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Wednesday 22 Nov 2017

शहर जैसा गांव

शहर जैसा गांव

 

नन्हकू ने छेक लिया सीधा टकराव

लेकिन गहराई तक उतर गया घाव

 

जबसे ऐलान हुआ बदल गया नेता

खुशियों से फूल गया बुधुवा का बेटा

अखर गया मुखिया को ऐसा फैलाव

 

बांच दिया मुखिया ने जमकर चालीसा

चटक गया टोले का चम़कीला शीशा

उभर गया टुकड़ों में मूंछों का ताव

 

फहर गया टोले पर अलग-अलग झण्डा

निगल गया खुशियों को सपनों का फन्दा

चाक हुई पुश्तैनी बरगद की छांव

 

टोप गया परिवर्तन जहरीली खाई

मौसम ने छीन लिया भाई से भाई

सचमुच का शहर हुआ भोला सा गांव

 

बुधुवा और झबरा

 

पता नहीं किस्मत खुली या अभाग का द्वार

छलका बुधुवा के लिए मंत्री जी का प्यार

 

पहुंच गया तिउहार मनाने सारा अमला

बरगद को झुक गया देख हरियाया गमा

लगे खींचने फोटो जमर टी.वी. और अखबार

 

मुखिया की थाली गिलास ने की अगवानी

प्रकट हो गया मड़ई में बोतल का पानी

खुशी-खुशी में गले पड़ गया थोड़ा और उधार

 

प्रायोजित है रोटी, गुड़ दे गया कसाई

भरत-मिलाप देखकर हंसती गहरी खाई

भौंचक है टोला निहारकर कलयुग में अवतार

 

पुश्तैनी यादों का सेजरा खुला हुआ है

बुधुवा, चढ़ी कड़ाही का गुलगुला हुआ है

गदगद है बुधनी समेटकर वादों का उपहार

 

जिस दिन से मौसम चुनाव का सजग हो गया

बुधुवा का दर्जा, झबरा से अलग हो गया

कुक्कुर भला कहां से पाये वोटिंग का अधिकार।

 

घुड़साल

 

खुली हुई घुड़साल

दौड़ रहे हैं गधे, ओढ़कर

घोड़े जैसी खाल

 

कुछ घोड़े नाराज चल रहे

जमकर ठनी हुई है

पंजीरी के दाम बढ़ गये

चाहत बनी हुई है

 

मनचाहा असबाब बेचकर

मोटे हुए दलाल

 

अगर बांधने आ जाएगा

पाजामे का नाड़ा

मिल जाएगा सभी गधों को

छोटा-मोटा बाड़ा

 

ठुंकी रहेगी खुर में सबकी

असली खालिस नाल

 

पूंछकर उठाकर करे सलामी

सपना लिए लगा है

लेकिन मालिक समझ रहा है

कितना कौन सगा है

 

फिर भी धोखा खा जाता है

हर माई का लाल।