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Monday 20 Nov 2017

                  (1)

नदी के सामने आ कर रुकेगा काारवां दिल का

कई जन्मों से प्यासा है, असल में आसमां दिल का।

 

चलो इन बंद कमरों में ही कोई रास्ता ढूंढें

कहीं ऐसा न हो कि मार ही डाले धुआं दिल का।

 

ज़रा सी ठेस लगते ही बिखर जाएगा शीराजा

बहुत मुश्किल से बन गया है यह कच्चा मकां दिल का।

 

दिलों की बात दिल में दफ्न हो जाये तो बेहतर है

सिवा दिल के नहीं होता है कोई राज़दा दिल का।

 

हज़ारो बार तिनके जोड़ कर फिर से बनाया है

हज़ारो बार उमड़ा है यकीनन आशियां दिल का।

 

               (2)

पराई आग में जल भुन रही है

अधूरी ज़िंदगी सर धुन रही है।

 

अजब होती है सूरज की ललक भी

अंधेरे रास्तों को चुन रही है।

 

कहो, खुल कर कहो, जो जी में आये

तुम्हारी बात दुनिया सुन रही है।

 

बहुत पहरे हैं अपनी सोच पर भी

मगर उम्मीद सपने बुन रही है।

 

हैं पनघट भी बहुत मायूस अब तो

कभी पाजेब की रुनझुन रही है।

 

               (3)

मातम की धुन रोज बजाना बंद करो

दीवारों को दर्द सुनाना बंद करो।

 

हर पत्थर के दिल में पत्थर होता है

पत्थर से शीशा टकराना बंद करो।

 

देखो फिर तुम खुद बेघर हो जाओगे

अपने घर में आग लगाना बंद करो।

 

सारी दुनिया बुरी कहां हो सकती है

हर दामन पर दाग लगाना बंद करो।

                (4)

लगता है यह लाईलाज़ बीमारी है

आने वाला हर इक लम्हा भारी है।

 

दिन तो जैसे-तैसे बीत गये लेकिन

मुश्किल से हमने हर रात गुजारी है।

 

क्या जाने क्यों तेज-कदम सब हार गये

हारी-थकी टीम ने बाजी मारी है।

 

गलत-सही के बीच हुई थी शुरू कभी

सदियों से वह जंग अभी तक जारी है।

 

मीठे-मीठे सपने देने वाली भी

आंसू की यह झील नमक से खारी है।

 

                (5)

किसी का भी बुरा करते नहीं हैं

दिलों के ज़ख्म क्यों भरते नहीं हैं।

 

यहां ऐसा भी कोई पेड़ है क्या

कि जिसके पत्ते अब झरते नहीं हैं।

 

अगर इंसान है तो डर भी होगा

कहा किसने कि हम डरते नहीं हैं।

 

जो भी आया वो गया है

महज शायर हैं जो मरते नहीं हैं।