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Sunday 19 Nov 2017

सुनो प्रिय

 सुनो प्रिय 

 

न तुम राजपुरुष थे न मैं राजस्त्री

किन्तु हमारा जीवन

एक राजसी ठाठ ही रहा

मैं एक राजमहिषी सी

आन बन शान से

अपने इंद्रप्रस्थ में रही

वन विहार सा किया हमने पर्यटन भी

आधुनिक ऐश्वर्य के भोग की अतृप्त इच्छाएँ

नहीं थी हमारे शब्दकोष में

धन संग्रह की लालसा से परे

हर क्षण जीवन का

एक अनिवार्य अनुष्ठान सा रहा

कौन सा गांव कौन सा घर कौन सा रिश्ता

हमारी पहुँच से दूर नहीं था कोई

हर रिश्ते की हर मर्यादा को जीते

स्नेह की बूंदों से सींचते रहे

हमारे साझा सम्बन्ध

अप्रिय स्थितियाँ आतीं

और हार मान लौटती रहीं

पर्णकुटी भी प्रासादों सी जगमगाती रही

ऐसा नहीं कि मुझे विस्मृत हो गया हो पितृगृह

खूँटे से बंधी बछिया सी

दौड़ती रही पीहर

जबकि नहीं था कोई बन्धन

तुमसे प्रेम दाम्पत्य मुझे मुक्त रखता था

जैसे मैं तुम्हें सहेजने देती थी

तुम्हारे रक्त ऋण खुद को न्यौछावर कर

स्त्री का मायका उसकी साँसोँ में

डूबता उतराता है

जैसे प्रवासी चिडिय़ा लौटती है कुछ दिन

कुछ विशिष्ट दाने पानी के लिए

सोचती हूँ कितनी विवश थीं

सीता कुन्ती और पांचाली

जो सप्तपदी के बाद लौटी नहीं कभी

पगफेरा करने मिथिला मथुरा और पांचाल

संघर्षों के उपहारों से सजा रहा

हमारा पथ भी

किन्तु रथ के अग्रचक्र

हर साल मुझे खींच ले जाते

मेरे बालारण्य में

जहाँ मैं पहाड़ों की रानी थी

और तुम मुझे सदा की तरह निश्चिन्त करते

हर बात भुला अपने प्रवास को जी भर जीना

लौटकर हर बार संवरा नीड़ पा

तुम्हारी कार्यक्षमता और समर्पण चकित कर देता

किसी भी परिस्थिति में किसी युक्तिपूर्ण उत्तर से एक दूसरे को

कभी सन्तुष्ट करने का प्रयत्न

न किया हमने सच कहा

और भी सच ही चाहे

कितना ही कष्टदायी और अप्रिय रहा

तब ही मैं और तुम

हम बन सके प्रिय

 

खानदानी

मेरे जेहन में दर्ज हैं कुछ स्मृतियाँ

जो आश्वस्ति हैं इस बात की

कि अभी भी बचे कुछ लोग पानीदार हैं

हाँ वे लोग खानदानी हैं

वे रिक्शावाले हैं, किसी बसस्टॉप पे खड़े

बेरोजगार लड़के भी हो सकते हैं

ऑफिस में कलम घिसता कोई सहृदय भी

तुम जिसे मामूली आदमी कहते हो

 

हाँ ये वे ही लोग हैं

जो मुसीबतजदा ल?की को

पहुँचा देते हैं गन्तव्य पे सुरक्षित

बलत्कृत होने से पहले

हाँ ये वे ही बेरोजगार आवारा लड़के हंै

जो किसी सभ्य भेडिय़े की छेड़छाड़

और गन्दी निगाहों से

बचा लेते हैं एक मासूम लड़की को

हाँ आप सही समझे

वो मामूली आदमी

जो आपकी मौके का फायदा उठाने की

घिनौनी साजिश से

बचा लेता है एक लाचार विधवा स्त्री को

बिना चक्कर कटवाये

उसका काम आसान करके

दिलवा कर उसके क्लेम

और भी बहुत हैं

जो नहीं उठाते किसी की मजबूरी का फायदा

कर देते हैं अपना काम

ईमानदारी से

नहीं पड़ते किसी लोभ ,लालच में

 

हाँ वे लोग खानदानी हैं

बगैर किसी अभिजात्य के टैग लगाये

 

विश्वास

हर बाढ़ के बाद नदियाँ

उपजाऊ बना जाती हैं मिट्टी

हर सूखे के बाद

बारिशें धो देती है अवसाद

 

आकाश की नीली ओढऩी

रात के स्याह बदन को

नहीं रहने देती अनावृत

 

धूप पहाड़ों पे सुस्ताती

भर देती है,देह में ऊष्मा

औसारों पे धान कूटती स्त्रियों की

 

हर बार थक कर

गिर कर घुटने तुड़ा बैठा सांवला बच्चा

फिर से खड़ा हो जाता है

 

धरती की कोख में

विश्वास के बीज

हमेशा पनाह पाते हैं,

अपने अस्तित्व के आधार को

बचा कर रखा है धरा ने 

 

           पिता के न रहने पे

धुंध के लिहाफ का एक छोर हटा के

   झाँकती है, उदास पहाड़ी

   उम्मीद कोई आहट न पाके

  वापस सिमट जाती है अपने आप में

 

  कैसी भी धुंध बारिश सर्द हवाएँ

   कहाँ रोक पाती थीं,पिता को

ब्रम्ह-मुहूर्त में उनका जागना अनिवार्य था

दु:ख तकलीफ बीमारी आलस्य

उन्हें देखते ही छूमन्तर हो जाते थे जैसे

 

सूर्योदय से पूर्व, पहाड़ी की ढलान तक

सुबह की सैर उनकी प्रतीक्षा में टिकाये रखती थी

जंगली खरगोशों की उछल-कूद को

.........यथावत

भोर का तारा भी उनकी आमद का

  इस्तकबाल सा करता था

वापसी में चिडिय़ाँ कलरव से

गौ-वत्स रंभा-रंभा के आकृष्ट करते थे

  उनका ध्यान अपनी ओर

.......और वे थपकियाँ सी देते चलते

खुशनुमा माहौल को ज्यूँ

भास्कर की प्रथम रश्मि

सदा अपने ऊगने का समय मिलाया करती

पिता की शंख-ध्वनि से

जिसे मानो विधाता ने स्वयं

अलार्म भरके सेट किया हो जैसे

स्वस्ति-वाचन और मंगल-आरती के स्वर

पवित्र कर देते दशों-दिशाओं को

आचमन से आकंठ-तृप्त हो जाते मानव-मन

कितनी ही पगडंडियां निर्मित कर गए है पिता

जिनपे होके सुबह गुजरती है हर रोज़

........किन्तु कितनी उदास-उदास

  जहाँ वे धो डालते थे विषाद

अपने गगन-चुम्बी अट्टहासों से

फैल जाती थी,खुशियों की चादर

  हटा के उदासी की बदलियों को

छेड़ देते थे, राग किवदन्ती और छा जाते थे

मुहावरों के आकाश में लोकोक्तियाँ बनके

हर मौसम हर माहौल हर वक्त और हर शै का

.........कर देते थे इलाज

अपने पिटारे से निकाल एक जादुई पुडिय़ा

  किसी सुलझे हुए अनमोल वचन की

जिन्दगी के बेमुरव्वत थपेड़ों ने

ऐसे पकाया था उन्हें

जैसे तपके निकलता है खरा सोना

भूख की लिखावट नैतिकता की गिरावट को

कैसे, पेशानी उकेरती है चित्रलिपि में

  मिसालें दे के वे  सहज ही हल कर देते

.........यक्ष-प्रश्न

पूछे जाने से पहले

प्रबंधन का कौशल

नियति ने स्वयं ही आत्मसात करा दिया था।

.........,प्रिया के अस्थि-विसर्जन के

  तत्काल बाद ही निष्णात बन गए थे

  हर अनजाने क्षेत्र के जाते ही प्रिया के

 

उनकी नींद विलीन हो गई थी

  हमारी मयूरपंखी आकाँक्षाओं के

सुनहरे घेरे में.....और हम

कभी जान ही नहीं पाये

हम चाहते और वे पूरी कर देते

हमारी चाहना

हमें सुला के गुदगुदे बिछौनों पे

वे आवाहन करते निद्रा-देवी का

......किन्तु वे आती अथवा नहीं

हमें ज्ञात ही नहीं

हमने तो उन्हें जागते ही पाया

....सदैव सजग प्रहरी सा

अंतिम क्षण तक वे सहेजते ही रहे

अपने हिस्से के सुख  और आराम

   सिर्फ हमारे लिए

तपते रहे जूझते रहे सहते रहे

धूप बारिश आंधी संकट

  और अपने तपोबल से निरन्तर

करते रहे प्रशस्त  हमारा मार्ग

  और सिखा गए जीना आखिरकार हमें

  इस निष्ठुर संसार में

पिता के न रहने पे