे मार डालंूगा।‘’

उन्मेष को गोद में उठाये शेष मणी अम्मा के सम्मुख थे -

''अम्मा, बच्चे को मत भड़काओ।‘’

''सावधान कर रहे हैं।  तुम्हें भी कर दें। अब तक फिर भी ठीक था।  अपनी औलाद का मुंह देखते ही पांचाली इसे दूध में पड़ी माछी की तरह फेंक देगी।‘’

''मैं हंू न।‘’

''तुम्हें मरीजों से फुर्सत नहीं है। उसे अपनी औलाद से फुर्सत नहीं मिलेगी। उन्मेष अकेला हो जायेगा।‘’

रसोई में चाय खौला रही पांचाली के मानस तक दुराशय पहुंच रहे थे।  उम्मीद थी शेष मणी, अम्मा के तर्क को खारिज करेंगे।  चुप रह गये।  अजन्मे शिशु का यह कैसा स्वागत है ? मां बनना कितना स्वाभाविक भाव है।  यहां अपराध समझा जा रहा है।  उसे याद है।  अपने घर में वह बहुत बोलती थी।  छोटे-छोटे तर्क देती थी।  सुने जाते थे।  जबकि मुद्दा बड़े नहीं होते थे।  यहां उसके तर्क को मुद्दा बना दिया जायेगा।  उसके भीतर दीन भाव भर गया।  कितना बोलती थी।  अब इतना चुप रहने लगी है।  उसने अपनी प्रकृति को बदल डाला।  फिर भी इस घर के लोग तुष्ट नहीं होते। 

बच्ची जन्मी है - सूचना पर अम्मा और शेष मणी ने मंगल मनाया। 

''हम भगवान से मनावत रहे घर में लच्छिमी आये।‘’

''पांचाली तुमने परिवार पूरा कर दिया।  एक बेटा, एक बेटी।  आदर्श परिवार।‘’

बच्ची का स्वागत देख दुलारी ने दांतों तले ऊंगली दबाई ''मेरे तीन लड़कियां हैं।  हर लड़की के पैदा होने पर मेरी सास कहती थी आ गई खर्चा कराने वाली।  आप लोग कितना खुश हैं।‘’

पांचाली ने कृति (पुत्री) को छाती से लगा लिया - उल्लास की पृष्ठभूमि दुलारी नहीं समझेगी। लेकिन कृति तुमने मुझे उन्मेष के हिस्सेदार (भाई) को जन्म देने के अपराध से बचा लिया।

पांचाली की अपार व्यस्तता।

उसे उन्मेष से अधिक कृति पर ध्यान देना पड़ता था। 

''मां, मैं बगीचे में पाइप से पानी डाल रहा था।  कपड़े गीले हो गये।‘’

चम्मच से कृति को दूध पिला रही पांचाली ने उन्मेष को देखा ''बेटा, अलमारी से कपड़े निकाल कर पहन लो।‘’

शेष मणी अस्पताल जाने के लिये तैयार हो रहे थे। दुराशय उन पर असर डालते थे। अति सतर्कता उनका लक्ष्य थी।  उन्हें स्पष्टत: लगता उन्मेष उपेक्षित हो रहा है -

''पांचाली, तुम तय करती हो उन्मेष क्या पहनेगा, कैसे पहनेगा। उसके कपड़े बदल दो। गीले कपड़ों में ठंड लग जायेगी।‘’

देख रही है शेष मणी मतभेद उत्पन्न करना चाहते हैं।  बहुत चुप रही।  अब बोलेगी -

''कृति को दूध पिला रही हूं।  बीच में छोड़ कर उठ जाऊं तो यह दुबारा नहीं पीती है।‘’

'' ..................।‘’

''सुन रहे हैं ?’’

''सुन रहा हूं।‘’

''उन्मेष की मदद कर दीजिये। वैसे उन्मेष छोटे-छोटे काम करना सीख ले यह गलत नहीं है।‘’

''छोटे-छोटे क्यों उससे बड़े काम कराओ।‘’

''बड़े काम करने की उसकी उम्र नहीं हुई है। जब घर में दूसरा बच्चा आने वाला हो, मां बड़े बच्चे को छोटे-छोटे काम सीखने के लिये प्रेरित करने लगती है ताकि वह जिम्मेदारी सीखे।‘’

''मैंने ऐसा क्या कह दिया जो मुद्दा बना रही हो ?’’

सब्र की एक मियाद होती है।

''आज मुद्दा बना ही दंू।  मैं जब मायके जाती हंू, आप उन्मेष को मेरे साथ नहीं जाने देते।  वह बूंदी भेज दिया जाता है या अम्मा यहां आ जाती है।  छुट्टियों में इसके मामा इसे ननिहाल ले जाते हैं। आपको फिक्र नहीं होती वहां उसके साथ क्या व्यवहार हो रहा होगा ?’’

''चुप रहती थी।  कितना बोल रही हो।‘’

''क्योंकि मुझे बुरा लगता है।  मुझसे शादी की है तो भरोसा भी कीजिये।‘’

''करता था पर अब तुम कृति पर अधिक ध्यान देने लगी हो।‘’

''मैं वैसी ही हूं, जैसी थी।  आप कुंठित लगते हैं। आपको समझना होगा। कुंठायें काम बिगाड़ती हैं।‘’

''भाषणबाजी बंद करो।‘’

शेष मणी, उन्मेष का हाथ पकड़ कर कमरे में चले गये और उसके कपड़े बदलने लगे। पांचाली के लिये राह नहीं।

बेबाक होकर सबके साथ सरोकार ..........सिलसिले बनाना चाहती है पर उसकी बातों के गलत अभिप्राय निकाले जाते हैं।  क्या वह हर किसी से विनती ही करती रहे ?  दूसरी पत्नी को लोग पूर्णत: स्वीकार नहीं करते हैं तो दूसरा विवाह क्यों करते हैं ?  फिलर की तरह इस्तेमाल करने के लिये ?  विमाता क्रूर होती है तो अपनी संतान के लिये दूसरी मां लाते क्यों हैं ?  संतान की परिचारिका बनाने के लिये ?  कितनी कुछ कहना-पूछना चाहती है। शायद कभी न पूछ सके। कितनी रुचियां खत्म होती गईं ........... इच्छायें मरती गईं .............. कोई नहीं समझना चाहता उसकी तकलीफ  कितनी जायज है।  ठीक है। उसे खुद को मजबूत करना पड़ेगा।  वही करेगी जो अपनी समझ से सही लगेगा।  कौन किस अर्थ में लेगा यह उसका मसला नहीं है। न ही उन्मेष या कृति का है।  अस्वाभाविक बन गये समीकरण के लिये न उन्मेष जिम्मेदार है न कृति।  इन्हें इनके हिस्से का स्नेह, सुरक्षा, समीपता मिलनी चाहिये।

उन्मेष और कृति।

पांचाली दोनों बच्चों को समानता देती जबकि शेष मणी ने सायास-अनायास अदृश्य विभाजन कर लिया।  उनके खेमे में उन्मेष, पांचाली के खेमे में कृति।  कृति और पांचाली के बीच प्राकृतिक गठबंधन था। कृति, पांचाली का निर्देश मानती।  कृति के अनुचित व्यवहार पर पांचाली हस्तक्षेप करती।  जबकि उन्मेष के अनुचित व्यवहार पर अपरिहार्य सख्ती करने की छूट उसे नहीं थी।  फलत: कृति समय सारिणी बना कर पढ़ती, अच्छा प्रतिशत लाती।  शेष मणी के संरक्षण में उन्मेष निरंकुश होता गया।  कृति को मारता।  गृह कार्य न कर खेलने चला जाता।  पांचाली न जाने देती तो हीमैन की तरह तन जाता -

''पापा से तुम्हारी शिकायत करूंगा।‘’

उन्मेष बात का बतंगड़ बना देता। काम के बोझ से बोझिल शेष मणी के पास प्रसंग को धैर्यपूर्वक सुनने का अवकाश न होता।  वे उन्मेष को अपने समीप बैठा लेते -

''पांचाली बहुत दखल दोगी तो उन्मेष का विकास नहीं होगा।‘’

उन्मेष, पांचाली को ऐसे देखता मानो वह स्वयं बहुत महत्वपूर्ण और पांचाली तुच्छ है।

''पढऩे के लिये कहती हंू।  कृति और इसके रिजल्ट में कितना अंतर है।‘’

''क्योंकि तुम इसे जिम्मेदारी से नहीं पढ़ाती।  इसके नाना फोन पर पूछते रहते हैं उन्मेष की पढ़ाई कैसी चल रही है।  मुझे बताना पड़ता है। कहने लगे कृति के दिमाग में कौन सी मशीन फिट है जो अच्छा रिजल्ट लाती है।  उन्मेष के दिमाग में क्या भूसा भरा है जो कठिनाई से पासिंग माक्र्स ला पाता है।  आप लोग उसका ध्यान क्यों नहीं रखते ?  सुन कर मुझे शर्म आती है।

पांचाली का चेहरा मलिन हो गया -

उन्मेष के ननिहाल वाले भी मुझे कटघरे में घसीटेंगे ?

''मैं ध्यान देती हूं ......... बच्चे की रुचि यदि पढ़ाई में न हो .........

''तुमसे न होगा।  मैं उन्मेष के लिये ट्यूशन का इंतजाम कर दंूगा।‘’

दुर्निवार स्थिति।

उन्मेष नहीं जानता था भटकन में है।

शेष मणी जानना नहीं चाहते थे दरअसल उन्मेष भटकन मेें है।

पांचाली जानती थी उन्मेष भटकन में है।  उसे भटकन का बोध कराने के लिये आधिकारिक तौर पर स्वतंत्र नहीं थी।  पाठशाला में उन्मेष किस स्तर की अनियमितता कर रहा है शेष मणी न जान पाते यदि उसके कक्षा अध्यापक फोन कॉंल कर उन्हें और पांचाली को पाठशाला न बुलाते। 

''उन्मेष से बार-बार कहा माता या पिता किसी को लाये पर आप लोग नहीं आये।‘’

पांचाली सिर झुकाये बैठी रही। शेष मणी पिता धर्म का प्रमाण देने के लिये उन्मेष को खासी पॉंकेट मनी देते हैं।  अब स्पष्टीकरण दें।  शेष मणी बोले -

''उन्मेष ने नहीं बताया।‘’

''मैं समझ गया था।  इसीलिये कॉंल किया। उन्मेष रेग्यूलर स्कूल नहीं आता है।‘’

''घर से ठीक वक्त पर स्कूल के लिये निकलता है।‘’

''लेकिन पहुंचता नहीं। आज भी नहीं आया। मंथली टेस्ट में कभी पास नहीं होता।  आप उसके रिपोर्ट कार्ड में साइन कर देते हैं।  कभी पूछते हैं पास क्यों नहीं होता ?’’

''मुझे रिपोर्ट कार्ड नहीं दिखाता।‘’

''इसका मतलब फेक साइन करता है। मानता हंू आपको मरीजों से फुर्सत नहीं मिलती पर मैडम आपको जानकारी रखना चाहिये। मुझे नहीं लगता वह वार्षिक परीक्षा में पास हो जायेगा।‘’

पांचाली का झुका सिर अधिक झुक गया - मास्टर साहब आप तो जानते हैं व्यस्तता के कारण पिता बच्चों की गतिविधियों को कम जानते हैं।  बच्चों की गतिविधि मां, पिता को प्रेषित करती है।  मुझे यह मोहलत नहीं मिली। डॉंक्टर साहब के मानस में उन्मेष इतना समाया हुआ है कि वाजिब शिकायत करूं तो ऐसी मुद्रा बना लेते हैं मानो त्रस्त कर रही हंू।  मुझे सीमायें बताई जाती हैं।  व्यवहार करने के तरीके मुझ पर आरोपित किये जाते हैं।  स्थिति का लाभ ले बच्चा नादानी करने लगा है।  स्पष्टीकरण मांगना है तो मुझसे नहीं उन्मेष की आजी, पिता, समाज से मांगिये।

पांचाली और शेष मणी आंखें झुकाये बैठे रहे।  पांचाली नमी को छिपा रही थी।  शेष मणी शर्म को।  आध्यापक ने स्थिति समझी। 

''आप लोगों ने मुझे वक्त दिया। उन्मेष को समझा देंगे।‘’

उन्मेष ने नहीं सोचा था आज का दिन भिन्न होगा।  घर में घुसते ही शेष मणी ने कड़े रुख में पूछताछ की -

''उन्मेष कहां से आ रहे हो ?’’

उन्मेष कैसे बताता मूवी देख कर आ रहा है।  मूवी देखना जाहिर न हो इसलिये उसने अच्छी युक्ति लगाई थी। दोपहर तीन बजे वाले शो में इंटरवल के बाद की मूवी देखता।  दूसरे दिन शाम छ: बजे के शो में इंटरवल के पहले की।

''पापा, ट्यूशन ................।‘’

शेष मणी ने उसे घसीट लिया।  ''झूठ मत बोलो ......... मैं तुम्हें डॉक्टर बनाना चाहता हूं ........ तुम वॉंर्ड ब्वॉंय नहीं बन सकते .........।‘’

शेष मणी उन्मादी की तरह उसे पीटने लगे।  पांचाली स्थिति बूझती जड़वत खड़ी रही फिर उन्मेष को बचाते हुए खुद झटके खा गई -

''छोडिय़े ........... दोष उन्मेष का नहीं, आपका ......... बल्कि मेरा है ........... न मैं इस घर में आती, न इतना तनाव बनता ........... छोडिय़े ............।‘’

पांचाली के दखल से शेष मणी की पकड़ कमजोर हो गई।  छूट कर उन्मेष दीवार से चिपक कर थर थरा रहा था।  एक ओर खड़ी, हिचक कर रो रही कृति ने उसे सहारा दिया -

''भैया, अपने कमरे में चलो।  पापा गुस्से में हैं।‘’

स्याह अंधेरों वाली भयावह रात।

किसी ने खाना नहीं खाया।

अपने-अपने शयन कक्ष में सब ऐसे छुपे थे जैसे फरारी काट रहे हैं। आखिर पांचाली ने पूछा -

''नींद नहीं आ रही ?’’

शेष मणी की आवाज ऐसी थी मानो खुद से जूझ रहे हैं -

''कुछ अम्मा ने उकसाया, कुछ मेरी सतर्कता, कुछ तुम पर नियंत्रण, कि मनमानी न करने लगो। पांचाली मैंने उन्मेष का तो अनर्थ किया ही, तुम्हारा भी अपमान किया। जानता हूं पीएमटी निकालने के लिये किस मेहनत, माहौल, मानसिकता की जरूरत होती है लेकिन मैंने उन्मेष से कभी नहीं पूछा क्या पढ़ रहे हो ?  क्या समझ में नहीं आ रहा है।‘’

''बच्चे कच्ची मिट्टी का पिण्ड होते हैं।  उन्हें आकार देना पड़ता है।‘’

''मैं हताश हूं।  तुम उन्मेष को राह पर लाने की कोशिश करो।‘’

''सब ठीक होगा।‘’

यह आश्वासन वह शेष मणी को कम स्वयं को अधिक दे रही थी।

परिवर्तन एक अतिरंजना की राह देखता है या निष्ठा से किये गये प्रयास विफल नहीं होते या लड़ाई कितनी ही घमासान हो मंद पड़ते हुए एक दिन खत्म हो जाती है या वे ज्ञान बांटने के क्षण थे।  नींद किसी को नहीं आ रही थी।  सब पूर्णत: मौलिक तरीके से सोच रहे थे। दृश्य शेष मणी की चेतना पर वार कर रहे थे -

पांचाली ने सहा है।  कृति घर में व्याप्त तनाव के कारण स्वाभाविक भाव में नहीं रह पाती।  घर में बन गये दो खेमों के कारण मुझसे सम्पर्क, समीपता नहीं बना पाती।  न मैंने बनने दी। अब उसने मान लिया है मैं उन्मेष का और पांचाली उसकी हमदर्द है।  ........ बेचारा उन्मेष।  मैंने इसे उदारता खूब दी, दिग्दर्शन देना याद न रहा। वह चिकित्सक बने मेरा अरमान है ........ जो शायद अरमान ही रह जाये।

दृश्य उन्मेष की चेतना पर वार कर रहे थे - मां मुझे बचाते हुए पिट गईं।  कृति छोटी है पर संरक्षिका की तरह सुरक्षा देते हुए मुझे कमरे में ले आई।  पापा ने हद दर्जे की हिंसा की।  मुझे लग रहा है मेरी सामथ्र्य कम हो गई है।  क्षमता का उपयोग मैं नहीं कर पाया .............

 

दृश्य पांचाली की चेतना पर वार कर रहे थे - मैंने जोखिम और अनिश्चितता में दिन बिताये हैं कि एक दिन यह घर सही वेव लेंथ पर आ जायेगा।  आज जो हुआ ........ होता रहा तो कैसी परिस्थिति का निर्माण होगा ?

दृश्य कृति की चेतना पर वार कर रहे थे - मां, मोर्चे पर अकेली हैं। उन्हें कहीं से मदद नहीं मिलती।  भैया को समझाऊंगी वे तुम्हारी मां हैं, जैसे मेरी।

बारहवीं में उन्मेष दूसरी बार अनुत्तीर्ण हो गया।  खोज-बीन करने उसके बड़े मामा चले आये -

''निधि नहीं रही। आने में संकोच होता है। उन्मेष की फिक्र रहती है, सो छठे-छमासे देखने आ जाता हूं।‘’

शेष मणी ने सदाशयता दिखाई ''आपका घर है।  संकोच कैसा ?’’

''आप इसे डॉंक्टर बनाना चाहते थे न ?  निधि ने इसके जन्म पर कहा था परिवार में एक और डॉंक्टर आ गया।  यह दो बार से ट्वेल्थ में फेल हो रहा है।  मेरे गांव के परीक्षा केन्द्र में बड़ी नकल होती है।  उन्मेष को वहां से परीक्षा दिलाइये। अच्छे नम्बरों से पास हो जायेगा।‘’

शेष मणी सफल नहीं हताश चिकित्सक लग रहे थे ''किताब नहीं उठाता। अच्छे नम्बर कैसे लायेगा ?''

''किताब उठाने का माहौल भी तो ............

मामा नहीं जानते थे शीश झुकाये उनका कीर्तन सुनते उन्मेष के भीतर क्या प्रतिक्रिया चल रही है।  दृढ़ता से बोला -

''मामा, माहौल जो भी रहा, मुझे बर्बाद करने वाली मां नहीं, पापा, आजी, आप लोग हैं।  मैं अपना भला-बुरा नहीं समझता था पर पापा समझते थे।  इन्होंने मुझे कभी सही सलाह नहीं दी।  मां ने दी पर मैं उनके साथ गलत सलूक करता रहा।  मुझे शर्म आती है।  वे गलती नहीं करतीं लेकिन हर कोई उन्हें गलत साबित करने पर तुला है।  जबकि मैं देखता हंू वे डर कर रहती हैं।‘’

मामा का मुख दांव हारने के भाव से जर्द हो गया ''बेटा, यह तुम नहीं तुम्हारी हताशा बोल रही है।  बचपन से कहते आये हो डॉंक्टर बनोगे।  बारहवीं में अटके हो।‘’

''मामा, मैं अपनी क्षमता खो चुका हंू।  वार्ड ब्वॉंय बनने के लायक नहीं हूं।‘’

''उन्मेष अच्छा सोचो, अच्छा होगा।  गांव के स्कूल से तुम्हें अच्छे नम्बर मिल जायेंगे। तुम्हारे पापा डोनेशन से किसी मेडिकल कॉंलेज में प्रवेश दिला देंगे।  तुम डॉंक्टर बनोगे।‘’

''डॉंक्टर बनने की मेरी इच्छा नहीं है।  कृति जहीन है।  डॉंक्टर बनेगी।‘’

''कृति ?  उन्मेष लोग हंसेंगे।  घर का चिराग कुछ न कर सका, लड़की पिता का साम्राज्य सम्भालने चली है।‘’

''मामा वह डिजर्व करती है।‘’

पांचाली की बहुआयामी विजय।

एकाएक बहुत कुछ वांछित सा लगने लगा। नहीं सोचा था उद्दण्ड उन्मेष इतना आज्ञाकारी हो जायेगा। अपनी जरूरत, मांग शेष मणी से नहीं उससे बतायेगा।  पढ़ाई पर एकाग्र होने लगेगा। कृति को चिकित्सक बनने के लिये प्रेरित करेगा। पहले ही प्रयास में अच्छे रैंक के साथ पीएमटी पास करने का उल्लास मनाने में कृति यूं झिझक रही थी मानो उसने उन्मेष को चिकित्सक बनाने के शेष मणी के सपने को अपने लिये पंजीकृत कर लिया है।  पता नहीं क्या सोच कर या कुछ भी नहीं सोच कर शेष मणी उसे भरपूर शाबासी नहीं दे पा रहे थे। जबकि उन्मेष ऐसा मोद मग्न हुआ मानो कृति की सफलता उसका अभीष्ठ हो -

''अरे डॉंक्टरनी ?  क्या रैंक है।  तुम्हें बहुत अच्छे कॉंलेज में एडमीशन मिलेगा।  काउन्सिलिंग में मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।‘’

कृति भावुक हो गई - भैया मुझे अपना तौलिया नहीं छूने देता था।  आज मेरी सफलता का जश्न मना रहा है।

''भैया, तुम बहुत अच्छे भाई हो।  मेरी बहुत मदद करते हो।‘’

''कृति, मैंने अपनी ही मदद नहीं की, तुम्हारी क्या करूंगा।  सिम्पली बीएससी कर रहा हूं।  पर तुमने इस घर को बहुत बड़ी खुशी दी है।‘’

पांचाली उन्मेष को देखती रही - कैसा वंचित सा नजर आ रहा है। विषमताओं ने मुझे ही नहीं इसे भी छला है।  शेष मणी की सतर्कता ने इससे वे अवसर छीन लिये जो शायद इसे मिलते। संतोष बस इतना है कि अब तक का बोझ, दबाव, थकान उतर गई लगती है।  थोड़ा सा आनंद, थोड़ी सी तसल्ली, थोड़ी सी कद्र, थोड़ा सा अपनत्व, थोड़ी सी उम्मीद, थोड़ा सा अधिकार ..... इतना ही तो चाहा था।  याद आते हैं अपने कई-कई रूप।  तेईस साल की लड़की .......... जो एक बच्चे के पिता से विवाह करने में हिचक रही थी ......... निष्ठापूर्वक सहज विश्वास पाने के लिये प्रयास करती पत्नी जिसे हर ओर से सलाह और संदेह मिल रहे थे, ........... आधिकारिक जगह पाने के लिये कर्तव्य करती गृहस्वामिनी .......।  इस घर में बरस बिता दिये।  अब जाकर लगता है घर, घर और वह गृहस्वामिनी बनी है।

कृति को भोपाल मेडिकल कॉंलेज में प्रवेश मिल गया। कृति को ट्रेन में बैठाते हुए पांचाली खूब रोई।  जब-जब संकट गहराया इस बच्ची ने अपने होने का बोध खूब कराया। कृति के साथ जा रहे उन्मेष ने रोती हुई पांचाली को थाम लिया।  मानो संकेत दे रहा हो - मां मैं, तुम्हें वही समीपता दंूगा जो कृति देती है।

उन्मेष अब शेष मणी के सम्मुख कम जाता। अपनी जरूरत मांग पांचाली के माध्यम से उन तक पहॅुंचाता।  पांचाली ने शेष मणी को बताया -

''उन्मेष मेडिकल स्टोर खोलना चाहता है।‘’

शेष मणी को अपना सपना याद आ गया ''जॉंब नहीं करेगा ?’’

''नहीं।‘’

''क्यों ?’’

''डॉंक्टर नहीं बन सका।  मेडिकल स्टोर खोल कर मेडिकल लाइन से जुड़े रहना चाहता है।  कहता है पापा और कृति मरीज देखेंगे।  यह दवाई की खूब बिक्री करेगा।‘’

''कृति की शादी हो जायेगी। चली जायेगी।‘’

''उन्मेष के पास पूरी योजना है।  कृति की शादी डॉंक्टर से करेगा।  दोनों यहां सैटिल होंगे।‘’

''पांचाली, मुझे उन्मेष के लिये हमेशा दु:ख रहेगा। मैंने उसका बहुत अहित किया।‘’

''जो चाहता है करने दें। आपका बनाया हुआ उसके लिये पर्याप्त है। मेहनत करेगा तो मेडिकल स्टोर की अच्छी बरकत होगी। सैटिल हो जाये, उसकी शादी कर दें।  जिये अपनी जिंदगी।‘’

''ठीक कहती हो।‘’

उन्मेष ने मेडिकल स्टोर का उद्घाटन पांचाली से करवा कर छिद्रान्वेषण करने वालों को पटकनी दी।  पांचाली ने उन्मेष के विवाह पर उसकी पत्नी पन्ना को निधि के गहने सौंप कर अपने विरोधियों को विस्मित कर दिया।  वयोवृद्ध अम्मा का अब सिर हिलने लगा है।  सिर हिलाते हुए सोचती हैं बंूदी में कितने लोगों के बेटे-बहू अलग हो गये।  पांचाली ने उन्मेष और पन्ना को कौन सी बूटी खिलाई जो बिना रक्त संबंध के इतना अच्छा समायोजना चल रहा है।  पुजाई कराने बेटे-बहू को लेकर बूंदी पहुंची पांचाली से अम्मा ने पूछा -

''पन्ना, तुम्हारी इज्जत करती है न ?’’

''हां अम्मा। पन्ना क्या आई, मुरादों वाले दिन आ गये। उसे गृहस्थी सौंप कर आराम फरमा रही हंू।‘’

अम्मा के चेहरे में छा गया अकाल, दरअसल पांचाली का विजयोत्सव था।