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Thursday 23 Nov 2017

बुआ बीसवीं सदी की

बुआ बीसवीं सदी की

बचपन में बहुत याद आती है

बुआ!

ठीक वैसे ही जैसे

मां के न होने पर याद आती है माँ

वे मां का स्थानापन्न भी होती हैं.

 

बुआ का तीज-त्यौहारों पर घर आना

करता है आह्लादित पिता को

ठीक वैसे ही जैसे

खोया हुआ धन

एक बार फिर मिल जाना

 

मांगलिक कार्यों में

बुआ का महीने भर पहले आ जाना

घर की कमान अपने हाथों में ले लेना

उत्सव में रंग भरना

दिन भर मेहनत करना

थकान से परे

आत्मसंतुष्टि का खजाना

 

बच्चों का नहलाना, धुलाना

रोते हुए को पुचकारना

मान-मनुहार करना

न जाने कितने काम

सारे बुआ जी के नाम

 

समस्याओं के निदान-बुआ से पूछो

कब क्या बनना है? -बुआ से पूछो

 

एक बुआ ही तो है

जो देती रहती है

पिता को स्नेह और सम्बल

 

एक बुआ ही तो है जो

बांटती है ममत्व

अपनों को अपनत्व

घर में बिना किसी प्रभुत्व

 

बुआएँ नहीं होती

चक्रवात की तरह

गरजते बादलों के बीच

कुशल होती हैं चक्रव्यूह से निकालने में

बिना किसी संशय के

 

ये पवित्र मना बुआएँ ही तो हैं

जो लगाती रहती हैं फेरा

माता-पिता के रहने तक

अनवरत-निर्बाध और निस्पृह

बिना किसी आमंत्रण के

प्रभु से इस प्रार्थना के साथ

कि बना रहे

मायके में स्नेह, सौहार्द्र

शांति और सद्भाव.

पर !

बीसवीं सदी के तीन चौथाई

हिस्से पर

एक छत्र राज करने वाली

दबदबा मयी बुआ

संयुक्त परिवार के क्षरण के साथ

विलीन होगई सहसा

सुबह की गुनगुनी धूप की तरह.

 

समय के प्रवाह में

मिठास खो चुके सभी रिश्तों में

अपनी प्यारी और पुरानी बुआ

को खोज पाना

बड़ा ही मुश्किल काम

बुआ!

तुम्हें एक बार फिर प्रणाम