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Tuesday 22 Jan 2019

गज़़ल

         (1)

 

बस्ती बस्ती पहरा है

वक़्त यहां पर ठहरा है!

 

सागर को मालूम नहीं

सागर कितना गहरा है!

 

नई सदी की सीरत में

चेहरे पर चेहरा है!

 

सन्नाटों ने जाल बुना

$गमजदा अभी सहरा है!

 

रोशन हुई नाकामियां

फिर भी ख़्वाब सुनहरा है!

 

कब तक भीड़ जुटाओगे

हा$िकम गूंगा-बहरा है!

 

          (2)

आगे कैसी दलदल है

भीतर मेरे हलचल है!

 

कैसे हम बच पाएंगे

नदिया में दूषित जल है!

 

नभ से देखो झांक रहा

आवारा सा बादल है!

 

 

अपनी पीर वही जाने

मैला जिसका आंचल है!

 

मानवता क्या हार गई

नम दुल्हन का काजल है!

 

नहीं महक पहचानी सी

लगता नकली सन्दल है!

 

राजनीति के जंगल में

मिलता रावण सा छल है !